वाराणसी में गंगा का 'विकास' कैसे बदलेगा नदी और इस पर निर्भर लोगों के जीवन को

वाराणसी में गंगा के दोनों ओर बड़े-बड़े निर्माणकार्य चल रहे हैं। एक तरफ राष्ट्रीय जलमार्ग 1 के लिए नहर खोदी गयी है वहीं दूसरी तरफ घाटों का सुंदरीकरण, रेस्टोरेंट, और कई नयी सुविधाओं का काम चल रहा है। लेकिन यह सब गंगा के पानी की गुणवत्ता, जलीय जीवन और स्थानीय लोगों पर क्या और कितना प्रभाव डालेगा?

Update: 2021-07-19 13:36 GMT

वाराणसी में गंगा में बना सीएनजी स्टेशन। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

वाराणसी: "अभी यहां पर लोग हमारी नाव में घूमने आते हैं तो कोई रुपये 100 देता है कोई रुपये 200, लेकिन जब यहां पर बड़े-बड़े क्रूज चलेंगे, उनमे (उनमें) एक पानी की बोतल मिलेगी, एक सैंडविच मिलेगा तो लोग हमारी इन छोटी नावों में क्यों आएंगे," वाराणसी के अस्सी घाट पर सालों से नाव चला रहे दिनेश मांझी गंगा नदी की दूसरी तरफ हो रही खुदाई के बारे में बात करते हुए कहते हैं।

"ये सिर्फ हमारी रोज़ी रोटी ही नहीं, इस पूरी नदी को भी ख़त्म कर देगा," मांझी कहते हैं। मांझी का मानना है कि गंगा नदी पर चल रहे प्रोजेक्ट से सिर्फ उनकी और हज़ारो मल्लाहों की रोज़ी रोटी पर ही नहीं बल्कि नदी के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है।

मांझी की ही तरह गंगा पर आश्रित हज़ारों लोग जैसे कि नाविक (मल्लाह), मछुआरे और दुकानदार इन दिनों गंगा के दोनों किनारों पर हो रहे निर्माण कार्यों की वजह से अपने भविष्य को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। इस ही के साथ उन्हें सबसे ज़्यादा चिंता है गंगा नदी और इसके जलीय जीवजंतुओं की।

वाराणसी में गंगा के दाहिने किनारे पर भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय जलमार्ग-1 का काम चल रहा है। इसके तहत किनारे के बालू वाले क्षेत्र में करीब 40 मीटर चौड़ी एक नहर खोदी गयी है, जो जहाजों को टर्मिनल से नदी तक लाने के लिए एक गहरे चैनल का काम करेगी।

इंडियास्पेंड की टीम अपनी 'गंगा ट्रेल' सीरीज के दौरान जब इस जगह पर गयी तो पाया कि खुदाई से निकली बालू इस नहर के दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे टीलों के रूप में ही छोड़ दी गयी है जो कि बारिश के साथ फिर से इस नहर में आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा में इस तरह के प्रोजेक्ट, जिसके लिए नदी के अंदर या उसके किनारों पर इतनी भारी मात्रा में खुदाई या निर्माणकार्य की आवश्यकता हो, नदी पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालेंगे।

गंगा में नयी नहर के किनारे छोड़े गए रेत के टीले। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

राष्ट्रीय हरित अधिकरण या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के 2017 के आदेशानुसार मैदानी इलाकों में गंगा के किनारों से 300 मीटर तक कोई भी निर्माणकार्य प्रतिबंधित है। इलाहबाद हाई कोर्ट ने भी 2013 और 2019 में गंगा के अधिकतम बाढ़ बिंदु से 500 मीटर तक स्थायी निर्माण पर रोक लगाई थी। लेकिन वाराणसी में चल रहे काम को देखकर ऐसा नहीं लगता है।

महामना मालवीय इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी फॉर गंगा मैनेजमेंट के डायरेक्टर और जाने-माने नदी विशेषज्ञ प्रोफेसर उदय कान्त चौधरी कहते हैं, "गंगा में ऐसी नहर बनाना और उसे वाटरवेज़ के लिए इस्तेमाल करना अवैज्ञानिक है। बालू वाले किनारे गंगा का स्थायी क्षेत्र है, यह रिवर सिस्टम का फ्लड प्लेन है। यहां पर सिर्फ बालू का जमाव होता है और ज़ाहिर तौर पर ये नहर कुछ ही दिनों में फिर बालू से भर जाएगी।"

