राजस्थान के किसानों ने ऋण कम्पनी पर लगाया धोखाधड़ी का आरोप; रिज़र्व बैंक, पुलिस ने मुँह फेरा

भारतीय रिज़र्व बैंक के नियमों के अनुसार ऋण अनुबंध उस भाषा में होने चाहिए जिसे कर्ज़दार समझता हो परंतु एक निजी कम्पनी ने कम पढ़े-लिखे ग्रामीणों को अंग्रेज़ी में बने दस्तावेज़ दिये जिनमें उसने कथित रूप से ब्याज दर दोगुनी कर दी। अब यह ग्रामीण अपनी गिरवी रखे हुए घर और ज़मीन की ज़ब्ती के भय में जी रहे हैं।

Update: 2022-03-28 14:20 GMT

(बाएं से) रामप्रसाद, रुपेश और ओमप्रकाश अपने गाँव निमोदा हरिजी में। 

कोटा/देहरादून: "इसके अलावा करूँ भी क्या! ज़मीन बेचने के अलावा... अब इससे पूरा नहीं होगा तो मैं आत्महत्या कर के मर जाऊँगा। फिर चुक जाएगा इनका (क़र्ज़)। इसके अलावा कोई ज़रिया नहीं है," राजस्थान के कोटा जिले की दीगोद तहसील-स्थित निमोदा हरिजी गाँव के रहने वाले ओमप्रकाश लोधा कहते हैं।

ओमप्रकाश और निमोदा हरिजी के लगभग एक दर्जन गरीब किसानों और मजदूरों ने 2018 में एक आवासीय ऋण कम्पनी यानी कि हाउसिंग फाइनेंस कम्पनी से 3-8 लाख रुपयों का ऋण लिया था। लेकिन अब गाँववाले कम्पनी पर तय दर से दोगुना ब्याज वसूलने, क़र्ज़ से सम्बंधित कागज़ात और रसीदें न देने, और कमीशन वसूलने के आरोप लगा रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि 2018 में खुश हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (के.एच.एफ.एल.) के कर्मचारियों ने गाँव में एक जनसभा में उन्हें आवासीय ऋण और मॉर्गेज ऋण क्रमशः 9% और 11% ब्याज पर देने की बात कही थी। ऋण के कागज़ अंग्रेज़ी में होने की वजह से ग्रामीण उन्हें पढ़ नहीं पाए और भरोसे में हस्ताक्षर कर दिए। दो साल बाद कोरोना काल में गाँव लौटे एक शिक्षित युवक से हुई एक आकस्मिक बात-चीत में उनमें से कुछ ने अपने ऋण की ऊँची किश्तों की चर्चा की; युवक ने हिसाब लगाया तो पाया कि वे दोगुना ब्याज का भुगतान कर रहे हैं।

के.एच.एफ.एल. एक आवासीय ऋण कम्पनी के तौर पर सरकार के साथ पंजीकृत निजी कम्पनी है और

भारतीय रिज़र्व बैंक (आर.बी.आई.) के नियमों के अनुसार ऋण-सम्बन्धी सभी कागज़ स्थानीय भाषा या ऐसी भाषा में होने चाहिए जिसे ऋण लेने वाला समझता हो। लेकिन के.एच.एफ.एल. के एरिया कलेक्शंस मैनेजर (जयपुर), लोकेश कुमार गौतम, ने इंडियास्पेंड को दो टूक कहा कि "ऐसा कहीं भी नहीं होता है।"

एक फ़ोन कॉल में उन्होंने कहा कि इस बारे में आर.बी.आई. के नियम अवश्य होंगे परंतु वास्तविकता यही है कि सभी ऋण कम्पनियाँ अपने कागज़ अंग्रेज़ी में ही बनाती हैं। उन्होंने यह भी मानने से साफ़ मना कर दिया कि निमोदा के यह ग्रामीण इन अंग्रेज़ी दस्तावेज़ों को पढ़ने-समझने में अक्षम हैं।

