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महिला नेताओं पर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों का ध्यान नहीं !

भानुप्रिया राव,
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तमिल कवयित्री और लेखिका सलमा के लिए तुवांकुरिनची शहर से पंचायत का चुनाव लड़ना, आजादी के टिकट की तरह था। 2004 में, सलमा द्रविड़ मुनेत्र कझागम में शामिल हो गई और राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ा। लेकिन पार्टी में महिलाओं के साथ लैंगिक मतभेद और उपेक्षा से हताश होकर,अब वह वहां से बाहर निकलना चाहती हैं और जमीनी स्तर पर काम करना चाहती हैं।

 

चेन्नई: राजनीतिक पार्टी द्रमुक की महिला शाखा की उप सचिव, 50 वर्षीय सलमा, तमिलनाडु में ग्रामीण शासन से मुख्यधारा की राजनीति में बदलाव की इच्छा रखने वाली कुछ महिलाओं में से एक हैं। पंचायत प्रमुखों के रूप में अन्य अधिकांश महिलाओं के पास अपने पांच साल के कार्यकाल के अंत में अपने घरों में वापस जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

 

एक प्रसिद्ध तमिल कवयित्री और उपन्यासकार सलमा का मानना ​​है कि यह उनकी साहित्यिक प्रतिभा थी, जिसने उन्हें अपने जीवन में सबसे बड़ा मौका दिया। 2004 में तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में तुवरंकुरिनची शहर पंचायत के प्रमुख के रूप में अपनी अवधि के दौरान वह अपने साथी कवि और द्रमुक संसद सदस्य के. कनिमोझी की नजर में आई।

 

उसके बाद सलमा द्रमुक में शामिल हो गई और दो साल बाद पार्टी के सर्वोच्च नेता करुणानिधि ने उन्हें 2006 में तिरुचिरापल्ली जिले के मारुंगापुरी निर्वाचन क्षेत्र से एक असेंबली टिकट की पेशकश की। करुणानिधि खुद एक लेखक हैं और उन्होंने उनके द्वारा मुस्लिम महिलाओं के आंतरिक जीवन पर लिखी गई किताब इरांडाम जामंगलिन कडाई ( द आवर पास्ट मिड नाइट) पढ़ी थी।

 

वर्ष 2006 में, सलमा का राजनीतिक करियर तेजी से बढ़ रहा था। लेकिन आज, पार्टी की राजनीति से परेशान होकर वह इसे छोड़ना चाहती हैं और जमीनी स्तर पर काम करने के लिए वापस जाना चाहती हैं। वह कहती हैं, “आप समझौता किए बिना राजनीति की इस सर्व-पुरुष दुनिया में जीवित नहीं रह सकते हैं।”

 

राजनीति द्वारा हासिल की गई सभी चीजों को त्याग देने के लिए एक महत्वाकांक्षी और कुशल महिला नेता क्यों तैयार है?

 

तमिलनाडु की पंचायत राजनीति में महिलाओं पर हमारी पांच भाग श्रृंखला में, हमने देखा है कि सलमा जैसी महिलाएं (भाग 1)लिंग पूर्वाग्रह से लड़ने, वित्तीय बाधाओं (भाग 2), जातिवाद (भाग 3) और शारीरिक खतरों (भाग 4) से जूझते हुए कैसे थक  जाती हैं?

 

इनमें से कई महिलाओं ने सार्वजनिक काम के लिए बड़े प्लेटफार्मों की पात्रता हासिल की। लेकिन तमिलनाडु के छह जिलों में इंडियास्पेंड की पड़ताल से पता चला है कि इनमें से कुछ महिला नेताओं को राजनीतिक पदानुक्रम में आगे बढ़ाने के लिए कुछ लोग उनके महिला होने का लाभ उठाना चाहते थे।

 

तमिलनाडु राज्य चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, स्थानीय शासन में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के बाद से दो दशकों में, सामान्य श्रेणी से कम से कम 18,244 महिलाएं, अनुसूचित जाति से 6,408 और अनुसूचित जनजातियों से 416 तमिलनाडु में पंचायत प्रमुख बनी हैं। शहरी और ग्रामीण शासन के सभी स्तरों पर कुल 277,160 महिला नेताओं ने अपना कार्यालय शहरी स्थानीय निकायों में पंचायत वार्ड के सदस्य, संघ और जिला पंचायत सदस्य, महापौर और काउंसिलर्स के रुप में पूरा किया है।

 