प्रोफेसर चौधरी कहते हैं कि बालू की मात्रा ज़्यादा होने से बाढ़ की स्थिति में बाढ़ की ऊँचाई भी बढ़ जाती है इसलिए फ्लड प्लेन को साफ़ और समतल रखना ज़रूरी है, उसकी जगह नहर बना देना भी गलत है क्योंकि वो एक ही बारिश में बालू से भर जाएगी।

राष्ट्रीय जलमार्ग-1 की प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अनुसार इस जलमार्ग में जहाजों के चलने के लिए 2-4 मीटर की गहराई और करीब 45 मीटर की चौड़ाई की ज़रुरत होगी। नदी की गहराई जिन जगहों पर इससे कम होगी वहां पर इस गहराई को प्राप्त करने के लिए ड्रेजिंग यानी नदी तल की खुदाई की जाएगी जिसके कई दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

ड्रेजिंग के दुष्प्रभाव और गंगा में कम होता पानी

किसी भी वाटरवेज़ प्रोजेक्ट के लिए सबसे अहम् मुद्दा ड्रेजिंग का होता है क्योंकि यह एक महँगी और पर्यावरण पर गहरा असर डालने वाली प्रक्रिया है। यूरोपियन कांफ्रेंस ऑफ़ मिनिस्टर्स ऑफ़ ट्रांसपोर्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार ड्रेजिंग से निकलने वाली गाद में कई तरह के प्रदूषित तत्व हो सकते हैं जो कि नदी के पानी या फिर जहां पर गाद का निस्तारण किया जा रहा है उस जगह को प्रदूषित कर सकते हैं।

 गंगा के बीच में होती हुई खुदाई। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

गंगा नदी में सेडीमेंटेशन भी ज़्यादा है और गाज़ीपुर से प्रयागराज के 370 किलोमीटर की दूरी, जिसमें वाराणसी भी आता है, नदी के इस हिस्से की न्यूनतम उपलब्ध गहराई भी 1.2-1.5 मीटर ही है यानी कि इस इलाके में ही सबसे ज़्यादा ड्रेजिंग की आवश्यकता होगी।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रेजिंग से बड़ी समस्या इस समय राष्ट्रीय जलमार्ग-1 के लिए गंगा में लगातार कम होते जलस्तर की है।

गंगा बेसिन अथॉरिटी के पूर्व सदस्य और बीएचयू स्थित महामना मदन मोहन मालवीय गंगा शोध केंद्र के चेयरमैन प्रोफेसर बी डी त्रिपाठी कहते हैं, "आप कितनी भी खुदाई कर लीजिये लेकिन जहाज तो तभी चल पायेगा जब यहां पर पानी होगा? गंगा की आज की सबसे बड़ी समस्या है इसमें कम होता पानी, अगर इसमें पानी है तो आप जहाज चलाइये लेकिन सिर्फ खुदाई करने से तो पानी नहीं बढ़ जायेगा।"

गंगा में हर साल पानी कम होता जा रहा है और इसके सबसे बड़े कारण नदी के अपर स्ट्रीम इलाकों में बांधों का निर्माण, सहायक नदियों के जलस्तर में कमी और गंगा बेसिन के भूजल के स्तर का कम होना हैं।

आईआईटी खड़गपुर के असिस्टेंट प्रोफेसर अभिजीत मुख़र्जी की एक स्टडी के अनुसार 1999 से 2013 के बीच गर्मियों के दिनों में −0.5 से −38.1 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की कमी आयी है।

इस कारण के चलते ही गंगा में चलने वाले जहाजों के फँस जाने की ख़बरें लगातार आती रहती है। गंगा में पानी कम होने की वजह 2018 में एक माल वाहक जहाज पटना से चौसा तक जाते समय कई महीनों तक फंसा रहा। वहीं 2019 में एक मालवाहक जहाज हल्दिया से पटना जाते वक़्त भागलपुर में फंगया और करीब 10 दिन तक फंसे रहने के बाद इस जहाज का माल ट्रकों में लादकर भेजा गया।

इस साल जनवरी में अंतर्देशीय जलमार्ग के जहाज एमवी रविंद्रनाथ टैगोर को वाराणसी से पटना जाते वक़्त कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा और इसे अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए पांच दिन से भी ज़्यादा का वक़्त लगा।

गंगा में प्रदुषण को बढ़ावा

स्थानीय लोगों और जानकारों का कहना है कि वाराणसी के इस इलाके में नई नहर की वजह से नदी अब दो भागों में बट जाएगी और नहर के ज़्यादा गहरे होने के कारण उन दिनों में जब गंगा में पानी कम होता है, तब नदी की मुख्य धारा में पानी बहुत कम हो जायेगा जिससे बहुत सारी अलग दिक्कतें पैदा हो जाएँगी।

