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…तब भारत में 11फीसदी अधिक दंगे होते : एक अध्ययन

एलिसन सलदानहा,
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मुंबई: विधानसभा के कांग्रेसी सदस्य अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पहले से ही सांप्रदायिक हिंसा रोकने की संभावना रखते थे। इसका कारण मुस्लिम वोटों और उनकी बहु-जातीय चुनावी संभावनाओं पर निर्भरता है। यह जानकारी पूर्व येल राजनीति विज्ञान अनुसंधान स्कॉलर द्वारा एक अध्ययन में सामने आई है। अध्ययन में आंकड़ों का हवाला दिया गया है, जो बताता है कि जिन राज्यों में कांग्रेस कम वोटों से चुनाव जीती है वहां, हिंदू-मुस्लिम दंगे होने की संभावना कम हुई है और यदि ऐसी घटनाएं होती भी हैं तो जान-माल का नुकसान कम होता है। यदि 1960 और 2000 के बीच, जिला स्तर पर कम फासलों से जीतने वाले चुनाव कांग्रेस हार गई होती तो भारत ने 11 फीसदी अधिक हिंदू-मुस्लिम दंगे (998 की जगह 1,114) और 46 फीसदी अधिक जनहानि (30,000 के बजाय 43,000) का अनुभव किया होता। यह जानकारी 2016 में त्रैमासिक ‘जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस’ में प्रकाशित रिपोर्ट में सामने आई है। इसका एक संक्षिप्त हिस्सा हाल ही में ‘आइडियाज ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित किया गया है, जो नीतिगत मुद्दों पर चर्चा के लिए एक मंच है।  अध्ययन में कहा गया है कि यदि कांग्रेस के उम्मीदवार ने स्थानीय वे सभी चुनाव जीते होते जहां वे बहुत कम वोटों से हार गए, तो दंगों में 10 फीसदी (या 103 कम दंगों) की कमी आई होती। अध्ययन में आगे कहा गया है कि, कांग्रेस के विधायकों के प्रभाव से दंगें की घटनाएं रूकीं,  चाहे राज्य के मुख्यमंत्री कांग्रेस के सदस्य हों या नहीं हों।  अध्ययन के निष्कर्ष उन चुनावी नियमों को रेखांकित करते हैं, जहां बहु-जातीय दलों को बनाने और समृद्ध करने के लिए नेताओं को प्रोत्साहित करने की बात है, जैसा कि अध्ययन के लेखक गैरेथ नेलिस, स्टीवन रोसेनज्वेग और माइकल वीवर ने सुझाव दिया है। नेलिस अभी बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में ‘एविडेंस इन गवर्नेंस एंड पॉलिटिक्स पोस्ट डॉक्ट्रल’ में फेलो हैं। रोसेनज्वेग ‘बोस्टन विश्वविद्यालय’ में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं और वीवर ‘शिकागो विश्वविद्यालय’ में कॉलेजिएट सहायक प्रोफेसर और ‘हार्पर-श्मिट फेलो’ हैं। वीवर ने एक ईमेल साक्षात्कार में इंडियास्पेन्ड को बताया, ” यह (अध्ययन) बताता है कि राजनीतिक दबाव से पुलिस को बचाने की आवश्यकता है और पुलिस पेशेवरता के स्तर को बढ़ाने की भी जरूरत है, ताकि अल्पसंख्यकों पर हमलों को रोकने के लिए पुलिस जो कदम उठाएगी, वह सत्ता या  राजनीतिक दलों से प्रभावित नहीं होगा।”

 
सांप्रदायिक दंगों को रोक सकता है स्थानीय स्तर का नेतृत्व
 

कई शोधकर्ताओं का मानना है कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी दल और विशेष रूप से वे जो चुनावी समर्थन के लिए अल्पसंख्यकों पर भरोसा करते हैं, लोकतंत्र को मजबूत करने और विभिन्न जातीय और धार्मिक समूहों के बीच शांति बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसा कि वीवर ने इंडियास्पेंड को बताया, “हम भारत के मामले का उपयोग करके इस सिद्धांत का परीक्षण करना चाहते थे । ” आजादी के तुरंत बाद के वर्षों में, सांप्रदायिक संघर्ष को रोकने के लिए स्वतंत्र रूप से धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस ने अपने प्रभुत्व की स्थिति का उपयोग किया था। इन दावों के लिए बारीक साक्ष्य ढूंढते हुए, लेखकों ने पाया कि अब तक शोध में बड़े पैमाने पर केंद्र सरकार की भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया गया है, भले ही कानून व्यवस्था को बनाए रखना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है।

 

