भगियाओं की नई पीढ़ी ने अपने पेशे से मुंह मोड़ा , कच्छ में विलुप्त हो रहा मवेशियों के इलाज का पारंपरिक ज्ञान

कच्छ के ‘भागिया’ समुदाय मवेशियों की देखभाल, उनके इलाज और स्थानीय पौधों की प्रजातियों के पारंपरिक ज्ञान का अपार खजाना सहेजे हुए हैं। लेकिन यह ज्ञान हर अगली पीढ़ी के साथ कम होता चला जा रहा है।

Update: 2023-09-22 01:30 GMT

भगिया भीम खान (बाईं तरफ) और जरार मुत्तवा (दाईं तरफ) बन्नी, कच्छ में अपने गांव में खड़े हैं। भगिया पारंपरिक तौर पर मवेशियों का इलाज करने वाला समुदाय हैं। इस समुदाय को स्थानीय पौधों और जड़ी-बूटियों की गहरी समझ है, जिसका इस्तेमाल वो बन्नी भैंस के इलाज में करते हैं। ये लोग पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक ज्ञान का अपार खजाना सहेजे हुए हैं।

भुज, गुजरात: कई साल पहले, जब कच्छ सूखे से जूझ रहा था, तो एशिया के सबसे बड़े खुले घास के मैदान बन्नी में सलीम मामा के गांव के लोगों ने और बेहतर जगह की तलाश में पलायन करना शुरू कर दिया। लेकिन सलीम मामा इनमें शामिल नहीं थे। उन्होंने गांव छोड़ने से इंकार कर दिया। सलीम ‘भगिया’ यानी वह एक ऐसे स्थानीय विशेषज्ञ थे, जिनसे बड़े पैमाने पर देहाती समुदाय अपने जानवरों को होने वाली बीमारियों या मौसम के बारे में सलाह मांगा करते थे। उन्होंने कहा, उनकी भैंस अभी परेशानी में नहीं नजर आ रही है और यह इशारा है कि चीजें जल्द ही बदल जाएंगी। उनके कहने के मुताबिक, उसके एक सप्ताह बाद बारिश हुई। घास के मैदान फिर से हरे-भरे हो गए। वहां के लोग और जानवर एक बार फिर से गांव लौट आए।

बन्नी गांव के लोगों के पास भगियाओं की ऐसी कई कहानियां हैं, जो या तो उनके सामने घटी हैं या फिर जिसके बारे में उन्होंने परिवार के बड़े सदस्यों से सुना है। मालधारी यानी पशुपालक समीर मोहम्मद ने कहा, “अगर हमारे जानवर बीमार पड़ जाते हैं, तो हम भगियों को बुलाते हैं। हमेशा से ऐसा ही होता आया है।” समीर के पास 10 भैंसें हैं। उन्होंने आगे बताया, “जानवरों और पौधों के बारे में भगिया को काफी ज्यादा जानकारी है। वह जानते हैं कि कौन सा पौधा किस बीमारी को ठीक करने में मदद कर सकता है। पिछले कुछ सालों में हमने पशु चिकित्सक से भी परामर्श लेना शुरू कर दिया है। लेकिन कई मामलों में भगिया हमारी काफी मदद कर देते हैं। मसलन, भैंस की जटिल डिलीवरी को ही ले लें। ये ऐसा समय होता है, जब पशु चिकित्सक भी अकसर हार मान लेते हैं।”

लेकिन फिलहाल ये पारंपरिक ज्ञान या कहें कि स्वदेशी तकनीकी ज्ञान (आईटीके) का खजाना लगातार कम होता जा रहा है। सलीम मामा का ही मामला ले लें। उन्हें स्थानीय पौधों और जानवरों के बारे में जो भी जानकारी थी, उन्हें वह अपने पिता, और उन्हें उनके पिता यानी सलीम के दादा से मिली थी। पीढियों से ऐसा ही चलता आ रहा था। लेकिन वह अब जिंदा नहीं हैं और उनका सारा पुश्तैनी पारंपरिक ज्ञान उनके साथ ही चला गया। यह कहीं किताबों में दर्ज नहीं है, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आने वाला मौखिक इतिहास है।

