जलवायु हॉटस्पॉट: चक्रवातों की बढ़ती संख्या और हीट वेव्स कर रहा कच्छ के लोगों के जीवन को प्रभावित

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के पिछले तीन दशकों के आंकड़े बताते हैं कि कच्छ में लगातार गर्मी और बारिश के दिनों की संख्या लगातार बढ़ी है, जिससे मछुआरों और किसानों की आजीविका खतरे में पड़ी है।

Update: 2023-05-31 06:37 GMT

नावों की संख्या में वृद्धि, मछली पकड़ने के काम में अधिक मशीनीकरण, डीजल, बर्फ और श्रम की बढ़ती लागत के कारण गुजरात के कच्छ जिले के जखाऊ बंदरगाह के मछुआरों का मुनाफा पहले से ही प्रभावित था, अब वे लगातार चक्रवात की चेतावनियों से भी प्रभावित हो रहे हैं, जिससे उनका बहुत नुकसान हो रहा है। फोटो: तन्वी देशपांडे/इंडियास्पेंड

कच्छ (गुजरात): जींस-टीशर्ट पहने और पतली मूंछ रखने वाले उमेश बारिया अब भी एक कॉलेज जाने वाले विद्यार्थी की तरह लगते हैं, लेकिन वह वास्तव में कच्छ के जखाऊ बंदरगाह पर मछलियां पकड़ते हैं। उनका परिवार पारंपरिक रूप से यही काम करता है। उमेश बचपन से ही अपने परिवार की इस काम में सहायता करते थे और अब वह ख़ुद एक नाव के मालिक हैं।

25 साल के उमेश बताते हैं, “चक्रवात की चेतावनी होने पर भी यहां के लोग समुद्र में जाने का जोखिम उठाते हैं क्योंकि हर एक बेकार दिन में हमारा कम से कम 10,000 रुपये का नुकसान होता है।” इसके बाद वह लकड़ी के चूल्हे पर उबल रहे बर्तन में झांकते हैं ताकि पता चल सके कि उनके दोपहर का भोजन तैयार है या नहीं।

उन्होंने बताया, “आज के ज़माने में 10,000 रुपये कमाने में बहुत समय लगता है, इसलिए कुछ लोग सोच-समझकर तूफान में भी मछली पकड़ने का जोखिम उठाते हैं।”

यह जोखिम उन्हें जीवनयापन में मदद करता है। उमेश बताते हैं कि पिछले एक दशक में कच्छ क्षेत्र में चक्रवात से संबंधित चेतावनियों में भारी वृद्धि हुई है, जिससे नाव मालिकों और मछुआरों को भारी नुकसान होता है। एक ही मौसम में ये मछुआरे कई बार खाली बैठने को मजबूर हो जाते हैं।

इस बीच जखाऊ से सिर्फ 20 किमी दूर नालिया इलाके के किसान यह बात कर रहे हैं कि कैसे साल दर साल अनियमित बारिश के कारण मूंगफली का उत्पादन 30% तक गिर गया है।

गुजरात के कच्छ जिले में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। भारत के मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन दशक में हीटवेव्स और बारिश के दिनों की संख्या बढ़ी है, जिससे लोगों का जीवन और आजीविका प्रभावित हो रही है।

इन परिवर्तनों से निपटने के लिए मछुआरे और किसान अब अनिश्चितता का जीवन जी रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर हमारी सीरीज़ के तहत हम इस रिपोर्ट में आपके लिए लेकर आए हैं कि कैसे जलवायु परिवर्तन से प्रेरित चरम मौसम घटनाओं से कच्छ के पारंपरिक व्यवसायों में लगे लोगों को नुकसान हो रहा है।

