राजस्थानः कोरोनाकाल में दिव्यांगों के अधिकारों को क्यों भूली सरकार?

दिव्यांगों के कोरोना इलाज, टेस्टिंग और वैक्सीनेशन में प्राथमिकता देने की राजस्थान सरकार द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की गयी है

Update: 2021-05-19 09:21 GMT

 जयपुर के सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज में वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन करवाते लोग। फोटो: माधव शर्मा

जयपुर: "मुझे भी कोरोना की वैक्सीन लगवानी है, लेकिन अकेला नहीं जा सकता। वैक्सीनेशन सेंटर पर भी दिव्यांगों के लिए अलग से कोई लाइन या प्राथमिकता नहीं है। दिव्यांग कोविड की मार के साथ-साथ बेरोजगारी की मार भी झेल रहे हैं। केन्द्र या राज्य सरकार ने लाखों-करोड़ों दिव्यांगों को राहत देने के लिए कोई काम नहीं किया है," राजस्थान में पाली जिले के सुमेरपुर के रहने वाले जेठाराम कुमावत उन्हें वैक्सीन ना लगने के सवाल के जवाब में कहते हैं।

कुमावत (33) मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी नामक बीमारी से पीड़ित हैं जिसके लक्षण 12 साल की उम्र से दिखाई देने लगे थे और बीते 8 साल वह व्हीलचेयर पर हैं। इस वजह से उन्हें कहीं भी आने जाने के लिए कम से कम 4 लोगों की जरूरत होती है। ऐसे में उनके लिए वैक्सीन लगवाने या कोविड की जांच करवाने जाना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है।

कुमावत की ही तरह राजस्थान में करीब 15 लाख (2011 की जनगणना के अनुसार) से ज़्यादा दिव्यांग हैं जिन्हे कोविड19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान कई परेशानियों का सामना करना पड रहा है और इसके साथ ही सरकार के द्वारा इनके हितों की सुरक्षा और सुविधाओं के लिए जारी किये गए दिशा निर्देशों का पालन भी नहीं किया जा रहा है।

सत्येन्द्र सिंह राठौड़ राजस्थान की राजधानी जयपुर में बीते 5 साल से रह रहे हैं। पैरों से 80% विकलांग सत्येन्द्र कोरोनाकाल में सरकार के विकलांगों के प्रति उदासीन रवैये से काफी नाराज़ हैं। 'विकलांग जन क्रांति सेना' नामक संगठन के राज्य प्रमुख राठौड़ का कहना है कि राज्य सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के नियमों का कोरोना काल में बिल्कुल पालन नहीं किया है।

सत्येन्द्र सिंह राठौड़।फोटो: माधव शर्मा

कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच जब प्रदेश और देश के विभिन्न क्षेत्रों में लॉकडाउन लगाए जा रहे हैं इस स्थिति में राजस्थान के दिव्यांगों के लिए समस्या और कठिनाई का स्तर काफी बढ़ जाता है।

राजस्थान में 18 मई को 8398 नए मामले रिपोर्ट किये गए थे वहीं 159455 सक्रीय मामले रिपोर्ट किये गए थे। इस दिन प्रदेश में रिपोर्ट की गयी कोविड19 मौतों की संख्या 146 थी।


केंद्र के दिशा निर्देश किये दरकिनार

हालांकि केंद्र सरकार समय-समय पर इस संबंध में राज्यों को निर्देश जारी करता रहा है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने पिछले साल 24 मार्च को एक नोटिफिकेशन जारी किया था। इसके अनुसार कोविड-19 से संबंधित सभी जानकारी दिव्यांगजनों को सुलभ प्रारूप में उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिससे वे दूसरों के समान ही स्थिति से निपटने में सक्षम हो सकें।

इस नोटिफिकेशन के अनुसार राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों को अपने स्वास्थ्य और प्रचार विभागों को आवश्यक निर्देश जारी करने को कहा गया ताकि कोविड-19 से संबंधित सभी प्रचार सामग्री को सुलभ बनाने के लिए तत्काल उपाय किए जा सकें। इसमें दृष्टिहीन लोगों के लिए ब्रेल और ऑडियो टेप में कोरोना से संबंधित सभी जानकारी प्रिंट रूप में दी जानी थी। सुन नहीं सकने वाले दिव्यांगों के लिए सांकेतिक भाषा की व्याख्या के साथ वीडियो सामग्री के साथ-साथ सभी वेबसाइटों और सोशल मीडिया में ओसीआर/ई-पब्लिकेशन प्रारूप में सभी दस्तावेजों के साथ जानकारी देने के निर्देश दिए गए थे।

इसके अलावा नोटिफिकेशन में यह भी कहा गया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के सेक्शन 25 के तहत सभी राज्यों के स्वास्थ्य विभाग को दिव्यांगों के इलाज को प्राथमिकता देने के लिए निर्देश जारी करने चाहिए।

