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क्यों होती हैं महिलाएं अपनी जान लेने पर मजबूर

देवानिक साहा,
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शादी के दो साल के बाद भानू ( बाएं ) ने नींद की गोली खा कर जान देने की कोशिश की थी। कीर्ति भारती (दाएं) , मनोवैज्ञानिक, ने भानू को इस समस्या से बाहर निकलने में मदद की। भानू के दादा ने दो लाख रुपए के बदले में 55 साल के रामचंद्र से भानू की शादी कराई थी।

 

दिसंबर की ठिठुरती रात और जोधपुर का एक घर। इस सर्दी भरी रात में भी घर के लोगों के सर से पसीना निकल रहा था। घर की 17 साल की बेटी, भानू बेसुध पड़ी थी। माता-पिता आनन-फानन में उसे लेकर अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टर ने बताया कि भानू ने नींद की गोलियां खा कर अपनी जान लेने की कोशिश की है।

 

हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ( एनसीआरबी ) ब्यूरो द्वारा आत्महत्या पर जारी आंकड़ों से साफ होता है कि यह केवल राजनीतिक रुप से संवेदनशील मुद्दा, किसानों की आत्महत्या तक ही सीमित है। लेकिन भानू आत्महत्या मामला हमें याद दिलाते हैं कि गृहणियों की ओर बहुत कम ध्यान दिया जाता जबकि सच्चाई यह है कि देश में किसानों की तुलना में गृहणियों के अधिक आत्महत्या करने की संभावना है।

 

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में हुए कुल आत्महत्या ( 20,412 ) के मामलों में से 18 फीसदी गृहणियां हैं जबकि किसानों के लिए यह आंकड़े 4.3 फीसदी दर्ज किए गए हैं। हालांकि गृहणियों के आत्महत्या मामले में गिरावट ज़रुर हुई है लेकिन जारी किए गए आंकड़ो से दो बातें साफ होती है: एक छुपा हुआ तथ्य कि भारतीय शादियों में समस्या देखने को मिलती है और दूसरी संख्या के साथ समस्या है।

 

पी. साईनाथ, पत्रकार एवं मैगसेसे पुरस्कार सम्मानितऔर जिन्होंने किसान आत्महत्या पर रिपोर्टिंग की शुरुआत की, के अनुसार ” गृहिणियों ” के रूप में वर्गीकृत की गई कई महिलाएं किसान हैं। हाल ही में साईनाथ ने लिखा“आमतौर पर महिला किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं की गिनती कम की जाती है क्योंकि महिला किसानों को किसान के रुप में स्वीकार नहीं किया जाता है। कुछ ही महिला किसानों के नाम पर ज़मीन के कागज़ होते हैं। इसी का परिणाम है कि गृहणियां श्रेणी उन वर्षों में अधिक गिनी जाती हैं जहां राज्यों में शून्य किसान आत्महत्या के आंकड़े दर्ज हैं।कुछ राज्यों में गृहणियां ( जिन्हें किसानों के रुप में स्वीकार नहीं किया जाता, उनके सहित ) के आत्महत्या का मामला 70 फीसदी तक दर्ज है”।

 

यदि यह पूरी तरह सत्य है तो एक बात साफ होती है कि देश भर में हज़ारों की संख्या में गृहणियां अपनी जान ले रही हैं। इंडियास्पेंड ने इसी मुद्दे पर देश भर से कई मनोचिकित्सकों एवं गैर सरकारी संगठन से बातचीत में भी यही पाया है।

 

गृहणियों द्वारा आत्महत्या ( बाएं ) एवं कुल आत्महत्याओं का प्रतिशत 2010-14

Source: NCRB

 

कैसे छठी कक्षा में पढ़नेवाली भानू बनी दुल्हन

 

भानू की शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ मात्र 15 साल की उम्र में 55 वर्ष के रामचंद्र के साथ कर दी गई। पेश से रामचंद्र नाई का काम करता था। साथी अपनी ज़मीन पर खेती भी करता था। चूकी भानू के पिता अजमेर में एक गरीब नाई थे इसलिए उन्होंने भानू की शादी की ज़िम्मेदारी उसके दादा के हाथों में दे दी जोकि जैसलमेर में रहते थे।