शायद ही इन सक्षम महिलाओं में से किसी ने भी पार्टी राजनीति, राज्य विधानसभा या संसद में महत्वपूर्ण पदों पर स्थान बनाया है। ऐसा क्यों हो रहा है? इंडियास्पेंड की जांच से पता चला है कि पुरूष वर्चस्व वाली पार्टी संरचना में महिलाओं को रास्ते में हर कदम में बाधाएं आती हैं।

 

हम व्यक्तिगत कहानियों के माध्यम से देखना चाहेंगे, कि महिलाओं को बड़ी भूमिका निभाने के लिए सशक्त बनाने की बजाय, पार्टियां वास्तव में उनकी भूमिकाओं को सीमित करने और उन्हें चुनावी राजनीति में हतोत्साहित करने का काम करती हैं।

 

15 फीसदी महिला पंचायत नेता मुख्यधारा की राजनीति में आना चाहती हैं…

 

तमिलनाडु में जयललिता जैसी मजबूत महिला मुख्यमंत्री रहीं, कुछ महिलाओं ने इसे राज्य की राजनीति में अपनी ताकत से जोड़कर भी देखा।

 

पिछले 20 वर्षों में, स्थानीय शासन में भागीदारी ने महिलाओं नेताओं के बीच राजनीतिक चेतना और आकांक्षा की एक नई भावना को प्रेरित किया है। 32 महिलाओं की अगुवाई वाली पंचायतों में इस श्रृंखला के लिए तमिलनाडु के छह जिलों में इंडियास्पेंड ने सर्वेक्षण किया। 30 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे आगामी पंचायत चुनाव लड़ना चाहती हैं, भले ही उनकी सीट अनारक्षित हो। इसके अलावा, 15 फीसदी महिलाओं ने कहा कि यदि मौका मिले तो वे मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश करना चाहती हैं।

 

लेकिन महिला नेताओं का कहना है, पुरुष प्रधान माने जाने वाले इस क्षेत्र को महिलाओं के लिए प्रतिरोधी माना जाता है। सलमा ने विधानसभा चुनाव लड़ा था लेकिन 1,000 वोटों से हार गई थी। वह कहती हैं, ” यदि पार्टी के भीतर के लोग अगर सहायक होते तो मैं जीत जाती। उनलोगों ने सक्रिय रूप से मेरे खिलाफ काम किया। दुखद सच्चाई यह है कि पुरुष नहीं चाहते हैं कि पार्टी में महिलाएं आगे बढ़े। “

 

राजवीर रोकीया के रुप में तुवराणुरिनिची में एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में पैदा हुई सलमा का राजनीतिक करियर दमनकारी परंपराओं से निपटने वाली युवा महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है। जैसा कि गांव की प्रथा के अनुसार उनके 13 साल पूरे होते ही उन्हें स्कूल से निकाल लिया गया था।

 

वह अपनी बहन के साथ एक कमरे तक ही सीमित थी। वह बताती हैं,  “युवावस्था के बाद, आप बाहरी दुनिया खो देते हैं। एक-एक करके, मेरी सभी सहेलियां ऐसे ही कमरे तक सीमित हो गईं। मेरे गांव में मुस्लिम लड़कियों के साथ ऐसा ही होता है। “

 

घर में लिखने के लिए कोई कागज नहीं होता था, इसलिए घरेलू किराने का सामान आने वाले समाचार पत्र के लिफाफे पर सलमा ने अपने अलगाव और अकेलापन के बारे में लिखना शुरु किया। 21 वर्ष की उम्र में, उनका विवाह द्रमुक से जुड़े एक राजनीतिक कार्यकर्ता के साथ हो गया।

 
चैनल 4  पर सलमा के जीवन पर बने एक वृत्तचित्र उन्होंने  दुर्व्यवहार की बात बताई थी, “उसने एक बार मुझ पर एसिड डालने की धमकी दी। मैं इतना डर ​​गई थी कि सोते समय मैं अपने छोटे बच्चे के चेहरे को अपने ऊपर रखती थी ताकि मैं सुरक्षित रह सकूं। ”
 

 

कविता ही थी, जिसने सलमा को बचाया, “मैं गीले बाथरूम में खड़ी रहती और लिखती।”

 

उन्होंने वृत्तचित्र में बताया था, “मुझे अपने सैनिटरी नैपकिन के बीच कागज और कलम छिपाना पड़ा, क्योंकि मेरे पति ने मेरी कई कविताओं को नष्ट कर दिया था।”

 