1994 और 2002 के बीच मार्च के महीने में नलिया में लगभग चार हीट वेव्स आते थे, लेकिन 2003 से 2022 के बीच इसकी संख्या बढ़कर हर साल लगभग 20 हीट वेव्स हो गई। न्यू कांडला में मार्च और अप्रैल के महीनों में अक्सर गर्म हवाएं (हीट वेव्स) चलती हैं। 2000 और 2010 के बीच न्यू कांडला ने छह वर्षों में आठ हीट वेव्स दर्ज किए, लेकिन 2014 और 2017 के अपवाद को छोड़ दें तो 2011 से 2019 के बीच हर साल लगभग 12 हीट वेव्स का अनुभव किया गया। न्यू कांडला क्षेत्र में मार्च 2022 में 13 दिन और जून 2022 में 17 दिन हीट वेव्स का अनुभव किया गया।

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गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (जीएसडीएमए) द्वारा तैयार हीटवेव पर एक रिपोर्ट बताती है कि गुजरात में हीटवेव से होने वाली मौतें 2015 में 58 से बढ़कर 2018 में 775 हो गईं और यह साल-दर-साल बढ़ रही है।

चरम मौसम की घटनाओं के कारण कच्छ में बारिश की मात्रा भी प्रभावित हुई है। परंपरागत रूप से सौराष्ट्र और कच्छ में देश के अन्य भागों की तुलना में कम वर्षा होती है। उदाहरण के लिए सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र में 2004 से 2013 की अवधि में लगभग 674 मिमी की औसत मौसमी वर्षा हुई थी, जिसमें औसतन 98 बरसात के दिन थे। इसी दौरान मुंबई में मानसून के मौसम में औसतन लगभग 2,300 मिमी वर्षा होती है।

पिछले 30 वर्षों में 15 मौसम स्टेशनों के आईएमडी डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि 15 में से कम से कम 11 स्टेशनों ने मानसून के दौरान बारिश के दिनों की आवृत्ति में वृद्धि दर्ज की है। उदाहरण के लिए, कांडला न्यू ऑब्जर्वेटरी ने 1990-2000 के दशक में औसतन 12 बारिश के दिन दर्ज किए थे, लेकिन अगले दशक में यह संख्या बढ़कर 18.7 और 2011-20 के दशक में 20 हो गई। मुंद्रा ऑब्जर्वेटरी ने 1990-2000 के दशक में 14.6 बरसात के दिनों की औसत आवृत्ति दर्ज की थी, लेकिन 2010-20 के दशक में यह संख्या बढ़कर 20 हो गई। इसी अवधि में नलिया में बरसात के दिनों की औसत आवृत्ति की संख्या बढ़कर 9.81 से 14.3 हो गई।

गुजरात के बदलते मौसम के बारे में मछुआरे जो कह रहे हैं, इसका उल्लेख 2013 के इस शोध पत्र में भी किया गया है। शोध पत्र में कहा गया है, "अरब सागर के ऊपर चक्रवाती गतिविधियों में वृद्धि के कारण भी पिछले दशक से भारी बारिश की घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि हुई है।"

बोओ, लेकिन मुश्किल से काटो

नलिया में किसान रमेश भानुशाली ने पिछले साल के लंबे अवधि के मानसून के कारण अपनी उपज का लगभग 70% हिस्सा खो दिया। उन्हें लाभ तो मिला नहीं, ऊपर से वे अपनी खेती की लागत को मुश्किल से ही हासिल कर पाए। कृषि क्षेत्र की इस अनिश्चितता ने भानुशाली को अपनी 13.5 एकड़ जमीन में से लगभग चार एकड़ जमीन को एक बिल्डर को बेचने के लिए मजबूर कर दिया है।

भानुशाली ने इंडियास्पेंड को बताया, "खेती-किसानी में कोई निश्चितता नहीं है। पिछले साल मेरी मूंगफली की 70% फसल खराब हो गई थी क्योंकि बारिश एक अतिरिक्त महीने तक जारी रहा। हर साल कीटों या मौसम की गड़बड़ी के कारण कुछ ना कुछ जरूर नुकसान होता है, हम अब आदी इसके हो चुके हैं। लेकिन पिछले साल हमें भारी नुकसान हुआ। हमने सोचा था कि हम एक सीजन में खेती से एक लाख रुपये कमा लेंगे, लेकिन हमें मुश्किल से ही अपनी लागत मिल पाई। मतलब पूरा एक साल (बर्बाद) गया ।”