पारंपरिक ज्ञान के पीछे का विज्ञान

भगियाओं के इस ज्ञान को सहेज कर रखने के लिए कुछ ही प्रयास किए गए हैं। इनमें से एक प्रयास ‘सहजीवन’ नामक एक गैर सरकारी संस्था ने भी किया है। यह संस्था इस क्षेत्र में काफी समय से काम कर रही है। 2011 में प्रकाशित इसकी एक रिपोर्ट के मुताबिक, बन्नी में भगिये मवेशियों के इलाज के लिए पौधों और जड़ी-बूटियों की 35 स्वदेशी प्रजातियों का इस्तेमाल करते है। इन पारंपरिक चिकित्सकों द्वारा मवेशियों की 39 बीमारियों के लिए 337 तरह के उपचार किए जाते हैं। रिपोर्ट में 'पशु चिकित्सा विज्ञान द्वारा सत्यापन' पर एक अलग कॉलम में बताया गया है कि किस पौधे का इस्तेमाल किस बीमारी के लिए किया जाता है।

मसलन, देशी बावल (बबूल निलोटिका) के पेड़ की लकड़ी को उबालकर अगर मवेशी के प्रभावित हिस्से पर मला जाए तो उनका गठिया रोग ठीक हो जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पशु चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इस पौधे में सूजन-रोधी गुण होते हैं। इसी तरह से, एक स्थानीय झाड़ी ‘केराड’ (कप्पारिस डिकिडुआ) की छाल को पीसकर प्रभावित हिस्से पर लगाने से कीड़ों से होने वाले घाव का इलाज किया जा सकता है। पशु चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक केराड में कसैले गुण होते हैं।

खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने इरिट्रिया में खानाबदोश चरवाहों की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली पर एक अध्ययन किया था। उन्होंने अपने अध्ययन में कहा कि पारंपरिक ज्ञान को 'पुराने जमाने का' या ' आज के परिवेश के हिसाब से सही नहीं' यह सोचना या कहना एक गलती है। अध्ययन में आगे कहा गया, “ऐसा ज्ञान स्थानीय स्तर पर विकसित होता है ताकि इसे विशेष रूप से स्थानीय लोगों की जरूरतों और परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा सके। यह नई परिस्थितियों का मुकाबला करने में पूरी तरह से सक्षम है।"

भगिया: बन्नी की संस्कृति का एक हिस्सा

बन्नी में भगियाओं को अनेक तरह के जानवरों की नस्लों की भी गहरी समझ है। बन्नी ब्रीडर्स एसोसिएशन के कोऑर्डिनेटर ईसा भाई मुत्तवा ने कहा, “भगिया सिर्फ देखकर ही किसी जानवर की नस्ल की शुद्धता बता सकते हैं। यही कारण है कि जब हम किसी जानवर को बेचने जाते हैं, तो वे हमेशा हमारे साथ मौजूद होते हैं।”

किसी जानवर की बिक्री एक रस्म अदायगी की तरह की जाती है: विक्रेता और भगिया के हाथों को पहले एक रुमाल से ढक दिया जाता है। इस रूमाल के नीचे विक्रेता उंगलियों के जरिए उस कीमत के बारे में इशारा करता है जो वह चाहता है। फिर खरीदार भी इसी तरह भगिया को रुमाल के नीचे वह कीमत बताता है जो वह चुकाने को तैयार है। यह पूरी बातचीत समझ पर निर्भर होती है। दरअसल यहां भागिया मध्यस्थ के रूप में होता है जिसके ज्ञान का इस्तेमाल जानवर की कीमत तय करने के लिए किया जाता है।