"ऐसा कुछ नहीं है, मजदूर वगैरह। सब पढ़े-लिखे हैं और सबको मालूम है। ऐसा कोई भी नहीं हैं," उन्होंने कहा।

ग्रामीणों को जानें

इंडियास्पेंड ने निमोदा के चार कर्ज़दारों से बात की। इनमें से दो हिंदी भी ठीक से नहीं बोल पा रहे थे एवं केवल अपनी स्थानीय बोली, हाड़ोती, में सहज थे। एक कर्ज़दार, रुपेश लोधा, ने बताया कि उन्हें पढ़ना नहीं आता; उन्होंने बस अपना नाम लिखना सीखा है। उनकी पत्नी अंगूठा लगाती हैं। वहीं ओमप्रकाश कहते हैं वह बस पाँचवी कक्षा तक पढ़े हैं। वह एक छोटे किसान हैं और साथ ही एक फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। उनकी पत्नी और बेटा भी मजदूरी करते हैं।

रुपेश और उनकी पत्नी के पास एक अदद फ़ोन भी नहीं है। ओमप्रकाश एक साधारण, बेसिक फ़ोन रखते हैं। जहाँ ओमप्रकाश अपने बच्चों की शादी में दिवालिया होने के कारण 4 लाख रुपये का ऋण लेने को विवश हुए, वहीं रुपेश को अपनी फसल चौपट होने के कारण बच्चे की फीस के लिए 3.5 लाख रुपये का ऋण लेना पड़ा। दोनों ने अपने घर को गिरवी रख कर ऋण लिया है।

निमोदा निवासी धनराज लोधा — जो मुंबई में एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करते हैं एवं जिन्होंने ग्रामीणों को ज्ञात कराया कि वे दोगुना ब्याज दे रहे हैं — ने बताया कि उनके गाँव के जितने भी लोग खुश हाउसिंग के ग्राहक बने हैं, सभी गरीब वर्ग के और कम पढ़े-लिखे हैं।

देशव्यापी समस्या

हाउसिंग फाइनेंस कम्पनियों के ज़्यादा दर पर ब्याज वसूलने और दूसरे तरीकों से ग्राहकों से अतिरिक्त राशि लेने की समस्या देशव्यापी है और इस ही सिलसिले में कर्नाटका, तेलंगाना, तमिल नाडु, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के जनप्रतिनिधियों ने यह मुद्दा लोकसभा और राज्यसभा में कई बार उठाया है। पिछले दो वर्षों में ही सांसदों ने कम से कम सात बार सरकार से पूछा कि वह गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों के द्वारा सामान्य से दोगुना ब्याज वसूले जाने के सम्बन्ध में क्या कर रही है? ऐसे सवाल संसद में 2012 और 2008 से उठाये जा रहे हैं।

झारखण्ड से राज्यसभा सदस्य दीपक प्रकाश ने इंडियास्पेंड को बताया कि यह वास्तव में देशव्यापी समस्या है। उन्होंने कहा ऋण कम्पनियाँ गाँवों में जा कर कम पढ़े-लिखे लोगों को खोजती हैं, उन्हें धोखा देती हैं, नियमों का उल्लंघन करती हैं, और वादा कुछ और करती हैं पर कागज़ों में कुछ और लिखा होता है। प्रकाश यह मुद्दा राज्यसभा में कई बार उठा चुके हैं।

सांसदों के इन प्रश्नों के उत्तर में सरकार कहती है कि वह इन ऋण कंपनियों की ब्याज दरें नियंत्रित नहीं करती पर इनसे अपेक्षा करती है कि ये आर.बी.आई. के नियमों का पालन करें। इनका कितना पालन हो रहा है, वह अलग मामला है।

पिछले साल नवंबर में राज्यसभा में उठाये गए एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने कहा कि आर.बी.आई. ने ऐसी सभी शिकायतों के निस्तारण के लिए एकीकृत लोकपाल योजना 2021 में प्रारम्भ की है।

आर.बी.आई. की एकीकृत लोकपाल योजना के विज्ञापन आये दिन समाचार पत्रों में देखने को मिलते हैं।