पिछले साल की भारी बारिश के कारण किसान रमेश भानुशाली को अपनी लगभग 70% फसल को गंवाना पड़ा। कृषि की अनिश्चितता के कारण उन्हें अपनी 13.5 एकड़ जमीन में से चार एकड़ जमीन को बेचने के लिए मजबूर कर दिया।

2022 में खरीफ सीजन के दौरान बेमौसम बारिश से गुजरात को तगड़ा झटका लगा। आईएमडी के अनुसार गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्रों में इस दौरान भारी बारिश हुई। उस समय कच्छ सहित 14 जिलों के 2,500 से अधिक गांव बेमौसम बारिश से प्रभावित थे। हालांकि राज्य सरकार ने 630 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की, जिससे इन जिलों के 800,000 किसानों को लाभ होने की उम्मीद है। लेकिन भानुशाली ने बताया कि वह इस मुआवजे के योग्य नहीं हैं।

रमेश भानुशाली ने बताया, “कुछ साल पहले जब नलिया में सूखा पड़ा था तो सभी को 13,500 रुपये का मुआवजा मिला था। इस साल हम सरकारी मानदंडों में फिट नहीं बैठे।”

इंडियास्पेंड ने गुजरात के कृषि विभाग को पत्र लिखकर पूछा कि जहां किसानों को अनियमित मौसम के कारण फसल नुकसान का सामना करना पड़ा है, वहां मुआवजे का निर्धारण करने के लिए क्या मानदंड हैं और रमेश भानुशाली को मुआवजा क्यों नहीं मिला? उनका जवाब आने पर इस स्टोरी को अपडेट किया जाएगा।

नलिया में खेती मानसून पर निर्भर है क्योंकि मुश्किल से 5 फीसदी खेतों में ही सिंचाई कृत्रिम साधनों द्वारा हो पाती है। इस क्षेत्र के किसान मुख्य या खरीफ मौसम में मूंग (हरा चना), बाजरी (मोती बाजरा), कपास और मूंगफली की खेती करते हैं, जबकि कुछ किसान रबी मौसम में गेहूं भी उगाते हैं।

नलिया क्षेत्र के एक अन्य किसान प्रवीणभाई भानुशाली ने बताया, "पहले हम 2 किलो बीज से 40 किलो मूंगफली उगाते थे, लेकिन अब हम केवल 12 से 14 किलो ही उगा पा रहे हैं। गर्मी, सर्दी, मानसून, सब कुछ अभी चरम पर है, जो हमारी उपज को प्रभावित करता है।”

इंडियास्पेंड ने गुजरात के कृषि निदेशालय, कृषि और किसान कल्याण विभाग से पूछताछ की कि नलिया में इतने कम प्रतिशत क्षेत्र में सिंचाई क्यों होती है और क्या सरकार भविष्य में सिंचाई के तहत क्षेत्र को बढ़ाने की योजना बना रही है। उनकी प्रतिक्रिया मिलने पर इस कहानी को अपडेट किया जाएगा।

नालिया के किसानों के एक समूह ने इंडियास्पेंड को बताया कि फसल खराब होने और बढ़ती गर्मी ने लोगों को कच्छ से पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है। उर्वरकों, कीटनाशकों, बीजों की बढ़ती कीमतों ने किसानों के मुनाफे को प्रभावित किया है। भूमि पर दबाव और पलायन का मतलब है कि श्रम की कमी है, जिसके कारण श्रम लागत प्रतिदिन 400 रुपये तक बढ़ गई है। पहले इसकी कीमत करीब 250 रुपये प्रतिदिन हुआ करती थी। इसकी तुलना में गुजरात में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत अकुशल शारीरिक श्रमिकों के लिए मजदूरी दर 256 रुपये प्रति दिन है।