रूद्र प्रताप साहनी अस्सी घाट पर चाय की दुकान चलाते हैं और कहते हैं, "यहां पर हम जो गंगा माँ को छू ले रहे हैं या आचमन कर पा रहे हैं आने वाले समय में ये एक नाला बनकर रह जायेगा। क्योंकि जब हम किसी चीज़ को दो भागों में बाँट देंगे तो उसकी जो स्पीड होगी वो भी तो दो भागों में बंटेगी।"

 रूद्र प्रताप साहनी

साहनी बताते हैं कि यहां से कुछ दूर पर ही एक नाला है और चूँकि अब नदी का पूरा प्रवाह नहर की तरफ चला जायेगा तो मुख्य धारा में सिर्फ नाले का पानी ही बचेगा।

उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में सबसे ज़्यादा प्रदुषण कानपुर और वाराणसी जिलों में पाया गया है और वाराणसी में गंगा के पानी की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कुछ दिनों पहले गंगा का पानी हरा हो गया था, जिसके पीछे नदी विशेषज्ञों ने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को ज़िम्मेदार ठहराया था।

उत्तर प्रदेश प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 2019 किये गए सर्वे के अनुसार वाराणसी में गंगा के पानी में कॉलिफोर्म बैक्टीरिया का सर्वाधिक स्तर 34000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर पाया गया था जबकि फीकल कॉलिफोर्म बैक्टीरिया का सर्वाधिक स्तर 22000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर था। 2020 में वाराणसी में गंगा के पानी में फीकल कॉलिफोर्म बैक्टीरिया का सर्वाधिक स्तर 21000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर और 2021 के पहले पांच महीनों में फीकल कॉलिफोर्म बैक्टीरिया का सर्वाधिक स्तर 23000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर था।विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार पीने के पानी में फीकल कॉलिफोर्म बैक्टीरिया की कोई उपस्थिति नहीं होनी चाहिए।

नदी में बढ़ने वाले जहाजों के यातायात से दुर्घटनाओं और उसके कारण होने वाले प्रदुषण का खतरा भी कई गुना बढ़ जायेगा जिसका सीधा असर नदी के जंतुओं और आसपास के लोगों पर पड़ेगा। इन आशंकाओं का ज़िक्र मंथन अध्ययन केंद्र के श्रीपद धर्माधिकारी और अवलि वर्मा ने अपनी स्टडी में किया है। स्टडी के अनुसार, "हानिकारक प्रदार्थों के परिवहन के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले जहाजों की दुर्घटना की स्थिति में ये हानिकारक तत्व और रसायन जैसे फ्लाई ऐश और उर्वरक गंगा के पानी को बड़ी मात्रा और बड़े क्षेत्र में प्रदूषित करेंगे। साथ ही इन जहाजों से निकलने वाला तेल भी पानी को प्रदूषित करेगा।"

राष्ट्रीय जलमार्गों में दुर्घटनाएं अभी भी देखी जा सकती हैं। पिछले साल मार्च में हुगली नदी में एक बांग्लादेशी जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिससे जहाज की फ्लाई ऐश नदी में फ़ैल गयी थी।

मंथन ने आरटीआई और स्थानीय समाचारों की मदद से मार्च और मई 2020 के बीच में ऐसे ही पांच फ्लाई ऐश वाले जहाजों के डूबने की घटनाओं को ट्रैक करके अपने ट्रैकर पर दर्शाया है।

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भूजल और लोक स्वास्थ्य पर असर

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर काम करने वाली संस्था इनवॉइस फाउंडेशन के मुख्य पदाधिकारी सौरभ सिंह बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में गंगा के पानी में बैक्टीरिया का प्रदूषण बढ़ा है और इसका सीधा असर वाराणसी के आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ पर देखा जा सकता है।

सिंह उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा से सटे इलाकों में भूजल प्रदूषण और उसमे आर्सेनिक और नाइट्रेट के प्रदूषण पर कई सालों से काम कर रहे हैं और गंगा में बढ़ रहे प्रदूषण के कारण भूजल और इससे होने वाली फसलों में नुक्सान की आशंका जताते हैं।

वाराणसी में खिड़किया घाट पर चल रहा निर्माणकार्य। फोटो: शैलेष श्रीवास्तव

"गंगा के घाटों पर जो बड़े बड़े निर्माणकार्य हो रहे हैं उसका नदी के पानी पर बहुत ही बुरा असर पड़ेगा। इसके साथ ही पानी के लगातार कम होने से प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। ऐसे में इस वाटरवेज़ प्रोजेक्ट की वजह से जहाजों से निकला तेल और सॉलिड वेस्ट गंगा के पानी में सीधे मिलेगा और इस ही से ग्राउंडवाटर रिचार्ज होगा। जब गंगा के इस पानी से फसलों की सिंचाई की जाएगी तो यही सब तत्व फसलों से लोगों के शरीर में जायेंगे जिससे लोगों के स्वास्थ पर बुरा असर पड़ेगा," सिंह बताते हैं।

