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केरल का एक जिला हल कर रहा है अपनी जल समस्या

श्रीहरी पलियथ,
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भारत में पानी की उपलब्धता कम हो रही है  और  2011 में समाप्त होने वाले दशक में, केरल में यह 10 प्रतिशत अंक घटकर 62 फीसदी तक हो गया है।  2008 में, त्रिशूर के जिला प्रशासन ने मझोपोलिमा की शुरुआत की थी। एक योजना जो छत पर हुई वर्षा के जल संचयन से कुओं का पुनर्भरण करता है। एक दशक के दौरान, इस योजना ने 100,000 से अधिक लोगों को लाभ पहुंचाया है और इसकी सफलता ने राज्य सरकार को सभी जिलों में इसे विस्तारित करने के लिए प्रेरित किया है।

 

त्रिशूर: जवाब वैलियादथ अपनी नीली लुंगी (सरोंग) को अपनी कमर के चारों ओर बांधते हैं और अपनी आस्तीन ऊपर उठाते हैं। वह अपने घर के पास शीट-मेटल बाड़ के नजदीक एक प्लास्टिक नल के पास पहुंचते हैं। उनकी छत से बाड़ तक फैला हुआ प्लास्टिक पाइप टूट गया है। वह बताते हैं, “यह एक कठिन वर्ष रहा है। यहां के आसपास, या तो कुएं सूख गए हैं या कम वर्षा के कारण पानी का रंग पीला हो गया है और स्वाद खारा हो गया है। बारिश के दौरान अपने कुएं को भरने से हमारी रोज की जरूरतों के लिए पानी बचाने में मदद हुई है। “

 

45 वर्षीय एक निर्माण मजदूर वैलियादथ, उनकी पत्नी जीनत और उनके तीन किशोर लड़के केरल के त्रिशूर जिले के तटीय पड़ीयूर पंचायत में रहते हैं। उन्होंने जिला प्रशासन की मझोपोलिमा योजना से लाभ प्रप्त किया है, जिसके माध्यम से छत वर्षा जल संचयन प्रणालियों (कीमत 4,500 रुपये) को स्थापित करने के लिए ग्रामीणों को 75 फीसदी सब्सिडी प्रदान की गई थी। 2008 के बाद से, करीब 30,000 इकाइयां स्थापित की गई हैं, जिसमें 100,000 लोगों का लाभ हुआ है। अधिकारियों का मानना है कि कई लोगों ने स्वयं की इकाइयां स्थापित की हैं, हालांकि डेटा उपलब्ध नहीं हैं।

 

फरवरी, 2013 प्रभाव आकलन रिपोर्ट के अनुसार, तटीय और मिडलैंड क्षेत्र में पूछने पर लगभग 78 फीसदी उत्तरदाताओं ने “भूजल उपलब्धता में महत्वपूर्ण सुधार” की सूचना दी है।

 

ज्यादा और कम की कहानी

 

हर साल, फरवरी से जून तक मानसून आने तक, त्रिशूर पानी की कमी का सामना करता है। समुद्री निकटता से नमक वाला पानी आता है, गहराई को सीमित करता है जिससे वैलियादथ की तरह परिवार के लोग पानी के लिए बोरवेल खोदते हैं। इसलिए छिछला पानी और खुला खुदा कुआं, पारंपरिक रूप से पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है।

 

हालांकि, खराब रखरखाव के कारण कई कुएं इस्तेमाल के लायक नहीं रहे हैं, जबकि बारिश तेजी से अनियमित हो रही है। इन कारकों के साथ  पारंपरिक जलमार्ग, जल निकासी व्यवस्था, कुओं और तालाबों के नुकसान के साथ शुष्क मौसम में पानी की कमी हो रही है।

 

राज्य अब फरवरी से मई के अंत तक एक बड़े शुष्क मौसम का सामना करता है। वर्ष 2011 में समाप्त होने वाले दशक में, केरल में घरेलू कुएं पानी की उपलब्धता 10 प्रतिशत घटकर 62 फीसदी हो गई है।

 

यह देश के बाकी हिस्सों की स्थिति को दर्शाती है – जनवरी 2016 में कुएं का जल स्तर भारत भर में 2006 और 2015 के बीच औसत से कम था, जैसा कि नवंबर 2016 में इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है। केवल 35 फीसदी कुओं ने जल स्तर में वृद्धि देखी है, जबकि 64 फीसदी ने गिरावट देखी है।

 