2000 में, उनकी मां ने उनकी कुछ कविताओं को चेन्नई में एक प्रकाशक को भेजा। ओरु मालायम, इनोरू मालायम (वन इवनिंग, अनदर इवनिंग ) नामक एक संग्रह तैयार हो गया और सलमा के छद्म नाम के तहत छपा।

 

जब तक राजनीति ने उनके जीवन में प्रवेश नहीं किया, तब तक सलमा गुमनाम रुप से काम करती रही। 2002 में, तुवरंकुरिनची को महिलाओं के लिए आरक्षित घोषित किया गया था और उनके पति, मलिक ने सलमा से शहर पंचायत अध्यक्ष के पद के लिए चुनाव लड़ने को कहा था। उन्होंने कहा “मैं हैरान थी। उसने मुझे घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी थी। लेकिन यह महिलाओं के मुद्दों पर काम करने के लिए मेरे लिए एक अवसर था।”

 

भारतीय संविधान का 73 वां संशोधन, जिसमें स्थानीय शासन में महिलाओं, अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए सीटों का न्यूनतम 33 फीसदी आरक्षण अनिवार्य है, सलमा के लिए आजादी के लिए टिकट बन गया।

 

सलमा अपने निर्वाचन क्षेत्र की महिलाओं में लोकप्रिय थीं। उन्होंने स्थानीय शासन में महिला नेता के रूप में अपने अनुभव साझा करने के लिए खूब यात्राएं की। जल्द ही राजनीति में पहला बड़ा ब्रेक आया लेकिन बाद की घटनाओं ने उन्हें निराश कर दिया।

 

ऐसी महिलाएं जो राजनीति में आगे बढ़ना चाहती हैं, उनके लिए जातिगत भेदभाव और राजनीतिक में पुरुषों का वर्चस्व सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।

 

एक बार पंचायत की अवधि खत्म होने के बाद, महिलाओं के विकास के लिए कोई रास्ता नहीं है।

 

तो ज्यादातर महिला नेताओं के साथ क्या होता है जब स्थानीय शासन में उनका पांच साल का कार्य समाप्त हो जाता है?

 

सलमा कहती हैं, “वे वापस वहीं चली जाती हैं जहां से वे आई हैं – अपने घरों के अंदर।”

 

अधिकांश महिलाएं आरक्षित सीटों से पंचायतों में चुनाव लड़ती हैं और ज्यादातर उनके पुरुष रिश्तेदारों या अन्य (मुख्य रूप से ऊपरी जाति) पुरुष दावेदारों द्वारा खाली होती हैं। हमारी पड़ताल से पता चला है कि पुरुष अपने डोमेन के रूप में पंचायत की अध्यक्षता देखते हैं, जबकि अगर उनकी अवधि खत्म हो गई है तो अध्यक्ष बनी महिलाओं को स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।

 

सलमा कहती हैं, “उनकी अवधि समाप्त होने तक इतनी सारी महिलाएं राजनीति में दिलचस्पी लेती हैं। लेकिन उन्हें दूसरा मौका नहीं मिलता है। दुर्लभ मामलों में जहां पति सीट स्वीकार करने के लिए तैयार है, आसपास के लोग पूछते हैं, वह अपनी पत्नी को एक और मौका क्यों दे रहा है।”

 

दलित महिला पंचायत नेताओं के लिए सामान्य श्रेणी की सीटें लड़ने के लिए असंभव लगता है, क्योंकि इससे गांव में अनिश्चित जाति संबंधों पर परेशानी छा सकती है।

 

शिवगंगाई जिले के थिरुमानवायाल पंचायत के दलित महिला नेता शर्मिला देवी, जिन्होंने अपने गांव की लगातार जल समस्या हल की है, उन्हें पता है कि वह फिर से चुनाव नहीं लड़ सकती है, हालांकि वह चुनाव लड़ना चाहती हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि अनारक्षित सीट प्रमुख जाति के पुरुषों के पास चली जाती हैं।

 

वह लगभग हताशा भरे स्वर में कहती हैं, “आखिरी चुनावों में, कल्लार जाति ने हमारे साथ सहयोग किया, इसलिए हमें अगले चुनाव में उनके साथ सहयोग करना होगा।”

 

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थिरुमानवायाल के दलित पंचायत अध्यक्ष शर्मिला देवी ने अपने गांव की जल समस्या पर लगातार ध्यान दिया, लोगों की सुविधाएं बढ़ीं। शर्मिला जानती है कि वह फिर से चुनाव नहीं लड़ सकतीं, भले ही वह लड़ना चाहती हैं। वह जानती हैं कि अनारक्षित सीट प्रमुख जाति के पुरुषों के पास चली जाती है।