हालाँकि, जब धनराज ने निमोदा के ग्रामीणों की तरफ से उनकी शिकायत यहाँ दर्ज करानी चाही, तो वह अस्वीकृत हो गयी। अस्वीकृति पत्र में लिखा है कि आर.बी.आई. खुश हाउसिंग को विनयमित नहीं करता है, अतः यह शिकायत नेशनल हाउसिंग बैंक को भेजी जा रही है। दो महीने उपरांत भी इस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

नेशनल हाउसिंग बैंक ने इंडियास्पेंड के किसी भी ईमेल का उत्तर नहीं दिया। इंडियास्पेंड ने आर.बी.आई. के जयपुर-स्थित क्षेत्रीय कार्यालय को भी कुछ प्रश्न भेजे, लेकिन वह ईमेल बाउंस हो गया।

आर.बी.आई. की मुख्य शाखा को भेजे गए इमेल्स के जवाब में विनियमन विभाग के सहायक महाप्रबंधक पंकज बच्छाव ने आवासीय ऋण कंपनियों पर लागू नियमों का उल्लेख किया। साथ ही, उन्होंने लिखा कि इन कंपनियों को नेशनल हाउसिंग बैंक विनयमित करता है, अतः यह मेल उन्हें प्रेषित किया जा रहा है।

गौरतलब है कि आवासीय ऋण कम्पनियों को विनयमित करने का अधिकार नेशनल हाउसिंग बैंक से आर.बी.आई. को अगस्त 2019 में हस्तांतरित कर दिया गया था।

कितना नुकसान

ग्यारह प्रतिशत ब्याज दर के अनुसार ओमप्रकाश को जहां 2.6 लाख रुपये का ब्याज देना पड़ता, वहीं 22% के हिसाब से वो दोगुने से भी अधिक—5.9 लाख रुपये—ब्याज चुकाने के लिए बाध्य हैं।

धनराज ने बताया कि गाँव के साहूकार बिना कोई संपत्ति गिरवी रखे उच्च ब्याज दरों (18–24%) पर ऋण देते हैं। उन्होंने पूछा कि ग्रामीणों को अगर यह दरें स्वीकार्य होती, तो वो एक कम्पनी के पास अपना घर-ज़मीन गिरवी रखने का अतिरिक्त सरदर्द क्यों उठाते।

"भूखे रह जाओ, बाकी लोन मत लेना इस से। फाइनेंस कम्पनी से लोन मत लेना। मैं यह कहता हूँ सबसे। सबको समझाता हूँ मैं," ओमप्रकाश ने इंडियास्पेंड से कहा।

कम्पनी बनाम ग्रामीण

मात्र खुश हाउसिंग के कर्ज़दार ही नहीं, बल्कि दो तटस्थ चश्मदीद गवाह एवं निमोदा हरिजी के जन प्रतिनिधि भी दावा करते हैं कि कम्पनी ने जनसभा में 22% ब्याज दर की बात कभी नहीं की थी। यह जनसभा तत्कालीन सरपंच, प्रेम बाई बागड़िया, के घर पर हुई थी। ओमप्रकाश बागड़िया, तत्कालीन सरपंच के पति, ने इंडियास्पेंड को फ़ोन पर बताया कि खुश हाउसिंग के कर्मचारियों के अनुरोध पर उन्होंने उक्त सभा आयोजित की थी। उन्होंने कहा उन्हें स्पष्ट रूप से याद है कि कम्पनी के लोगों ने 11% ब्याज दर की बात की थी। वार्ड पंच एवं ग्राम रक्षक पुरषोत्तम सेन भी इस जनसभा में उपस्थित थे और उन्होंने भी इंडियास्पेंड को कहा कि बात 11% की ही हुई थी। यह दोनों इस तथ्य की पुष्टि न्यायालय, पुलिस, प्रशासन आदि के समक्ष करने के लिए तैयार हैं।

