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सार्वजनिक परिवहन से डरती हैं भारत की अमीर युवा महिलाएं

एलिसन सलदानहा,
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मुंबई:  किशोरावस्था की लड़कियों के बीच सुरक्षा धारणाओं की पड़ताल पर एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, सभी आय समूहों में 11 से 18 साल की भारत की सबसे अमीर लड़कियां और युवा महिलाएं सार्वजनिक स्थानों में सबसे कम सुरक्षित महसूस करती हैं।

 

शहरी (47 फीसदी) और ग्रामीण (40 फीसदी) क्षेत्रों में, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते समय युवा लड़कियां छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार के लिए खुद को निशाने पर महसूस करती हैं , जैसा कि एक अंतरराष्ट्रीय स्वंय सेवी संगठन ‘सेव द चिल्ड्रेन इन इंडिया’ द्वारा जारी रिपोर्ट, ‘विंग्स 2018: वर्ल्ड ऑफ इंडियाज गर्ल्स’ में बताया गया है। अध्ययन के मुताबिक, यह निष्कर्ष अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और सामान्य जातियों (45 फीसदी) से संबंधित उच्च आय वाले समूहों (53 फीसदी) की लड़कियों के लिए विशेष रूप से सच थी।

 

मध्यम और छोटे शहरों (51 फीसदी) की लड़कियां बड़े शहरों (44 फीसदी), छोटे गांवों (42 फीसदी) और बड़े गांवों (39 फीसदी) की तुलना में अधिक असुरक्षित महसूस करती हैं।

 

अध्ययन में कहा गया है, “उच्च आय वाले समूहों की किशोर लड़कियों के बीच अधिक डर का एक संभावित कारण यह हो सकता है कि वे लड़कियां परिस्थितियों में खुद को ढालने की क्षमता नहीं रखतीं और अधिक आरामदायक जीवन जीती हैं और इसलिए अपेक्षाकृत अधिक खतरा महसूस करती हैं।”

 

‘थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन’ द्वारा किए गए वैश्विक धारणा सर्वेक्षण के अनुसार, यौन हिंसा के लिए सबसे खराब रिकॉर्ड, सांस्कृतिक और पारंपरिक प्रथाओं से उत्पीड़न, और मानव तस्करी के साथ भारत को महिलाओं के लिए दुनिया में बहुत असुरक्षित देश माना जाता है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 26 जून, 2018 की रिपोर्ट में भी बताया है।

 

वर्ष 2011 के पिछले आम चुनाव में चौथे स्थान पर पहुंचने के बाद, हालात में सुधार करने की विफलता ने अब महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक रैंकिंग की है।

 

छह राज्यों-असम, दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल-में आयोजित किशोरावस्था की लड़कियों की धारणा रिपोर्ट में भारत के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, मध्य और उत्तर-पूर्व को शामिल किया गया है, जिसमें 30 शहरों और 12 जिलों में 84 गांवों का सर्वेक्षण किया गया है।नमूने में 3,128 किशोरावस्था की लड़कियों, 1,141 युवा पुरुष (15-18 वर्ष की उम्र),  जल्दी शादी करने के लिए मजबूर 248 युवा महिलाएं (19 -22 वर्ष की उम्र), और किशोर लड़कियों के 842 माता-पिता शामिल थे।

 

अपने संबंधित क्षेत्रों में, चयनित राज्यों ने बाल यौन अनुपात, महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाएं, जल्दी शादी, महिलाओं के खिलाफ पारस्परिक हिंसा और कामकाजी महिलाओं पर सबसे खराब प्रदर्शन किया है, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

 

सार्वजनिक परिवहन के बाद, स्कूल, स्थानीय बाजार या निजी शिक्षण के लिए संकीर्ण सड़कों को सबसे असुरक्षित माना गया है। कम आय वाले परिवार से अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) से संबंधित युवा महिलाओं ने इन क्षेत्रों को विशेष रूप से असुरक्षित बताया।

 

अध्ययन के मुताबिक, बड़े शहरों (28 फीसदी), विशेष रूप से कम आय वाले समूहों और झुग्गी-झोपड़ियों के एक चौथाई युवा महिलाओं ने कहा कि वे सिनेमाघरों में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं।

 

अध्ययन में कहा गया है, “इसके लिए एक व्यावहारिक स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि झोपड़ियां या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की इन लड़कियों को डर है कि बेहतर वर्ग और जाति के खिलाफ उनकी शिकायत को नजरअंदाज किया जा सकता है। शायद इसी कारण से, एससी और एसटी लड़कियों को सामान्य जाति और ओबीसी लड़कियों की तुलना में स्कूल और स्कूल की सड़क अधिक असुरक्षित लगती हैं।”

 

छेड़छाड़ / दुर्व्यवहार के खिलाफ रिपोर्ट की संभावना कम

 

अगर सार्वजनिक जगहों पर छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार की बात करें तो शहरी और ग्रामीण इलाकों में, लड़कियां अपनी मां, पिता, करीबी दोस्तों और साथियों पर विश्वास करने में सबसे सहज थीं। भाई-बहनों और अन्य रिश्तेदारों पर उनका विश्वास कम था और शिक्षकों, अन्य स्कूल कर्मचारियों और स्थानीय पुलिस से संपर्क करने की संभावना सबसे कम थी।