 

‘अच्छी’ महिलाओं के लिए नहीं है राजनीति

 

ज्यादातर महिलाओं के लिए, संघर्ष घर से शुरू होता है, जहां परिवारों को राजनीति में महिलाओं के जाने का विचार अचंभित करता है।

 

शिवगंगाई जिले के के रायवारम पंचायत की पूर्व अध्यक्ष रानी सथप्पन ग्रामीण राजनीति में अनिच्छा से आई थीं। 1996 में, उन्हें गांव के बुजुर्गों ने चुनाव लड़ने के लिए राजी किया, क्योंकि उनका मानना ​​था कि रानी ‘सही’ परिवार से हैं।

 

अपने 10 साल के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने पंचायत को प्लास्टिक मुक्त बनाने सहित बहुत से बदलाव किए। वह तमिलनाडु महिला पंचायत अध्यक्ष संघ की अध्यक्ष बनीं, जो एक निश्चित 10 साल की आरक्षण अवधि के लिए था, लेकिन जब शराब के खिलाफ प्रतिबंध के लिए उन्होंने संघर्ष किया तो राज्य सरकार ने इसे वापस लेने का फैसला किया।

 

क्या वह मुख्यधारा की पार्टी राजनीति में शामिल होने पर विचार करती थी? रानी मुस्कुरा उठी, अपने पति की ओर देखा और फिर मुस्कुराई। “ऐसा कुछ भी नहीं,” उसने अपनी साड़ी को संभालते हुए कहा।

 

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रानी सथप्पन ने तमिलनाडु महिला पंचायत संघ की अध्यक्ष भी रहीं और कई महत्वपूर्ण काम किए। लेकिन उनका राजनीतिक करियर खराब हो गया, क्योंकि उनके परिवारवालों ने उनके काम को तवज्जो नहीं दी। ज्यादातर महिलाओं के लिए, संघर्ष घर से शुरू होता है, जहां परिवारों को राजनीति में महिलाओं के जाने का विचार अटपटा लगता है।

 

कल्पना सतीश, जिन्होंने फेडरेशन के प्रशिक्षक के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान उनके साथ काम किया था, कहा, “रानी महिला अध्यक्षों में से उज्ज्वल नेताओं में से एक थीं। वह राजनीति में आगे बढ़ना चाहती थीं। लेकिन उनके परिवार ने अनुमति नहीं दी।  “

 

रानी अब शिवगंगाई जिले में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षक हैं।

 

पार्टियों को सक्रिय रूप से महिला नेताओं को खोजने और बढ़ावा देने की जरूरत है।

 

गुड़लूर पश्चिम पंचायत (करूर जिला) के पूर्व काउंसिलर और तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के मौजूदा प्रवक्ता जोथिमानी सेनिमालाई भी स्थानीय से राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आई थीं।

 

वह बताती हैं, “लोग सोचते हैं कि पंचायतों में आरक्षण एक जादू बुलेट है जो महिलाओं के लिए स्वचालित रूप से दरवाजे खोलता है। सच्चाई यह है कि पंचायत के बाद महिला के लिए पार्टी पदानुक्रम, राज्य विधानसभा, संसद तक का हर एक दरवाजा बंद हो जाता है।”

 

उनके करियर के अध्ययन से पता चलता है कि राजनीतिक दलों के लिए जमीनी राजनीति में सक्रिय महिलाओं को पहचानने, आगे बढ़ाने  और सहयोग करने के लिए सकारात्मक कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?

 

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गुड़लूर पश्चिम पंचायत (करूर जिला) के पूर्व काउंसिलर और तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के मौजूदा प्रवक्ता जोथिमानी सेनिमालाई भी स्थानीय से राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आई थीं।उनके करियर के अध्ययन से पता चलता है कि राजनीतिक दलों के लिए जमीनी राजनीति में सक्रिय महिलाओं को पहचानने, आगे बढ़ाने और सहयोग करने के लिए सकारात्मक कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?

