चुनाव 2024: बढ़ता जोखिम, बढ़ता विरोध, फिर भी धड़ल्ले से बढ़ रही हैं बांध परियोजनाएं

हांलाकि हिमालय की तलहटी में बसा भारत का उत्तराखंड राज्य जल विद्युत् परियोजनाओं को स्थापित करने के लिए सभी मानकों को पूरा करता है। यहां कई तरह की परियोजनाएं चल भी रही है लेकिन प्रकृति को इससे हो रहे नुकसान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इस पहाड़ी राज्य ने पिछले कुछ सालों में काफी प्राकृतिक आपदाएं देखीं है। उसके बावजूद यह एक चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है।

Update: 2024-04-09 05:59 GMT

फरवरी 2021 में चमोली में आई आपदा में 2 जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह बह गई थीं।

देहरादून: जल विद्युत परियोजनाओं पर स्थानीय समुदाय से लेकर पर्यावरण कार्यकर्ताओं के कड़े विरोध के बावजूद हिमालयी राज्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में लगातार नए बांध बनाए जा रहे हैं। बीते कुछ सालों में जलविद्युत परियोजनाओं की वजह से इन राज्यों ने कई बड़ी आपदाओं का सामना किया है। लेकिन इसके बावजूद राज्य सरकारें नई परियोजनाओं के साथ-साथ वर्षों से अटकी परियोजनाओं को भी धड़ल्ले से आगे बढ़ा रही है।

हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हो रही जलवायु आपदाओं के अपरिवर्तनीय प्रभावों को देखते हुए हिमालयी राज्य समेत देश के 14 राज्यों के 68 संगठनों ने एक साथ मिलकर आगे आने का फैसला किया और पीपल फॉर हिमालय अभियान 2024 की शुरुआत की। इस अभियान के जरिए हिमालयी राज्यों में बांध, रेलवे ट्रैक और चार लेन राजमार्गों को बनाने पर पूरी तरह से रोक लगाने और मौजूदा परियोजनाओं के सामाजिक, आर्थिक, वित्तीय और पारिस्थितिकी प्रभावों की समीक्षा करने की मांग की जा रही है।

29 मार्च 2024 को इस अभियान के सदस्यों ने ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपना घोषणा पत्र साझा किया। घोषणा पत्र में कहा गया है कि जिन आपदाओं को प्राकृतिक बताया जा रहा है वास्तव में ये आपदाएं प्रणालीगत और नीतिगत खामियों की विफलताओं का नतीजा हैं। वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक शोषण और दोहन के चलते आज हिमालय आपदाग्रस्त क्षेत्र बन गया है। इसलिए ये सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं है बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का भी संकट है।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में लद्दाख की ओर से शामिल पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा “हिमालय अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति, संस्कृति और जीवनशैली के लिए जाना जाता है। इन क्षेत्रों में विकास और शासन का थोपा जाने वाला मॉडल काम नहीं करेगा।” उन्होंने आगे कहा, “विकास के नाम पर उद्योगों को फायदा होता है। लेकिन जब आपदाएं आती हैं तो स्थानीय लोगों को सबसे ज्यादा परेशानियां झेलनी पड़ती है और सरकार करदाताओं के पैसों से नुकसान की भरपाई करती है। हमें हिमालय को अलग नजरिए से देखना होगा।”

देहरादून के विकासनगर में व्यासी परियोजना के टनल के नजदीक भूस्खलन


विशेषज्ञों के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में 2023 मानसून में ब्यास घाटी में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स के गेट खोलने की वजह से बाढ़ की तीव्रता बढ़ गई थी।

आपदाएं और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स

जलवायु परिवर्तन के लिहाज से संवेदनशील और क्लाइमेट हॉटस्पॉट माने जाने वाले हिमालयी राज्य बड़ी बांध परियोजनाओं के जोखिम से जूझ रहे हैं। 7 फरवरी 2021 को चमोली में नंदा देवी पर्वत रेंज में हिमस्खलन और चट्टान टूटने से ऋषि गंगा और धौलीगंगा नदियों में भारी मात्रा में मलबा आया। सड़क, पुल और इमारतों के साथ-साथ ऋषि गंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट (13 मेगावाट) और एनटीपीसी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट (520 मेगावाट) को बहा ले गया। इस घटना में 204 लोग मारे गए थे।

वर्ष 2023 में चमोली के ही जोशीमठ में भूधंसाव के बाद स्थानीय लोगों ने “एनटीपीसी गो बैक” के नारे लगाए। उनका मानना है कि परियोजना की सुरंग में पानी जमा होने के चलते ही भूधंसाव हुआ है। यहां 868 मकानों में दरारें आ गईं। यहां रहने वाले लोगों को राहत शिविरों या किराए के मकानों में आश्रय लेना पड़ा।