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 1,700 क्यूबिक मीटर (एम 3) से भी कम पानी की उपलब्धता के साथ वाला क्षेत्र को ‘पानी की कमी’ वाला क्षेत्र माना जाता है।

 

2011 में, भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1,545 एम 3 होने का अनुमान था, और पानी की कमी माना गया था, जैसा कि जल मंत्रालय द्वारा मूल्यांकन के आधार पर इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2017 में रिपोर्ट किया है। 2025 तक उपलब्धता में 1334 एम 3 तक और 2050 तक 1,140 एम 3 तक गिरावट आने की संभावना है, जिससे देश को गंभीर रूप से पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

 

त्रिशूर में, 450,000 कुओं ने अपनी तीन मिलियन में से तीन चौथाई आबादी को पानी की आपूर्ती की, जो कुएं की पानी पर ही निर्भर थे। फिर भी, वैलियादथ जैसे परिवारों ने हर साल महीनों तक पानी की कमी का सामना किया है।

 

तत्कालीन कलेक्टर वी.के. बेबी के नेतृत्व में, त्रिशूर जिला प्रशासन ने 2008 में मजापोलिमा (पानी की वर्षा), एक जल संचयन कार्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया। इसके पीछे विचार कृत्रिम रूप से भूजल को छत वर्षा जल के सीधे खोदे गए कुएं में एकत्रित करके रिचार्ज करना था।

 

केरल में घरेलू कुआं जल उपलब्धता, 2001-2011

खोदे गए कुएं : अनुपयोग, और पुनरुद्धार

 

परंपरागत रूप से भूजल तक पहुंचने के लिए खोदे गए कुएं का लोग तेजी से उपयोग करना छोड़ देते हैं। पिछले दो दशकों से 2014 तक, खोदे गए कुएं की संख्या में 9 फीसदी की कमी आई है। यह संख्या भारत के 661 जिलों में, 9.6 मिलियन से 8.7 मिलियन तक हुई है, जैसा कि 5 वीं लघु सिंचाई जनगणना में बताया गया है।

 

इस बीच भूजल कम होने के साथ गहरे ट्यूबवेल्स की संख्या (70 मीटर 200 मी 3 प्रति घंटे की प्रवाह साथ 70 मीटर या अधिक की गहराई) में 86 फीसदी की वृद्धि हुई है,  2006-07 और 2013-14 के बीच 1.4 मिलियन से 2.6 मिलियन तक, जैसा कि सिंचाई की जनगणना में पता चला है।

 

भारत में दक्षिणी राज्यों में केरल मानसून (दक्षिण पश्चिम) बारिश से जल प्राप्त करने वाले में सबसे आगे है। राज्य को सालाना लगभग 3000 मिलिमीटर (मिमी) बारिश प्राप्त होने का अनुमान है। तुलनात्मक रूप से, गुजरात का कच्छ जिला, देश के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से है। इसे करीब 378.2 मिमी बारिश प्राप्त होती है ।

 

फिर भी, अप्रैल 2017 में केरल को सूखा प्रभावित घोषित किया गया था। इसे पिछले साल जून से दिसम्बर तक सामान्य वर्षा का केवल 33 फीसदी प्राप्त हुआ है, जैसा कि Scroll.in ने अप्रैल 2017 में रिपोर्ट किया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा इस रिपोर्ट के अनुसार 1951 और 2010 के बीच, वार्षिक और मानसून वर्षा 1.43 मिमी और 2.42 मिमी प्रति वर्ष कम हुई है।

 

पर्यावरण सूचना केंद्र के मुताबिक, 80 फीसदी से अधिक ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भूजल पानी का प्रमुख स्रोत था। अपर्याप्त जल प्रबंधन की वजह से पानी की कमी, खोदने गए कुओं का खराब रखरखाव से केरल की 33 मिलियन आबादी में से एक बड़ी संख्या प्रभावित हुई है।

 

मझोपोलिमा योजना के सचिव, जो. सी. राफेल. ने इंडियास्पेंड को बताया, “जब से सरकारी कार्यक्रमों ने 1970 के दशक में पाइप की आपूर्ति सुनिश्चित की, लोग घरों में कुओं की रक्षा करना भूल गए हैं। पाइप आपूर्ति से कठिन परिश्रम कम हुआ है, लेकिन पारंपरिक जलमार्ग, जल निकासी व्यवस्था, कुओं और तालाबों की हानि, और अनियमित वर्षा से केरल में गंभीर पानी की समस्या पैदा हुई है।  “राफेल और उनकी टीम ने त्रिशूर में वर्षा जल संचयन के माध्यम से कुएं का रिचार्ज लेने के लिए समुदाय को सम्मिलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

