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मोटापा और समृद्धि : भारत में कुपोषण का नया चेहरा

चारु बाहरी,
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एक नए भारतीय अध्ययन के मुताबिक लोगों की बढ़ती कमर की चौड़ाई से कुपोषण के खिलाफ भारत की लड़ाई में भी विस्तार हो रहा है। इसका मुख्य कारण बिगड़ती जीवनशैली है।

 

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अस्थाई वृद्धि के साथ भारत एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है जोकि दुनिया में तीसरा सबसे अधिक मोटापा ग्रस्त वाला देश है। आंकड़ों पर नज़र डालें तो देश में मोटापे से ग्रास्त लोगों की संख्या 61 मिलियन है और संख्या हर रोज़ बढ़ ही रही है।

 

आमतौर पर कुपोषण, निर्बल एवं अल्पपोषित लोगों से संबंधित होता है और यह आहार की भाषा में जो लोग अधिक पोषित नहीं होते हैं वो कुपोषित कहलाते हैं।

 

दरअसल, यहां पर “अधिक पोषण” का तात्पर्य कैलरी या उर्जा खपत से है। कारलाइन रेमेडिओस, वरिष्ठ पोषण, मोटापा और पाचन सर्जरी, मुबंई एवं गस्त 2015 में प्रकाशित एक अध्ययन, ओबेसिटी सर्जरी के सह-लेखक , कहते हैं कि वसा और शर्करा युक्त, कम पोषक तत्व से अत्यधिक कैलोरी लेने से मोटे लोगों में महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।

 

30 से अधिक किग्रा / एम 2 बॉडी मास इंडेक्स ( बीएमआई) के साथ 2,740 लोगों के समूह पर किए गए अध्ययन में से 43 फीसदी लोगों में आयरन की कमी पाई गई है, 56.7 फीसदी में विटामिन बी 12 की कमी, 11 फीसदी में कैल्शियम की कमी, 35 फीसदी में विटामिन डी 3 की कमी एवं 10 फीसदी में  प्रोटीन की कमी पाई गई है।

 

Micronutrient Deficiencies In Obese People In India
Micronutrient Deficiency in obese people (%) Deficiency in general population (%)
Iron 43 60-80
Vitamin B12 57 35-75
Calcium 11 8-40.6
Vitamin D3 35 44-90

Note: Figures for general population include obese, overweight, and undernourished people. Source: Carlyne Remedios’ study.

 

अमेरीका में किए गए एक नए अध्ययन का निष्कर्ष भी रेमेडिओस के निष्कर्ष से मेल खाता है। अध्ययन किए गए पांच मोटापे से ग्रस्त मरीजों में से एक में इन सूक्ष्म पोषक तत्वों के तीन या अधिक तत्व अपर्याप्त स्तर पर था : विटामिन ए, विटामिन बी 12, विटामिन डी , विटामिन ई , आयरन, फोलेट (विटामिन B9 ) और थिअमिने (विटामिन बी 1) ।

 

जाहिर है, खाद्य और पोषण बहुतायत पर्याय नहीं हैं।

 

अधिक वज़नदार भारतीय: कुपोषण की तरह ही तेज़ी से बढ़ता

 

संभवत: भारत में कुपोषण का नया चेहरा अब उस वर्ग से संबंधित है जो शहरी और समृद्ध हैं एवं जो लोग अपने आहार का चयन वहन कर सकते हैं।

 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण III के अनुसार ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्र में मोटापा ग्रस्त लोगों की संख्या तीन गुना अधिक है। मोटापा ग्रस्त लोगों की संख्या उतनी ही तेज़ी से बढ़ रही है जितनी कि कुपोषित भारतीयों की संख्या समाहित की जा रही है।

 

गौर करें :

 

  • 1990 में भारत की आबादी में से 23.7 फीसदी कुपोषित थी जबकि 15.8 फीसदी जनता अधिक-पोषित थी।
  • वर्तमान में, देश की कुल आबादी में से 15.2 फीसदी कुपोषित है जबकि 22 फीसदी अधिक-पोषित हैं।

 

overweightobese

Source: World Health Organisation Obesity & Overweight data.

