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2020 तक 21 शहरों में समाप्त हो सकता है भूजल

भास्कर त्रिपाठी,
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नई दिल्ली: भारत अपने इतिहास में सबसे खराब जल संकट का सामना कर रहा है। 2020 तक 21 भारतीय शहरों में भूजल समाप्त हो जाने की संभावना है। इस रिपोर्ट के बाद नीति आयोग ने जल संसाधनों के ‘तत्काल और बेहतर’ प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर डाला है।

 

ऐसे इलाकों में, जहां सालाना उपलब्ध 40 फीसदी से अधिक सतह के पानी का उपयोग किया जाता है,  लगभग 600 मिलियन भारतीय पानी को लेकर मुश्किलों से जूझ रहे हैं। सुरक्षित पानी तक अपर्याप्त पहुंच के कारण हर साल लगभग 200,000 लोगों की मौत हो जाती है। 14 जून, 2018 को जारी ‘कंपोसिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स’ (सीडब्ल्यूएमआई) रिपोर्ट के अनुसार स्थिति के और खराब होने की आशंका है, क्योंकि पानी की मांग 2050 तक आपूर्ति से अधिक हो जाएगी ।

 

अब जबकि भारतीय शहर जल आपूर्ति के लिए जूझ रहे हैं, आयोग ने ‘तत्काल कार्रवाई’ की मांग की है, क्योंकि पानी की बढ़ती कमी से भारत की खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित होगी।

 

राज्यों को अपने भूजल और कृषि जल के प्रबंधन को शुरू करने की जरूरत है, जैसा कि रिपोर्ट (सीडब्ल्यूएमआई) में कहा गया है, जो देशव्यापी जल डेटा पर भारत का पहला व्यापक संग्रह है।

 

सीडब्ल्यूएमआई सही दिशा में एक कदम है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक नीति आयोग प्रमुख देशों के राज्य जल प्रबंधन प्रथाओं की तुलना करके इसे एक कदम आगे बढ़ा सकता था। भूजल शोषण के खिलाफ मौजूदा कानूनों को लागू करने में राज्यों के प्रदर्शन पर ध्यान दिया जा सकता है।

 

जैसा कि हमने कहा, दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई और हैदराबाद समेत 21 भारतीय शहरों में 2020 तक भूजल समाप्त होने की आशंका है, जिससे 100 मिलियन लोग प्रभावित होंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक भारत की 40 फीसदी आबादी के पास पीने के पानी की कोई पहुंच नहीं होगी।

 

वर्तमान में, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु समेत कई भारतीय राज्यों में वर्षा की कमी के कारण पानी की कमी का सामना करना पड़ा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 6 जून, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

इकोनॉमिक सर्वे 2017-18 ने भारत के जल संकट को स्वीकार किया है और तेजी से भूजल की कमी, औसत वर्षा में गिरावट और सूखे मॉनसून दिनों में वृद्धि सहित ट्रिगरों को समझाया है, जैसा कि द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 21 जून, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

भारत में भूजल 2002 और 2016 के बीच प्रति वर्ष 10-25 मिमी पर कम हुआ है। औसत वर्षा में गिरावट आई है। 1970 के खरीफ ( ग्रीष्मकालीन फसल) मौसम में 1,050 मिमी से खरीफ 2015 में 1,000 मिमी से कम तक। इसी तरह, सर्दियों की फसल या रबी के मौसम में, 1 9 70 में 150 मिमी से लगभग 100 मिमी तक औसत वर्षा घट गई है। सूखे दिन – बिना वर्षा के दिन – मानसून के दौरान 2015 में ~ 40 फीसदी से 45 फीसदी तक बढ़ गया है।

 

अगर तत्काल कुछ उपायों को लागू नहीं किया जाता है, तो भारत को 2050 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 6फीसदी की कमी का सामना करना पड़ेगा, जैसा कि नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 70 फीसदी पानी दूषित हो गया है। भारत वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में से 120 वें स्थान पर है।

 

भारत में वैश्विक ताजा पानी का 4 फीसदी और आबादी का 16 फीसदी रहता है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (डब्लूआरआई) के जल-संबंधी मुद्दों पर एक विशेषज्ञ सम्राट बसक ने कहा, औद्योगिक, ऊर्जा उत्पादन और घरेलू उद्देश्यों के लिए जल गहन कृषि प्रथाओं और बढ़ती जल मांग की वजह से भारत के सीमित जल संसाधन पर दवाब बढ़ा है।

 

नीति आयोग अपने वार्षिक अभ्यास के सूचकांक में नौ व्यापक क्षेत्रों, भूजल, सिंचाई, कृषि प्रथाओं और पेयजल सहित 28 संकेतकों पर राज्यों का मूल्यांकन करता है।

 