त्रिशूर ने किया सही इस्तेमाल

 

मझोपोलिमा को त्रिशूर जिले के सभी इलाकों, मिडलैंड्स और तटीय भागों सहित लागू किया गया है।

लगभग 35 फीसदी इकाइयां तटीय क्षेत्रों में स्थित घरों में स्थापित की गई हैं और निचले क्षेत्र और उन्नत भूमि में 32 फीसदी इकाई की स्थापना की गई है। इकाइयां पुलिस स्टेशन, सरकारी स्कूल और पंचायत जैसे संस्थानों में भी स्थापित किए गए हैं।

 

 

वर्षा जल संचयन इकाइयां दो प्रकार के हैं।एक रेत, लकड़ी का कोयला और कंकड़ से बना फिल्टरऔर दूसरा  नायलॉन या कपड़ा फिल्टर के साथ। प्रत्येक इकाई में फिल्टर टैंक के माध्यम से प्लास्टिक पाइप छत बारिश का पानी संचालन करता है। शुरुआत में गंदा पानी बाहर निकल जाता है। यह पानी मिट्टी में भी फैलता है, और बर्बाद नहीं होता है।

 

अनुमान है कि, एक इकाई की लागत 4,500 रुपये आती है, जिसमें से सरकार 75 फीसदी का भुगतान करती है और लाभार्थी बाकी का भुगतान करते हैं ( लगभग1,125 रुपये)। चल रहे सरकारी कार्यक्रमों से धन जैसे कि इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) और जिला आपदा प्रबंधन कोष लिया गया है। केरल राज्य औद्योगिक विकास निगम और निजी दाताओं ने भी योगदान दिया है।

 

2012 में, त्रिशूर में वेल्लंगलल्लूर ब्लॉक ने एक क्लस्टर दृष्टिकोण को पायलट करने का फैसला किया। चूंकि कई पंचायत बड़े ब्लॉक के अंतर्गत आते हैं, इसलिए एक लॉटरी व्यवस्था स्थापित करने का फैसला लिया गया और इसमें पाद्यूर गांव को चुना गया। इकाइयों को 38 घरों में स्थापित करने के लिए पंचायत ने अपने ‘योजना निधि’ से 1 लाख रुपये का उपयोग किया ( वर्ष की शुरुआत में पंचायत द्वारा तय किया गया ) जिनमें से एक वैलियादथ का था।

 

जब वैलियादथ परिवार को 2008 में त्रिशूर में स्थानांतरित किया गया था, तो पानी संकट गंभीर था। जीनथ वैलियादथ कहती हैं, “मैं एक सार्वजनिक स्टैंड-पोस्ट या उसके पास से पानी लाने के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करती थी और मटके में पानी लाती थी। हमें एक दिन में कम से कम पांच मटका पानी चाहिए था। ” जिस मटके की बात जीनत कर रही हैं उसमें औसतन 15 लीटर पानी आता है।  12 वीं पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति कम से कम 55 लीटर पानी प्रदान करना था।

 

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जवाब और जीनत वैलियादथ मजहोपोलिमा योजना के लाभार्थी हैं,  एक जिला प्रशासन योजना जो खुदाई कुओं को रिचार्ज करने के लिए वर्षा जल संचयन किटों पर सब्सिडी प्रदान करता है। जिनत को अब पानी लाने के लिए लंबी दूरी की यात्रा नहीं करना पड़ती है।

 

2017 के सूखा के बाद, एक बोरवेल जो कि वैलियादथ ने अपने घर में स्थापित किया था, उससे 30 फीट पर पानी निकाला। उन्होंने कहा, “वह ताजा पानी खारे पानी के साथ मिलेगा। पानी रिचार्जिंग गतिविधि ने घरेलू उपयोग के लिए भूजल को अधिक उपयुक्त बनाया है।”

 

वैलियादथ के घर के पास की वी.वी लैला का घर है। 61 वर्षीय लैला अकेले रहती हैं। वह कहती हैं, “मेरी मां के गुजर जाने के बाद मैं ही अपने छोटे भाई-बहनों का ध्यान रखती थी। मुझे अपनी छोटी बहन को गोद में उठाकर एक मटके से कुएं का पानी लाना याद है।”

 

अकेले रहने से, उनकी पानी की जरूरतें कम है और उसके पास पाइप कनेक्शन नहीं है। वह कहती हैं, “ मैं पीने के पानी को छोड़कर अन्य आवश्यकताओं के लिए पास के कुएं के पानी का इस्तेमाल करती हूं।”

