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दिसंबर 2012 के दिल्ली बलात्कार मामले पर, एक ब्रिटिश वृत्तचित्र , इंडिया'स डॉटर पर प्रतिबंध पर चल रहे विवाद के दौरान जिस बात की चर्चा नहीं की जा रही है, वह है ऐसे मामलों में न्याय प्रणाली द्वारा किए गए मुकदमों का रिकार्ड।

राज्यसभा में पेश नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत में चार बलात्कार के मुकदमे में केवल एक ही पर सज़ा हो पाती है। बलात्कार के मुकदमे के लिए सजा की दर 2011, 2012 और 2013 में क्रमशः 26.4%, 24.2% और 27.1% थी।

मजलिस, मुंबई के एक कानूनी एडवोकेसी के अनुसार, कम सजा दरों के कारणों में से कुछ इस प्रकार हैं: पीड़ितों के द्वारा बयान वापिस ले लेना , प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में देरी, दोषपूर्ण जांच, उदासीन अभियोजन पक्ष, विसंगतियाँ और गवाह के बयानों में विरोधाभास, असंवेदनशील न्यायाधीश और चतुर आपराधिक (बचाव पक्ष) वकीलों द्वारा नाबालिग बच्चों से भी कठिन जिरह।

भारत में सजा की दर विकसित देशों की तुलना में अधिक है जैसे कि यूनाइटेड किंगडम में वर्ष 2011-12 में 7% की सजा की दर दर्ज की गई। टाइम पत्रिका के अनुसार स्वीडन में 10% और फ्रांस में 25% तक कम सजा की दर दर्ज की गई है।

नागालैंड, जो हाल ही में एक बलात्कार के आरोपी व्यक्ति की हत्या का गवाह रहा है , वहां 2013 में , 85.7% के साथ भारत में सर्वोच्च सजा की दर थी उसके उपरान्त सिक्किम है जहां 73.8% सजा दर थी।

सजा दर, पश्चिम बंगाल और पूर्व आंध्र प्रदेश में बड़े भारतीय राज्यों के बीच में सबसे खराब रही है। 2013 में आंध्र प्रदेश में केवल 11.6% बलात्कार के मुकदमों में ही सज़ा हो पाई जो पिछले वर्ष के 11.2% की तुलना में मामूली सी'वृद्धि है। पश्चिम बंगाल में 2013 में सजा दर 12.6% रही , जो 2012 की दर 10.9% से अधिक थी।

दूसरे शब्दों में, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में नौ बलात्कार के मुकदमों में एक ही सज़ा में समाप्त होता है।

2013 में महाराष्ट्र, असम और गुजरात का प्रदर्शन, क्रमशः 17.5% 13.9% और 18.8% , सजा की दर, के साथ बहुत खराब रहा।

यह संभावना हो सकती है कि वास्तविक सजा दर, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो, जो राज्यों द्वारा भेजे गए आंकलन को संकलित करता है, द्वारा दिए गए आंकड़ों से कम हो सकती है।

राज्य अनुसार बलात्कार की घटनाएँ और सज़ा दर , 2013

Source: Rajya Sabha

बलात्कार मामलों की शिकायत सूचना में वृद्धि। इसका अर्थ ज़रूरी नही कि बलात्कार बढ़ गए हैं।

भारत में बलात्कार मामलों की शिकायतों में पिछले एक वर्ष में 35% की वृद्धि हुई ,2012 में 24,929 से बढ़कर 2013 में 33,707 हो गई।

यह कहना कि बलात्कार बढ़ गए हैं ( हालांकि हो सकता है ऐसा हुआ हो , ) मुश्किल है, यह संकेत ज़रूर मिलता है कि अधिक संख्या में पीड़ित आगे आने को तैयार हैं और दिसंबर 2012 में दिल्ली बलात्कार के मामले के बाद हुए इतने व्यापक विरोध के बाद शिकायत दर्ज करने के लिए तैयार हैं ।

ऐसे मामलों की शिकायतों को दर्ज करने की संख्या में सबसे अधिक वृद्धि दिल्ली में हुई जहां 132% की वृद्धि रिपोर्ट की गई , 2012 में 706 से 2013 में 1636 तक।

उसी अवधि के दौरान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में क्रमश: 55% और 67% वृद्धि की रिपोर्ट की गई।

केवल दो राज्यों पश्चिम बंगाल और मिजोरम में बलात्कार मामलों की दर्ज की गई शिकायतों में कुछ गिरावट दिखी क्रमश: 18% और 14%।

