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15 वर्षों में लिंग समानता के प्रमुख निशानों पर भारत फिसला

चारु बाहरी,
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21 साल पहले जब पूनम गौर एक नई नवेली दुल्हन थी, हरियाणा के बस पदमिका में उनके ससुराल वालों ने उन्हें आगे और काम करने से मना कर दिया। आज, वह महिलाओं के उस समूह में है, जो वंचित महिलाओं की मदद करती हैं। अशिक्षत महिलाओं को सरकार की जागरूकता अभियान जैसे बेटी बचाओ- बेटी पढाओ, लिंग संवेदीकरण के उद्देश्य के पीछे के संदेश को समझाती हैं। हालांकि, भारतीय महिलाओं को अब शिक्षा के बेहतर मौके मिल रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता, जैसे कि राजनीतिक, आर्थिक और सार्वजनिक जीवन में निर्णय लेने में भाग लेना, स्वयं के शरीर पर नियंत्रण रखना और कब और किससे शादी करने के अधिकार का उपयोग करना, के लिए उन्हें एक लंबा रास्ता तय करना है।

 

माउंट आबू, राजस्थान: पूनम गौर एक 21 वर्षीय दुल्हन थीं, जब उन्होंने स्नातक और काम पूरा करने के लिए अपने ससुराल वालों से अनुमति मांगी थी। उन्होंने एक सरकारी लिपिक नौकरी के लिए आवेदन दिया था और उन्हें दिल्ली में एक साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था।

 

हरियाणा में पटौदी तहसील के बस पदामका में उनके नए परिवार ने उसकी एक नहीं सुनी। 43 वर्षीय गौर ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया, “बस पदामका में महिलाओं को हर बात के लिए पुरुषों पर निर्भर रहने की आदत है और लोग यही उम्मीद करते हैं। हमें घर के बाहर पैर रखने की अनुमति नहीं थी। मैं कुछ हद तक शिक्षित थी और आगे बढ़ना चाहती थी, लेकिन इस बात से अंजान थी कि खुद के लिए आगे कैसे बढ़ना है और बेटियों के लिए कैसे रास्ता निकालना है? “

 

गौर जैसी कहानी दो दशक पहले तक बहुत ही आम थी। लेकिन शिक्षा में लिंग समानता प्राप्त करने के लिए बड़े पैमाने पर सरकार के अभियानों ने बदलावों के परिणामस्वरूप भारत को लैंगिक समानता पर 2015 के लिए संयुक्त राष्ट्र के मिलेनियम विकास लक्ष्य के करीब ला दिया है। आज, भारत में लड़कियां, लड़कों की तरह ही माध्यमिक और महाविद्यालय जा रही हैं।

 

लेकिन 2015 में, संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्य ने अपने सशक्त विकास लक्ष्यों को अपनाया, जो महिलाओं के लिए अधिक से अधिक इक्विटी की मांग करते हैं। नए लक्ष्यों को दो मापदंडों को औपचारिक रूप दिया गया, जिसमें पहले ही कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी और एक देश के संसद में महिला सदस्यों की संख्या को ट्रैक किया जाता था।

 

लैंगिक समानता पर स्थायी विकास लक्ष्य महिलाओं से जुड़े अन्य लक्ष्यों को भी प्रदर्शित करता है, जैसे कि यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों का सार्वभौमिक उपयोग करना – जो मातृ मृत्यु दर पर आधारित है, आमतौर पर दक्षिण में महिलाओं की बेहतर स्थिति के साथ  वर्तमान में अभी भी पूरे भारत में काफी भिन्नता है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध सभी प्रकार के हिंसा को बंद करना भी है।  पिछले दशक में महिलाओं के खिलाफ हिंसा में 83 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जैसा कि दिसंबर, 2017 में इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

हालांकि, भारतीय महिलाओं को अब शिक्षा के बेहतर मौके मिल रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता, जैसे कि राजनीतिक, आर्थिक और सार्वजनिक जीवन में निर्णय लेने में भाग लेना, स्वयं के शरीर पर नियंत्रण रखना और कब और किससे शादी करने के अधिकार का उपयोग करना, के लिए उन्हें एक लंबा रास्ता तय करना है।