वर्ष 2023 मानसून में हिमाचल प्रदेश में बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से जुड़ी घटनाओं में 404 लोग मारे गए और 38 लोग लापता हो गए। मानसून में आई आपदा में हुए नुकसान का आकलन करने वाली कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि लोगों के घरों, सार्वजनिक इमारतों, सिंचाई और जल आपूर्ति से जुड़ी पाइप लाइन, गौशाला और सड़कों समेत राज्य को 12,000 करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ। इसमें कई हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और ट्रांसमिशन लाइन को भी नुकसान पहुंचा।

कौंसिल ऑफ एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर के एक विश्लेषण के मुताबिक उत्तराखंड के 85 फीसदी से ज्यादा जिले अत्यधिक बाढ़ और उससे जुड़ी घटनाओं के हॉटस्पॉट हैं। इन जिलों में 90 लाख से ज्यादा की आबादी रहती है।

रिपोर्ट बताती है कि व्यास नदी बेसिन में कई हाइड्रो पावर परियोजनाओं से जुड़ी अथॉरिटी ने सही समय पर सही फैसले नहीं लिए। 20-24 जून की भारी बारिश के बाद डैम के फ्लड गेट नहीं खोले गए। बारिश का पानी जमा होने के बाद सभी अपस्ट्रीम डैम ने भारी मात्रा में पानी छोड़ा। यह 2023 में आने वाली बाढ़ का बड़ा कारण था। इन परियोजनाओं के सही तरीके से संचालित न होने की वजह से ही कुल्लू, मंडी, कांगड़ा जिले के साथ पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में भारी नुकसान हुआ।

इस कमेटी ने केंद्र और राज्य सरकारों को हिमालयी क्षेत्र में हाइड्रोपावर नीति पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया। 4 अक्टूबर 2023 को सिक्किम में दक्षिण ल्होनक हिमनद झील टूटने से तीस्ता नदी बेसिन में आई भीषण बाढ़ (GLOF) में सेना के 15 जवान समेत 46 लोग मारे गए। सिक्किम का सबसे बड़ा 1200 मेगावाट क्षमता का हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट इस बाढ़ में बह गया। 87 हजार से अधिक आबादी प्रभावित हुई। 14 बड़े पुलों के साथ सरकारी इमारतें, रिहायशी मकान, सड़कें और हाईवे को भारी नुकसान पहुंचा था।

दक्षिण ल्होनक झील से जुड़े खतरे का अंदेशा पहले से था और इसकी मॉनिटरिंग की जा रही है।

गैर-सरकारी संस्था साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के हिमांशु ठक्कर कहते हैं “चमोली आपदा, हिमाचल की बाढ़ या फिर सिक्किम में हिमनद झील का टूटना तो प्राकृतिक था लेकिन उनके आपदा में बदलने की वजह मानवीय थी। चमोली में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के टूटने से इतनी बड़ी संख्या में मौतें हुईं। हिमाचल में बारिश की वजह से बाढ़ शुरू हुई लेकिन बांधों से छोड़े गए पानी की वजह से ये बाढ़ कई गुना अधिक बड़ी हो गई। सिक्किम में भी बांध टूटने से डाउनस्ट्रीम में ज्यादा नुकसान हुआ”।

ठक्कर कहते हैं “हाइड्रो पावर या अन्य विकास योजनाओं पर काम करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक होनी चाहिए। इसमें स्थानीय लोगों को सही जानकारी देना और फैसले में उनका शामिल होना जरूरी है। बड़े बांधों से संभावित खतरे, आपदा की आशंका, पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले असर को जोड़कर इसके लाभ का विश्लेषण (cost benefit analysis) करना चाहिए। इसके बाद अगर लोग अपनी सहमति जताते हैं तो ही ऐसी विकास योजनाएं बनाई जाएं”।

देहरादून के विकासनगर में व्यासी जलविद्युत परियोजना

पॉलिटिकल इकोनॉमी

जलविद्युत ऊर्जा को अक्षय ऊर्जा माना जाता है। कोयला से बनी ऊर्जा से होने वाले प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट बिजली अक्षय ऊर्जा स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सौर और पवन के साथ जलविद्युत ऊर्जा को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

ऊर्जा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022-23 तक देश में 46850.15 मेगावाट जलविद्युत ऊर्जा का उत्पादन हुआ है। इस समय तक 12663.5 मेगावाट की परियोजनाएं निर्माणाधीन थीं। वर्ष 2030 तक जलविद्युत ऊर्जा की स्थापित क्षमता में 26.4 (1 गीगावाट = 1000 मेगावाट) गीगावाट और जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