 

भानू के दादा ने भानू की पढ़ाई छुड़वा उसे घर के कामकाज सिखाने का सुझाव दिया। छठी क्लास में पढ़ने वाली भानू का स्कूल जाना बंद कर घर के कामों के लगा दिया गया। भानू अब दुल्हन बनने का इंतज़ार करने लगी। भानू के दादा ने बिना उसके माता-पिता के जानकारी के दो लाख रुपए के सौदे में भानू की शादी तय कर दी।

 

रिश्ता तय होते ही भानू की ज़बरदस्ती आमने-सामने की शादी ( एक प्राचीन परंपरा ) रामचंद्र का साथ कर दी गई। एक तरफ जहां भानू का विवाह 55 साल के रामचंद्र के साथ किया गया वहीं रामचंद्र की 8 साल की भतीजी की शादी भानू के एक चाचा के साथ कराई दी गई। चूकी भानू और उसके माता-पिता के बीच की दूरी 480 किलोमीटर थी इसलिए उन्हें अपनी बेटी की शादी के बारे में बहुत देरी से पता चला।

 

भानू के माता-पिता जब आठ साल की बच्ची की शादी में शरीक होने आए तब उन्हें अपनी बेटी के बारे में पता चला। यह शादी उनके लिए भी सदमे से कम नहीं थी। उन्होंने इस शादी को रद्द करने की पूरी कोशिश की। यहां तक कि पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाना चाहा। लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी बावजूद इसके कि भानू की शादी के समय 18 वर्ष की नहीं थी और कानूनी रुप से यह शादी अवैध थी।

 

नाम न बताने की शर्त पर भानू के पिता ने बताया “हम सोच भी नहीं सकते थे कि दो लाख के बदले भानू के दादा उसकी ऐसी शादी करा देंगे। हमने बहुत मुश्किल से खुद पर संयम पाया और बाद में मदद के लिए कीर्ति के पास गए ”।

 

इस शादी को रद्द करने के लिए भानू के माता-पिता ने हर कोशिश जारी रखी। भानू के पिता कीर्ति भारती, पुनर्वास मनोवैज्ञानिक और सार्थीट्रस्ट के संस्थापक , जोधपुर में एक गैर सरकारी संगठन के पास गए। भारती ने उन्हें कोर्ट में मामला दायर करने एवं बेटी की संरक्षण उन्हें दिलाने में पूरी मदद की। जब तक मामले कोर्ट में चला, भानू का पति ने उस पर अधिकार जताते हुए उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाने की कई बार कोशिश की।

 

क्या आंकड़े गृहणियों की आत्महत्या के कारणों की व्याख्या करते हैं?

 

विशेषज्ञों का कहना है कि आत्महत्या के मामलों पर एनसीआरबी के आंकड़ों एवं दिए गए कारणों न तो स्पष्ट रुप से दिए गए हैं और न ही भरोसे के लायक हैं। आकड़े आत्महत्या को एक घटना बताने की बजाए एक जटिल परस्पर क्रिया कारकों की व्याख्या करती है।

 

इंडियन मनोरोग जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार ग्रामीण इलाकों में हुई मृत्यु पंचायत द्वारा प्रमाणित किए जाते हैं हालांकि मामले की जांच पुलिस द्वारा ही की जाती है एवं ग्रामीण इलाकों में मृत्यु पंजीकरण प्रक्रिया अक्षम है।

 

विक्रम पटेल, आत्महत्या पर व्यापक अनुभव के साथ एक मनोचिकित्सक, के अनुसार “जहां तक आत्महत्या एवं उसके कारणों का सवाल है एनसीआरबी के आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया सकता है। आत्महत्या की जटिलता को देखते हुए आत्महत्या के लिए एकल कारणों को सूचीबद्ध करना बहुत साधारण है। इसके अलावा पुलिस आत्महत्या के मामलों और जांच संभालने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। साथ ही रिपोर्टिंग बेतरतीब ढंग से की जाती है”। डॉ राजेश रस्तोगी , दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के मुख्य मनोचिकित्सक, ने भी इस बातपर सहमती जताई है। उन्होंने कहा कि “बस यह कहना कि महिला दहेज उत्पीड़न या घरेलू हिंसा से अवसाद में आने के कारण महिलाएं आत्महत्या करती हैं, बहुत सरल है”।

