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40 करोड़ लोगों द्वारा देखे जाने वाले एक टीवी सीरियल ने बदली ग्रामीण भारत में लिंग मान्यता

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प्रतापगढ़ के एक गांव में ( जो कि हिंदी क्षेत्र में कहीं भी हो सकता है) एक युवा पुरुष रवि को पता चलता है कि उसकी पत्नी सीमा गर्भवती है। रवि को पता चलता है कि इस बार भी सीमा के गर्भ में एक बच्ची ही है। इसके पहले भी उन्हें दो बेटियां ही थी। वह बच्चे का गर्भपात कराना चाहता है, क्योंकि तीसरे बच्चे के रूप में उसे लड़के की चाहत है। वह सीमा को डॉक्टर के पास ले जाता है, जो गर्भपात करने के लिए राजी होता है। हालांकि 20 सप्ताह तक के भ्रूण का ही गर्भपात किया जा सकता है। सीमा का गर्भपात हो जाता है, लेकिन उसकी स्थिति गंभीर है। उसे काफी खून का नुकसान हुआ है। उसे उसकी बहन स्नेहा बचाती है, जो एक आदर्शवादी युवा चिकित्सक है। वह उसे अस्पताल ले जाती है। साथ ही पुलिस को फोन करने की धमकी देती है।

 

यह‘मैं कुछ भी कर सकती हूं’ नाम के टीवी कार्यक्रम के चौथी और पांचवीं कड़ी की कहानी है। यह दिल्ली स्थित जनसंख्या अनुसंधान और वकालत संगठन ‘पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ (पीएफआई) द्वारा निर्मित एक धारावाहिक है।

 

इस धारावाहिक में, महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य और लिंग के अधिकारों के बारे में बात करने के लिए शिक्षा और मनोरंजन का उपयोग किया गया है।

 

इस धारावाहिक में, मुख्य किरदार, स्नेहा माथुर के जरिए बाल विवाह, पहली बार गर्भवती होने की उम्र,  बच्चों के बीच अंतर, परिवार नियोजन, सेक्स चयन, स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता और घरेलू हिंसा जैसे विषयों को दिखाया गया है।

 

धारावाहिक राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन पर दो सीजन, 2014 से 2016 तक प्रसारित हुआ है और इसके पहले सीजन में 58 मिलियन दर्शकों द्वारा देखा गया था, जैसा कि ‘टेलिवीजन ऑडिएंस मेजरमेंट एंड इंडियन रिडरशिप सर्वे’ में पता चलता है। दूरदर्शन के मुताबिक दो सीज़न और उनका दोबारा प्रसारण, संयुक्त रुप से  400 मिलियन लोगों तक पहुंचा है।

 

यह प्रोजेक्ट ‘यूनाइटेड किंगडमस डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेश्नल डेवलपमेंट’ और ‘गेट्स फाउंडेशन’ द्वारा वित्त पोषित और ‘संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष’ द्वारा समर्थित है। वर्ष 2015 पीएफआई अध्ययन के अनुसार, यह कार्यक्रम दृष्टिकोण बदलने में कामयाब रहा है।

 

हालांकि, 73 फीसदी महिलाओं को धारावाहिक शुरु होने के पहले ही शादी की कानूनी उम्र के बारे में पता था और पहले सीजन के बाद ये आंकड़े 83 फीसदी हुए हैं, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है। धारावाहिक शुरु होने से पहले, 57 फीसदी पुरुषों के मन में गर्भनिरोधक के आधुनिक तरीकों का उपयोग न करने के दुष्प्रभावों का डर बैठा था। पहले सीजन के बाद यह संख्या 32 फीसदी हुई है।

 

लोकप्रिय मनोरंजन सामाजिक संदेश के लिए उपकरण

 

लिंग के अधिकारों पर महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश देने के लिए लोकप्रिय मनोरंजन का उपयोग क्यों किया जा रहा है? क्योंकि कार्यकर्ताओं के मुताबिक यह तेजी से अपने लक्ष्य दर्शकों तक पहुंच सकता है और उनका संदेह दूर हो सकता है।

 