 

गौर की जिंदगी के सफर में एक सकारात्मक मोड़ 13 साल पहले आया, जब वह दीपालाय में सामाजिक कार्यकर्ताओं के संपर्क में आई थी। दीपालाय विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए काम करने वाला एक गैर सरकारी संगठन है। समूह ने उसे खुद पर भरोसा करना सिखाया।

 

गौर बताती हैं, “दीपालाय ने मुझे और 15 अन्य महिलाओं को स्वयं सहायता समूह बनाना सिखाया, कि किस प्रकार बचत की जाए? बैंकिंग की मूल बातें बताईं और मुझे एक छोटे सा व्यवसाय शुरू करने के लिए समर्थ बनाया। “

 

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गौर की जिंदगी के सफर में एक सकारात्मक मोड़ 13 साल पहले आया, जब वह दीपालाय में सामाजिक कार्यकर्ताओं के संपर्क में आई थी। दीपालाय विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए काम करने वाला एक गैर सरकारी संगठन है। समूह ने उसे खुद पर भरोसा करना सिखाया। गौर बताती हैं, “दीपालाय ने मुझे और 15 अन्य महिलाओं को स्वयं सहायता समूह बनाना सिखाया, कि किस प्रकार बचत की जाए? बैंकिंग की मूल बातें बताईं और मुझे एक छोटे सा व्यवसाय शुरू करने के लिए समर्थ बनाया। “

 

आज, वह महिलाओं के उस समूह में है, जो वंचित महिलाओं की मदद करती हैं। अशिक्षत महिलाओं को सरकार की जागरूकता अभियान जैसे बेटी बचाओ- बेटी पढाओ, लिंग संवेदीकरण के उद्देश्य के पीछे के संदेश को समझाती हैं।

 

कार्यबल में कम महिलाओं के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवहार बाधा

 

आर्थिक जीवन में नेतृत्व के लिए समान अवसर और आर्थिक संसाधनों के समान अधिकार – लैंगिक समानता पर स्थायी लक्ष्य के तहत ये दो बातें भारत में प्रासंगिक हैं, जहां पितृसत्ता है और सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवहार में महिलाओं को घर के अंदर रखने की परंपरा है।

 

2011 में भारत की श्रमशक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी 27.2 फीसदी थीं। दक्षिण एशिया में, यह पाकिस्तान के बाद महिला रोजगार की सबसे कम दर है। जी -20 देशों में, केवल सऊदी अरब ही इससे बद्तर है, जैसा कि  इंडियास्पेंड ने 9 अप्रैल, 2016 की रिपोर्ट में बताया है। 2015 के एक रिपोर्ट में पाया गया है कि वैश्विक स्तर पर, कृषि के बाहर 41 फीसदी महिलाएं वेतनधारी कार्यबल का गठन करती हैं।

 

यदि भारत में 2004-05 और 2011-12 (पिछले साल जिसके लिए जनगणना डेटा उपलब्ध हैं) के बीच नौकरी छोड़ने वाली महिलाओं की संख्या को गिना जाए तो यह एक ऐसे शहर के बराबर होगा, जिसकी आबादी 19.6 मिलियन होगी, जो शंघाई और बीजिंग के बाद, दुनिया में तीसरी सबसे अधिक आबादी वाला शहर होगा, जैसा कि इंडियास्पेंड ने कार्यबल में महिलाओं पर चल रही राष्ट्रव्यापी अध्ययन के बाद इसकी जानकारी दी है।

 

इस श्रृंखला में देखा गया कि आखिर भारत में महिलाएं श्रमशक्ति से बाहर क्यों हो रही हैं। इसका कारण मोटे तौर पर सामाजिक और सांस्कृतिक हैं। पारिवारिक और घर के काम की जिम्मेदारी सबसे बड़ी बाधाएं हैं। घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी काफी हद तक महिलाओं पर निर्भर करती हैं, लेकिन इस काम को न तो मान्यता प्राप्त है और न ही इसका मूल्य समझा जाता है। जब तक महिलाएं को सार्वजनिक सेवाओं, बुनियादी ढांचे, सामाजिक सुरक्षा नीतियों से समर्थन नहीं मिलता, वे बड़ी संख्या में कर्मचारियों की संख्या में शामिल होने की संभावना नहीं रखती हैं, जो लैंगिक समानता पर सतत विकास लक्ष्य के लिए जरूरी है।