उत्तराखंड में इस समय 4183.10 मेगावाट अनुमानित क्षमता की 42 जलविद्युत परियोजनाएं चल रही हैं। इसके अलावा उत्तराखंड जलविद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) 2535.8 मेगावाट की 27 नई परियोजनाओं पर काम कर रहा है, तो वहीं केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (सीपीएसयू) 5801.00 मेगावाट की 22 नई परियोजनाएं तैयार करने में लगा है। वहीं निजी ऊर्जा कंपनियां (आईपीपी) भी 1360.8 मेगावाट की 33 परियोजाओं पर काम कर रही हैं। यानी कुल मिलाकर राज्य में 13,880.7 मेगावाट की 124 परियोजनाएं सक्रिय हैं।

उत्तराखंड सरकार लंबित जलविद्युत ऊर्जा परियोजनाओं को केंद्र सरकार से मंजूरी दिलाने और इस क्षेत्र में नए निवेश आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। वर्ष 2021 में 300 मेगावाट की लखवाड़ बहुउद्देशीय परियोजना और 25 अक्टूबर 2023 को 14 मेगावाट की जामरानी बांध बहुउद्देशीय परियोजना को केंद्र से मंजूरी मिली थी।

हिमाचल प्रदेश में 10263.0 मेगावाट जलविद्युत क्षमता की परियोजनाएं स्थापित हैं। जबकि 2490.0 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। वहीं, 5552.0 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं प्रस्तावित हैं।

अपने क्षेत्र में प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना का विरोध करते हुए दारमा घाटी के लोग।

विरोध के स्वर

हिमालयी राज्य जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ लगातार विरोध दर्ज करा रहे हैं। उत्तराखंड में चमोली, पौड़ी, पिथौरागढ़ देहरादून और जगह-जगह से लोग इन परियोजनाओं के विरोध में आगे आए हैं।

राज्य के सीमांत जिले पिथौरागढ़ की दारमा घाटी के लोगों को जब अपने क्षेत्र में 165 मेगावाट की बोकांग बालिंग जलविद्युत परियोजना की जानकारी मिली तो 17 गांवों के लोगों ने मिलकर दारमा घाटी संघर्ष समिति बनाई और परियोजना का विरोध किया। इस परियोजना का सर्वे किया जा चुका है और डीपीआर तैयार की जा रही है।

दारमा घाटी संघर्ष समिति के अध्यक्ष और घाटी के गोह गांव के पूरन ग्वाल कहते हैं “सर्वे के नाम पर ही हमारे गांवों के नीचे 15 मीटर से अधिक लंबी सुरंग खोदी जा चुकी है। हमारा क्षेत्र भौगोलिक और जलवायु की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है और हर बरसात में हमें भूस्खलन झेलना पड़ता है। यहां प्रोजेक्ट आएगा तो हमारे गांव खतरे में आ जाएंगे। हमें विस्थापित होना पड़ेगा”।

2013 केदारनाथ आपदा के बाद 23 हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को रद्द करने की सिफारिश करने वाली एक्सपर्ट बॉडी के अध्यक्ष रहे और पर्यावरणविद् डॉ रवि चोपड़ा कहते हैं, “स्थानीय स्तर पर विरोध के बावजूद जलविद्युत परियोजनाएं बन रही हैं क्योंकि उन्हें सरकार का समर्थन हासिल है।” उन्होंने आगे कहा, “टिहरी और नर्मदा बांध परियोजनाओं को लेकर हुए स्थानीय विरोध प्रदर्शन के बाद बांध बनाने वाली कंपनियों ने सीख लिया है कि कुछ स्थानीय लोगों को थोड़े-बहुत फायदे दे दो, उन्हें अस्थायी नौकरियां दे दो, जिससे उनके पास पैसा आ जाएगा और वह पीछे हट जाएंगे। इस तरह वे स्थानीय विरोध को कमजोर कर देते हैं। ये रणनीति देशभर में काम कर रही है”।

डॉ चोपड़ा के मुताबिक, सरकार सोच-समझकर बांधों से जुड़े जोखिम उठा रही है।

ऊर्जा विशेषज्ञ और क्लाइमेट जस्टिस पर काम कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ता सौम्या दत्ता ने कहा कि पिछले एक दशक में जलवायु परिवर्तन के चलते खतरा बढ़ा है इसलिए अब जलविद्युत परियोजनाओं का रिस्क प्रोफाइल बढ़ गया है। उनके मुताबिक, “खतरों के बावजूद इन परियोजनाओं के आर्थिक लाभ हैं। जीडीपी बढ़ती है। कंपनियों का मुनाफा होता है। दरअसल स्थानीय समुदाय को तरजीह नहीं दी जाती है। सिर्फ सरकार और कंपनियों के फायदे को देखा जाता है।

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