महिला सशक्तिकरण में कुछ निराशाजनक रुझान हैं। वर्ष 2015-16 में, प्रजनन आयु समूह में केवल 53.5 फीसदी महिलाएं गर्भनिरोधक के आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल किया है। हम बता दें कि वर्ष 2005-06 में यह आंकड़े 56.3 फीसदी थे, जैसा कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 डेटा में बताया गया है। वर्ष 2015-16 में, 28.8 फीसदी विवाहित महिलाओं ने वैवाहिक हिंसा का सामना किया है। ग्रामीण क्षेत्रों का यह आंकड़ा 31.1 फीसदी का है।

 

पीएफआई के कार्यकारी निदेशक और विकास क्षेत्र के 40 वर्षीय अनुभवी पूनम मुत्तरेजा ने कहा कि वह निराश और हताश थी कि उनके जैसे छोटे संगठनों ने सामाजिक मानदंडों और व्यवहारों को कैसे प्रभावित किया था। उन्होंने मानना है कि ज्यादातर सूचना शिक्षा संचार पहल से बहुत कम प्रभाव पड़ा है।

 

फिर, व्यवहार परिवर्तन संचार पर गेट्स फाउंडेशन सम्मेलन के दौरे पर, वह मनोरंजन शिक्षा या शिक्षा के प्रभाव के बारे में जागरूक हुई। दक्षिण अफ्रीका के  सोल सिटी में, 1990 के दशक में एक टेलीविजन श्रृंखला ने स्वास्थ्य और विकास के मुद्दों जैसे एचआईवी / एड्स, बलात्कार, विकलांगता और मद्यपान के बारे में लोगों को बताया और लोगों के व्यवहार पर सकारात्मक प्रभाव डाला।

 

क्या ऐसा दृष्टिकोण भारत में काम कर सकता है? इस विचार के साथ, मुत्तरेजा ने अमेरिका स्थित संचार और सामाजिक परिवर्तन विशेषज्ञ अरविंद सिंघल की विशेषज्ञता की मांग की। सिंघल ने शो में ‘सकारात्मक विचलन’ की अवधारणा का इस्तेमाल किया। इसका मतलब पारंपरिक ज्ञान को फिर से खोजने और कार्य करने के लिए समुदायों तक पहुंचना। सिंघल और मुत्तरेजा ने उन 60 मामलों का दस्तावेजीकरण किया, जिन्होंने सामाजिक मानदंडों को झुठलाया था, लेकिन उनकी जड़ें समुदायों में थी।

 

मुत्तरेजा कहती हैं, “हमने सुनिश्चित किया है कि धारावाहिक में एक हिंदी फिल्म की तरह सौंदर्यबोध हो, क्योंकि हमारी उम्मीद बड़ी थी।” टीम ने धारावाहिक को निर्देशित करने के लिए थिएटर और फिल्म निर्देशक फिरोज अब्बास खान से संपर्क किया, जिन्होंने गांधी, माई फादर जैसे फिल्म बनाई है। स्क्रिप्ट पूरा करने में एक वर्ष का समय लगा और इसे पूरा करने के लिए 12 विशेषज्ञों की एक टीम बनाई गई, जिसमें समाजशास्त्री से लेकर स्त्री रोग विशेषज्ञ और थिएटर कलाकार शामिल थे।

 

धारावाहिक की कहानी वास्तविक,लेकिन सामाजिक परिवर्तन पर जोर

 

इस सीरियल में उन पात्रों का इस्तेमाल किया गया, जो ग्रामीण वास्तविकता को प्रतिबिंबित करते हैं – स्नेहा का भाई- पूरब बेरोजगार है और शराबी है। वह अपनी पत्नी को मारता है और गर्भनिरोधक के बारे में नहीं सोचता है। इस के बावजूद, स्नेहा की चाची उसकी बहनों की तुलना में पूरब को ही ज्यादा पसंद करती है। पूरब की पत्नी रत्ना के तीन बच्चे हैं। वह फिर से गर्भवती हैं और उनके पास निर्णय लेने की क्षमता बहुत कम है।

 

लेकिन धारावाहिक में पूरब को एक जिम्मेदार और सकारात्मक चरित्र में बदलते दिखाया गया है।

 

