सीखने के स्तर में पांच सालों से गिरावट के बाद अब भारत के ‘कुछ’ प्राथमिक स्कूलों में दिख रहा है सुधार

Update: 2017-01-21 01:30 GMT
भारत के स्कूलों में छात्रों के सीखने के स्तर में पांच सालों से गिरावट देखी जा रही थी। लेकिन अब कक्षा 1 से 5 तक के प्राथमिक स्कूलों में कुछ बुनियादी पठन-पाठन और गणित के स्तर में सुधार देखने को मिल रहे हैं। यह जानकारी भारत के नए सर्वेक्षण आंकड़ों में सामने आए हैं। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार, कक्षा 6 से 8 यानी उच्च प्राथमिक स्कूलों में सीखने के स्तर में गिरावट हुई है। एक गैर सरकारी संगठन प्रथम द्वारा वर्ष
2016 के शिक्षा पर वार्षिक स्थिति रिपोर्ट
( एएसईआर ) के अनुसार, वर्ष 2016 में कक्षा 3 के 25 फीसदी छात्र कक्षा 2 की किताबें नहीं पढ़ सकते थे। यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि वर्ष 2014 में ऐसे छात्रों के आंकड़े 23.6 फीसदी थे। कक्षा 3 में ऐसे छात्र, जो गणित में घटाव कर सकते थे, उनका अनुपात वर्ष 2014 में 25.4 फीसदी से बढ़ कर वर्ष 2016 में 27.7 फीसदी हुआ है। सीखने के स्तर से संबंधित जानकारी के लिए एएसईआर ने 3,50,232 परिवारों से 5,62,305 बच्चों से बातचीत की। इनमें वे बच्चे भी शामिल थे, जिन्होंने स्कूल में दाखिला नहीं लिया है या फिर जो स्कूल छोड़ चुके हैं। यह सर्वेक्षण ग्रामीण क्षेत्रों में किया गया। इसमें 589 जिलों के 17,473 गांवों को शामिल किया गया था।
वर्ष 2014 की तुलना में वर्ष 2016 में अधिक छात्र गणित में घटाव करने में सक्षम थे

Source: Annual Status of Education Report, 2016

इस सुधार के बावजूद, सीखने के ये स्तर कम हैं और भारत के 25.95 करोड़ स्कूली छात्र अब भी स्कूलों में सीख नहीं रहे हैं। लगातार सीखने के कम स्तर के साथ के आधे छात्र गणित में विभाजन नहीं कर सकते हैं। सीखने के कम स्तर को आंकड़ों में देखें तो 5वीं क्लास के 49 फीसदी छात्र और 7वीं क्लास के 43 फीसदी छात्र गणित में विभाजन कर सकते हैं। भारत के लिए यह संभव नहीं कि यह देश वर्ष 2020 तक 86.9 करोड़ की अपनी काम करने लायक आबादी से पूरी तरह से जनसांख्यिकीय लाभांश लेने के लिए सक्षम हो सके। भारत में काम करने वाली आबादी किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक है।
कक्षा 7 के कुछ ही छात्र कर सकते हैं गणित में विभाजन

Source: Annual Status of Education Report, 2016

निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी प्राथमिक स्कूलों में अधिक सुधार  रिपोर्ट के अनुसार सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों में सुधार हुए हैं। हालांकि, बुनियादी पठन और गणित के संबंध में, निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलों में अधिक सुधार हुए हैं। वर्ष 2016 में सरकारी स्कूलों में कक्षा 3 के 19.3 फीसदी छात्र, कक्षा 2 की किताबें पढ़ सकते थे। वर्ष 2014 में ऐसे बच्चों के आंकड़े 17.2 फीसदी थे। इसी मामले में देखें तो निजी स्कूलों में वर्ष 2014 में जहां कक्षा 3 के 37.8 फीसदी कक्षा 2 की किताबें पढ़ सकते थे, वहीं 2016 में आंकड़ा मात्र 38 फीसदी हुआ है।
प्राथमिक स्कूलों में बुनियादी पठन स्तर में सुधार