 

एक काउंसिलर के रूप में अपने 10 साल के कार्यकाल (1 996-2006) के अंत में, युवा नेताओं के लिए राष्ट्रव्यापी प्रतिभा की तलाश में राष्ट्रीय युवा कांग्रेस द्वारा जोथिमानी को संभावित महिला नेता के रूप में पहचाना गया था। उन्होंने करूर में रेत खनन माफिया के खिलाफ एक सफल कानूनी अभियान का नेतृत्व किया था। 2007 में, उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नामांकित किया गया था, जहां 10 में से पांच पद महिलाओं, अल्पसंख्यकों, विकलांग और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षित हैं। उन्हें आंध्र प्रदेश, केरल और उत्तर पूर्व का प्रभारी महासचिव बनाया गया था। उन्होंने 2011 में राज्य विधानसभा चुनाव और 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों चुनाव वह हार गईं।

 

1977 की शुरुआत में, पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) ने ‘एआईएडीएमके’ के लिए राज्य विधानसभा चुनावों में स्नातक महिलाओं की भर्ती के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया था।

 

वर्तमान में द्रमुक के उप-महासचिव, सुब्बुलक्ष्मी जगदेसन कहती हैं, “इस तरह मैं एक सधारण स्कूल की शिक्षक राजनीति में शामिल हुई।” बाद में वह लघु उद्योग की मंत्री के रूप में एमजीआर कैबिनेट में शामिल हो गई और बाद में 2004 में केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार में सामाजिक न्याय में उप मंत्री के रूप में काम किया।

 

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द्रमुक के मौजूदा उप-महासचिव सुब्बुलक्ष्मी जगदेसन का राज्य और केंद्र सरकार में के मंत्री के रूप में एक सफल राजनीतिक करियर रहा है। 1997 में, पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने अपनी पार्टी में स्नातक महिलाओं की भर्ती के लिए विशेष अभियान शुरु किया है, जिससे स्कूल शिक्षक सुब्बुलक्ष्मी राजनीति में आ पाईं ।

 

सबसे बड़ी बाधा

 

राजनीतिक दलों की जिला इकाइयों से पता चलता है कि किस प्रकार पुरुष महिलाओं के साथ राजनीतिक शक्ति साझा करने के लिए अनिच्छुक हैं। ये इकाइयां पार्टी संरचनाओं की अगली पंक्ति हैं और महिला नेताओं के लिए एक प्रभावी भर्ती एवेन्यू हो सकती हैं। जिला सचिव के नेतृत्व में, वे शक्तिशाली हैं क्योंकि वे बूथ, पंचायत और ब्लॉक-स्तरीय समितियों की निगरानी करते हैं और मतदाताओं को संगठित करते हैं।

 

तमिलनाडु में, 30 जिलों में कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल में महिला जिला सचिव नहीं है। अकेला अपवाद डीएमके है, जिसमें चार महिलाएं जिला सचिव हैं।

 

सलमा कहती हैं, “जिला सचिव एक शक्तिशाली स्थिति है। जयललिता जैसी शक्तिशाली महिला नेता ने भी इसे समझा कि पुरुष एक महिला के तहत काम करने की कल्पना नहीं कर सकते हैं। इसलिए, उन्होंने भी एक भी महिला (उस स्थिति में) नियुक्त नहीं की थी। ”

 

“यह पूरी तरह से संभव है”, जोथिमानी समझाती हैं। वह कहती हैं, “जिला सचिव के जरिए अभियान के समय 30 दिनों के भीतर 250,000 मतदाताओं तक पहुंचा जा सकता है।”

 

सभी पार्टियां लिंग समानता का प्रचार करती हैं,  लेकिन इसका पालन नहीं

 

“कांग्रेस पार्टी का एक नियम है कि 33 फीसदी जिला इकाई पदों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए, लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है ”, जोतिमानी कहती हैं, “यह  लेफ्ट दलों के साथ भी मामला है।”

 

डिंडीगुल से तीन बार कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी (सीपीआई -एम) की विधाय, बाला भारती कहती हैं, “हम समानता का प्रचार करते हैं इसलिए हमें इसका अभ्यास करना चाहिए। लेकिन हमारे पास कोई महिला सचिव नहीं है, हां जिला समितियों में कुछ महिलाएं जरूर हैं। “

 

राज्य समितियों में समान रूप से महिलाएं उपेक्षित हैं।द्रमुक के शीर्ष पायदान पर सुब्बुलक्ष्मी जगदीसन एकमात्र महिला है। कांग्रेस ने पिछले 15 वर्षों में अपनी शीर्ष नेतृत्व समिति का पुनर्गठन नहीं किया है। और सीपीआई (एम) की 81 सदस्यीय राज्य समिति में 10 महिलाएं हैं, कुल का 12 फीसदी।

 

पार्टियों के महिला नेताओं ने से दलित और आदिवासी घरों से महिलाओं के लिए स्थान विशेष रूप से आरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

 