भारत के निर्वाचन आयोग से नए संकलित डेटा सेट और स्कॉलर आशुतोष वर्षानी और स्टीवन विल्किन्सन द्वारा निर्मित वर्शनी-विल्किन्सन डेटासेट में दर्ज हिंदू-मुस्लिम दंगों के जियोकोडेड डेटा के साथ येल अध्ययन के लेखकों ने अपना आकलन करने के लिए कुछ प्रयोग किए कि कैसे कांग्रेस बनाम गैर-कांग्रेस विधायकों के चुनाव ने दंगों को भड़काने की संभावना को प्रभावित किया था। उन्होंने 1962 से 2000 तक की अवधि के लिए 315 जिलों से डेटा का अध्ययन किया है। विश्लेषण किए गए राज्य और वर्षों में कांग्रेस ने राज्य सरकार को 58 फीसदी नियंत्रित किया है।  इस अध्ययन में जिला स्तरीय विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जहां कांग्रेस उम्मीदवार 1 फीसदी के अंतर से जीता या हार गया है, जो यह बताते है कि, इस तरह के चुनाव के परिणाम आकस्मिक हैं, जो मतदान दिवस पर मौसम जैसे अप्रत्याशित कारकों पर निर्भर हैं। (ऐसे स्थानों में, मतदाताओं को समान रूप से पार्टी लाइनों में वितरित किया गया, जिससे सांप्रदायिक तनाव को रोकने में विधायक की भूमिका का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दे।) गहन विश्लेषण के लिए, अध्ययन के नमूने को कांग्रेस राज्य सरकारों और अन्य पार्टियों के शासन के तहत विभाजित किया गया।

 

वीवर ने कहा, “हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि विधायक ऐतिहासिक रूप से दंगों को कम करने में सक्षम हैं। आज के संदर्भ में, अध्ययन के  परिणाम सुझाव देते हैं कि यदि मतदाता हिंसा को रोकने के लिए राज्य द्वारा कार्रवाई पर जोर देते हैं, तो राजनेता अधिक काम कर सकते हैं।”

 

निष्कर्ष कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को जरूर आश्चर्यचकित करेंगे, क्योंकि शोधकर्ताओं ने जोर दिया कि अध्ययन अन्य धार्मिक, जाति या आर्थिक क्लेवेज से होने वाले संघर्ष पर कांग्रेस की सत्ता के प्रभाव को नहीं बताता है, जो अन्य कारकों की वजह से हो।

 

शोधकर्ताओं ने कांग्रेस की सत्ता के संभावित परिणाम का भी आकलन किया। शोधकर्ताओं ने लिखा, “कांग्रेस के नेताओं ने कभी-कभी हिंदू-मुस्लिम हिंसा को बढ़ावा दिया है, लेकिन हमारा प्रयास यह दिखाना है कि यह मानदंड से विचलन का प्रतिनिधित्व करता है। अध्ययन का परिणाम राज्य विधायकों के लिए विशेष रूप से सच है। हम यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि सरकार के अन्य स्तरों पर राजनेताओं के लिए समकक्ष पैटर्न है या नहीं।”

 

निष्कर्ष मजबूती के लिए कई जांचों का सामना करते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा,  ” इस अध्ययन के बाद भारत में हिंदू-मुस्लिम हिंसा के कारणों के बारे में सबसे अधिक सतर्क अनुभवजन्य नतीजे सामने आए हैं।” इस अध्ययन में कांग्रेस पार्टी की आजादी के बाद स्वतंत्रता विरासत के पुनर्मूल्यांकन की मांग है,  और  दुनिया भर के विभाजित समाजों में बहुसंख्यक दलों की बात कही गई है।

 

कांग्रेस के पदाधिकारी सांप्रदायिक हिंसा को हतोत्साहित क्यों करते हैं?

 

अध्ययन में आगे पाया गया है कि, मुस्लिम वोटों और बहु-जातीय चुनावी गणित पर निर्भरता, वे संभावित कारण हैं जिससे कांग्रेस विधायकों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगाई है। अध्ययन से पता चला है कि औसत मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस की सत्ता का प्रभाव असरदार पाया गया या उन इलाकों में दंगों के भड़कने की संभावना कम थी। इससे इन दावों को बल मिलता है कि चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस मुस्लिम वोटों पर ज्यादा निर्भर है।

 

शोधकर्ता कहते हैं, सांप्रदायिक हिंसा के प्राथमिक पीड़ितों के रूप में, मुस्लिम मतदाता अक्सर ऐसे राजनेताओं को चुनने के बारे में गहराई से सोचते हैं, जो उन्हें हमलों से बचा पाएंगे।” इस महत्वपूर्ण वोटिंग ब्लॉक के समर्थन को बनाए रखने के लिए, कांग्रेस के नेताओं द्वारा हिंदू-मुस्लिम दंगों को खत्म करने के लिए मजबूत कार्रवाई करने की जरूरत तो सामने आती ही है- ज्यादातर, मामले में ऐसा लगता है कि मामला आगे बढ़े इससे पहले पुलिस को गड़बड़ी को दूर करने के निर्देश दे दिए जाएंगे।” शोधकर्ताओं ने इंडियास्पेंड को बताया कि उन्होंने हिंदू आबादी वाले क्षेत्रों को अलग से नहीं देखा है। वीवर ने इंडियास्पेंड को बताया, ” जिले में अधिक मुस्लिम होने के साथ हिंदूओं के कम होने की उम्मीद होती है, हम यह देखना चाहते हैं कि ज्यादा हिंदू आबादी वाले क्षेत्रों में दंगों को रोकने के लिए कांग्रेस ने कितना कम काम किया है।” अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि सभी बहु-जातीय समूहों को खुश रखना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि अकेले मुस्लिम अल्पसंख्यक के वोट चुनाव जीता नहीं सकते हैं।  बहु-जातीय मतदाताओं पर आधारित  पार्टी, जैसे कि कांग्रेस भी, मतदाताओं के ध्रुवीकरण से बचने के लिए जातीय हिंसा को रोकने के लिए प्रेरित हो सकते हैं, जो जातीय मतों पर निर्भर प्रतिस्पर्धी दलों को लाभ पहुंचाता है और उनकी खुद की चुनावी संभावनाओं को कमजोर करता है।

