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सूरत के कपड़ा व्यापारी क्यों नहीं चाहते जीएसटी?

फुरकान अमीन सिद्दीकी,
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सूरत (गुजरात): व्यस्त और चारों तरफ फैले सूरत टेक्सटाइल मार्केट में रंगनाथ सारदा की दुकान है। जुलाई में बरसात की एक शाम को सारदा के पास तमिलनाडु के एक वितरक ग्राहक का फोन आया। यह फोन नई जीएसटी शासन के तहत बिलिंग विवरण पर चर्चा करने के लिए था। चूंकि सारदा के पास माल और सेवा कर (जीएसटी) नंबर नहीं था, इसलिए उसके ग्राहक को यह जानना था कि उसे बिल कैसे करना है? कैसे माल परिवहन के लिए और एजेंट्स का पैसे देना है?

 

हर दिन लगभग 40 मिलियन मीटर कपड़े बनाने वाले सूरत टेक्सटाइल मार्केट के हजारों छोटे व्यापारी, बुनाई और रंगाई करने वाले इकाइयों के मालिक अपने आपूर्ति ग्राहकों से इसी बात की चर्चा करते रहते हैं।

 

जब से भारत सरकार ने ‘एक राष्ट्र- एक कर’ के लिए 1 जुलाई, 2017 को जीएसटी लागू किया है, तब से सूरत के वस्त्र व्यापारियों में नाराजगी झलक रही है। उनका कहना है कि जीएसटी ने अपने अनौपचारिक व्यापार चैनलों के लिए मौत की घंटी बजा दी है। क्योंकि अनौपचारिक व्यापारी मोटे तौर पर नकदी पर काम करते रहे हैं और उनका लाभ बहुत कम रहता है।

 

जीएसटी नंबर के लिए पंजीकरण करके व्यवसायों को औपचारिक रूप से लागू करने पर जोर देने के साथ व्यापारियों को यह डर है कि जीएसटी से व्यापार बड़े और संगठित व्यापारियों की ओर चला जाएगा और छोटे व्यापारी अक्षम हो जाएंगे। उनका यह भी मानना ​​है कि यह कागजी कार्रवाई में वृद्धि करेगा और लेखाकारों को काम पर रखने के बिना लेखांकन पुस्तकों को बनाए रखना मुश्किल होगा। यह नकद व्यवसायों के लिए एक अतिरिक्त बोझ होगा, जो पहले से ही कम लाभ मार्जिन पर काम करते रहे हैं।

 

सारदा बताते हैं कि उन्होंने बेमन से जीएसटी नंबर के लिए आवेदन किया था। गणेश चतुर्थी के आने के साथ अक्टूबर और नवंबर में दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ के साथ उत्सव का मौसम जारी रहेगा। इंडियास्पेंड से बात करते हुए सारदा कहते हैं, “ सरकार को अच्छी तरह से पता था कि इससे व्यापारियों पर बंदिश लगेगी। लेकिन हमारे पास विरोध प्रदर्शन का वक्त नहीं है।”

 

1 जुलाई, 2017 को सूरत के व्यापारियों ने हड़ताल की थी, लेकिन उन्होंने वित्त मंत्री अरुण जेटली के आश्वासन के बाद 18 दिनों के बाद इसे खत्म कर दिया था कि जीएसटी परिषद 5 अगस्त 2017 को अपनी बैठक में उनकी मांगों पर विचार करेगी। जेटली ने यह कहते हुए कि इनपुट कर क्रेडिट श्रृंखला तोड़ेगी, कर को हटाने से इनकार कर दिया था।

 
परिषद ने ‘नौकरी के काम’ के लिए कर की दर कम कर दी है( तीसरी पार्टी जैसे कि जैसे सिलाई और कढ़ाई )। यहां दर 18 फीसदी से 5 फीसदी तक किए गए हैं, लेकिन व्यापारी नाखुश थे कि उन्होंने कई अन्य चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया। चर्चा है कि वे अपनी हड़ताल को फिर से शुरू कर सकते हैं।
 