जोथिमानी कहती हैं, “पार्टी पदानुक्रम-बूथ, पंचायत, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर के माध्यम से महिलाओं के लिए कम से कम 33 फीसदी आरक्षण होना चाहिए। वास्तव में, मैं कहती हूं कि 50 फीसदी आरक्षण हो। यह एक उचित प्रतिनिधित्व है। “

 

फिलहाल, पार्टी की महिला शाखा में महिलाओं की बड़ी संख्या है।

 

भारती हंसते हुए कहती हैं, “हमने तमिलनाडु में सीपीआई (एम) में राज्य और जिला स्तर पर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए 30 फीसदी पदों के न्यूनतम आरक्षण के लिए याचिका दायर की है। पोलित ब्यूरो ने अभी तक फैसला नहीं किया है। “

 

वर्तमान में, दुनिया के 52 देशों में राजनीतिक पार्टियों में 30 फीसदी से 50 फीसदी तक महिलाओं के लिए स्वैच्छिक पार्टी कोटा है, जैसा कि ग्लोबल डेटाबेस ऑन कोटा फॉर वुमन  से पता चलता है।

 

चुनाव में केवल 6-15 फीसदी महिला उम्मीदवार

 

पार्टी संरचना के निचले भाग में लिंग असंतुलन का सहज परिणाम यह है कि कुछ महिलाएं ही चुनावों में उतारी जाती हैं और कुछ ही विधायी विधानसभा के सदस्यों के रूप में चुनी जाती हैं।

 

1996 से 2016 के बीच, चुनाव में उतारी गई 6 फीसदी और 15 फीसदी उम्मीदवार महिलाएं थीं। 2016 में अंतिम विधानसभा चुनावों में, एआईएडीएमके और सीपीआई (एम) ने 12 फीसदी और द्रमुक ने 10 फीसदी महिलाओं को चुनाव में उतारा था। कांग्रेस ने तीन महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था।

 

पार्टी के अनुसार, तमिलनाडु चुनाव में महिला उम्मीदवार, 1996-2016

Source: Election Commission Of India reports for Tamil Nadu assembly elections 1996, 2001, 2006, 2011 and 2016

 

1996 से 2016 के बीच, महिला विधायकों की तमिलनाडु राज्य विधानसभा में 3 फीसदी से 10 फीसदी की हिस्सेदारी रही है।

 

तमिलनाडु विधानसभा में महिला विधायक, 1996-2016

Source: Election Commission Of India reports for Tamil Nadu assembly elections 1996, 2001, 2006, 2011 and 2016

 

सलमा कहती हैं, ” दलों का कहना यह है कि उन्हें पर्याप्त महिला उम्मीदवार नहीं मिल सकते हैं। जमीनी राजनीति में हजारों महिलाओं के बारे में क्या? पार्टियों के महिला विंग में महिलाओं के बारे में क्या? इन महिलाएं पर नजर क्यों नहीं पड़ती ? “

 

महिला नेताओं की कमी: पार्टियों के द्वारा एक भ्रामक प्रचार

 

महिला उम्मीदवारों की कमी एक मिथक है। यह बात आईजेडए इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स के स्टीफन डी ओ’कोनेल ने एक नए अध्ययन में बताई गई है। अध्ययन में भारत के विधानसभा और संसद चुनावों के लिए महिला उम्मीदवारों की स्थिति पर स्थानीय निकायों में लिंग कोटा के प्रभाव की जांच की गई है।

 

अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि स्थानीय स्तर पर 3.4 वर्ष के लिंग कोटा के औसत से अवगत कराए गए निर्वाचन क्षेत्रों में संसद के लिए अतिरिक्त 38.75 महिला उम्मीदवार चल रहे हैं – 1991 और 2009 के बीच 35 फीसदी की वृद्धि हुई है। राज्य विधानसभाओं के लिए, अतिरिक्त 67.8 महिला उम्मीदवार 2.8 वर्षों के कोटा के औसत एक्सपोजर के साथ निर्वाचन क्षेत्रों में कार्यालय के लिए चल रही थीं।

 

अध्ययन के मुताबिक राज्य विधानसभाओं के चुनाव में हिस्सा लेने वाली अन्य महिला उम्मीदवार मुख्य रूप से स्थानीय सरकार के संपर्क में थीं। राष्ट्रीय संसद के चुनाव में भाग लेने वाली महिलाएं वे थीं, जिन्होंने राज्य विधानसभा चुनावों में चुनाव लड़ा था लेकिन हार गई थी। अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि महिलाएं राजनीति में आगे बढ़ने के इच्छुक हैं।

 