केन्द्र के बीते साल दिए निर्देश के पालन की हकीकत जानने के लिए इंडियास्पेंड ने राजस्थान सरकार की तमाम वेबसाइट्स (राज्य के स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट, कोविड के लिए खास शुरू की गयी वेबसाइट) को खंगाला, लेकिन हमें विकलांगों की सहूलियत के लिए कोरोना से संबंधित कोई भी सामग्री नहीं मिल सकी।

सिर्फ वेबसाइट ही नहीं कोविड के लिहाज से जन जागरूकता में लगे राजस्थान सरकार के ट्विटर हैंडल (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, राजस्थान, पत्र सूचना कार्यालय, राजस्थान, राजस्थान संपर्क) पर भी ऐसी कोई जानकारी नहीं दिखाई देती है।

राजस्थान के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव समित शर्मा से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "इस बारे में हमने स्वास्थ्य सहित दिव्यांगों के संबंधित विभागों को पत्र लिखा है।" विशेष योग्यजन निदेशालय के आयुक्त गजानंद शर्मा ने भी यही पत्र लिखने की ही बात दोहराई । इंडियास्पेंड ने जब ऑर्डर की कॉपी की मांग तो शर्मा ने कार्यालय बंद होने की बात कही।


वैक्सीनेशन, कोविड जांच में प्राथमिकता नहीं, सरकारी कर्मियों को नहीं दिया वर्क फ्रॉम होम

राजस्थान सहित पूरे देश में 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को कोरोना की वैक्सीन लगाई जा रही है। लेकिन इस टीकाकरण कार्यक्रम में दिव्यांगों के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं की है। जबकि 7 मई को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक पत्र जारी कर दिव्यांगों के कोरोना इलाज, टेस्टिंग और वैक्सीनेशन में प्राथमिकता देने के लिए उचित कदम उठाने की बात कही थी।

 पाली जिले के जेठाराम कुमावत अभी तक कोविड19 वैक्सीन इसलिए लगवा पाए हैं क्योंकि वो इसके लिए अकेले नहीं जा सकते और टीकाकरण केंद्रों पर भीड़ में व्हीलचेयर के साथ क़तार में लगना उनके लिए मुमकिन नहीं है। फोटो: माधव शर्मा

इंडियास्पेंड की पड़ताल में सामने आया कि राजस्थान सरकार ने केंद्रीय मंत्रालय के इस निर्देश का भी पालन नहीं किया। प्रदेश में किसी भी वैक्सीनेशन सेंटर पर विकलांगों को वैक्सीन के लिए अलग से कोई इंतजाम नहीं हैं। ना ही इन्हें कोविड जांच में कोई सहूलियत दी गई है। आम नागरिकों की तरह दिव्यांगों को भी घंटों लाइन में लगकर कोरोना की जांच करानी पड़ रही है।

स्वावलंबन फाउंडेशन के अध्यक्ष वैभव भंडारी ने इस संबंध में केंद्र सहित राज्य के तमाम अधिकारियों -- मुख्य आयुक्त; न्यायालय दिव्यांगजन, नई दिल्ली; मुख्यमंत्री अशोक गहलोत; विशेष योग्यजन आयोग, राजस्थान -- को 4 मई को एक पत्र लिखा। इससे पहले भी वे कई पत्र जिम्मेदार अधिकारियों और सरकार के मंत्रियों के लिख चुके हैं। पाली में रहने वाले भंडारी ने इंडियास्पेंड को बताया, "प्रदेश के 15 लाख से ज्यादा दिव्यांगजन सरकार की लापरवाही का शिकार हो रहे हैं। हमारी संस्था की ओर से विकलांगों की जांच, इलाज और वैक्सीनेशन में प्राथमिकता की मांग के संदर्भ में केंद्र मंत्रालय ने राज्यों को पत्र लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली और राज्यों ने अब तक इस पर कोई एक्शन नहीं लिया है।"

इस बारे में इंडियास्पेंड ने सभी जिम्मेदारों अधिकारियों से बात की। राजस्थान के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव सिद्धार्थ महाजन ने कहा, "विभाग ने जिला स्तर पर सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमएचओ) को दिव्यांगों के लिए अलग से वैक्सीनेशन, जांच के लिए बोला हुआ है। हालांकि जमीनी हकीकत बताती है कि इन निर्देशों का कोई पालन नहीं हो रहा है। जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर वैक्सीन लगवाने के लिए दिव्यांग अपने ही संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।"