 

यह समस्या उच्च शिक्षा के लिए जाने वाली लड़कियों के साथ भी है। वर्ष 2015-16 में, करीब आधी लड़कियां वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक नहीं गई, और चार युवा महिलाओं में से तीन को उच्च शिक्षा नहीं मिली है।

 

नौकरी दिलानेवाली तकनीकी पढ़ाई, कानून और व्यवसाय प्रशासन कार्यक्रमों में दाखिले में पुरुषों की तुलना में महिलाएं कम दिखती हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा किए गए नए सर्वेक्षण के अनुसार प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रम के स्नातक में, हर 100 पुरुषों पर 39 महिलाएं नामांकित हैं। स्नातक कानून पाठ्यक्रम में,  प्रति 100 पुरुषों पर 47 महिलाओं का नामांकन हुआ है।

 

राजनीतिक भागीदारी के लिए महिलाओं को सकारात्मक सहयोग की जरूरत

 

लिंग समानता पर संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास लक्ष्य के 50 फीसदी लक्ष्य और मौजूदा 23.5 फीसदी विश्व औसत के मुकाबले भारत में लोकसभा में केवल 11.8 फीसदी सीटों पर महिलाएं हैं ।

 

विश्व बनाम भारत में महिला सांसद

पड़ोस में 29.6 फीसदी सीटों पर महिला सांसद के साथ नेपाल, 20.6 फीसदी के आंकड़ों के साथ पाकिस्तान और 20.3 फीसदी के साथ बंग्लादेश की स्थिति बेहतर है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि इन देशों में भारत के 0.53 के साथ तुलना में लैंगिक असमानता सूचकांक है। (पैमाना 0 से 1 तक मापता है जहां 0 लिंग समानता का प्रतिनिधित्व करता है और 1 जीवन के हर क्षेत्र में लिंग असमानता का प्रतिनिधित्व करता है।)

 

संसद में महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भारत कैसे सुधार सकता है, इसका हल तीन देशों में छिपा है, जहां सबसे अधिक महिला सांसद हैं । रवांडा (61.3 फीसदी), बोलिविया (53.1 फीसदी) और दक्षिण अफ्रीका (41.8 फीसदी)।

 

इन सभी तीनों देशों में और विश्व स्तर पर 39 फीसदी देशों में संसद में महिला प्रतिनिधित्व का सकारात्मक संचालक रहा है। रवांडा और दक्षिण अफ्रीका में दोनों कानून हैं कि सीटों का एक निश्चित प्रतिशत 30 फीसदी और 50 फीसदी महिलाओं द्वारा आयोजित किया जाएगा। जबकि बोलीविया में ऐसा कानून है, जिसमें चुनाव में पुरुष और महिला उम्मीदवारों की समान संख्या की आवश्यकता होती है।

 

1996 में, भारत ने लोकसभा में सभी सीटों और सभी राज्य विधान सभाओं में 33 फीसदी सीटें आरक्षित करनें के लिए महिला आरक्षण विधेयक पेश किया है। 2010 में, विधेयक को राज्यसभा में पारित किया गया था, लेकिन सांसदों के मजबूत विरोध, विशेषकर पिछड़े वर्गों से, के कारण निचले सदन में मतदान नहीं हुआ, जो तर्क देते हैं कि इस तरह का बिल उच्च जातियों की महिलाओं का समर्थन करेगा, जो बेहतर शिक्षित और अधिक संसाधित हैं। हालांकि यह एक कमजोर तर्क है, क्योंकि ऊंची जातियों की महिलाओं ने भी पर्याप्त संख्या में संसद में जगह नहीं बनाई है।

 

इंडियास्पेंड ने जनवरी 2018 में रिपोर्ट दी थी कि भारतीय महिलाओं को तत्काल पांच कानूनों की जरूरत है,जिसमें तीन तलाक पर प्रतिबंध भी है और और महिला आरक्षण विधेयक भी।