… इसलिए महिलाएं स्वतंत्र उम्मीदवारों के रूप में लड़ती हैं चुनाव

 

अध्ययन में बताया गया है कि, ज्यादातर महिलाएं स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ती हैं। क्योंकि पार्टियां उन्हें टिकट देने के लिए अनिच्छुक हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक तमिलनाडु में महिला प्रतिभागियों की संख्या 2011 में 144 से बढ़कर 311 थी। इसी अवधि में स्वतंत्र महिला उम्मीदवारों की संख्या 63 से 97 हो गई थी।

 

ओ’कनेल के अध्ययन के मुताबिक, जिन महिलाओं को प्रमुख राजनीतिक दलों में शामिल किया गया है, उन्हें जीतने का अधिक मौका मिला है।

 

1996-2006 के बीच नागपट्टिनम जिले में वडुवाचेरी पंचायत के पूर्व अध्यक्ष रानी मुनियाकानु ने इस क्षेत्र में रेत माफिया के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।  2011 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राज्य विधानसभा चुनाव लड़ा। वह उन चुनावों में हार गईं । इसके बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गई।

 

वह बताती हैं, “एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जीतना मुश्किल है लेकिन राजनीतिक दल से टिकट प्राप्त करना भी मुश्किल है।”

 

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1996-2006 के बीच नागपट्टिनम जिले में वडुवाचेरी पंचायत के पूर्व अध्यक्ष रानी मुनियाकानु ने इस क्षेत्र में रेत माफिया के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।  2011 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राज्य विधानसभा चुनाव लड़ा। वह उन चुनावों में हार गईं । इसके बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गई।

 

अध्ययन में बताया गया है कि, राजनीतिक आरक्षण ने महिलाओं और राजनीति के बीच एक नया पूल बनाया है, जो अधिकतर निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के प्रतिभागियों की तुलना में उन्हें जीतने की संभावना कम होती है।

 

कुछ महिलाओं ने साक्षात्कार में कहा, टिकट न देने के पीछे राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए अन्य तर्क ये हैं कि ‘महिलाएं जीतने योग्य नहीं हैं।’  शिवगंगाई जिले में कुरुथंगुड़ी पंचायत के दलित अध्यक्ष राजेश्वरी अपने काम से बहुत लोकप्रिय थीं और उन्हें मानमदुराई निर्वाचन क्षेत्र से टिकट का वादा किया गया था, लेकिन 2016 के विधानसभा चुनावों में एआईएडीएमके ने आखिरी मिनट में इनकार कर दिया था।

 

राजेश्वरी निराश अवाज में बताती हैं, “उन्होंने कहा कि पुरुष के लिए जीतने का बेहतर मौका है।”

 

जोतिमानी की पार्टी ने 2011 में राज्य विधानसभा चुनाव और 2014 के आम चुनावों से उन्हें मैदान में उतारा था। वह दोनों चुनाव हार गईं। 2016 में, उन्होंने अराकुरीची से चुनाव लड़ने का फैसला किया, वह एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र था जिसे वह अधिक परिचित थीं। पार्टी ने उसे टिकट देने से इंकार कर दिया । उन्होंने इसके खिलाफ सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराया।

 

यूनाइटेड किंगडम में राजनीति पर 2010 के एक अध्ययन में बताया गया कि कंज़र्वेटिव पार्टी द्वारा उतारी गई महिलाएं चुनाव में कम सफल रही थीं क्योंकि उन्हें अवांछनीय निर्वाचन क्षेत्रों में उतारा गया था।

 

जोथिमानी कहती हैं, “पार्टी के बड़े लोग सोचते हैं कि अगर टिकट देने से इनकार किया जाता है, तो महिलाएं चुनाव नहीं लड़ेंगी। इस धारणा को मैं बदलना चाहती थी। इसलिए मैंने सार्वजनिक रूप से विरोध किया था।”

 

चुनाव लड़ने के लिए महिलाओं के पास पर्याप्त धन नहीं

 

एक राजनीतिक करियर के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है-खासकर चुनाव के समय। कुछ ही महिलाएं इसे वहन कर सकती हैं। महिला पंचायत नेताएं मामूली मानदेय से बड़ी मुश्किल से अपने दैनिक खर्च को पूरा कर पाती हैं । राजनीतिक पदानुक्रम में ऊंचे जाने के लिए धन और साधन जुटाना जमीनी स्तर के महिला नेताओं, खासकर दलित और आदिवासी समुदायों के लिए मुश्किल है।

 

