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मैंने मुंबई में अपने 0.99 वर्ग मीटर के साथ क्या किया?

एलिसन सलदान्हा,
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एक छोटी बच्ची नहीं  रही। किशोरावस्था के उथल-पुथल भरे वर्षों के साथ, और जगह (सिर्फ व्यक्तिगत नहीं) की चाह मन में उठी और उसका अभाव होने के कारण  गुस्सा भी बहुत आया।

 

अब वापिस मुड़ कर देखती हूँ तो  मैं खुद को भाग्यशालियों में गिनती हूँ ।

 

हम भी मुंबई में जगह की कमी की सर्वव्यापक समस्या से अंधे थे ( हमे भी मुंबई में सर्वव्यापक जगह की कमी की समस्या नज़र नही आती थी )।  हमने भी बड़ी मासूमियत से (और खतरा लेते हुए )  संकीर्ण गलियों में क्रिकेट और फुटबॉल खेला, जहां स्कूटर और कार बड़ी तेज़ी से बगल से गुज़र जाते थे। फिर भी, कभी कभी गूंजती सिर्फ एक टूटी खिड़की की आवाज़ और उसके दुष्परिणामों के आलावा  हम काफी हद तक खेल के मैदान और पार्क की सुविधाओं तक ना पहुँच  पाने की व्यापक वास्तविकता से अनभिज्ञ  थे।

 

अपनी किशोरावस्था में  अपने दक्षिण मुंबई स्थित कॉलेज रोज़ आते जाते, उपनगरीय ट्रेनों / बसों में  घृणात्मक गंध और पैर रखने के लिए दो इंच की जगह के लिए नियमित रूप से झगड़ते हुए एक दिन अचानक महसूस हुआ कि , जगह यहां एक (लक्जरी) विलासिता  है।

 

उस दौरान ,  शहरी डिजाइन अनुसंधान संस्थान (UDRI) के एक अध्ययन ,मुंबई 2007 ने अनुमान लगाया की नागरिकों  की अभिगम्यता कुल  2318 हेक्टेयर तक की जगह पर है  । यह  12.4 मिलियन की आबादी के एक शहर में प्रति व्यक्ति 1.86 वर्ग मीटर खुले रिक्त स्थान का अनुपात है।

 

2012 में ग्रेटर मुंबई नगर निगम ने अपने  मुंबई में मौजूदा भूमि उपयोग सर्वेक्षण में (एमसीजीएम),  कुल 1228.6 हेक्टेयर खुली जगह के लिए प्रति व्यक्ति 0.99 वर्ग मीटर खुले रिक्त स्थान का अनुपात दिया है।  निगम ने  2014-2034 के लिए विकास योजना बनाने की तैयारी के लिए यह प्रयास किया, और इसमें खेल मैदान, मनोरंजन मैदान, स्विमिंग पूल और मछली सुखाने के लिए मैदान शामिल थे। इसमें उन स्थानो को रियायत दी गई जो एमसीजीएम की सीमा के भीतर शामिल नही हैं जैसे संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, रक्षा भूमि और मुंबई पोर्ट ट्रस्ट का क्षेत्र।

 

0.99 वर्ग मीटर

 

यह मोटे तौर पर मुंबईकर के लिए उतनी ही जगह अभिगम्य है जितनी उसे कमर में हूला हूप  डाल कर चलने पर होती।

 

केंद्र सरकार के शहरीय और क्षेत्रीय विकास योजना निर्माण और कार्यान्वयन (यूडीपीएफआई) के दिशानिर्देश 1996 अनुसार किसी भी शहरी क्षेत्र में  खुली जगह का आदर्श अनुपात  प्रति व्यक्ति  10 वर्ग मीटर होता है । दुनिया के अन्य शहरों की तुलना में, लंदन, न्यूयॉर्क, और शंघाई के लिए प्रति व्यक्ति खुले स्थान का अनुपात क्रमशः 4.84 वर्ग मीटर 7.2 4.84 वर्ग मीटर , और 9.16 4.84 वर्ग मीटर कहा जाता है।

 

और जैसे  हमारे पास शिकायतों के लिए वजह पर्याप्त नहीं हैं विश्व स्तरीय रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म,  जोंस लैंग लासेल ने  2011 की अपनी  एक रिपोर्ट में दिल्ली में  खुले स्थान का अनुपात प्रति व्यक्ति 15 वर्ग मीटर आँका है ।

 

इसके अलावा, महानगर क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण के पर्यावरण सुधार सोसायटी (EIS) ने  2012 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि  मुंबई में नागरिक मौजूदा 3246 खुली जगह में से  आधे से अधिक या 1999 जगहों का उपयोग नहीं कर सकता है।  इनमें से 835 पर अतिक्रमण किया गया है बाकि अन्य निजी संपत्तियां हैं । EIS ने आगे कहा है कि शेष 1247 अभिगम्य रिक्त स्थानों  को कई प्रतिबंधनों का सामना करना पड़ता है, जैसे समय सीमा (जनता के लिए खुलने का   दिन / माह), चयनित प्रविष्टि आदि ।

 

0.99 वर्ग मीटर का चौंका देने वाला आंकड़ा ही अकेले परेशान करने वाला है।

 

इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेन्ट्स (IIHS) ने  2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर एक अध्ययन में, कहा है कि शहर की आबादी में 2001-2011 से लगभग 15 फीसदी की वृद्धि हुई है, जबकि इसके निर्मित क्षेत्र की वृद्धि दर  35 प्रतिशत से अधिक रही है । मुंबई के प्रति आकर्षण में कोई कमी नही आने से , अचल संपत्ति और बुनियादी सुविधाओं की मांग में  तेजी से वृद्धि हुई है। जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के सभी प्रयास इससे पीछे ही रह गए हैं।

 

शहर के लिए बनी विवादास्पद खुले रिक्त स्थानों की नीति पर राज्य सरकार द्वारा लगाई गई रोक को सात  वर्ष हो चुके हैं यह शहर (रखरखाव की आड़ में इस नीति द्वारा सिर्फ नेताओं को भूमि उपहार स्वरूप प्रदान की है)। 2010 के बाद से, ताजा नीति के लिए कई ड्राफ्ट  तैयार किए गए है लेकिन अभी भी अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा है।   वास्तव में नवीनतम मसौदे आठ महीने से एमसीजीएम  में में धूल खा रहें है, विचार समिति को इन्हें देखना अभी  बाकी  है

 

क्या हम उस बिंदु तक पहुंच चुके हैं जहाँ  से लौटना मुमकिन नहीं है ?

 

मेरे भीतर का किशोर अभिगम्यता की कमी पर आज भी क्रोधित है पर इसने यह भी स्वीकार कर लिया है कि इसमें शक नहीं कि गली क्रिकेट और फुटबॉल शहरी भारतीय पड़ोस का  दिल और आत्मा हैं ।

 

आज जैसे जैसे इन वर्गों का तेजी से पुनर्विकास हो रहा है और गलियाँ पार्क (और डबल पार्क ) कारों से भरती  चली  जा रही हैं क्रोध की जगह उदासी और विषाद ने ले ली है ।

 

(एलिसन, मुंबई में आधारित, एक पत्रकार हैं । उनसे alison.saldanha@gmail.com पर सम्पर्क किया जा  सकता है )

 

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