इन सभी कारकों के एक साथ आने से किसानों के लिए गुजारा करना मुश्किल हो जाता है। केएसकेवी कच्छ विश्वविद्यालय में पृथ्वी और पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख महेश ठक्कर ने सहमति व्यक्त की कि सामान्य ग्राफ कच्छ में तेजी से अनियमित होते मौसम को दर्शाता है।

ठक्कर ने कहा, "यह विशेष रूप से 1991 से हो रहा है। वर्षा इतनी अनियमित हो गई है कि कुछ साल 200% वर्षा होती है तो कुछ साल सूखा पड़ता है। वहीं भारत की मौसम संबंधी क्षमताओं में बहुत सुधार हुआ है और सूचना का प्रसार किया जा रहा है। किसानों के पास अपनी फसलों को मौसम की मार से बचाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।”

यह 2013 के उपर्युक्त शोध पत्र में भी परिलक्षित हुआ था। इसमें पाया गया कि गुजरात में 2004-2013 के दशक में औसत मौसमी वर्षा में "प्रशंसनीय रूप से वृद्धि" हुई थी। साथ ही गुजरात राज्य की सभी वेधशालाओं में इस दशक (2004-2013) में भारी बारिश (>65 मिमी) की आवृत्ति काफी बढ़ गई थी।

चक्रवात की चेतावनी से मछुआरे अपंग हो जाते हैं

मछुआरे नरसी लल्लू उस समय को याद कर रहे हैं जब मछली पकड़ने के लिए समुद्र में 4-5 दिनों के लिए जाना पर्याप्त था, लेकिन अब उतनी ही मात्रा में मछली पकड़ने के लिए कम से कम 15-20 दिनों तक नाव चलती है

61 वर्षीय नरसी लल्लू बताते हैं, "पहले गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी होती थी। अब किसी भी मौसम में कुछ भी हो जाता है।”

मूल रूप से वलसाड के रहने वाले लल्लू एक नाव मालिक हैं जो अगस्त से मई तक मछली पकड़ने के मौसम में अपने जहाज को जखाऊ लाते हैं। वह वलसाड से मजदूरों को लाते हैं क्योंकि जो यहां मजदूर मिलते हैं वे उनके जैसा धंधा नहीं कर सकते हैं।

लल्लू उस समय को याद करते हुए कहते हैं कि जब चार-पांच दिनों के लिए समुद्र में जाना मछली पकड़ने के लिए पर्याप्त था, लेकिन अब उतनी ही मात्रा में मछली पकड़ने के लिए कम से कम 15-20 दिनों के लिए नाव चलती है। इसके अलावा लॉबस्टर, पोम्फ्रेट और झींगे जैसी मछलियों को पकड़ने से मछुआरों को अच्छी कीमत मिलने की गारंटी होती थी, लेकिन अब उनकी मात्रा कम हो गई है। अगर कुछ दशक पहले लॉबस्टर या पोम्फ्रेट मछलियों का दाम 150-300 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच में था, तो अब इनका दाम 1,500-2,500 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया है। हालांकि इन दुर्लभ मछलियों को मिलने की मात्रा अब कम हो गई है और लाभ भी कम हो गया है।

लल्लू कहते हैं, "अब हमें घर पर बहुत अधिक रहना पड़ता है। हर एक या दो महीने में मौसम की चेतावनी दी जाती है। मेरे नाव पर 10 मजदूर हैं। हम उन्हें 8,000-12,000 रुपये के बीच हर सीज़न का भुगतान करते हैं। यह एक बड़ी लागत है। इस लागत को स्थानीय रूप से 'वेरेंटेज' कहा जाता है और यह प्रत्येक नाव-मालिक की चुनौतियों की सूची में बहुत ऊपर है।

गुजरात के मत्स्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार गुजरात में 218,000 सक्रिय मछुआरे और 36,980 मछली पकड़ने वाली नौकाएं हैं। कच्छ में 4,553 मछुआरे परिवार हैं। 2020-21 के महामारी वर्ष को छोड़कर गुजरात का पूर्ण मछली उत्पादन (समुद्री और अंतर्देशीय) 2017-18 से 2021-22 तक लगातार बढ़ा ही है। लेकिन बढ़ी हुई उत्पादन संख्या उन लागतों को नहीं दर्शाती है जो जखाऊ में काम करने वालों द्वारा की जाती हैं।

