बाढ़ के बाद खाद की कमी और कालाबाज़ारी से जूझते बिहार के किसान

बिहार के बाढ़ से प्रभावित जिलों जैसे सुपौल और सहरसा में बांध के भीतर के गाँव के किसान खरीफ सीजन में बाढ़ और बेमौसम बारिश से नुकसान झेलने के बाद अब रबी की बुआई के समय डीएपी की किल्लत से भारी मुसीबतों का सामना कर रहे हैं।

Update: 2021-12-22 09:37 GMT

सुपौल में प्राइवेट दुकानों पर खाद के लिए किसानों की भीड़। फोटो: राहुल कुमार गौरव 

सुपौल के बीरपुर प्रखंड में सरकार के विरोध में प्रदर्शन करते किसान। फोटो: अमित चौधरी"धान का सीजन बाढ़ खा गया, अब डीएपी के लिए बाप-बाप कर रहे है। सिर्फ एक दिन गांव में पैक्स वाले के पास डीएपी आया था। भोर में (सुबह) 3.00 बजे से लाइन में लग गए, बावजूद इसके डीएपी और यूरिया नहीं मिला," बिहार के सहरसा जिले के बलवा गांव के सत्तन पासवान अपनी खेती की समस्याओं के बारे में बात करते हुए कहते हैं।

प्रदेश के बाढ़ से प्रभावित जिलों जैसे सुपौल और सहरसा में बांध के भीतर के गाँवों के किसान खरीफ सीजन में बाढ़ और बेमौसम बारिश से नुकसान झेलने के बाद अब डीएपी की किल्लत से भारी मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। जब देश के अधिकांश राज्यों में रबी की फसल की बुआई का ज्यादातर वक्त निकल चुका है तब भी बिहार में किसानों को खाद की आपूर्ति की राह देखना पड़ रहा है। ऐसे में कई किसानों को अपनी फसलों की बुआई के लिए ब्लैक में महंगे दामों पर खाद खरीदनी पड़ रही है।

"कुछ लोग इधर-उधर से मंगाता तो है, लेकिन उसे महंगे दाम में बेच देता है। भागदौड़ के बाद भी हम किसानों को डीएपी और यूरिया के बगैर खाली हाथ लौटना पड़ता है," पासवान आगे कहते हैं।

बिहार में इफको की यूरिया और डीएपी का वितरण पैक्स (प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटी) करती है।

सुपौल जिले के मरौना गाँव के 66 वर्षीय किसान हरिशंकर मंडल कहते हैं, ''बीते 2 दिसंबर को मैंने दो बोरी डीएपी खाद काला बाजारियों से ₹1550 प्रति बोरी की दर से खरीदा, जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से ₹350 रुपए प्रति बोरी ज्यादा है।"

मंडल का गांव बिहार की राजधानी पटना से करीब 250 किलोमीटर दूर है जहां मंडल को अपनी करीब 60 कट्ठा (22 कट्ठा का एक एकड़) जमीन पर गेहूं की खेती के लिए औसतन तीन बोरी डीएपी की जरूरत होती है। मतलब, सिर्फ डीएपी के लिए ही उन्हें ₹1200 से ₹1300 अतिरिक्त देने पड़ते हैं।

मंडल की तरह बिहार के लाखों किसान एमआरपी से अधिक कीमत देकर यूरिया, डीएपी और पोटाश खरीद रहे हैं। सहरसा जिले की डगमारा पंचायत के अनिल मिश्र की मानें तो पूरे गांव में चार से पांच व्यापारी यूरिया का व्यापार करते हैं। लगभग दो महीनों से किसी के पास कोई खाद उपलब्ध नहीं है। अगर कोई व्यापारी डीएपी मंगवाता भी है तो वह दुकान पर रखने के बजाय उसे ब्लैक में बेच देता है। काला बाजारियों की वजह से यूरिया, डीएपी, पोटाश जैसी खादों के संकट की यह कहानी उस राज्य की है जो नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सबसे गरीब राज्यों में शामिल है।