 

कामना चिब्बर, दिल्ली फोर्टिस अस्पताल में मनोचिकित्सक, के अनुसार “आमतौर पर किसी आत्महत्या के बाद पुलिस जांच के दौरान जो सार्वजनिक रुप से सबके सामने आता वही आत्महत्या का कारण माना जाता है। लेकिन असल में वह कारण होता ही नहीं।”

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही अपनी खास रिपोर्ट में बताया है कि किसान आत्महत्या पर जारी किए आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यही बात गृहणियों के आत्महत्या मामले पर भी लागू  होती है। आमतौर पर पीड़ित परिवार घटना की रिपोर्ट दर्ज नहीं करता।

 

लक्ष्मी विजयकुमार, मनोचिकित्सक एवं आत्महत्या निवारण एवं अनुसंधान के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की सदस्य, के अनुसार “अधिकतर मामले रिपोर्ट नहीं किए जाते। कई परिवार पुलिस के लफड़ों से बचने एवं समाज में अपना नाम न खराब होने के कारण घटना की रिपोर्ट नहीं करते हैं। ”

 

क्यों लेती हैं गृहणियां अपनी जान? पुरुष की होती है मुख्य भूमिका

 

गृहणियों द्वारा आत्महत्या के कारण की विस्तृत जानकारी एनसीआबी के आंकड़ों से नहीं मिलती है। आंकड़े केवल कुल आत्महत्याओं पर ही मौजूद हैं।

 

आत्महत्या के कारणों की व्याख्या (%)

 

Source: NCRB

 

विभिन्न मनोचिकित्सकों ‘ और मनोवैज्ञानिकों के अनुभव के आधार पर, तीन बींदु सामने आते हैं :

 

1. पारिवारिक पृष्ठभूमि, अतीत मनोरोग इतिहास , आनुवंशिक स्थितियों और तत्काल माहौल महत्वपूर्ण कारक हैं।

 

2. मामले जैसे कि वैवाहिक जीवन में असंतोष, दहेज के लिए अत्याचार, घरेलू हिंसा एवं आर्थिक कठिनाईयां तनाव को बढ़ाने का काम करते हैं। हालांकि अधिक तनाव से आत्महत्या का खतरा अधिक बढ़ जाता है लेकिन उनकी उपस्थिति मात्र आत्महत्या का कारण नहीं बन सकती।

3. भारत के पुरुष प्रधान समाज एवं महिलाओं के अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर चर्चा आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

बंगलौर में किए गए मनोवैज्ञानिक शव परीक्षा अध्ययन, घरेलू हिंसा एवं आत्महत्या पर ( पूरी एवं सफल ) अध्ययन के अनुसार एक जटिल तरीके से कई कारकों का संचयी और दोहरायी गई पारस्परिक क्रिया आत्महत्या जैसे परिणाम को अंजाम देती है।

 

पटेल के अनुसार “निजी, जैविक और बाह्य पर्यावरणीय कारकों और तनाव औरअवसाद को संभालने की क्षमता इस मामले में बड़ी भूमिका निभाते हैं।”

 

आत्महत्या पर किए गए कई अध्ययन से पाया गया है कि लगभग 80 फीसदी मामलों में पीड़ित महिलाएं अवसाद से ग्रसित होती हैं।

 

रस्तोगी इसे और सरल शब्दों में बताते हैं : दो दोस्त एक कमरे में बैठे हैं। और सांप अंदर आ जाए। एक दोस्त सांप को देख कर घबरा जाता है जबकि दूसरा जोकि ग्रामिण इलाके में काफी वक्त रहा है और कई सांप भी मारे हैं, वह नहीं घबराता और साहस के साथ सांप को भगा देता है।

 

इस उद्हारण से साफ है कि विभिन्न लोग विभिन्न तरीके से तनाव का सामना करते हैं। एक गृहणी घरेलू हिंसा एवं तनाव के खिलाफ लड़ सकती है जबकि दूसरी इसे अपनी किस्मत समझ उसे चुपचाप सहती रहेगी।