चूंकि पानी एक राज्य विषय है, संसाधन से संबंधित निर्णय लेना राज्यों का काम है। नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने रिपोर्ट के प्रस्ताव में लिखा था,  “यह सूचकांक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पानी के कुशल और इष्टतम उपयोग की दिशा में लाने और तत्काल भावना के साथ रीसाइक्लिंग करने का प्रयास है।”

 

24 राज्यों में से 14 राज्यों का जल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा पर 50 फीसदी से कम स्कोर

 

2015-16 में, 24 राज्यों में से 14 राज्यों में किए गए पानी प्रबंधन पर विश्लेषण में  50 फीसदी राज्यों का स्कोर बहुत कम है, उन्हें  ‘लो पर्फॉर्मर’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

 

ये राज्य उत्तर-पूर्वी भारत, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के आबादी वाले कृषि क्षेत्रों पर केंद्रित हैं।

 

गुजरात ने 76 फीसदी के स्कोर के साथ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, इसके बाद मध्य प्रदेश (69 फीसदी) और आंध्र प्रदेश (68 फीसदी) का स्थान रहा है।

 

कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा को शामिल करते हुए सात राज्यों ने 50-65 फीसदी के बीच स्कोर किया और उन्हें ‘मीडियम पर्फॉर्मर’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है, “राज्यों में जल सूचकांक के स्कोर व्यापक रूप से भिन्न होते हैं, लेकिन अधिकांश राज्यों ने 50 फीसदी से कम स्कोर प्राप्त किया है और उनके जल संसाधन प्रबंधन परंपराओं में काफी सुधार किया जा सकता है।”

 

राज्य अनुसार जल प्रबंधन स्कोर

Water Management Scores, By State
State Score (In %) Performance
Gujarat 76 High
Madhya Pradesh 69 High
Andhra Pradesh 68 High
Karnataka 56 Medium
Maharashtra 55 Medium
Punjab 53 Medium
Tamil Nadu 51 Medium
Telangana 50 Medium
Chhattisgarh 49 Low
Rajasthan 48 Low
Goa 44 Low
Kerala 42 Low
Odisha 42 Low
Bihar 38 Low
Uttar Pradesh 38 Low
Haryana 38 Low
Jharkhand 35 Low
Tripura 59 Medium
Himachal Pradesh 53 Medium
Sikkim 49 Low
Assam 31 Low
Nagaland 28 Low
Uttarakhand 26 Low
Meghalaya 26 Low

Source: Composite Water Management Index, NITI Aayog

 

भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर कई जोखिम हैं, जैसा कि जल सूचकांक पर कम प्रदर्शकों के रुप में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा का भारत के कृषि उत्पादन में 20-30 फीसदी की हिस्सेदारी है और इन राज्यों में 600 मिलियन से अधिक लोगों के घर हैं।

 

रिपोर्ट में कहा गया है, “तेजी से गिरावट वाले भूजल स्तर और सीमित नीति कार्रवाई (जैसा कि कम सूचकांक स्कोर द्वारा इंगित किया गया है) को देखते हुए लगता है कि इस देश में खाद्य सुरक्षा को लेकर जोखिम ज्यादा हैं।

 

कम प्रदर्शन करने वाले राज्यों में सुधार

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि पानी की कमी से जूझ रहे कई राज्यों ने इंडेक्स में बेहतर प्रदर्शन किया है। उच्च और मध्यम प्रदर्शन वाले राज्य जैसे कि गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना-हाल के वर्षों में गंभीर सूखे से पीड़ित हैं।

 

इसके अलावा, 24 राज्यों में से 15 ने पिछले वर्ष की तुलना में 2016-17 में अपने स्कोर में सुधार किया है, जैसा कि आंकड़ों से पता चलता है।

 

औसतन, 2015-16 और 2016-17 के बीच स्कोर में 1.8 प्रतिशत अंक में सुधार हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई राज्यों की धीमी गति से चलने वाली प्रकृति (जैसे कि सिंचाई क्षमता का उपयोग और बारिश से भरे कृषि के तहत क्षेत्र) के बावजूद आठ राज्यों में 5 प्रतिशत अंक या इससे अधिक की वृद्धि हुई है।

 

सुधार वाले राज्य, 2015-16 से 2016-17

रिपोर्ट में कहा गया है, “अधिकांश लाभ सतही जल निकायों, वाटरशेड विकास गतिविधियों और ग्रामीण जल आपूर्ति प्रावधान की बहाली में सुधार के कारण मिले हैं।”

 

रिपोर्ट के मुताबिक, मेघालय, सिक्किम और त्रिपुरा शीर्ष पांच राज्यों में से हैं, जिनमें सबसे ज्यादा सुधार हुआ है, जिन्होंने 7.5 प्रतिशत से ज्यादा अंक प्राप्त किए। यह स्कोर इन राज्यों द्वारा उठाए गए जल नीतिगत कार्यों के संकेत देते हैं।