 

undernourished

Source: Food and Agriculture Organization

 

आहार की गड़बड़ी से हो रही है भारत की कमर चौड़ी

 

एक 28 वर्षीय आदमी, कद करीब 5 फीट 4 इंच और वज़न 100 किलो। इनके आहास में बुरे कार्बोहाइड्रेट, बुरे वसा के साथ कम प्रोटीन शामिल है। गंभीर रुप से मोटापे से ग्रस्त इस शख्स को लगातार शरीर, जांघों और घुटनों में दर्द की शिकायत है। इनका विटामिन बी 12 का स्तर भी कम है।

 

परामर्श डॉक्टर अनिल अरोड़ा, इकाई के प्रमुख और नेतृत्व सलाहकार , आर्थोपेडिक्स विभाग, मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, पटपड़गंज , दिल्ली, कहते हैं कि जांच से पता चलता है कि मरीज़ में विटामिन डी की कमी एवं  उच्च यूरिक एसिड पाया गया था। आम तौर पर मोटापे से ग्रस्त लोगों में यह कमी पाई जाती है।

 

एक 13 वर्षीय बच्ची, कद- 5 फीट, 4 इंच, और वज़न 114 किलो। वज़न कम करने के लिए इसने आहार विशेषज्ञ से संपर्क किया है।

 

शेरीन वर्गीज , प्रबंधक, डायटेटिक्स आयुर्विज्ञान संस्थान मालाबार , कोझीकोड, कहती हैं “आहार आकलन से पता चला कि उनके आहार में सब्ज़ियां शामिल ही नहीं हैं। खाने में  सिर्फ उच्च वसा और उच्च कार्बोहाइड्रेट के साथ अधिक मात्रा में मीट एवं चिकन शामिल है। कुल मिलाकर उनके कैल्शियम , आयरन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का सेवन बेहद कम था।”

 

कम उम्र की होने के बावजूद उनके रक्त परिक्षण से पता चलता है कि वह मधुमेह जैसी बिमारी की सीमा रेखा पर हैं।

 

अनुसंधान और देश भर में आहार विशेषज्ञों के अनुभवों से साफ है कि दोषपूर्ण आहार एवं अधिक वज़न होने के बीच संबंध है।

 

2010 में गुजरात में हुए एक अध्ययन में मोटापे के शिकार लोगों और सामान्य वजन के लोगों के दैनिक आहार की तुलना की गई थी। सामान्य वज़न वाले लोगों के मुकाबले अधिक वजन वाले लोग प्रतिदिन 10 फीसदी ग्राम अधिक तेल एवं 20 फीसदी कम सब्ज़ियों का सेवन कर रहे थे।

 

2013 में दिल्ली में हुए एक अध्ययन में महिलाओं को केंद्रित किया गया था। अध्ययन में मोटापे से ग्रस्त महिलाओं कि स्थिति का मुख्य कारण अधिक तैलय खाद्यों का सेवन करना बताया जबकि अधिक वज़न वाली महिलाओं ने अतिरिक्त वज़न के लिए अधिक खाना को ज़िम्मेदार ठहराया है।

 

करिश्मा चावला, मुंबई स्थित पोषण एवं ईट राइट 24×7 (एक पोषण परामर्श ) की संस्थापक तहती हैं कि, “अधिकतक अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त लोग अधिक ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थ, जिनमें अधिक संतृप्त वसा एवं शर्करा का सेवन करते हैं। खराब पोषक तत्व होने के कारण हम उन्हें खाली कैलोरी कहते हैं।”

 

इसके अलावा, मोटापे से जुड़े चयापचय में परिवर्तन भोजन से सूक्ष्म पोषक तत्वों के अवशोषण समझौता कर सकते हैं।

 

तकनीकी तौर पर, मोटापा सूजन का एक प्रकार है और अनुसंधान के मुताबिक यह आयरन के अवशोषण या आयरन के उपयोग को नुकसान पहुंचाता है।

 

हाल ही में बेंगलुरू के सेंट जॉन अनुसंधान संस्थान में हुए एक अध्ययन के अनुसार, मोटापे से ग्रसत महिलाओं में आयरन की कमी होने की संभावना अधिक होती है और वे आहार आयरन को भी कम अवशोषित करती हैं।

 

रेमेडिओस कहते हैं कि, “रिसर्च से पूरी तरह इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है लेकिन हम मानते हैं कि ऊतकों द्वारा वसा ( फैट) सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग में बाधा उत्पन्न करता है ( आयरन और संभवतः अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व ) ।”

 

मोटापे से रोग तक – सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के माध्यम से

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बढ़े हुए बीएमआई से गैर संचारी रोग जैसे कि  हृदय रोग और स्ट्रोक( 2012 में हुई मौत का प्रमुख कारण ), मधुमेह, और कुछ तरह के कैंसर ( जैसे कि एंडोमेट्रियल , छाती और पेट ) का खतरा अधिक बड़ जाता है।

 

मोटापा, पोषक तत्वों की कमी और रोग के बीच के संबंध में आमतौर पर बहुत कम रिपोर्ट दी जाती है।
 