लगभग पूरे देश में-पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र- में कपड़ा उत्पादन केंद्रों में जीएसटी का उग्र विरोध सामने आया है। सूरत जीएसटी के खिलाफ लड़ाई का केंद्र बन गया है। इंडियास्पेंड ने इसका कारण जानने की कोशिश की है।

 

एक ऐतिहासिक व्यापार केंद्र

 

अहमदाबाद के 270 किमी दक्षिण में, गुजरात की वाणिज्यिक राजधानी बसा हुआ है। भारत की वित्तीय राजधानी, मुंबई से भी सूरत की करीब इतनी ही दूरी है। सूरत में व्यापार का एक समृद्ध इतिहास है और कपड़ा निर्माण की एक लंबी परंपरा है।

 
1980 के दशक में, शहर ने कपास से सिंथेटिक वस्त्रों का परिवर्तन देखा है। 2017 वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सूरत भारत में सभी तरह के मानव निर्मित कपड़े का 40 फीसदी उत्पादन करता है।
 

आज जो लोग इस व्यापार में प्रभुत्व रखते हैं, वे काठियावाड़ी समुदाय के लोग हैं, जिनकी जड़े गुजरात के समुद्र तट सौराष्ट्र क्षेत्र और जयपुर के राजस्थान में मारवाड़ के रेगिस्तानी क्षेत्र में हैं। इन लोगों की व्यापार की दक्षता मशहूर है और दोनों समुदायों ने अंबानी और बिरला जैसे नाम दिए हैं।

 

सरकार का समर्थन

 

एक सहायक नीति ढांचे ने सूरत के वस्त्र उद्योग की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

महेन्द्र रामोलिया, एक काठियावाड़ी हैं, जो सूरत के बाहरी इलाके में सचिन जीआईडीसी (गुजरात औद्योगिक विकास निगम) में बिजली करघा चलाते हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय वर्ष 2004 और वर्ष 2009 के बीच प्रस्तावित सब्सिडी और टैक्स ब्रेक को दिया, जब गुजरात के शंकरसिंह वाघेला केंद्र सरकार में कपड़ा मंत्री थे।

 

700 हेक्टेयर सचिन जीआईडीसी में 2,250 औद्योगिक इकाइयां हैं, जिनमें 1,750 कपड़ा इकाइयों, 70 डाइंग और प्रिंटिंग मिल्स और 40 डाई और केमिकल यूनिट शामिल हैं। अनुमान है कि यह करीब 350,000 लोगों को काम देता है।

 

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सूरत के सचिन जीआईडीसी में कीर्तिदा सिल्क मिल्स में साड़ियों पर प्रिटिंग प्रक्रिया

 

सूरत में ऐसे 9 जीआईडीसी सम्पदा हैं, जहां सरकार बुनियादी ढांचे और राजकोषीय सहायता प्रदान करती है, जो सूरत के व्यापारी सुरक्षा में बहुत मददगार रहे हैं।

 

रामोलीया ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया, “1990 के दशक के अंत में जब बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी के दौरान बिजली करघा उद्योग हड़ताल पर चला गया था, तो सरकार को सब्सिडी की पेशकश और प्रस्ताव देना पड़ा था।”

 

जब अप्रैल 2003 में उद्योग पर एक केंद्रीय मूल्यवर्धित कर (सेनवाट) लगाया गया था, तो कपड़ा व्यापारियों ने फिर से काम करना शुरू कर दिया था, कुछ महीनों बाद नई सरकार बनी, जिसने बिजली करघा उद्योग पर लगाए पर सेनवैट को वापस लिया।

 

अप्रैल, 2003 से जुलाई 2004 तक इस संक्षिप्त अवधि को छोड़कर, वस्त्र उद्योग को कराधान से काफी हद तक छूट मिली है।

 

जीएसटी का जन्म

 

अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्रों की तरह सूरत के कपड़ा व्यवसायी इस बात के बारे में उलझन में हैं कि जीएसटी आपूर्ति श्रृंखला पर कैसे असर डालेंगे – क्या वे लागत और कीमतों में वृद्धि करेंगे और क्या वे  प्रक्रियाओं को जटिल या आसान करेंगे?

