ग्रामीणों ने कैसे बचाया उत्तराखंड के बंद होते इस सरकारी विद्यालय को

जोशीमठ ब्लॉक के पैनी गांव का स्कूल एक समय विद्यार्थियों की कम संख्या की वजह से बंद होने की कगार पर था।

Update: 2022-07-30 14:35 GMT

पैनी गांव का राजकीय प्राथमिक विद्यालय। फोटो: सत्यम कुमार

चमोली/देहरादून: साल 2019 में उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ ब्लॉक के पैनी गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक मथुरा लाल सेमराग एक अजीब परेशानी से गुजर रहे थे। उनके विद्यालय, जो कि कक्षा एक से पांच तक है, में इस साल सिर्फ 10 विद्यार्थी बचे थे जिसमें से तीन बच्चे पांचवी कक्षा में थे जो कि अगले साल दूसरे विद्यालय में चले जाते और उनके विद्यालय में सिर्फ सात बच्चे ही बच जाते।

नियमों के अनुसार, राज्य के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम 10 बच्चों का नामांकन अनिवार्य है। ऐसा नहीं होने पर ऐसे विद्यालयों को या तो बंद कर दिया जाता है या उनका विलय पास ही के किसी विद्यालय में कर दिया जाता है।

विद्यालय के भविष्य पर छाई इस अनिश्चितता ने मथुरा लाल को परेशान कर रखा था लेकिन वो इस बारे में कुछ किये बिना नहीं रहना चाहते थे।

"साल 2013 में जब मेरी नियुक्ति यहां हुई तब इस स्कूल में 17 बच्चे थे लेकिन समस्या ये थी कि इस स्कूल में पहली कक्षा के लिए ऐडमिशन नहीं आ रहे थे और कक्षा पांच पास करने के बाद छात्र इस स्कूल से लगातार कम हो रहे थे। इसे देखकर ऐसा लगता था कि जल्द ही स्कूल में छात्रों की संख्या 10 से कम रह जायेगी और शायद स्कूल बंद या विलय हो जायेगा," मथुरा लाल बताते हैं।

"साल 2019 स्कूल में मात्र सात छात्र ही शेष बचे थे, मैंने यह बात गांव के लोगों को बताई और साथ ही उनको बताया कि यदि स्कूल में छात्रो की संख्या नहीं बढ़ी तो स्कूल बंद हो जायेगा। यह जानकर गांव के कुछ लोगों ने अपने बच्चों का एडमिशन स्कूल में कराने के लिए हामी भर दी। पहले तो मैं अकेले ही गांव के लोगो को अपने बच्चों का ऐडमिशन सरकारी स्कूल में करने के लिए मनाता था लेकिन अब गांव के कुछ और लोग भी साथ में आने लगे, जिसका नतीजा यह हुआ कि आज हमारे स्कूल में 18 बच्चे हैं," वह आगे बताते हैं।

एक दशक में 846 सरकारी स्कूलों पर लगा ताला

निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के मुताबिक, प्रत्येक राजकीय प्राथमिक विद्यालय के लिए सरकार ने कुछ मानक निर्धारित किये हैं। इन मानकों के अनुसार, एक स्कूल में कम से कम 10 बच्चों का नामांकन और दो शिक्षकों की नियुक्ति अनिवार्य है। इसके अलावा प्रत्येक विद्यालय के भवन में शिक्षकों के लिए एक कक्ष, बाधा मुक्त पहुंच, लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय, पर्याप्त और स्वच्छ पेयजल व्यवस्था, जिन विद्यालयों में मिड-डे मील पकाया जाता है वहां रसोई की व्यवस्था और एक खेल का मैदान होना भी अनिवार्य है।

उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय जिलों में छात्रों की संख्या कम होने से साल 2012-13 से लेकर साल 2019-20 तक सरकार 846 राजकीय प्राथमिक विद्यालयों पर ताला लगा चुकी है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, साल 2012-13 में उत्तराखंड में कुल 12,499 राजकीय प्राथमिक विद्यालय थे जो घटकर अब 11,653 रह गए हैं।

जिलेवार इनकी संख्या देखें तो अल्मोड़ा में 130, बागेश्वर में 39, चमोली में 49, चम्पावत में 28, देहरादून में 57, हरिद्वार में 10, नैनीताल में 17, पिथौरागढ़ में 130, रूद्रप्रयाग में 41 और टिहरी गढ़वाल में 180 सरकारी प्राथमिक विद्यालय पिछले एक दशक में बंद हो चुके हैं।

अकेले का काम नहीं

इस विद्यालय को बंद होने की कगार से एक ऐसी स्थिति में, जहां गाँव वालों का एक सरकारी स्कूल पर निजी विद्यालयों से ज़्यादा विश्वास हो, लाना मथुरा लाल के लिए आसान नहीं था। उन्होने इसमें शिक्षा से जुड़े अन्य कर्मचारियों की भी मदद ली जिनमे गाँव की आंगनबाड़ी कार्यकत्री सरिता देवी भी शामिल थीं।

"हमारा आंगनबाड़ी केंद्र विद्यालय के पास है। जब मथुरा लाल जी ने बताया कि स्कूल में छात्र संख्या 10 से कम हो चुकि है तब हमको लगा यदि स्कूल बंद हुआ तो गांव को इसका काफी नुकसान होगा," सरिता देवी बताती हैं।

सरिता देवी बताती हैं कि पहले उन्होंने उन लोगों से बात की जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे लेकिन उन्हें सरकारी स्कूल पर कम भरोसा होने के कारण "आप ही अपने बच्चों को दाल भात खाने के लिए भेजिए" जैसे जवाब मिले।