दूसरी तरफ के.एच.एफ.एल. के सेल्समेन एवं कलेक्शन एजेंट कँवर पाल कहते हैं कि ऐसा संभव ही नहीं है क्योंकि कम्पनी 11% ब्याज पर ऋण देती ही नहीं है। उस जनसभा में कँवर पाल के अलावा के.एच.एफ.एल. की कोटा शाखा के तत्कालीन मैनेजर भी थे। "अपन ने तो उनको जो चीज़ बताई, उसी पे लोन किये हैं सैंक्शन," कँवर पाल ने कहा।

पर जब इंडियास्पेंड ने इनके सीनियर गौतम से ब्याज दर की बात पूछी तो उन्होंने कहा: "11% फ्लैट हुआ न वो!" उन्होंने भिन्न प्रकार की ब्याज दरों का उल्लेख किया—फ्लैट, वेरिएबल, रिवर्स और वार्षिक—और कहा कि ऋण कम्पनियाँ जो ब्याज बताती हैं, वो फ्लैट (समान दर) होती है; वास्तविक दर जो ऋण पर लागू होती है सामान्यतः इसका दोगुना होती है।

"सभी बैंक जानते हैं। इसमें कोई गणित नहीं है। 9% [ब्याज दर] का मतलब 19% बैठता है," उन्होंने कहा।

कम्पनी बनाम कानून

ग्राहकों को वित्तीय समीकरणों में न उलझना पड़े, इसे सुनिश्चित करने के लिए आर.बी.आई. ने नियम बना रखे हैं। यह नियम कहते हैं कि ग्राहकों को देय ब्याज दर के बारे में पूर्ण स्पष्टता दिया जाना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता पुनीत जैन के अनुसार एक दर बता के दूसरी दर लागू करना धोखाधड़ी है। जैन धनराज के माध्यम से इस मामले में ग्रामीणों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। इन्होंने एक और अनियमितता रेखांकित की। इन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि ब्याज की कुल रकम मूल राशि से ज़्यादा नहीं हो सकती लेकिन खुश हाउसिंग ने जो ऋण दिए हैं, उनमें कुल ब्याज मूल से काफी अधिक है।

जहाँ ओमप्रकाश को 4 लाख रुपये के ऋण के लिए 5.9 लाख रुपये ब्याज चुकाना है, वहीं एक अन्य ग्रामीण, रामप्रसाद लोधा, को 3.7 लाख रुपये के ऋण के लिए 4 लाख रुपये ब्याज देना है। इंडियास्पेंड के पास इन दोनों की किश्त भुगतान योजना की प्रति है।

अन्य आरोप

ओमप्रकाश के ऋण दस्तावेज़ में देय राशि 4 लाख रुपये लिखी हुई है पर वो कहते हैं कि कम्पनी ने उन्हें मात्र 3.64 लाख रुपये का चेक दिया। उनके बैंक के पासबुक की प्रति इसकी पुष्टि करती है।

जब उन्होंने कम्पनी के अधिकारियों से इस बारे में पूछा, तो उन्हें बताया गया की बाकी रकम अन्य खर्चों के लिए काटी गयी है। उन्हें इस किसी भी खर्चे की कोई रसीद नहीं दी गयी है। देय राशि का अर्थ ही होता है वो रकम जो ग्राहक को प्रदान की जाएगी।

साथ ही, उन्होंने कँवर पाल पर उनसे कमीशन के नाम पर 5,000 रुपये ऐंठने का आरोप लगाया। रामप्रसाद ने इंडियास्पेंड को बताया कि के.एच.एफ.एल. के एक मैनेजर ने उनसे अग्रिम किश्त के नाम पर 6,000 रुपये लिए पर रसीद देने से साफ़ मना कर दिया। जब भी रामप्रसाद रसीद माँगते, उन्हें बोला जाता कि धनराशि उनके खाते में जमा हो जाएगी।

इसके अलावा, ओमप्रकाश और धनराज ने बताया कि के.एच.एफ.एल. के कर्मचारियों ने रुपेश को कभी सरे बाज़ार तो कभी उनके कार्यस्थल पर ऋण न चुकाने के कारण अपमानित किया है।