 

महिला स्वास्थ्य और लिंग समानता, अभी भी प्राथमिकता नहीं

 

किसी भी महिला सशक्तिकरण लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यौन और प्रजनन स्वास्थ्य तक पहुंच को सार्वभौमिक बनाने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार करना महत्वपूर्ण है। अपर्याप्त सार्वजनिक-स्वास्थ्य संरचना और कभी-कभी सेवा प्रदाताओं की उदासीनता ( इंडियास्पेंड और वीडियो वालन्टीर द्वारा अगस्त 2015 की जांच देखें) से गर्भवती महिलाओं निजी उपचार लेने के लिए बाध्य होती हैं, जिसे अक्सर गरीब वहन नहीं कर सकते हैं।

 

चिकित्सा देखभाल अभाव मातृ मृत्यु दर को भी प्रभावित करती है, जो लिंग असमानता सूचकांक का एक प्रमुख कारण है। अच्छी गुणवत्ता वाले मुफ्त या कम लागत वाली स्वास्थ्य देखभाल से शिशुओं को जीवन में एक बेहतर मौका मिलेगा  और बाल लिंग अनुपात पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

 

लिंग समानता के लिए काम करने वाली और दिल्ली की ‘जेंडर ट्रेनिंग इन्स्टिटूट’ की पूर्व प्रमुख जुथिका बनर्जी बातचीत के क्रम में इंडियास्पेंड को बताती हैं, “ विशेष रूप से गरीबों घरों में जब बच्चे बीमार पड़ जाते हैं, तो माता-पिता लड़कियों के मुकाबले लड़कों के उपचार पर ज्यादा ध्यान देते हैं।”

 

भारतीय लड़कों की तुलना में चार वर्ष तक बच्चियों के जीवित रहने की संभावना कम होती है और यह पिछले कुछ दशकों में यह संभावना और कम हो गई है। जबकि 2000 में 0 से 4 वर्ष की आयु तक के हर 100 लड़कियों पर 56 लड़कों की मृत्यु हुई थी, जबकि 1970 के दशक में इसी आयु समूह की 100 लड़कियों पर 75 लड़कों की मौत का आंकड़ा था।

 

लिंग के अधिकारों पर सार्वजनिक प्रचार पर कम ध्यान

 

अब तक, लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण पर सतत विकास लक्ष्य पर भारत सरकार की कार्रवाई ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान पर ध्यान केंद्रित किया है। यह पहली बार ऐसे जिले में शुरू किया गया था, जहां पितृसत्तात्मक मानसिकता सबसे मजबूत है और यह कम बाल लिंग अनुपात में परिलक्षित होता है।

 

सभी उत्तरी राज्यों ने राष्ट्रीय औसत से कम शिशु लिंग अनुपात दर्ज किया है। 2011 की जनगणना में 914, 1951 के बाद से सबसे कम है। जिला स्तर पर, उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में 100 जिलों में से करीब 80 फीसदी सबसे कम बाल लिंग अनुपात वाले हैं।

 

सरकार के साथ जुड़े विशेषज्ञ और सलाहकार जुपक्का माधवी ने इंडियास्पेंड को बताया, “हालांकि, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ राष्ट्रीय स्तर पर एक जागरूकता अभियान है, जो पहले चरण में, यह 161 जिलों में लागू किया गया है जहां सबसे कम बाल लिंग अनुपात है और जहां महिला को भी सशक्त होने की आवश्यकता है। “

 

प्रारंभिक परिणाम बताते हैं कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ ने 161 जिलों में से 104 में जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार करने में मदद की है, जिससे सरकार को देश के बाकी हिस्सों में इस योजना को लेने के लिए प्रेरित किया है। लेकिन जरूरत है कि ऐसे अभियानों का और विस्तार हो।

 

अधिक महिलाएं राजनीति में या कार्यबल में आए इसके लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास करने और सकारात्मक कार्रवाई के बिना, भारत संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्य को पूरा करने के लिए संघर्ष कर सकता है।

 

(बाहरी स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं और माउंट आबू में रहती हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 3 मार्च, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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