क्षेत्र के मछुआरे अपने नुकसान के कारणों में नावों की संख्या में वृद्धि, मछली पकड़ने का अधिक मशीनीकरण, डीजल, बर्फ और श्रम की बढ़ती लागतों को गिनाते हैं। एक अन्य प्रमुख कारण चक्रवात या मौसम संबंधी चेतावनियों की बढ़ती संख्या है।

दूसरी पीढ़ी के मछुआरे उमेश बारिया का कहना है कि मौसम की चेतावनी के बावजूद मछुआरे अक्सर समुद्र में जाने का जोखिम उठाते हैं क्योंकि निष्क्रिय दिनों में उन्हें लगभग 10,000 रुपये प्रतिदिन का खर्च आता है

मई 2021 में चक्रवात ताउक्ते ने भारत के कई राज्यों और विशेष रूप से गुजरात को प्रभावित किया, जिसके बाद केंद्र सरकार ने राज्य के राहत कार्य के लिए 1,000 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की। मछली पकड़ने वाले बैरिया का कहना है कि 2014 में निलोफर चक्रवात के बाद से इस क्षेत्र में चक्रवात या मौसम की चेतावनी अधिक देखने को मिली है।

बारिया कहते हैं, "इस साल [2022] सितंबर में मौसम की अधिक चेतावनियां थीं। यह मछुआरों के लिए कैच-22 की स्थिति है। ऐसी चेतावनियों के समय यदि वे घर पर ही रहते हैं तो उन्हें मछलियां भी नहीं मिलती हैं और उन्हें अपने मजदूरों को भुगतान भी करना पड़ता है। और यदि चक्रवात की चेतावनी होने पर आप बिना परमिट के समुद्र में जाते हैं तो अधिकारी आपको दंडित कर सकते हैं। इसके बावजूद, कुछ मछुआरे अभी भी जोखिम उठाते हैं और समुद्र में जाते हैं।"

मछुआरों का कहना है कि मछली पकड़ने का मौसम अगस्त से मई तक पूरे नौ महीने का होता था, लेकिन बेमौसम मौसम और बार-बार चक्रवात की चेतावनी ने इस खिड़की को छह या सात महीने तक छोटा कर दिया है।

बारिया ने कहा, “ओखा, वेरावल, दीव या जखाऊ हर जगह यही स्थिति है। एक पेशे के रूप में मछली पकड़ना मेरे पिता के समय की तुलना में अब कहीं अधिक कठिन है।” जखाऊ में अधिकांश मछुआरे अपनी मछलियों को उन निर्यातकों को बेचते हैं, जिनके कच्छ या वेरावल में कार्यालय हैं। बारिया जैसे नाव मालिकों को अब कुछ मौसमों में नुकसान होता है और अन्य में वार्षिक लाभ 1.5 रुपये से 2 लाख रुपये तक हो सकता है।

मछली पकड़ने वाली एक बड़ी नाव को समुद्र में ले जाने के लिए लाखों रुपये की पूंजी की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए इसे प्रति ट्रिप लगभग 3,500 लीटर डीजल की आवश्यकता होती है, जिसकी लागत लगभग 3.5 लाख रुपये है।

गुजरात मत्स्य विभाग में मत्स्य पालन के सहायक निदेशक जयेश तोरानिया ने सहमति व्यक्त की कि मछुआरों को अब लंबी अवधि के लिए समुद्र में जाना पड़ता है।

उन्होंने कहा, "मछली पकड़ने की यात्रा अब एक महीने जितनी लंबी है। डीजल मछुआरों के लिए एक प्रमुख लागत है। अभी डीजल के दाम 100 रुपये प्रति लीटर को छू चुके हैं। एक मछली पकड़ने वाली नाव को प्रति ट्रिप करीब 3,500 लीटर डीजल की जरूरत होती है यानी इसकी लागत करीब 3.5 लाख रुपये होगी। इसके अलावा इसे बर्फ के 50 से 100 ब्लॉक भी चाहिए होते हैं। इस प्रकार एक बड़ी नाव को समुद्र में जाने के लिए लाखों रुपये की पूंजी की आवश्यकता होती है और इसकी तुलना में लाभ कम हो गया है।”