एक अमेरिकी अध्ययन में मोटापा, मधुमेह और विटामिन डी , क्रोमियम, विटामिन बी 7 (बायोटिन) , विटामिन बी 1 (thiamine) और विटामिन सी की कमी के बीच एक कड़ी का पता लगाया गया है।

 

2012 में, 1765 उत्तर भारतीय मधुमेह रोगियों पर किए गए अध्ययन में 76 फीसदी से कम समग्र विटामिन डी दर की कमी होने का अनुमान लगाया । अधिक बीएमआई के साथ वाले लोगों में बद्तर कमी की पहचान की गई: 23किग्रा / मी से कम बीएमआई में 65 फीसदी, 23-27.5 किग्रा / मी बीएमआई में 75 फीसदी, 27.5 किग्रा / मी से अधिक बीएमआई में 85 फीसदी।

 

यह बेहद प्रशंसनीय है ।

 

सीमा गुलाटी , पोषण अनुसंधान समूह की प्रमुख, पोषण और मेटाबोलिक अनुसंधान, कहती हैं कि, “अधिक वजन वाले लोगों में विटामिन डी की कमी का खतरा अधिक होता है क्योंकि विटामिन वसा में घुलनशील है, इसका मतलब है कि यह संग्रहीत या ‘ ऊपर बंद’ हो जाता है और इसलिए वसा कोशिकाओं में उपयोग के लिए शरीर के लिए कम उपलब्ध होता है।”

गुलाटी आगे कहती हैं कि इसके विपरीत, जब मोटे लोगों को वजन कम होता है, उनके सीरम विटामिन डी के स्तर में वृद्धि हो सकती।

 

मुंबई में 2009 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, सामान्य वजन के उच्च रक्तचाप से ग्रस्त लोगों की तुलना में उच्च रक्तचाप से ग्रस्त अधिक वजन अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त लोगों में विटामिन बी 12 और फोलिक एसिड का कम स्तर का लक्षण होता है।

 

क्यों वज़न की देख-रेख है महत्वपूर्ण औऱ क्यों है इस पर नियंत्रण करना कठिन

 

मोटापा, एक वयस्क पुरुष के जीवन काल की करीब साढ़े आठ साल को कम कर सकती है जबकि एक वयस्क महिला की उम्र के छह साल घटा सकती है। इसके अलावा, समान्य वज़न वाले लोगों की तुलना में मोटापे से ग्रस्त लोगों का जीवन दो से चार गुना अधिक अस्वस्थय हो सकता है।

 

यह वज़न कम करने के पर्याप्त कारण हैं लेकिन वजन कम करना इतना आसान नहीं है।

 

ग्लोबल बर्डन ऑफ डीज़िज स्टडी 2013 के अनुसार, पिछले 33 वर्षों में किसी भी देश में मोटापा कम नहीं हुआ है।

 

भारत में अधिक वजन वाले लोगों के प्रसार के साथ , 2030 तक 27.8 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है औऱ सबसे अधिक उम्मीद शहरी इलाकों में होने का है जहां पर मोटापे में तेजी से विस्तार हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार सार्वजनिक नीति स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर कुपोषण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जोकि भारत में अपनी ही चुनौतियां प्रस्तुत करती हैं क्योंकि भारत में अधिक और अल्प पोषण सिर्फ अमीर औऱ गरीब की ही समस्या नहीं है।

 

सुतापा अग्रवाल, महामारी विशेषज्ञ, भारत पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन, कहती हैं, “यहीं तक कि ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में अक्सर अधिक एवं अल्प पोषण एक ही घर में एक ही साथ होती हैं। ”

परिवार का दोहरा बोझ सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों मुश्किल बनाते हैं।

 

अग्रवाल कहती हैं अल्प-पोषण के तहत संबंधित करने वाली रणनीतियां जैसे कि घर के भोजन की आपूर्ति में वृद्धि करना, मोटापा कटौती कार्यक्रमों का खंडन कर सकता है जबकि मोटापा संबोधित करने के लिए हस्तक्षेप, जैसे कि कम वसा वाले आहार की सिफारिशें से किसी भ कम वज़न वाले लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है।

 

तो इसके लिए सबसे बेहतर तरीका क्या है?

 

अग्रवाल आगे कहती हैं कि मोटापा चढ़ने से पहले ही उस ओर ध्यान देना चाहिए : स्कूल शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से कुपोषण के दोनों प्रकार के संबंध में बच्चों में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।

 

( बाहरी माउंट आबू, राजस्थान स्थित एक स्वतंत्र लेखक और संपादक है। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 5 दिसंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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