 

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61 वर्षीय लैला अकेली रहती हैं। हालांकि सूखे मौसम में पानी की स्थिति से दुखी हो जाती है। मझोपोलिमा स्कीम ने यह सुनिश्चित किया है कि कुआं पूरी तरह न सूखे। गर्मीयों में वह पीने के पानी को छोड़कर अन्य आवश्यकताओं के लिए पास के कुएं के पानी का इस्तेमाल करती है।

 

कुएं का पानी पीला है, जो लोहे की उपस्थिति बताता है। वह बताती हैं, “बारिश से पहले, मैं यह सुनिश्चित करती हूं कि कुआं ठीक से साफ हो। बारिश के दौरान पानी साफ हो जाता है।”

 

फरवरी 2013 की इस प्रभाव आकलन रिपोर्ट के अनुसार, तटीय और मिडलैंड क्षेत्र में लगभग 78 फीसदी उत्तरदाताओं ने ‘भूजल उपलब्धता में महत्वपूर्ण सुधार’ की सूचना दी। उन्नत भूमि में परिणाम कम दिखाई दे रहे हैं, जहां 68 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि अंतर ‘न्यूनतम’ था, परिणामस्वरूप क्षेत्र की स्थलाकृति पर रिपोर्ट को दोषी ठहराया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि, ” मध्यम से खड़ी ढलानों और मिट्टी की झरझरा प्रकृति से रिचार्ज किए गए भूजल घाटी के हिस्से में बहुत तेजी से फैल सकते हैं। इसी कारण मजहोपोलिमा परियोजना ने उच्च भूमि क्षेत्र में भूजल व्यवस्था पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं दिखाया है। “

 

महत्वपूर्ण है रखरखाव

 

उत्तरदाताओं में से अधिकांश (85 फीसदी) ने 2013 की रिपोर्ट में कहा था कि रिचार्ज सिस्टम, गुणवत्ता वाले सामग्रियों और लाभार्थी की भागीदारी के आवधिक रखरखाव की आवश्यकता है।राफेल कहते हैं, “अक्सर, गरीबी रेखा से नीचे के घरों में, सिस्टम का अनुचित उपयोग हो जाता है।” पाइप का रखरखाव और लकड़ी का कोयला और रेत फिल्टर को जोड़ने में हर साल लगभग 2,000 रुपये का खर्च आता है और कई परिवार इसे वहन नहीं कर सकते हैं।

 

हालांकि, राफेल कहते हैं, “अगर इकाई को अच्छी तरह से बनाया, रखा और साफ किया जाता है, तो एक बुनियादी पारगम्य फिल्टर [नायलॉन नेट या कपड़ा के साथ] काम आ सकता है।”

 

पाइप और फिल्टर समय के साथ गंदगी और पत्तियों को जमा करते हैं, और साफ करना आसान नहीं होता है। मनरेगा से रखरखाव के लिए धन उपलब्ध नहीं है, क्योंकि यह काम कुशल / अर्द्ध कुशल लोग कर सकते हैं और मनरेगा केवल अकुशल लोगों के लिए है।

 

मनरेगा में 90 फीसदी से अधिक प्रतिभागी महिलाएं हैं ( आम तौर पर पुरुष अधिक वेतन की नौकरी चाहते है ) रखरखाव-संबंधित कार्य से पहले महिला श्रमिकों में क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण के लिए धन की आवश्यकता होती है।

 

पडीयुर गांव के पंचायत सदस्य शिवदासन सीए कहते हैं, “हम इसे अगले साल के लिए हमारी पंचायत योजना में शामिल करने की उम्मीद कर रहे हैं।” फिर भी, संरक्षण और रखरखाव की आखिरी जिम्मेदारी घरेलू मालिक की होगी।

 

हालांकि, मझोपोलिमा मॉडल सभी जिलों में विस्तारित किया गया है, इसकी निगरानी पंचायत स्तर पर है। घरेलू प्रभाव के आधार पर इसके प्रभाव के आंकड़े अभी तक मौखिक हैं।

 

2008 के बाद से, 100,000 से अधिक लाभार्थियों के साथ मझोपोलिमा करीब 30,000 इकाइयों स्थापित करने में सक्षम है । राफेल का अनुमान है कि कई लोगों ने स्वयं इकाइयां स्थापित की हैं, लेकिन डेटा उपलब्ध नहीं हैं।

 

(पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 7 मार्च 2018 को indiapspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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