सहरसा में प्राइवेट दुकानों पर खाद के लिए किसानों की भीड़। फोटो: राहुल कुमार गौरव

आंकड़े बताते हैं संकट और उसके पीछे की कहानी

रसायन और उर्वरक मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 1 अक्टूबर 2021 से 18 दिसंबर 2021 के बीच की अवधि में बिहार में 288.065 हजार मीट्रिक टन डीएपी खाद की जरूरत थी, लेकिन इसकी उपलब्धता महज 276.567 हजार मीट्रिक टन ही रही। यानी कि प्रदेश की डीएपी ज़रूरतों और उपलब्धता के बीच करीब 11.5 हज़ार मीट्रिक टन की कमी है।

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मांग और आपूर्ति में इस भारी अंतर वाले सरकारी आंकड़ों से इतर जमीनी हालात और भी ज्यादा खराब हैं। इसकी वजह केन्द्र सरकार भी है क्योंकि केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय से मिले एक के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 2018-19 के मुकाबले 2020-21 में 17.38 लाख मीट्रिक टन डीएपी का कम आयात किया।

इस कम आयत के बारे में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिक डॉ. शंकर झा ने इंडियास्पेंड से बातचीत में बताया, "दरअसल, भारत की कृषि जरूरतों की ज्यादातर आपूर्ति आयात पर निर्भर करती है। उर्वरक मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 50% फास्फेटिक उर्वरक का उत्पादन करता है। बाकी माल (पोटाश, फास्फोरस और नाइट्रोजन) विदेश से आता है। वहीं भारत 80% नाइट्रोजन (यूरिया) का उत्पादन करता है बाकी दूसरे देशों से आयात किया जाता है। पिछले काफी समय से अंतरराष्ट्रीय मार्केट में फास्फेटिक उर्वरकों और उनके रॉ मटेरियल की ज्यादा मांग और महंगे होने से भारत का गणित गड़बड़ाया हुआ है, लिहाजा देश के अंदर डीएपी का उत्पादन प्रभावित हुआ है।"

दूसरा, "अगर डीएपी नहीं मिल रही हैं तो जिंक और बोरोन देकर भी किसान बुवाई कर सकते हैं। उत्पादन में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन किसान इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। शायद जागरूकता की कमी है। लिहाजा सरकार को इस दिशा में भी पहल करनी होगी ताकि खादों की मांग और आपूर्ति में संतुलन बिठाया जा सके।"

घंटों कतार में खड़े रहने के बाद भी लौट जाते हैं खाली हाथ

सोचिए, जिस किसान की किसानी सिर्फ दो बोरी खाद पर टिकी हो उसे घंटों कतार में खड़े होने के बाद खाली हाथ घर लौटना पड़े तो उस पर क्या बीतेगी। और दुर्भाग्य से बिहार में कमोबेश हर जिले में हर प्रखंड में ऐसा देखने को मिल ही जाता है।

7 दिसंबर 2021 को सुपौल जिला स्थित मरौना प्रखंड क्षेत्र में कृषि समन्वयक संजीव कुमार खाद वितरण करा रहे थे। पूरे तीन घंटा तक यह खाद वितरण चला। कतार में करीब 600 किसान लगे थे, लेकिन डीएपी खाद मिला सिर्फ 250 किसानों को। बाकी 350 किसानों को बिना डीएपी के खाली हाथ घर लौटना पड़ा।

सुपौल के बीरपुर प्रखंड में सरकार के विरोध में प्रदर्शन करते किसान। फोटो: अमित चौधरी

इस हालत में अपनी हताशा का इजहार करते हुए मरौना के किसान बांके मंडल कहते हैं, "हम लोग खेत जुताई कर दिए हैं, लेकिन खाद के अभाव में खेती चौपट हो रही है। घंटों लाइन में खड़े रहे, नंबर आने का इंतजार करते रहे, लेकिन उससे पहले ही खाद का स्टॉक खत्म हो गया।"