ज्योतिमानी के 22 वर्षीय राजनीतिक करियर में उनकी मां ने उन्हें अक्सर आर्थिक सहायता दी। उनके परिवार के पास कृषि योग्य जमीन है। परिवार के वित्त पर ज्यादातर महिलाओं का नियंत्रण नहीं होता है और, अपने परिवार के समर्थन के बिना राजनीति में प्रवेश करना और उसे जारी रखना असंभव सा लगता है।

 

ज्योतिमानी पूछती हैं, “एक जिला सचिव को अवैतनिक स्थिति में अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए कम से कम 70,000 रुपये से 1 लाख रुपये की जरूरत है। जमीनी स्तर की महिला नेताओं को इस तरह से पैसा कहां मिलते हैं?”

 

जिन महिला नेताओं से इंडियास्पेंड ने बात की, उनका मानना था कि महिलाओं और हाशिए वाले समूहों को राजनीति में बनाए रखने के लिए केंद्रीकृत वित्त पोषण तंत्र होना आवश्यक है। महिला नेताओं के मुताबिक वामपंथी दलों का वित्तपोषण मॉडल एक बेहतर विकल्प है।

 

बाला भारती कहती हैं, “वामपंथी दलों के विधायक और सांसद अपना वेतन घर नहीं ले जाते हैं। वे पार्टी को अपना वेतन दे देते हैं, जिसका उपयोग पूर्णकालिक पदाधिकारी का भुगतान करने के लिए किया जाता है।”

 

सलमा ने 2006 के चुनावों में खर्च हुए 5 करोड़ रुपये को याद किया। उन्होंने कहा, “पार्टी ने केवल थोड़ी सी राशि दी”। बाकी का खर्च उन्हें खुद उठाना पड़ा। 2016 में, जब वह दोबारा चुनाव लड़ना चाहती थी, तो पार्टी ने फिर से आर्थिक मदद करने से इनकार कर दिया।

 

धन एकमात्र कारण है, जिसकी वजह से सुब्बुलक्ष्मी जगदीसन ने चुनाव लड़ना बंद कर दिया। वह बताती हैं “जब मैं 2009 में केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के बाद विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थी, तो चुनाव व्यय 5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। इसके अलावा, मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए धन देने का एक नया चलन था। इसलिए मैंने पार्टी के लिए काम करते रहने का विकल्प चुना। “

 

राजनीति में एक और समस्या है यौन शोषण और इसका कोई उपाय नहीं दिखता। सलमा कहती हैं, “राजनीतिक दल यौन उत्पीड़न पर दिशानिर्देशों का पालन नहीं करते हैं।”

 

जोतिमानी जैसी नेता, हालांकि वित्तीय रूप से संघर्ष कर रही हैं, महिलाओं के लिए राजनीति को करियर रूप में पसंद करने की चाह पर समाज की धारणा को बदलना चाहती हैं।

 

जब उन्होंने 21 साल की उम्र में 1996 में चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो उन्हों आज भी याद है कि कैसे रिश्तेदारों ने उन्हें मनाने की कोशिश की और समझाया कि यह एक पढ़ी-लिखी महिला के लिए गलत विकल्प है। बीस साल बाद, लोग अभी भी ‘उचित’ नौकरी करने के लिए उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं।

 

जोतिमानी कहती हैं, “इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरुष सत्ता अपने पास रखना चाहते हैं और वे इसे साझा करने में अनिच्छुक रहते हैं। यही वजह है कि  बहुत चालाकी से पुरूषों ने महिलाओं को समझाना चाहा है कि राजनीति उनके लिए नहीं है। हमें इस विचार में छिपे स्वार्थ को समझने की जरूरत है।”

 
यह लेख पांच लेखों की श्रृंखला का अंतिम भाग है। आप इस श्रृंखला के अन्य लेख पढ़ सकते हैं:
 

Part 1: जिद से जीत तक, तमिलनाडु में महिला पंचायत प्रमुखों की कहानी

 

Part 2: कम फंड, कोई वेतन नहीं, तमिलनाडु के महिला नेता कैसे हैं सफल ?

 

Part 3: दलित मुथुकानी को स्वयं के लिए क्यों पंचायत कार्यालय का निर्माण करना पड़ा?

 

Part 4: हिंसा की छाया में तमिलनाडु की महिला नेता

 

(राव GenderandPolitics की ‘को-क्रिएटर ’ हैं। यह एक ऐसी परियोजना हैजो भारत में सभी स्तरों पर महिला प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी को ट्रैक करती है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 30 जून 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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