 

इसी प्रकार, राजस्थान, झारखंड और हरियाणा जैसे गैर हिमालयी राज्यों में सर्वोत्तम सुधार देखे गए। हालांकि समग्र प्रदर्शन सूचकांक में येराज्य कम प्रदर्शन करने वालों में थे।

 

टिकाऊ जल प्रणाली का एकमात्र रास्ता भूजल प्रबंधन

 

अधिकांश राज्यों ने बुनियादी ढांचे पर अच्छा प्रदर्शन किया है। ‘प्रमुख और मध्यम सिंचाई’ और ‘वाटरशेड विकास’ और ‘नीति और शासन’ विषय पर सलाह के अनुरूप नीतियों को भी लागू किया है।हालांकि, वे ‘स्रोत वृद्धि’ (भूजल), ‘टिकाऊ ऑन-फार्म वॉटर यूज प्रैक्टिस’ और ‘ग्रामीण पेयजल’ जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर पीछे थे।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि भूजल वृद्धि पर, 24 राज्यों में से 10 ने 50 फीसदी से कम स्कोर किया है, जो खराब स्थिति को उजागर करता है। भारत के 54 फीसदी कुएं में भूजल स्तर में गिरावट हुई है।

 

बसक कहते हैं, “निगरानी नेटवर्क में सुधार और भूजल स्तर और भूजल की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी जरूरी है। वर्षा जल संचयन और उसके रखरखाव के सख्त कार्यान्वयन से राज्यों को अपने भूजल को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।”

 

देश के जल भूजल संसाधनों की निगरानी और प्रबंधन के लिए एक केंद्रीय प्राधिकरण ‘सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड’ (सीजीडब्लूबी) के पास भारत में 22,33 9 भूजल अवलोकन कुओं का नेटवर्क है, जिसका मतलब है कि लगभग 147 वर्ग किलोमीटर में एक निगरानी केंद्र है।

 

इसके अलावा, 24 राज्यों में से 17 राज्यों ने प्रभावी रूप से ‘खेत के पानी’ के प्रबंधन पर 50 फीसदी से कम स्कोर किया है। यह कम प्रदर्शन देश के लिए पानी और खाद्य सुरक्षा जोखिम पैदा करता है।विशेषज्ञों का मानना ​​है कि सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को त्वरित अपना लेने से खेत के पानी के उपयोग में काफी सुधार हो सकता है। सूक्ष्म सिंचाई के तहत भारत अपने शुद्ध खेती वाले क्षेत्र ( 140 मिलियन हेक्टेयर ) का लगभग आधा हिस्सा ला सकता है।

 

बसक बताते हैं कि अब तक, केवल 7.73 मिलियन हेक्टेयर ( ड्रिप सिंचाई में 3.37 एमएच और सिंचन सिंचाई 4.36 एमएच शामिल है ) सूक्ष्म सिंचाई के तहत कवर किया गया है, लेकिन अनुमानित क्षमता 69.5 एमएचए है।

 

शोध से पता चलता है कि स्प्रिंगक्लर सिंचाई में 30-40 फीसदी कम पानी का उपयोग हो सकता है, जबकि ड्रिप सिंचाई में फ्लड सिंचाई की तुलना में लगभग 40-60 फीसदी कम पानी का उपयोग हो सकता है।

 

समग्र जल प्रबंधन सूचकांक पर विपरीत विचार

 

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि सीडब्ल्यूएमआई सही दिशा में एक कदम है, लेकिन इसे और आगे बढ़ाने की जरूरत है।

 

बसक कहते हैं, “तुलनात्मक जोखिम विश्लेषण और प्रतिभागियों (राज्यों) के बीच समान क्षमता और प्रकृति के बीच रेटिंग में जल जोखिम कम करने और पानी की सुरक्षा पर ज्यादा जोर नहीं है। यह देखने की जरूरत यह है कि राज्य चीन जैसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों के सामने कैसा प्रदर्शन कर रहा है।”

 

“ सीडब्ल्यूएमआई एक प्रशासनिक सीमा दृष्टिकोण पर आधारित है लेकिन पानी प्रशासनिक सीमा का पालन नहीं करता है। इससे अलग यह वाटरशेड / जलग्रहण /नदी बेसिन सीमा का पालन करता है ”, जैसा कि बसक कहते हैं,” इसलिए, वाटरशेड / कैचमेंट / नदी बेसिन स्तर पर जल जोखिम और जल प्रबंधन पहलुओं का मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, देखें कि डाउनस्ट्रीम राज्यों के जल प्रबंधन सूचकांक अपस्ट्रीम राज्यों के जल प्रबंधन परंपराओं और पानी के‘ट्रांसबाउंडरी मूवमेंट ऑफ वाटर’ से कैसे प्रभावित हो रहे हैं। “

 

(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 25 जून, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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