भंडारी का कहना है कि हजारों दिव्यांग ऐसे हैं जो विकलांगता के चलते घरों से बाहर भी नहीं जा सकते। या अन्य कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हैं, लेकिन कोरोना जैसी विभीषिका में भी उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। उनका आरोप है कि राज्य सरकार ने लॉकडाउन के दौरान वैक्सीनेशन के लिए जिन समूहों को प्राथमिकता दी है, उनमें भी दिव्यांगों का नाम नहीं है।

जबकि महाजन का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान प्राथमिकता के साथ वैक्सीनेशन उन्हीं समूहों को लगाई जा रही है जो फील्ड पर काम कर रहे हैं। ताकि संक्रमण की स्थिति में वे स्प्रेडर ना बनें। इनमें कोविड प्रबंधन में शामिल विभागों के अधिकारी, कर्मी, मीडियाकर्मी, वन विभाग, बैंक, रेलवे, पशुपालन विभाग के कर्मचारी और ऑक्सीजन सप्लायर जैसे समूह हैं।

इसके अलावा भारत सरकार ने 19 अप्रैल 2021 को एक आदेश जारी किया था जिसमें दिव्यांग और गर्भवती कर्मचारियों को घर से काम करने के निर्देश संबंधित विभागों को दिए गए थे, लेकिन राजस्थान सरकार के कई विभाग दिव्यांगों को अभी भी कार्यालय बुला रहे हैं।

जालौर जिले में पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग में बतौर क्लर्क काम कर रहे महेश कुमार (बदला हुआ नाम) 40% विकलांग हैं। इंडियास्पेंड से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे कोरोना संक्रमण में कई खतरों के बीच रोजाना करीब 40 किलोमीटर दूर अपने गांव से ऑफिस जा रहे हैं। जबकि दिव्यांगों को इससे छूट होनी चाहिए।

जोधपुर की जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में प्रोफेसर अरविंद जोशी दोनों आंखों से देख नहीं सकते, लेकिन दिव्यांगों की अनदेखी को महसूस जरूर कर रहे हैं। वे कहते है, "विकलांगों के लिए मतदान के वक्त घर पर वोट देने की व्यवस्था हो सकती है। वहीं, कई बार उन्हें निजी वाहनों से मतदान केन्द्र पर लेकर जाया जाता है। लेकिन कोरोना की वैक्सीन के लिए यह व्यवस्था क्यों नहीं है? इसी तरह कोरोना जांच के लिए भी दिव्यांगों के लिए कोई अलग से व्यवस्था सरकार ने नहीं की है। दूसरा, केंद्र सरकार ने समय-समय पर दिव्यांगों के लिए गाइडलाइन जारी की हैं, लेकिन राज्य सरकार की ओर से ना उनका पालन हुआ और ना ही अपनी तरफ से कोई गाइडलाइन निकाली गईं। तीसरी समस्या यह है कि कोरोना की पहली लहर में सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने आर्थिक और सामाजिक रूप से दिव्यांगों की मदद की। इस बार तो मदद के लिए आया ही नहीं है। सरकार ने भी कोई अलग से इंतजाम नहीं किए हैं।"


कर्नाटक उच्च न्यायालय में दिव्यांगों को वैक्सीनेशन में प्राथमिकता के लिए याचिका

दिव्यांगों को वैक्सीनेशन कार्यक्रम में प्राथमिकता देने के लिए कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक रिट पिटीशन लगाई गई है। इसमें कहा गया है कि संविधान के आर्टिकल 47, दिव्यांगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के आर्टिकल 11 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के सेक्शन 8 और 25 के अनुसार दिव्यांगों को वरीयता देकर वैक्सीनेट किया जाना चाहिए। याचिका में मांग की गई कि जो दिव्यांग घरों से बाहर नहीं निकल सकते उन्हें उनके घर तक इलाज और वैक्सीन दी जाए।

इस संबंध में हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को कई निर्देश जारी किए हैं। अगली सुनवाई 12 मई को रखी गई है।

राजस्थान में सपोर्ट फाउंडेशन फॉर ऑटिज्म एंड डेवलपमेंटल डिसेबिलिटीज संस्था की अध्यक्ष प्रतिभा भटनागर ने इंडियास्पेंड से दिव्यांगों की समस्याओं पर विस्तार से बात की।

वे कहती हैं, "कोरोना काल में जितनी खराब हालत दिव्यांगों की ही वैसी किसी की नहीं है। ऊपर से सरकार की इस समूह के प्रति उदासीनता ने इनके दुखों को और गहरा किया हुआ है। मैंने जागरूकता, वैक्सीनेशन, इलाज, घर से काम करने की छूट देने के लिए सरकार के हर एक संबंधित विभाग में पत्र लिखे हैं, लेकिन किसी भी पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यह बेहद दुखद है। अधिकारी सिर्फ टालमटोली और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का खेल खेलते रहते हैं। जबकि बीते एक साल से प्रदेश के लाखों दिव्यांग भयानक तकलीफ में हैं।"

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