 

सांप्रदायिक दंगे कैसे भारत में चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं?
 

राज्य विधानसभा चुनाव से पहले के वर्ष में, प्रत्येक दंगा का प्रकोप औसतन कांग्रेस वोट शेयर में 1.3 प्रतिशत अंक की गिरावट के साथ जुड़ा हुआ था। इसके विपरीत, भारतीय जनसंघ / भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने औसतन अपने वोट शेयर में 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। शोधकर्ताओं ने लिखा कि, जब पारस्परिक विश्वास कम हो जाता है, तो कांग्रेस कुछ धार्मिक समूहों, विशेष रूप से हिंदुओं का समर्थन खो देती है।

 

1981 और 2001 के बीच 16 भारतीय राज्यों में राज्य सरकार के चुनावों पर हिंदू-मुस्लिम दंगों के प्रभाव का विश्लेषण करने वाले कैम्ब्रिज शोध स्कॉलर श्रीया अय्यर और आनंद श्रीवास्तव के एक अध्ययन ने इन निष्कर्षों को प्रतिबिंबित किया है।

 

यदि चुनाव से पहले वर्ष में एक दंगा हुआ, तो इसके बाद बीजेपी के वोट शेयर में विशेष रूप से 5-7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जैसा कि जर्मनी के बॉन में ‘आईजेडए इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स’ द्वारा प्रकाशित अय्यर और श्रीवास्तव के 2015 के पेपर में बताया गया है।

 

अय्यर और श्रीवास्तव कहते हैं, ” हमारा काम इस तर्क के लिए आधार प्रदान करता है कि मजॉरिटी आइडेन्टटी पार्टीके पास जातीय तनाव पैदा करने या यहां तक ​​कि दंगों का कारण बनने के लिए स्पष्ट प्रोत्साहन है। भारत में हालिया घटनाओं से पता चला है कि इसका इस्तेमाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक रणनीति के रूप में किया गया था। “

 

इस बात पर जोर देते हुए कि उनके शोध ने बहिर्जात कारण जैसे कि दंगों के चुनावी परिणामों के प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया था, अय्यर और श्रीवास्तव ने कहा कि नतीजे बताते हैं कि दंगों से व्यवस्थित रूप से लाभ लेने वाली पार्टी को चुनावी लाभ के लिए दंगों का कारण बनने का स्पष्ट प्रोत्साहन हो सकता है।

 

येल के शोधकर्ताओं ने इस संभावना का भी अध्ययन किया कि क्या कांग्रेस के राजनेताओं ने करीबी चुनाव हारने के बाद दंगों को उकसाया? आंकड़ों पर उनके विश्लेषण ने इसे ‘असंभव’ पाया क्योंकि दंगों ने बाद के चुनावों में कांग्रेस के वोट हिस्से को कम किया है। शोधकर्ताओं ने कहा, “हिन्दू-मुस्लिम हिंसा का प्रकोप कांग्रेस के लिए वोट और सीटों को खोने का कारण बनता है, और बदले में अधिक हिंसा होती है।”

 

बहुजातीय मतदाताओं पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने वाली पार्टियों से बहुत कम वोट से कांग्रेस के जीतने या हारने के प्रभावों को भी शोधकर्ताओं ने देखा-परखा।वीवर ने कहा, “हम यह देखकर आश्चर्यचकित हुए कि इन मामलों में भी कांग्रेस के जीतने पर कम दंगे हुए थे, और इस प्रभाव का आकार उस तरह का था, जब कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से जातीय दलों के खिलाफ चुनाव जीता था। इससे निष्कर्ष निकाला गया कि दंगों को रोकने के लिए कांग्रेस के राजनेताओं के पास अधिक विशिष्ट प्रोत्साहन थे।”

 

अध्ययन के निष्कर्ष में इस पहेली पर नई रोशनी डाली गई है कि इन चुनौतीपूर्ण बाधाओं के खिलाफ सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकतांत्रिक संस्थानों ने कैसे खुद को खड़ा रखा है?अध्ययन में आगे कहा गया है कि, “विभाजित समाजों में लोकतांत्रिक स्थिरता न सिर्फ संस्थानों या सामाजिक क्लेवेज की प्रकृति पर निर्भर करती है, बल्कि इस बात पर भी कि नागरिक किस पार्टियों को सत्ता में लाने के लिए मत देते हैं।

 
सलदानहा सहायक संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 12 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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