तोरानिया ने कहा कि सरकार के पास मछुआरों के लिए बीमा योजनाएं हैं जो मृत्यु और चोट को कवर करती हैं, लेकिन मछली पकड़ने के नुकसान को कवर करने के लिए कुछ भी नहीं है।

तोरानिया ने समझाया, “किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) 2 लाख रुपये तक का क्रेडिट देता है, लेकिन इसमें डीजल की लागत भी शामिल नहीं होगी। मछुआरे मांग करते हैं कि केसीसी को इसके बदले 10 लाख रुपये तक का कवर प्रदान करना चाहिए। लेकिन बैंक पहली बार में मछुआरों को ऋण देने में हिचकिचाते हैं, क्योंकि पुनर्भुगतान की कोई गारंटी नहीं होती है। इसलिए इस उद्योग में अब तक कोई बहुराष्ट्रीय निगम नहीं है, क्योंकि इसमें कोई निश्चित राजस्व नहीं है।

तोरानिया केसीसी योजना का जिक्र कर रहे थे, जो मछुआरों को उनकी कार्यशील पूंजी की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करती है। नए कार्ड धारकों के मामले में 7% उधार दर पर क्रेडिट सीमा 2 लाख रुपये है।

इस जनवरी की दोपहर में, बैरिया अपनी तस्वीर क्लिक करने के लिए घाट तक जाता है, एक मार्ग के साथ जो मलबे से अटा पड़ा है। स्थानीय अधिकारियों ने हाल ही में बंदरगाह क्षेत्र में अवैध शेड, कार्यालयों, झोपड़ियों और अन्य संरचनाओं के खिलाफ विध्वंस अभियान चलाया था। इनमें से कई देश के विभिन्न हिस्सों के मजदूरों के थे, जो मछली पकड़ने का मौसम शुरू होने के बाद वापस लौट आएंगे (सर्दियों का मौसम तुलनात्मक रूप से कम होता है)।

स्थानीय अधिकारियों ने हाल ही में बंदरगाह क्षेत्र में अवैध शेड, कार्यालयों, झोपड़ियों और अन्य संरचनाओं के खिलाफ विध्वंस अभियान चलाया था। इनमें से कई देश के विभिन्न हिस्सों के मजदूरों के थे, जो मछली पकड़ने का मौसम शुरू होने के बाद वापस लौट जाएंगे।

“इंसान दरिया में जाएगा तो दो पैसा कमाएगा, खाली बैठ के क्या होगा, नुकसान ही होगा,” जोखिम के बावजूद समुद्र में जाने पर बारिया ने कहा।

इस क्षेत्र में अपनी यात्रा के दौरान हमने बार-बार संकट की ऐसी कहानियां सुनीं, जिनका एक निश्चित पैटर्न था: मछली पकड़ना कम हो रहा है, फसल की पैदावार कम है, लागत अधिक है और कमाई कम है। ये अत्यावश्यक परिस्थितियां पारंपरिक मछुआरों और किसानों को पलायन करने के लिए प्रेरित कर रही हैं। यह प्रक्रिया पहले से गंभीर हो चुकी परिस्थिति को और बढ़ा रही है।

इन कहानियों के केंद्र में एक सामान्य कारण छुपा हुआ है: जलवायु परिवर्तन, जिसके प्रभाव मात्रात्मक रूप से स्पष्ट रूप से प्रत्येक बीतते वर्ष के साथ बढ़ते जा रहे हैं।

(इंडियास्पेंड के साथ इंटर्नशिप कर रहीं रितिका चड्डा, रक्षिता नरसिम्हन और पवन थिम्मवज्जला ने भी इस रिपोर्ट में अपना सहयोग दिया है।)





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