 

छिब्बड़ के मुताबिक “कोई भी महिला अपनी जान लेने का निर्णय तभी लेती है जब उसे लगता है कि अब उसके पास दूसरा कोई और रास्ता नहीं बचा है”।

 

भानू के भी शायद ऐसा ही लगा था। इंडियास्पेंड से बीतचीत के दौरान भानू ने बताया कि वह अपने 55 साल के पति के खिलाफ लगातार लड़ाई लड़ती रही है।

 

भानू ने बताया कि “रामचन्द्र मुझे जबरदस्ती अपने साथ ले जाने की धमकी देता था। लेकिन मैं उसके साथ नहीं जाना चाहती थी। कोर्ट की प्रक्रिया के दौरान भी वो मुझे धमकाता रहता था, जिससे मैं बहुत डर जाती थी। मेरी सारी उम्मीद समाप्त हो गई थी, इसलिए मैंने अपनी जान लेने की कोशिश की”।

 

पटेल के अनुसार यही सारी व्यापक आशंकाएं हैं। घरेलू हिंसा एवं आर्थिक कठिनाईयां ही किसी भी शादीशुदा महिला के आत्महत्या करने का मुख्य कारण होती हैं।

 

“A married woman plays multiple roles—procreating, satisfying the husband’s sexual and emotional needs, raising children, managing the kitchen, household expenses, children’s school performance, tending to in-laws and social obligations—mother, wife, and daughter-in-law. If women chose to retaliate, they are scared they will be turned out of their families and in-laws, lose custody of the children they bore, be institutionalised and never resume normalcy. It’s easier to slit one’s wrist or drink poison. Or hang from a ceiling fan.”Sreemoyee Piu Kundu, writer on women’s issues.

 

 

 

 

गृहणियों के पास दोस्तों और रिश्तेदारों का सहारा हो सकता है लेकिन अधिकतर मामलों में शादी के बाद उनके पास वित्तीय स्वतंत्रता नहीं रहती।

 

15 से 29 वर्ष की गृहणियों के आत्महत्या के कारण

 

यदि आंकड़ों को देखा जाए तो पिछले चार सालों में गृहणियों के आत्महत्या के 43 फीसदी मामलों में पीड़ित की उम्र 15 से 29 साल के बीच की है।

 

15 से 29 वर्ष के बीच गृहणियों के आत्महत्या के आंकड़े ( बाएं ) एवं कुल गृहणियों के आत्महत्या का प्रतिशत 2010-13

Source: NCRB

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही अपनी खास रिपोर्ट में बताया है कि कैसे बाल विवाह के खिलाफ कानून होने के बावजूद देश में हर साल 36 मिलियन बाल विवाह कराए जाते हैं।

 

छिब्बड़ के विचारों को सहमती देते हुए पटेल ने बताया कि इसी उम्र की महलाएं सबसे अधिक आत्महत्या मामलों का शिकार बनती हैं।

 

भानू की उम्र केवल 15 साल की थी जब उसका विवाह जबरदस्ती कराया गया था। इस बात का उसके दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ा था। हालांकि भानू के साथ उसके माता-पिता का समर्थन था लेकिन वह तनाव की स्थिति को झेल नहीं पाई।

 

संजय चुग , दिल्ली के एक मनोचिकित्सक के अनुसार “युवास्था एक ऐसा समय है जब हम जीवन में स्थिर होने की कोशिश में रहते हैं। कभी-कभी गैर समर्थक वातावरण के करण या अपने व्यक्तित्व की वजह से ज़िंदगी में वो हासिल नहीं कर पाते जिसकी इच्छा रखते हैं। और ऐसे में जब तनाव हद से अधिक बढ़ जाता है और उसे सहने की क्षमता नहीं रहती तब महिलाए ऐसी कदम उठाती हैं। जैसे – जैसे हम उम्र में बढ़ते हैं हम और अधिक परिपक्व हो जाते हैं और तनाव सहने की क्षमता भी बढ़ जाती है। ”

 

युवा लड़कियों पर शादी के बाद अचानक ही काम भारी बोझ और ज़िम्मेदारियां बढ़ जाती है। कई मामलों में लड़कियों इच्छाएं एवं अकांक्षाएं दबी रह जाती हैं।

 

भारती के अनुसार “अचानक आए बदलाव से वह खुद को बहुत दबाव मेंमहसूस करती हैं जिससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है एवं आत्महत्या की प्रवृति को बढ़ावा दोता है”।

 

गृहणियों की आत्महत्या के मामलों पर चर्चा क्यों नहीं?