मुत्तरेजा कहती हैं, “लोग साजिश रचने वाली औरतों के सीरियल देखते-देखते हुए थक चुके हैं। वे सकारात्मक सामग्री के लिए तैयार हैं जो वास्तविक जीवन के मुद्दों के बारे में बात करता है। ” निर्माताओं ने धारावाहिक के प्रभाव में वृद्धि के लिए कई तरह के माध्यमों का इस्तेमाल किया है, जैसे कि टीवी, रेडियो, सोशल मीडिया और यहां तक कि सेलिब्रिटी की मौजूदगी भी।

 

प्रत्येक एपिसोड को एक संदेश के साथ समाप्त किया गया और एक प्रश्नोत्तरी और एक नंबर दिया गया था, जिस पर मिस्ड कॉल देना था। जिससे उत्तरदाता प्रश्नोत्तरी का जवाब दे सकते हैं या चर्चा में भाग ले सकते हैं। सीरियल को पूरे देश से दो साल में 1.4 मिलियन कॉल प्राप्त हुए हैं। लोगों को बुलाया गया और उन्होंने अपनी राय और कविताएं साझा की और खुद को बदलने की कसमें खाई। उनके कॉल रिकॉर्ड किए गए और विश्लेषण किए गए थे।

 

दर्शकों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर चर्चा करने के लिए  बिहार और मध्य प्रदेश में 10 गैर-लाभकारी संस्थाओं की मदद से ‘स्नेहा क्लब’ बना। शो को स्नेहा की डायरी पढ़ने के साथ रेडियो सीरियल में भी बदल दिया गया और 230 ऑल इंडिया रेडियो स्टेशनों पर प्रसारित किया गया। क्षेत्रीय प्रसारण के लिए इसका 12 भाषाओं में भी अनुवाद किया गया था।

 

उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के ‘मीडिया’ क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए छह समुदाय रेडियो का उपयोग कर रेडियो एडैप्शन प्रसारण किया गया था।

 

प्रभाव: कम उम्र में लड़कियों के विवाह की अस्वीकारता 23 फीसदी से बढ़कर 43 फीसदी

 

पहले सीजन के बाद धारावाहिक के प्रभाव का आकलन करने के लिए, पीएफआई ने बिहार और मध्य प्रदेश में 30,000 घरों का मूल्यांकन किया। इन दोनों राज्यों में भारत की आबादी का 15 फीसदी हिस्सा रहता है और यहां परिवार नियोजन के बारे में अधिक जागरूकता की आवश्यकता है।

 

यह पाया गया कि यह कार्यक्रम 36 फीसदी टीवी स्वामित्व और 72 फीसदी रेडियो स्वामित्व वाले आबादी तक पहुंचा। इस धारावाहिक को देखने वाले दर्शकों में से 52 फीसदी महिलाएं थी।

 

जैसा कि हमने पहले भी कहा था, इस धारावाहिक ने महत्वपूर्ण लैंगिक मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद की है। धारावाहिक शुरू होने से पहले शादीशुदा बच्चों के साथ महिलाओं में, शादी के लिए कानून उम्र के संबंध में जागरुकता 59 फीसदी थी, जबकि धारावाहिक प्रसारित होने के बाद यह आंकड़े 80 फीसदी तक पहुंचे थे। टीवी पर इस कार्यक्रम के शुरु होने से पहले, इनमें से करीब 23 फीसदी महिलाओं का मानना था कि कम उम्र में विवाह से जिंदगी में मिलने वाले अवसरों का नुकसान होता है। धारावाहिक प्रसारण के बाद ये आंकड़े बढ़ कर 43 फीसदी हुए हैं।

 

धारावाहिक प्रसारण से पहले केवल 2 फीसदी पुरुषों का मानना ​​था शादी से उन्हें अवसर का नुकसान हुआ है। पहले सीजन के प्रसारण के बाद यह संख्या बढ़कर 31 फीसदी हुई है।

 

महिलाओं में पहला बच्चा होने की आयु के संबंध में विश्वास में भी बदलाव पाया गया। धारावाहिक शुरु होने के पहले 57 फीसदी सास ने कहा था कि 21 से 25 वर्ष की आयु पहले बच्चे के लिए सही है। धारावाहिक के पहले सीजन के बाद ये आंकड़े बढ़ कर 86 फीसदी हुए थे।

 