आकंड़ों से पता चलता है कि भारी संख्या में बलात्कार मामलों की शिकयतें दर्ज नहीं की जातीं।

ये आंकड़े, कई मायनों में, मामलों की एक और अधिक गंभीर समस्या- अंडर रिपोर्टिंग के संकेतक हैं।

मजलिस की फ्लाविया एग्नेस ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की एक कार्यकर्ता के साथ हुई एक घटना सुनाई जिसमे उसका एक आईआईटी प्रोफेसर द्वारा यौन उत्पीड़न / बलात्कार किया गया था।

एग्नेस ने इंडिया स्पेंड को बताया कि " उसे समर्थन का आश्वासन देने के बावजूद उसने शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया"। "लेकिन अब, बाल यौन शोषण पर नए कानून के अंतर्गत और साथ ही हाल में हुए आपराधिक कानून संशोधन के तहत, अपराध की शिकायत नहीं करना भी एक अपराध है।"

2014 में रिसर्च इंस्टिट्यूट कम्पैशनेट इकोनॉमिक्स के एक रिसर्च फेलो आशीष गुप्ता द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, पुलिस को रिपोर्ट किए गए ,लगभग 5.8%, या 17 मामलों में से एक, कुछ अनुमानों के अनुसार,उत्तरजीविता के पति के अलावा अन्य पुरुषों द्वारा की गई यौन हिंसा के हैं। (यह अध्ययन 2005 के आंकड़ों के आधार पर किया गया था)

इसके अतिरिक्त, केवल 0.6% के लगभग या पति द्वारा यौन हिंसा की 167 घटनाओं में से सिर्फ एक ही सूचित की जाती हैं। वैवाहिक बलात्कार को भारत में एक अपराध नहीं मन जाता है।

बलात्कार मामलों में अंडर रिपोर्टिंग ,उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश द्वारा दिए गए आंकड़ों में स्पष्ट है।

उत्तर प्रदेश में 98.8 मिलियन की महिला आबादी में 2013 में केवल 1128 मामले दर्ज किए गए। बिहार में 48.6 मिलियन की महिला आबादी में 2013 में 3050 बलात्कार मामले दर्ज किए गए।

अतः, 2013 में उत्तर प्रदेश और बिहार में , क्रमशः 3.08 और 2.3 की ( प्रति 100,000 महिलाओं पर दर्ज किए गए बलात्कार मामले ) बलात्कार मामलों की दर रिपोर्ट की गई।

मध्य प्रदेश में 35.8 मिलियन महिलाओं के बीच 2013 में 4335 बलात्कार मामले दर्ज हुए , बलात्कार मामलों की दर 12.1 रही। यह उत्तर प्रदेश से चौगुनी और बिहार से पांच गुना की दर है।

मध्य प्रदेश की स्थिति , लिंग अनुपात और साक्षरता जैसे मानव विकास सूचकांक संकेतकों में , उत्तर प्रदेश और बिहार की तुलना में बेहतर है।

अतः, मध्य प्रदेश के लिए इतनी उच्च अपराध दर असंभव है । आंकड़ों से उत्तर प्रदेश और बिहार में अंडर रिपोर्टिंग का संकेत मिलता है। यही प्रवृत्ति भारत भर में स्पष्ट रूप से दिखती है।

'पुलिस स्टेशन से चिकित्सा जांच तक एक कटु अनुभव'

क्यों पीड़ित कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बलात्कार की शिकायत करने में संकोच करते हैं?

हाल ही में दिवंगत महिला अधिकार कार्यकर्ता और 'पार्क स्ट्रीट बलात्कार' उत्तरजीवी, कोलकाता की सुज़ेट जॉर्डन के मामले की चर्चा करते हुए, एग्नेस ने कहा " वास्तव में पुलिस स्टेशन से चिकित्सा जांच तक का अनुभव एक कटु अनुभव है, परीक्षण-पहचान परेड, अदालत में जिरह, अभियोजक की उदासीनता और न्यायाधीश की लापरवाही,"।

“प्रताड़िता क्यों इससे क्यों गुज़रना चाहेगी खासकर जब उसे पता है कि सजा की दर इतनी कम है? ", एग्नेस कहा। "इससे अपमान और कलंक को छोड़कर और क्या मिलता है? यह कोई आश्चर्य नहीं कि महिलाएँ [बलात्कार] रिपोर्ट नहीं हैकरती हैं? "