गंगा बेसिन के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा संयुक्त राष्ट्र के मानकों से कहीं ज़्यादा पायी जाती है और इस पूरे क्षेत्र के भूजल में आर्सेनिक का प्रदूषण व्याप्त है जो कि एक बड़ी समस्या है।

भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति काफी ऊपरी सतह पर पायी जाती है इसलिए ऐसे इलाकों में शुद्ध पानी के लिए गहरे बोरवेल किये जाते हैं। लेकिन अगर गंगा के पानी में प्रदूषण बढ़ता है और इससे भूजल भी प्रभावित होता है तो ऐसे में इन क्षेत्रों के लोगों के लिए ऊपरी और निचली दोनों सतहों का भूजल उपयोग योग्य नहीं बचेगा।

नाविकों पर दोहरी मार

वाराणसी में इस वाटरवेज़ का प्रभाव इस शहर को एक अलग पहचाने देने वाले गंगा के नाविकों पर भी पड़ेगा। इस प्रोजेक्ट की वजह से उनकी नावों के लिए दायरा बहुत ही सीमित हो जायेगा। गंगा में इसके साथ ही पर्यटकों के लिए क्रूज चलाने का भी प्लान है जो कि इन नाविकों की आजीविका पर सीधा असर डालेगा।

"अभी यहाँ पिछले कुछ सालों से एक क्रूज चल गया है -- अलकनन्दा। उसमे 85 सीट हैं और एक आदमी को उसमे रुपये 950 किराया लगता है। अब अगर ये यहां से इतने लोगों को लेकर जा रहा है तो घाटों के नाविकों की ही रोजी मार रहा है। पहले लोग अलग-अलग घाटों पर आते थे और नाव लेते थे तो वो सारे नाविकों में बंट जाते थे जिससे सबको काम मिलता था। मगर अब लोग गाडी से सीधे वहाँ जायेंगे, टिकट लेंगे और क्रूज में बैठ जायेंगे," दिनेश मांझी जिनकी पिछली तीन पीढ़ियां नाव चलाने का काम करती आ रही हैं, बताते हैं।

 दिनेश मांझी

मांझी ये भी कहते हैं कि क्रूज जैसी सुविधाएँ लोगों को असली बनारस से दूर ले जाएंगी और पर्यटक इस शहर की छोटी-छोटी विशेषताओं को नहीं देख पाएंगे क्योंकि उनको जितना दिखाया जायेगा वो उतना ही देखेंगे।

"हम लोगों को क्रूज से भी कम पैसे में चाय, नाश्ता भी करवा सकते हैं और साथ ही हम उनको यहां के घाटों की विशेषता बताएँगे और छोटी छोटी जगहों के बारे में 'स्टेटमेंट' देंगे। मगर बाहर का आदमी तो हमेशा चकाचौंध की तरफ ही जाता है, ऐसे में हमारा परिवार और घर चलाने के लिए हमारे लिए बड़ी समस्या होने वाली है," मांझी कहते हैं।

वाराणसी में करीब 9000 से भी ज़्यादा नाविक हैं जिनकी आजीविका गंगा पर निर्भर है। इनमें से अधिकतर लोग कोरोना से पहले से ही प्रभावित हैं और अब गंगा में होते हुए इस विकास की वजह से शायद इनमें से कई नाविकों को अपने भविष्य के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे।

हमने राष्ट्रीय जलमार्ग 1 से जुड़े सवालों के बारे में जानने के लिए अंतर्देशीय जल परिवहन के डिप्टी सेक्रेटरी एस के सिन्हा को मेल किया है जिसका जवाब हमें अभी तक नहीं मिल पाया है। जवाब मिलने पर इस स्टोरी को अपडेट किया जायेगा।

(यह रिपोर्ट 'गंगा ट्रेल' सीरीज का चौथा भाग है। इस सीरीज के पहले तीन भाग आप नीचे दिए लिंक्स पर पढ़ सकते हैं।)

पार्ट 1: गंगा में पानी बढ़ने के साथ नई परेशानी, किनारे गड़े शवों के उतराने का खतरा

पार्ट 2: कोरोनाकाल में अपनों के इलाज के लिए क़र्ज़ के तले दबते परिवार

पार्ट 3: वाराणसी या प्रयागराज? देश की इकलौती कछुआ सेंचुरी, जो है भी और नहीं भी

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