 

अधिक खातों को बनाए रखने के बारे में लोगों की चिता ज्यादा है। सूरत में आम बात यह है कि ज्यादातर वस्त्र व्यापारी अनपढ़ हैं।

 

कई व्यापारियों ने लेखांकन पुस्तकों में उलझने के खिलाफ विरोध प्रकट करते हुए इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “ये चापरे के चक्कर फंस जाएंगे।”

 

वैसे सूरत में हर कोई व्यापार की भाषा समझता है। कोई भी बातचीत बिना टाका या प्रतिशत के उल्लेख के बिना पूरी नहीं होती है।

 

इसके विपरीत, बड़े व्यापारियों का कहना हैं कि छोटे निर्माताओं और व्यापारी केवल कर का भुगतान करने से बचने का प्रयास कर रहे हैं। एक दशक तक सचिन जीआईडीसी में कीर्तिदा सिल्क मिल्स चलाने वाले संजय सुद्राणिया ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “लोग चिंतित हैं क्योंकि इस प्रणाली पर आने के बाद कोई कर चोरी नहीं होगी।”

 

कई व्यापारियों का दावा है कि सुप्त कर की सीमा ही उनका एकमात्र लाभ मार्जिन है और सस्ते चीनी आयात से भी बड़ी लड़ाई है। एक मिल पर्यवेक्षक कामरान हुसैन ने बताया कि “हम केवल भारतीय कपड़ों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे हैं, हमें सस्ते चीनी कपड़ों के साथ भी खड़े होने की जरूरत है। अगर लागत बढ़ती है तो हम उस लड़ाई में हार जाएंगे।”

 

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सूरत के सचिन जीआईडीसी में कीर्तिदा सिल्क मिल्स में रंगे हुए कपड़ों की धुलाई

 

सुद्राणिया ने कहा कि व्यापारियों और बुनकरों के विपरीत, जिन्हें छूट दी गई थी, रंगाई और छपाई इकाइयों पर हमेशा से कर लगा है। सुद्राणिया ने बताया कि जीएसटी से लगभग 60,000 बुनाई इकाइयों, 65,000 व्यापारियों और 50,000 कढ़ाई इकाइयों पर सबसे ज्यादा असर होगा। उन्होंने कहा, “जीएसटी में बदलाव से लागत में केवल मामूली वृद्धि होगी।”

 

इससे बिजली करघा मालिक रामोलिया  असहमत थे। उन्होंने कहा कि अधिकांश व्यापारी नकदी पर काम करते हैं।इससे कीमतों में काफी वृद्धि होगी। रामोलिया कहते हैं, “मैं ज्यादातर आरआर (रोक्का, या नकद) के साथ काम करता था। सिर्फ 20 फीसदी पक्के बिल पर काम होते थे। अब, अगर हमें आयकर के अलावा सभी प्रक्रियाओं पर करों का भुगतान करना पड़ेगा, तो हमें कर के बाद ही हमारे मुनाफे की गणना करनी होगी।”

 

चीनी प्रतिस्पर्धा

 

कपड़ा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत सरकार ने 2014-15 में 2.62 बिलियन डॉलर के वस्त्र और कपड़ों के आयात किए हैं जो कि भारत की अपनी टॉप के 10 व्यापार-साथी देशों से कुल वस्त्र और परिधानों आयात का 60 फीसदी है।

 