 

पुलिस और न्यायिक प्रणाली के साथ ‘विश्वास की कमी’ का वर्णन करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि, ” किशोरावस्था की लड़कियों के अलावा , उनके माता-पिता और भाइयों ने महसूस किया कि उनके परिवार का एक ‘नाम’ है और शिकायत से लड़की नकारात्मक रूप से प्रभावित होगी साथ ही ‘पारिवारिक सम्मान’  भी कम होगा।”

 

“उनमें से ज्यादातर पुलिस के पास जाने के खिलाफ थे, क्योंकि वे (पुलिस) को असंवेदनशील मानते हैं। यह भी माना जाता है कि इस प्रक्रिया में बहुत समय और संसाधन लगते हैं और अंत में, लड़की की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है। “

 

लड़कियां परिवार को बताने से परहेज करती हैं, क्योंकि उन्हें घर की तरफ से लगने वाले प्रतिबंधों का डर था। ऐसी स्थिति ग्रामीण (36 फीसदी) क्षेत्रों की तुलना में शहरी (49 फीसदी) में अधिक था।

 

रिपोर्ट में पाया गया कि परिवारों पर विश्वास न करने का दूसरा सबसे ज्यादा कारण डर था। शहरी किशोर लड़कियों में 44 फीसदी और 38 फीसदी ग्रामीण लड़कियों ने महसूस किया कि उनके साथ होने वाले उत्पीड़न के लिए, उन्हें ही दोषी ठहराया जाएगा।

 

क्यों कुछ लड़कियां छेड़छाड़ / दुर्व्यवहार पर चर्चा नहीं करना चाहती

 

50 फीसदी से अधिक माता-पिता इस बात पर सहमत हुए कि यौन उत्पीड़न पर वे शायद ‘अपनी बेटियों’ को ही डांटेंगे, जबकि 42 फीसदी ने स्वीकार किया कि सार्वजनिक स्थानों में उनकी बेटियों के चलने पर नियंत्रण रखते हैं, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है।

 

भारत की आधे से भी कम लड़कियां दोस्तों से मिलने, सुबह टहलने, पार्कों में खेलने के लिए घर से बाहर निकलती हैं।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि आम तौर पर ग्रामीण युवा लड़कियों और महिलाओं की तुलना में अधिक संख्या में शहरी लड़कियां सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल करती है।

 

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए, ‘स्कूल जाने के लिए’ लड़कियों के लिए सबसे सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत सुरक्षित सार्वजनिक स्थान (96 फीसदी) था, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है। निजी शिक्षण में भाग लेना दूसरे स्थान पर रहा है। ग्रामीण  क्षेत्र के लिए यह आंकड़ा 32 फीसदी और शहरी क्षेत्र के लिए 54 फीसदी है।

 

सार्वजनिक परिवहन के बाद, स्थानीय बाजारों, निजी शिक्षण या स्कूल जाने वाली सड़कों को युवा लड़कियों के बीच सबसे असुरक्षित माना गया, जैसा कि हमने कहा था।

 

शहरी क्षेत्रों में किशोरावस्था की आधे से कम लड़कियां (41 फीसदी) दोस्तों से मिलने के लिए बाहर जा सकती हैं। ग्रामीण इलाकों में, एक-तिहाई से ज्यादा लड़कियां (34 फीसदी) दोस्तों से मिलने बाहर नहीं जा सकती हैं।

 

शहरी क्षेत्रों में सर्वेक्षण की गई किशोर लड़कियों में से केवल पांचवीं या 20 फीसदी ने महसूस किया कि वे सुरक्षित रूप से सार्वजनिक पार्क में खेल सकती हैं या सुबह टहलने के लिए जा सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 15 फीसदी से अधिक लड़कियों को समान रूप से महसूस नहीं हुआ।

 

किशोर लड़कियां सार्वजनिक स्थानों के साथ कैसे प्रभावित होती हैं?

 

युवा लड़कियां भीड़ या सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़ और अन्य लिंग से जुड़े अपराधों का बड़ा खतरा मानती हैं। यहां भी, ओबीसी / सामान्य जातियों (40 फीसदी) से संबंधित उच्च और मध्यम-आर्थिक वर्गों (42 फीसदी) की युवा महिलाओं ने जोखिम की एक उच्च धारणा की सूचना दी है।

 

स्कूलों, निजी शिक्षण और बाजारों की ओर जाने वाली संकीर्ण सड़कों के डर के बावजूद, 80 फीसदी से अधिक युवा लड़कियों ने सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने की बजाय इन सार्वजनिक क्षेत्रों में पैजल जाना पसंद किया, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है। छोटे और मध्यम शहरों में किशोर लड़कियों के बीच सायकल एक लोकप्रिय पसंद के रूप में उभरा है, जहां ट्रैफिक कम है और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने में जोखिम की धारणा सबसे अधिक थी, जैसा कि हमने कहा था।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि “सर्वेक्षण अखिल भारतीय तस्वीर का प्रतिनिधि नहीं है, बल्कि इससे सार्वजनिक स्थानों पर लड़कियों की सुरक्षा के मुद्दे पर मौजूदा धारणाओं को गहराई से देखने और अनुभव करने में सहायता मिलती है।”

 

(सलदानहा सहायक संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 2 जुलाई, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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