पुलिस के पास दर्ज किए जा रहे मामलों की संख्या में आई वृद्धि, इसलिए एक स्वागत योग्य कदम है। इससे भी अभियुक्तों को दोषी करार देने की संभावना बढ़ जाती है।

महिला एवं बाल विकास मंत्री, मेनका गांधी के अनुसार, बलात्कार के मामलों और महिलाओं पर हमलों की संख्या में, 2011 और 2013 के बीच, वास्तव में एक बढ़त की प्रवृत्ति थी। 2013 में, बलात्कार और हमलों की संख्या सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश (13,323) और आंध्र प्रदेश (13,267), उसके बाद महाराष्ट्र (13,827) में रिपोर्ट की गई थी।

एक 'झूठे बलात्कार' की रचना

जब प्रिया (बदला हुआ नाम), एक 14 वर्षीय लड़की को उसकी माँ एक सार्वजनिक अस्पताल में लाई क्योंकि उसे महीना नहीं हो रहा था, तब उसकी जांच से पता चला वह गर्भवती थी। उस पूर्व किशोरी ने स्थानीय प्रमुख (मुखिया) , जिसके घर पर वह नौकरानी थी, पर उसके साथ बलात्कार का आरोप लगाया। उसने उस हमले के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया था पर उसने वहाँ वापिस काम करने के लिए जाने से मना कर दिया था।

प्रिया की मां ने मामला दर्ज नहीं करने के लिए अस्पताल के कर्मचारियों से विनती की। वह प्रिया और खुद को कलंक से बचाने के लिए सिर्फ अपनी बेटी का गर्भपात करवाना चाहती थी। लेकिन प्रिया पांच महीने से अधिक समय से गर्भवती थी, और गर्भपात से उसकी जिंदगी को खतरा हो सकता था । जल्द ही, पड़ोसियोंको सब पता चल गया और उस प्रमुख की पिटाई हुई और बलात्कार का मामला दर्ज किया गया।

"जब प्रिया और उसकी माँ ने हमसे संपर्क किया तो वह दिल को छूने वाला दृश्य था जैसे प्रिया अपने दुपट्टे से अपने गर्भ की छिपाने की कोशिश कर रही थी " एग्नेस और ऑड्री डी मेलो ( दोनों मजलिस से हैं ) ने पिछले साल द हिन्दू में लिखा

मजलिस ने प्रिया को एक आश्रय घर में ले जाने की मदद की। उसकी माँ इतनी गरीब थी कि इस महत्वपूर्ण समय के दौरान उसकी बेटी से मिलने के लिए सिर्फ बस यात्रा का ही खर्च वहन कर सकती थी। बच्चे को अंततः गोद लेने के लिए दे दिया गया था।

"परीक्षण के दौरान, प्रिया अच्छी तरह से गवाही देने और भीषण जिरह का सामना करने में सक्षम थी । उसकी अनपढ़ माँ को बहुत अपमान झेलना पड़ा क्योंकि उसके पति ने उसे छोड़ दिया था। डीएनए रिपोर्ट से पता चला कि प्रमुख पिता नहीं था, "एग्नेस और डी मेलो लिखती हैं।

जांच अधिकारी और अभियोजक ने कहा कि प्रिया झूठी थी।

"बरी होना पहले से ही तय निष्कर्ष था, लेकिन हम प्रिया और उसकी माँ को इसे झेल पाने में मदद करने में कामयाब रहे। अंततः उनकी हिम्मत एक स्थानीय अखबार में छपी एक रिपोर्ट ने तोड़ दी जिसमे उसकी माँ को एक षडयंत्रकारी औरत बताया गया था जिसने एक मलिन बस्ती विकास योजना में अपना नाम शामिल करने के लिए प्रमुख पर दबाव डालने के लिए एक झूठा मामला दायर किया था।

"प्रिया की दुनिया ढह गई और वह आत्महत्या करना चाहती थी। 40 साल से उसी झुग्गी बस्ती में रह रही उसकी माँ, पर भारी कर्ज़ा चढ़ चूका था और उसे वह स्थान छोड़ कर किसी दूसरी जगह जाना। किसी ने भी पूछने की कोशिश नहीं की कि ,कैसे और क्यों एक 14 वर्षीय लड़की गर्भवती हो गई। अदालत के रिकॉर्ड में, यह एक झूठा मामला था। "

छवि आभार: फ़्लिकर/रमेश लालवानी

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