मधेपुरा जिले के 72 वर्षीय नारद यादव का कहना है, "मोदी सरकार बिहार के कोटे का खाद उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भेज रही है, क्योंकि वहां पर चुनाव होने वाले हैं। सरकार चुनावी राज्यों में किसानों को नाराज नहीं करना चाहती है।"

दूसरी बड़ी दिक्कत जिसका जिक्र सुपौल जिला स्थित करिहो पंचायत के किसान रामशंकर मंडल कर रहे हैं, "एक आधार कार्ड पर मात्र दो बोरा ही डीएपी या यूरिया दिया जाता है। हम लोगों के पास 20 बीघा अपनी जमीन हैं। उसमें दो बोरा खाद से क्या होगा। सुबह 3.00 बजे लाइन में लगे तो दोपहर बाद 3.00 बजे दो बोरा डीएपी मिलता है। पहली बार आया तो पता भी नहीं चला। खेत में रबी की फसल बो चुके हैं और फसल के खराब होने का डर लगातार सता रहा है।"

किसानों के अलावा बाढ़ ग्रसित इलाकों में खाद के व्यापारी भी बहुत सी समस्याओं से जूझ रहे हैं। सहरसा जिला स्थित महिषी पंचायत के खुदरा व्यापारी मनोज मिश्रा कहते हैं, "हमारा गांव बांध के भीतर है। मतलब हमारे गांव तक यूरिया आने के लिए पहले गाड़ी फिर नाव के जरिए हमारे दुकान तक पहुंचता है। सरकार डीएपी का सरकारी मूल्य ₹1200 प्रति बोरी तय किया है। हमारे गांव तक पहुंचते-पहुंचते खाद की कीमत ₹1400 प्रति बोरी हो जाती है। लिहाजा हम लोग खाद मंगाना ही छोड़ दिए हैं।"

सुपौल के एक थोक खाद सप्लायर सुमन चौधरी की अपनी अलग ही पीड़ा है। वो बताते हैं, "हम थोक कारोबारियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमें रैक से उठाकर विक्रय केंद्रों तक पहुंचाने का जो भाड़ा लगता है वो वास्तविक लागत का एक चौथाई ही होता है। ऐसी स्थिति में हम फुटकर विक्रेता को कैसे सरकारी रेट पर खाद की आपूर्ति कर सकते हैं।"

जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते सरकारी बाबू

सुपौल जिला के जिला समीर कुमार डीएपी की किल्लत के बारे में बताते हुए किसानों को ही उल्टा संयम रखने की सलाह देते हुए कहते हैं, "अक्टूबर-नवंबर के लिए 8500 मीट्रिक टन खाद की डिमांड की गई थी जिसमें अब तक केवल 3500 मीट्रिक टन डीएपी ही जिला को आवंटित हुआ है। पूर्णिया में एक रैक लग रही है जिसमें 900 मीट्रिक टन डीएपी मिल रहा है। इसके बाद 700 मीट्रिक टन डीएपी और 700 मीट्रिक टन मिक्सचर मिलने वाला है। अभी खाद नियमित रूप से आ रहा है। इलाके के किसान संयम बरतें तो सभी को खाद उपलब्ध कराया जाएगा।" लेकिन नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ कृषि अधिकारी ने कहा, "ऐसा नहीं है कि खाद एकदम नहीं हैं। खाद है, लेकिन वितरण प्रणाली गलत है। इस वजह से किसानों को खादों की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।"

इंडियास्पेंड ने जब इस संबंध में सुपौल लोकसभा क्षेत्र के सांसद दिलेश्वर कामत से बात की तो उन्होंने दावा किया, "जिले में किसानों को खाद की किल्लत का मामला हमने 6 दिसंबर को शून्यकाल के दौरान उठाया। खुद मेरे संसदीय क्षेत्र सुपौल में खेती के लिए 16,000 मीट्रिक टन डीएपी की आवश्यकता है। जबकि उपलब्धता सिर्फ 3,450 मीट्रिक टन ही रही। कमोबेश पूरे बिहार राज्य की यही स्थिति है। जल्द ही सरकार इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएगी और किसानों को उनकी जरूरत के अनुसार खाद उपलब्ध कराएगी।

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