कम्पनी के मैनेजर गौतम इन सभी आरोपों का खंडन करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए कम्पनी ने ग्राहकों को विभिन्न माध्यम जैसे उपभोक्ता सेवा नंबर और मैनेजर के नंबर उपलब्ध करा रखे हैं।

ग्राहक सेवा की गुणवत्ता

रामप्रसाद ने कम्पनी के कोटा ऑफिस को एक पत्र भेज कर अपने 6,000 रुपये की रसीद की माँग की थी, लेकिन न तो उन्हें रसीद मिली और न ही कोई उत्तर।

रामप्रसाद द्वारा रसीद न मिलने के सम्बन्ध में कम्पनी को लिखी गयी चिट्ठी।

निमोदा के एक छोटे सुनार लालचंद सोनी ने इंडियास्पेंड को बताया कि उन्होंने अपने ऋण की ब्याज दर के बारे में कई बार के.एच.एफ.एल. के मैनेजर्स से बात करनी चाही पर वो हमेशा उन्हें टाल देते। इन्होंने अपना घर गिरवी रख कर 8 लाख रुपये का ऋण लिया था। इन्होंने कम ब्याज दर से आकर्षित हो के खुश हाउसिंग को चुना था परंतु इन्हें बाद में पता चला कि कम्पनी इनसे 16% ब्याज वसूल रही है। एक मैनेजर के कम्पनी छोड़ने के बाद यह दर 18% हो गयी। इन सब से त्रस्त हो कर इन्होंने 2020 में कहीं और से ऋण ले कर खुश हाउसिंग को पूरे पैसे लौटा दिए और अपना खाता बंद करा दिया।

ओमप्रकाश ने फरवरी 2021 में कम्पनी के कोटा कार्यालय को पत्र लिख कर अपनी ब्याज दर पर स्पष्टता माँगी और अपने ऋण खाते से सम्बंधित कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ माँगे। उन्हें मात्र अधूरी जानकारी मिली और एक भी दस्तावेज़ प्राप्त नहीं हुआ। उन्होंने अप्रैल में कम्पनी के मुंबई-स्थित मुख्य कार्यालय में पत्र भेज कर सम्पूर्ण जानकारी और दस्तावेज़ माँगे और एक महीने बाद पुनः एक पत्र भेजा। उन्होंने लिखा कि उन्होंने फरवरी तक की सभी किश्तें चुकाई हैं लेकिन वो आगे का भुगतान तभी करेंगे जब कम्पनी उन्हें उनकी ब्याज दर के बारे में स्पष्टता देगी।

उनके पत्रों का कोई उत्तर नहीं आया और उन्होंने कथनानुसार किश्तों का भुगतान रोक दिया। परिणामस्वरूप, कम्पनी ने उन्हें चेताना शुरू कर दिया है कि वह उनका घर ज़ब्त कर सकती है।

ओमप्रकाश ने इंडियास्पेंड को बताया कि वह अपने ऋण की सम्पूर्ण राशि एक ही बार में चुकाकर इस झंझट से मुक्त होना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने मजबूरी में अपनी 2 बीघा पुश्तैनी ज़मीन बेच कर 4 लाख रुपये जोड़े हैं, मगर वह उसी ब्याज दर के हिसाब से भुगतान करेंगे जो उन्हें बताई गयी थी।

कम्पनी की सफाई

खुश हाउसिंग के मैनेजर गौतम के अनुसार निमोदा के ग्रामीण पैसे नहीं लौटाना चाहते, इसलिए यह आरोप लगा रहे हैं। "जब सामने वाले की नीयत खराब होती है ना, पैसा देना नहीं होता है, तब जाके यह सारी चीज़ें होती हैं," उन्होंने कहा।