Source: Annual Status of Education Report, 2016

एएसईआर केंद्र के निदेशक विलिमा वाधवा ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, सीखने के स्तर में सुधार या गिरावट के कारणों को बता पाना मुश्किल है। अलग-अलग राज्यों में इसके भिन्न कारण होते हैं। हालांकि इस मामले में संकेतकों में सुधार से हालत बदल सकते थे। जैसे कि अध्यापक-छात्र अनुपात और मध्यान्ह भोजन पर फोकस किया जाता तो वर्ष 2016 के नतीजे सकारात्मक ढंग से बदल सकते थे। बुनियादी सुविधाएं, छात्रों और शिक्षकों की उपस्थिति जैसे स्कूल स्तर के आंकड़ों के लिए एएसईआर सर्वेक्षकों ने हर गांव में एक स्कूल का दौरा किया। एएसईआर सर्वेक्षक ज्यादातर स्थानीय स्वयंसेवक हैं। इनमें कॉलेज के छात्र, गैर-सरकारी संगठन के सदस्य, और स्व-सहायता समूहों से महिलाएं शामिल हो सकती हैं।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम
(आरटीई) के अनुसार, प्राथमिक स्कूलों के लिए निर्धारित अध्यापक-छात्र अनुपात 30: 1 और उच्च प्राथमिक के लिए 35:1 है। एएसईआर के सर्वेक्षण में पाया गया कि वर्ष 2016 में, 53 फीसदी सरकारी प्राथमिक और उच्च प्रथमिक स्कूल आरटीआई की इन दिशा निर्देशों का पालन कर रहे हैं। जबकि वर्ष 2014 में केवल 49.3 फीसदी और वर्ष 2010 में 38.9 फीसदी स्कूल ही इन दिशा-निर्देशों का पालन कर रहे थे। वर्ष 2016 में जिस जिन एएसईआर की टीम ने स्कूलों का दौरा किया, उस दिन कम से कम 87.1 फीसदी सरकारी स्कूलों ने छात्रों को मध्यान्ह भोजन परोसा। वर्ष 2014 में ये आंकड़े 85.1 फीसदी थे।  वर्ष 2016 में एएसईआर की टीम ने जिन पब्लिक स्कूलों का दौरा किया, उनमें से 68.7 फीसदी स्कूलों में शौचालय थे और इस्तेमाल करने योग्य थे। यदि इससे पहले के वर्षों के आंकड़ों को देखा जाए तो वर्ष 2014 में 65.2 फीसदी और वर्ष 2010 में 47.2 फीसदी इस्तेमाल करने योग्य शौचालय थे। इस बीच, वर्ष 2016 में, 61.9 फीसदी ऐसे स्कूल थे, जहां लड़कियों के लिए अलग, बिना ताले के और इस्तेमाल करने योग्य शौचालयों की व्यवस्था थी। वर्ष 2014 में ऐसे शौचालयों से युक्त स्कूल 55.7 फीसदी थे। पुस्तकालयों के साथ स्कूलों के अनुपात में गिरावट पाई गई है। वर्ष 2014 में 78.1 फीसदी स्कूलों में पुस्तकालय थे, जबकि वर्ष 2016 ऐसे स्कूल 75.5 फीसदी हुए हैं। लेकिन वर्ष 2014 के मुकाबले वर्ष 2016 में पुस्तकालय से लेकर किताबें इस्तेमाल करने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2016 में, एएसईआर टीम द्वारा दौरा करने वाले 42.6 फीसदी स्कूलों में बच्चे पुस्तकाल की किताबों का उपयोग कर रहे थे, जबकि 2014 में 40.7 फीसदी स्कूलों में बच्चे पुस्तकालय की किताबों का इस्तेमाल करते देखे गए थे।  सोच-समझ कर किए गए हस्तक्षेप भी सीखने के स्तर में वृद्धि ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के छह जिलों में नवीन शिक्षण प्रणाली से हिंदी में 45 फीसदी, अंग्रेजी में 26 फीसदी और गणित में 44 फीसदी औसत वृद्धि दर्ज की गई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2016 की रिपोर्ट में
बताया