एक समय इस विद्यालय में सिर्फ सात विद्यार्थी ही बचे थे। फोटो: सत्यम कुमार

"इस समय हमें लगा कि पहले हमें अपने बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूल में कराना होगा तभी हम दूसरे लोगों को समझा पाएंगे। फिर हमने ऐसा ही किया और हम लोग काफी सफल भी हुए। अब मेरा बेटा इसी विद्यालय में पढता और मैं उसकी पढ़ाई को लेकर बहुत संतुष्ट हूँ, बल्कि मेरा तो यह मानना है कि गांव में सरकारी स्कूल ही सफल होते हैं," सरिता देवी आगे बताती हैं।

पैनी गांव के मनमोहन सिंह ने अपनी पढाई इस ही स्कूल से की है। इंडियास्पेंड से बातचीत में मनमोहन कहते हैं, ''हमारे गांव का राजकीय प्राथमिक विद्यालय साल 1977-78 में बना था। गांव में रहने वाले सभी परिवारों के बच्चों ने अपनी कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई यहीं से की है। जब हमने स्कूल के बंद होने की खबर सुनी तो ऐसा लगा जैसे कोई हमसे हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा छीन रहा हो। मेरी और मेरे बचपन के साथियों की बहुत सारी स्मृतियां इस स्कूल से जुड़ी हैं। लिहाजा हमने गांव के लोगों से बात की और फैसला किया कि हमें अपने गांव के स्कूल को बचाना है।"

अपने इस प्रयास में मनमोहन ने सबसे पहले अपनी बेटी मानवी का नामांकन इस स्कूल में कराया फिर दुसरो से भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का अनुरोध किया। मनमोहन बताते हैं कि शुरुआत में कम बच्चों दाखिला हो पाया लेकिन बच्चों की पढ़ाई का स्तर देखकर धीरे-धीरे और लोगों ने भी अपने बच्चों का दाखिला इस सरकारी स्कूल में कराना शुरू कर दिया।

बच्चों के विकास पर जोर

पैनी गाँव ऋषिकेश-बद्रीनाथ राजमार्ग पर जोशीमठ से करीब सात किमी दूर बसा है। गांव के पोस्ट ऑफिस के बगल से एक छोटी सी पगडण्डी पर लगभग 50 मीटर पैदल चलने पर हम राजकीय प्राथमिक विद्यालय पहुंचे। मध्यान्तर का वक्त था तो स्कूल के खेल के मैदान में कुछ बच्चे बैडमिंटन खेल रहे थे, कुछ क्रिकेट और कुछ बच्चे अपनी अन्य गतिविधियों में मगन थे। खेलते बच्चों के शोरगुल से कोई भी दूर से ही अंदाज़ा लगा सकता था कि कहीं पास में ही स्कूल है।

स्कूल के मैदान में बैडमिंटन खेलते बच्चे। फोटो: सत्यम कुमार 

सुबोध सिंह चौहान जिनकी बेटी अंशिका इस स्कूल में पांचवी कक्षा में पढ़ती है बताते हैं, "आज वह रोज़ शाम को खेलने के लिए स्कूल के मैदान में जाती है। जब वह प्राइवेट स्कूल में पढ़ती थी तब स्कूल से घर के लिए इतना कार्य मिलता था कि वह खेल भी नहीं पाती थी। मेरी बेटी इसके बाद नवोदय स्कूल में पढ़ना चाहती है, जिसकी तैयारी लिए स्कूल के अध्यापक भी उसकी मदद करते हैं।"

सुबोध यह भी कहते हैं कि वह अपने 8 साल के बेटे अंश का दाखिला भी इस स्कूल में अगले साल करवाने के बारे में सोच रहे हैं। अंश अभी प्राइवेट स्कूल में पढता है।

प्रधानाध्यापक मथुरा लाल स्कूल की पढाई अन्य गतिविधियों के बारे में बताते हैं, "अब तो सरकारी स्कूलों में भी शिक्षण कार्य को आसान और मजेदार बनाने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। बच्चों का मन पढ़ाई में कैसे लगे इसके लिए नित नए-नए तरीके भी सरकारी स्कूलों में इस्तेमाल किये जा रहे हैं और समय-समय पर शिक्षकों को इसकी ट्रेनिंग भी दी जाती है। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए खेलकूद बहुत जरूरी है. इसके लिए हमारे स्कूल में खेल के उपकरण भी हैं जिससे बच्चे मध्यावकाश में खेलते हैं।"

मनमोहन सिंह कहते हैं कि एक तरफ जहां प्राइवेट स्कूलों की फीस बहुत मंहगी हो गई है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में कक्षा आठ तक मुफ़्त शिक्षा दी जाती है जहां अमीर और गरीब दोनों तरह के छात्र एक साथ पढ़ सकते हैं। दूसरा प्राइवेट स्कूलों की किताबें भी बहुत मंहगी होती हैं वही सरकारी स्कूलों में किताबें मुफ़्त में मिलती हैं और सबसे बड़ी बात यह कि सरकारी स्कूलों में जो शिक्षक नियुक्त किये जाते हैं वह राज्य स्तर की चयन परीक्षा उत्तीर्ण करके आते हैं। इस दृष्टिकोण से सोचें तो आज प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों को बेहतर विकल्प के तौर पर बढ़ाया जाना चाहिए।

''एक अच्छे शैक्षिक वातावरण के लिए शिक्षक, अभिभावक और छात्र तीनों का ही जागरूक होना बहुत जरूरी है क्योंकि छात्र स्कूल में चार से पांच घंटे ही तो बिताता है। बाकी के समय तो वह अपने घरवालों के साथ रहता है। इसलिए घर में पढ़ाई का माहौल बनाना बहुत आवश्यक है। निश्चित रूप से पैनी गांव के लोगों ने अपनी जिम्मेदारी को समझा है," मथुरा लाल कहते हैं।

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