कम्पनी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और शिकायत अधिकारी नरेश कुमार दोशी ने भी यही तर्क दिया। इंडियास्पेंड के ईमेल के जवाब में उन्होंने लिखा कि निमोदा गाँव के दनकर्ता बेबुनियाद इलज़ाम लगा रहे हैं क्योँकि कम्पनी ने उन्हें दिए पैसे वसूलने के लिए वैधानिक कार्यवाही शुरू कर दी है।

इंडियास्पेंड ने दोशी को 6 बिंदुवार प्रश्न भेज कर आर.बी.आई. के नियमों के उल्लंघन और अन्य कथित अनियमितताओं के बारे में पूछा। उन्होंने 5 प्रश्न पूर्णतयाः नज़रअंदाज़ कर दिये। ओमप्रकाश को 3 बार पत्र लिखने के बावजूद दस्तावेज़ न देने के सम्बन्ध में उनहोंने मात्र इतना कहा कि कम्पनी उचित आवेदन मिलने पर ग्राहकों को सब जानकारी उपलब्ध कराती है।

धनराज ने ग्रामीणों की तरफ से दोशी को एक ईमेल भेज कर ब्याज दर वाली समस्या से उन्हें अवगत कराया तो दोशी का जवाब आया: "हम बिलकुल नहीं मानते की हमारी कम्पनी या उसके कर्मचारियों ने उच्च ब्याज दर के सम्बन्ध में कोई भी धोखा किया है।"

दोशी ने ईमेल में आगे लिखा कि ब्याज दर और ऋण की अन्य शर्तें ग्राहकों को मौखिक और लिखित रूप में साफ़-साफ़ बताई जाती हैं। पर धनराज ने इंडियास्पेंड को बताया कि दोशी जिन दस्तावेज़ों की बात कर रहे हैं, वो ग्रामीणों को दिए ही नहीं गए हैं। यह वही दस्तावेज़ हैं जिन्हें पाने के लिए ओमप्रकाश ने पिछले वर्ष कम्पनी को 3 बार पत्र भेजा था।

दोशी ने धनराज को भेजे ईमेल में लिखा कि कम्पनी उनके अन्य आरोपों—जैसे कि कर्मचारियों के द्वारा कमीशन ऐंठना—की जाँच करेगी अगर वह कोई पुख्ता सबूत दे पाएँ।

पुलिस का रवैया

धनराज पूछते हैं कि कम पढ़े-लिखे ग्रामीणों से आर.बी.आई., नेशनल हाउसिंग बैंक, लोकपाल इत्यादि के बारे में जानने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? उन्होंने कहा अगर इनकी ऋण कम्पनी इनको अनसुना कर रही है, तो उसके बाद इनके पास जाने के लिए कहीं नहीं है।

आर.बी.आई. के लोकपाल और खुश हाउसिंग के शिकायत अधिकारी से निराशा हाथ लगने के बाद जनवरी 2022 में ओमप्रकाश, रुपेश और रामप्रसाद अपने स्थानीय पुलिस थाने गए। पुलिस ने इनकी शिकायत लिखने से मना कर दिया और उन्हें कहा कि चूँकि कंपनी का कार्यालय कोटा शहर में है, उनकी शिकायत भी वहीं दर्ज होगी। ग्रामीणों की दलील है कि जब कंपनी की जनसभा और ऋण-सम्बन्धी समस्त चर्चा इसी गाँव में हुई, तो यह मामला शहर के क्षेत्राधिकार में कैसे आ सकता है। फिर इन तीनों ने अपनी शिकायत इसी पुलिस थाने को डाक से भेजी और उसकी प्रतियां पुलिस और जिला प्रशासन के उच्च अधिकारियों को भी प्रेषित की। इस बात को दो महीने से अधिक हो गए हैं लेकिन अभी तक इनका केस दर्ज नहीं हुआ है।

इस रिपोर्टर के साथ अपनी पहली बात-चीत के अंत में ओमप्रकाश ने बताया था कि वो और रुपेश अब आत्महत्या के बारे में सोचने लगे हैं। "प्रताड़ित करेगा, मकान से निकालेगा, और क्या चारा है," ओमप्रकाश ने मायूसी से कहा।

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