है। इस प्रक्रिया में लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि पर ध्यान नहीं दिया गया था।   सीखने की रफ्तार धीमी, अब भी एक कमरे में चलती हैं कई कक्षाएं  हालांकि, वर्ष 2014 की तुलना में वर्ष 2016 में सीखने के नतीजे में सुधार हुआ है, लेकिन कई अब तक वर्ष 2010 के स्तर तक भी नहीं पहुंच पाए हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2016 में कक्षा 3 के 27.7 फीसदी छात्र गणित का घटाव करने में सक्षम दिखे, लेकिन यह संख्या वर्ष 2010 की संख्या की तुलना में तो कम ही है। वर्ष 2010 में 36.3 फीसदी छात्र घटाव कर सकते थे। एएसईआर के वर्ष 2016 के
आंकड़ों
के अनुसार, कम से कम 63.7 फीसदी स्कूलों में कक्षा 2 के और 58 फीसदी स्कूलों में कक्षा 3 के छात्र, अन्य कक्षाओं के छात्र के साथ बैठते हैं। यह अनुपात एएसईआर द्वारा सर्वेक्षण किए गए 9644 प्राथमिक स्कूलों का है। एएसईआर-2011 की रिपोर्ट के अनुसार, जैसा कि कई कक्षाओं के बच्चे एक ही शिक्षक के साथ एक ही कमरे में बैठते हैं तो हर छात्र तक पहुंचने के लिए अधिक प्रशिक्षण और विभिन्न प्रकार के शैक्षणिक साधनों का इस्तेमाल होने चाहिए। हालांकि एक कमरे में चलने वाली कई कक्षाओं के लिए आरटीई अधिनियम कोई भी नियम निर्दिष्ट नहीं करता है। यह संभव है कि एक ही कमरे में चलने वाले कई कक्षाओं के लिए स्कूल कुछ ही शिक्षकों को प्रशिक्षित कर पाते हों। इसके अलावा भारत में शिक्षक के पदों में रिक्तियां लगातार बनी रहती हैं। लोकसभा में दिए एक
जवाब
के अनुसार, देश भर के सरकारी स्कूलों में 60 लाख शिक्षकों के पदों में से करीब 900000 प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक पद रिक्त हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 में विस्तार से बताया है। भारत में माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में नामांकन के निम्न स्तर देखने को मिलते हैं। हालांकि, प्राथमिक स्कूल जाने की उम्र के 87.3 फीसदी बच्चों ने भारत में सार्वजनिक और निजी स्कूलों में दाखिला लिया है, लेकिन वर्ष 2015-16 में माध्यमिक कक्षाओं में नामांकन 51.26 फीसदी रहा है।
अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में शिक्षा पर कम खर्च
एएसईआर सर्वेक्षण का आयोजन करने वाले गैर लाभकारी संगठन प्रथम द्वारा आयोजित पैनल चर्चा में सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा, “राजनीतिक रूप से अब भी शिक्षा को वोट जुटाने के विषय के रुप में नहीं देखा जाता है।” वर्ष 2015-16 में, अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में स्कूल और उच्च शिक्षा पर भारत में केंद्रीय सरकारी खर्च कम था। भारत के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के वर्ष 2016 के
आंकड़ों
के अनुसार, भारत में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3 फीसदी खर्च हुआ है जबकि रूस में 3.8 फीसदी, चीन में 4.2 फीसदी, ब्राजील में 5.2 फीसदी, और दक्षिण अफ्रीका में 6.9 फीसदी खर्च किया गया है। शिक्षा पर भारत करता है कम खर्च Full View

Source: Ministry of Statistics and Programme Implementation

(सालवे विश्लेषक हैं । शाह लेखक / संपादक हैं। दोनों इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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