 

देश में किसानों की आत्महत्या का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है लेकिन गृहणियों के जान देने के विषय में कोई चर्चा नहीं की जाती है।

 

कुंडु के मुताबिक “हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य के आस-पास के भय और मानसिक बीमारी से संबंधित किसी भी बातचीत पर चर्चा करना पसंद नहीं किया जाता है। यहां तक कि इनके विषय में बात करना वर्जित है”।

 

भारती के मुताबिक “ यदि हमारे शरीर का कोई हिस्सा जल जाता है तो हम उसे अन्य सभी लोगों से छुपाने की कोशिश करते हैं क्योंकि हमें यह पता होता है कि यह घाव नहीं कभी ठीक नहीं हो सकते। इसी तरह हमारे समाज ने यह मान ही लिया है कि महिलाओं को समान सम्मान एवं अधिकार देने का मामला सुलझाया नहीं जा सकता है। इसलिए इन मुद्दों पर कभी चर्चा ही नहीं किया जाता है। जब तक हमें यह विश्वास नहीं होता कि हम समस्या का समाधान निकाल सकते हैं जब तक हम कुछ नहीं कर सकते हैं”।

 

विजयकुमार के लिए प्रमुख मुद्दा राजनीतिक अप्रासंगिकता है । उनका कहना है कि “गृहिणियों की आत्महत्या का मामला नेताओं के लिए राजनीततिक रुप से महत्वपूर्ण नहीं है और यही वजह है कि इस मुद्दे  पर चर्चा नहीं करते हैं”।

 

अपराध श्रेणी से आत्महत्या को बाहर निकालने से मिलेगी मदद

 

कुपोषण एवं मातृ मृत्यु दर जैसी गंभीर समस्या के साथ भारत का संघर्ष लगातार जारी है। इसलिए अत्महत्या जैसे मुद्दे, देश के लिए के लिए महत्वपूर्ण बन ही नहीं पाए हैं।

 

2013 में संसद में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत में 87 फीसदी मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी है।

 

 मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी 

Source: Lok Sabha

 

केंद्र ने पिछले साल आत्महत्या की कोशिश को अपराध की श्रेणी से हटाने की योजना बनाई है। भारतीय दंड संहिता की स्क्रैप खंड 309 के तहत आत्महत्या करने की कोशिश करने वाले को एक साल की जेल एवं जुर्माने की सज़ा हो सकती है।

 

भारतीय कानून आयोग की 210 वी रिपोर्ट खंड 309 को हटाने का सुझाव देती है लेकिन इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

 

विजयकुमार ने इस कदम से होने वाले तीन लाभ को सूचीबद्ध किया है :

 

1. यह आत्महत्या का प्रयास करने वाले को बिना किसी चिकित्सकीय- कानूनी प्रक्रिया के तत्काल इलाज कराने की अनुमती देगा।

2. इलाज का खर्च परिवार के लिए वहन करने योग्य होगा। आमतौर पर नीजि अस्पताल कानूनी दांव-पेंच की आड़ में इलाज का खर्च बढ़ा देते हैं।

3. यह आत्महत्या के प्रयास करने वाले आंकड़ों को संकलित करने में सहायता करेगा। साथ ही पीड़ितों के लिए सेवाओं की योजना बनाने में भी सहायक होगा।

 

भारती के मुताबिक “आत्महत्या के प्रयास करने वालों पर आरोप लगाने के बजाय उन लोगों को पर मुकदमा चलाना चाहिए जिनकी वजह से आत्महत्या करने की कोशिश की गई है”।

 

भानू एक काल्पनिक नाम है। पीड़ित के अनुरोध पर उसका असली नाम प्रकाशित नहीं किया जा रहा है।

 

( साहा नई दिल्ली में स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं ।)

 

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