मुत्तवा ने आगे कहा, "भगिया जानवरों की सिलेक्टिव ब्रीडिंग में भी मदद करते हैं। इससे नस्ल की शुद्धता बनाए रखने में मदद मिलती है।" यह जानवर के लिए अच्छी कीमत पाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है कि मवेशी की नस्ल क्षेत्र में बनी रहे। उदाहरण के लिए, बन्नी भैंस को आधिकारिक तौर पर 2010 में एक खास नस्ल के रूप में मान्यता दी गई है। भैंस की यह प्रजाति अपनी उच्च दूध उत्पादकता के लिए जानी जाती है। सूखे की स्थिति में लंबी दूरी तक चल सकती है, कई बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है और मौसम की चरम स्थितियों को सहन कर सकती है।

गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेजर्ट इकोलॉजी (GUIDE) के निदेशक विजय कुमार ने कहा कि भगियाओं की ज्यादातर बातें विज्ञान की कसौटी पर सही उतरी हैं। कुमार ने इंडियास्पेंड को बताया, “लगभग 15 साल पहले यहां एक भगिया रहा करता था। वह ज्वार और समुद्र के रंग को देखकर मौसम की भविष्यवाणी कर सकते थे। उनकी सटीकता लगभग हमेशा 100% थी। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि वह अब इतनी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते क्योंकि जलवायु परिवर्तन हो रहे हैं - यह अपने आप में पर्यावरण के बारे में उनके गहरे ज्ञान के बारे में काफी कुछ बता जाता है।”

धीरे-धीरे विलुप्त होता पारंपरिक ज्ञान

2004 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि गुजरात में पारंपरिक ज्ञान को दस्तावेजों में दर्ज करने के लिए 'छिटपुट प्रयास' किए गए हैं और यह खासकर मानवजाति वनस्पति विज्ञान (एथनोबॉटनी) तक ही सीमित है। अध्ययन में पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकारों के मुद्दों का उल्लेख करते हुए कहा गया है, "किसी देश की किसी भी जैव संपदा पर अधिकार सिर्फ उचित दस्तावेजों से ही साबित किए जा सकते हैं।"

उदाहरण के लिए GUIDE ने 2010 में, भुज में स्थानीय समुदाय के औषधीय पौधों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने के लिए इसके "दीर्घकालिक अस्तित्व और समाज द्वारा व्यापक उपयोग" के लिए एक एथनोबॉटनी अध्ययन प्रकाशित किया था।

गुजरात राज्य सरकार में पशुपालन विभाग के अतिरिक्त निदेशक के.ए. वसावा ने कहा कि उनके पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने या दस्तावेज तैयार करने में भगियाओं के साथ कोई "सीधा जुड़ाव" नहीं रहा है। वह कहते हैं, “हम सहजीवन जैसे गैर सरकारी संस्थाओं का समर्थन करते हैं जो इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इसलिए एक तरह से अप्रत्यक्ष जुड़ाव बना हुआ है।”

भगियाओं के मौखिक इतिहास और पारंपरिक ज्ञान का धीरे-धीरे विलुप्त होना काफी मायने रखता है। इमरान मुत्तवा ‘सहजीवन’ के साथ बतौर क्लस्टर कोऑर्डिनेटर काम करते हैं और बन्नी में एक समुदाय के सदस्य भी हैं। उन्होंने कहा कि अनुभवी और बेहद जानकार भगियाओं की संख्या कम होती जा रही है। उन्होंने कहा, "आज बन्नी में शायद ऐसे पांच या छह पुराने भगिया ही बचे हैं।"

बन्नी में 19 ग्राम पंचायतें हैं और यह जरूरी नहीं है कि प्रत्येक पंचायत में एक ऐसा पारंपरिक चिकित्सक हो। उन्होंने बताया, "अन्य (भगिया) भी हैं, लेकिन उनके पास समान स्तर का ज्ञान नहीं है, इसकी बड़ी वजह युवा पीढ़ी के बीच इस परंपरा को आगे बढ़ाने में ज्यादा दिलचस्पी न लेना है।"