इस धारावाहिक से ऐसी महिलाओं की संख्या घटाने में मदद मिली है जो मानती हैं कि एक बार जब वह शादी करे, तब एक लड़की को अपने माता-पिता के घर वापस नहीं जाना चाहिए। इस संबंध में धारावाहिक शुरू होने से पहले संख्या 45 फीसदी थी, जो बाद में घट कर 28 फीसदी हुई थी। इस धारावाहिक ने कई महिला दर्शकों को भी आश्वस्त किया कि बेवफाई के संदेह पर पुरुषों को अपनी पत्नियों को मारना ठीक नहीं है। कार्यक्रम प्रसारित होने से पहले 66 फीसदी ‘सजा’ का समर्थन किया, और बाद में यह आंकड़े कम होकर 44 फीसदी हुए थे।

 

धारावाहिक में ऐसे कई उद्हारण दिखाए गए, जिससे समुदायों को प्रेरित किया गया। मध्य प्रदेश के नयागांव गांव में, जहां कोई लड़की कभी कॉलेज नहीं गई थी, वहां एक 16 वर्षीय लड़की ने स्कूल के बाद अपनी पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया। हालांकि, उसके माता-पिता ने उसका समर्थन किया, लेकिन गांववाले ने विरोध किया। आरोप है कि जिन लोगों ने उसका विरोध किया, उन्होंने उसके पैरों पर गाड़ी भी चलाई। लेकिन लड़की ने हार नहीं मानी और आज उस गांव से दस लड़कियां कॉलेज जाती हैं।

 

 

बिहार के छतरपुर गांव में, कुछ पुरुषों ने एक समूह का गठन किया और घरेलू दुरुपयोग को रोकने, परिवारों की योजना बनाने और घर की कामकाज में अपनी पत्नियों की सहायता करने का वचन दिया। उनका नारा था, “घर में हाथ बटाएंगे,  हम खाना भी बनाएंगे।”

 

 

धारावाहिक का विस्तार, लेकिन राशि समाप्त

 

जब धारावाहिक के निर्माताओं ने पाया कि उनके दर्शकों में से 40 फीसदी 15 से 24 वर्ष के बीच थे, तो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने उनसे सरकार के किशोर कार्यक्रम, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरकेएसके), राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम को दूसरे सीजन में शामिल करने का अनुरोध किया।

 

दूसरे सीजन में धारावाहिक का ध्यान किशोरों की समस्याओं पर था। इसमें स्नेहा की बहन, प्रीता की बात की गई और दिखाया गया कि कि प्रकार उसे गांव में लड़कियों की एक फुटबॉल टीम चलाने के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

 

बॉलीवुड अभिनेता और निर्देशक, फरहान अख्तर ने इस धारावाहिक के दूसरे सीजन में एक सूत्रधार या कथाकार की भूमिका के लिए स्वेच्छा से भाग लिया और हर एपिसोड के बाद लिंग समानता के बारे में बात की।

 

मुत्तरेजा कहती हैं, “हमने पोषण, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य, लिंग समानता, मानसिक स्वास्थ्य, दर्घनाओं और मादक द्रव्यों के सेवन को रोकने जैसे छह विषयों पर आठ फिल्में बनाई हैं।”

 

पीएफआई शोधकर्ताओं ने इस कार्यक्रम को चलाने वाले सहकर्मी शिक्षकों को ‘ साथिया ‘ नाम दिया, जिसका मतलब दोस्त है। फिल्मों की सीडी साथी शिक्षकों को वितरित करने वाली कीट का हिस्सा बन गई थी।

 

वर्ष 2016 में आखिरी एपिसोड समाप्त होने के बाद, धारावाहिक की लोकप्रियता के बावजूद, निर्माताओं को तीसरे सीजन के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल हो गया। मुत्तरेजा कहती हैं, ” ऐसे परियोजनाओं के लिए बहुत कम कॉरपोरेट फंडिंग उपलब्ध है।”

 

निर्माताओं ने उत्पादन, आउटरीच, पदोन्नति और इंटरैक्टिव वॉयस रिस्पॉन्स सर्विस और पहुंच (दूरदर्शन के अनुसार 400 मिलियन) की लागत की गणना की है। इनके अनुसार यह आंकड़े दोनों सीजन के लिए 1.08 रुपए प्रति व्यक्ति या प्रति वर्ष 0.72 रुपए प्रति व्यक्ति हैं।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 20 जनवरी, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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