बचे हुए कुछ जाने-माने भगियाओं में होडको पंचायत के एरंडावाली गांव के 60 वर्षीय हाजी गुल मोहम्मद भी हैं। इनकी सलाह न सिर्फ बन्नी के मालधारी, बल्कि पड़ोसी राज्य राजस्थान के लोग भी लेने के लिए आते हैं। खासकर पौधों के औषधीय गुणों के बारे में उनका ज्ञान असाधारण बताया जाता है। गुल मोहम्मद, बन्नी में उगने वाली लगभग 56 प्रकार की घास और उनकी खासियतों की पहचान कर सकते हैं।

उन्होंने इंडियास्पेंड को बताया, “मैं बता सकता हूं कि कौन सी घास भैंस को ज्यादा दूध देने में मदद करेगी, या कौन सी घास खारी भूमि में उगेगी। ये सब मैंने अपने पिता से देखा और सीखा है। और मेरा खुद का अपना अनुभव भी है, क्योंकि मुझे सीखने में हमेशा दिलचस्पी रही है। ” वह आगे कहते हैं, “जब मैं छोटा था तो मवेशी की मौत के पीछे का कारण जानने के लिए हमेशा ही उत्सुक रहता था। अब भले ही वह मवेशी कितने लंबे समय से मरा पड़ा हो या फिर उसमें से कितनी ही बदबू क्यों न आ रही हो। मेरा बड़ा बेटा और मेरा भतीजा अब मुझसे यह ज्ञान सीख रहे हैं। लेकिन मुझे युवाओं में वैसा जुनून नहीं दिखता जैसा हममें से कुछ में था।'

60 वर्षीय भीम खान के परिवार में भी इस ज्ञान को सीखने में घटती दिलचस्पी साफ दिखाई दे रही है। आधिआंग गांव के रहने वाले खान भगिया हैं। उनके 55 साल के छोटे भाई जरार हाजी माजिद मुत्तवा भी भगिया हैं। लेकिन खान के बड़े बेटे के अलावा, परिवार में चार भाइयों और तीन बहनों के अन्य बच्चों में से कोई भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा, "बाकी बच्चे ड्राइवर या किसी और काम में लगे हैं।"

खान ने कहा “भगिया होने से आर्थिक सहायता नहीं मिलती है। वे लोगों को मुफ्त में सलाह देते हैं क्योंकि यह भगवान का एक खास तोहफा है” इसके बारे में उनका मानना है कि इसे साझा किया जाना चाहिए। जीविका के लिए भागिया बाकी चरवाहों की तरह अपने पशुओं पर ही निर्भर हैं।

तीन साल पहले ‘सहजीवन’ ने युवा चरवाहों के लिए एक युनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन-सर्टिफाइड कोर्स शुरू किया था ताकि वे पशुचारण (पैस्टरलिज्म) की जटिलताओं के पीछे के विज्ञान के साथ-साथ अपने बुजुर्गों के पारंपरिक ज्ञान को सीख सकें। सहजीवन की अंतरिम कार्यकारी निदेशक कविता मेहता ने कहा, “यह 12 मॉड्यूल के साथ 300 घंटे का कोर्स है। छात्र इकोलॉजी, कीड़े, मिट्टी और जलवायु परिवर्तन के बारे में सीखते हैं, ” वे पारंपरिक ज्ञान के महत्व को समझने के लिए गांव के बुजुर्गों के साथ बातचीत करने के लिए इलाकों का दौरा भी करते हैं। अब तक 50 छात्रों के दो बैचों ने इस पाठ्यक्रम को पूरा किया है।”

कोर्स के एक हिस्से के रूप में भगिया हाजी गुल मोहम्मद ने छात्रों के साथ एक सत्र लिया था। उन्होंने कहा, "मैंने उन्हें वह सिखाने की कोशिश की जो मैं जानता हूं लेकिन आखिर में इस ज्ञान को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन पर ही है।"


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