सुद्राणिया ने कहा कि चीनी आयात पर डंपिंग ड्यूटी होना चाहिए। मई 2016 में, ‘फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन’ (एफओटीटीए) ने सस्ते चीनी आयात और मांग की कमी के कारण सूरत में 50 फीसदी मानव निर्मित कपड़ा क्षेत्र को एक महीने के लिए बंद करने की शिकायत के साथ केंद्रीय वस्त्र मंत्री को आयातित चीनी कपड़ों पर एक ‘एंटी डंपिंग ड्यूटी’ की मांग के लिए पत्र लिखा था।

 

दो महीने बाद टेक्सटाइल आयुक्त कविता गुप्ता ने इस दावे को खारिज कर दिया था कि, सूरत के बिजली करघा उद्योग आयातित चीनी कपड़ों के तहत व्यवसाय खो रही थीं।

 

‘मित्सुबिशी केमिकल कॉर्पोरेशन’ और ‘रिलायंस इंडस्ट्रीज’ द्वारा एक अलग याचिका ने शुद्ध टेरेफाथिक एसिड (पीटीए) के डंपिंग के आरोपों पर एक सरकारी जांच के लिए प्रेरित किया था,अप्रैल 2014 में, आम चुनाव से पहले, चीन, यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड से पीटीए आयात पर ‘एंटी डंपिंग शुल्क’ लगाया गया था।

 

जुलाई 2016 में, ‘एंटी डंपिंग ड्यूटी ऑर्डर’ में संशोधन किया गया और चीन, ईरान, ताइवान, इंडोनेशिया और मलेशिया पर शुल्क लगाया गया।

 

इसने कुछ ऐसे आरोपों को जन्म दिया कि ‘एंटी डंपिंग ड्यूटी’ को केवल ‘सबसे बड़े और एकीकृत पॉलिएस्टर खिलाड़ी – रिलायंस इंडस्ट्रीज’ के लाभ के लिए डिज़ाइन किया गया था और यह प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाएगा।

 

वर्ष 2013-14 में, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने घरेलू पीटीए उत्पादन में 60-65 फीसदी का योगदान दिया था, जिसमें 4.4 एमएमटीपीए (प्रति वर्ष दस लाख मीट्रिक टन) की क्षमता थी। सामग्री के रसायन और प्रदर्शन उद्योग (पूर्व में मित्सुबिशी केमिकल निगम) और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन पीटीए का उत्पादन करते हैं। रिलायंस के प्रवक्ता ने इंडियास्पेंड के सवालों का जवाब नहीं दिया है। ड्यूटी 2015 और 2016 में बढ़ा दिया गया था, जो अभी भी मौजूद है।

 

छोटे व्यवसायों पर दवाब

 

नाम न बताने की शर्त पर एक बिजली करघा इकाई के मालिक ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “मैं मोदी को प्यार करता था, लेकिन देखो उसने उन लोगों के साथ क्या किया है जिन्होंने उनकी सहायता की थी। किसी ने भी हमारे जितना मोदी को समर्थन नहीं किया है।”

 
बिजली करघा मालिक, रामोलिया मानते हैं कि उनकी उपेक्षा हुई हैं। वह कहते हैं, “ये विज्ञापन वाली सरकार है।”
 

नाम न बताने वाले एक व्यापारी ने बताया कि जीएसटी के खिलाफ विरोध करने के बजाय, कपड़ा व्यापारियों को ‘रिलायंस यार्न’ की खरीद रोकनी चाहिए था। उन्होंने बताया कि “उन्होंने (रिलायंस) हमारे लिए पूरे मुद्दे को वर्गीकृत कर लिया होगा।”

 

छोटे व्यापारियों का डर है कि जीएसटी बड़े व्यापारियों को और बड़ा बनाएगा। रिलायंस जैसी बड़ी मछलियों में अधिक संयुक्त इकाइयां स्थापित होंगी जो यार्न और साड़ी दोनों का उत्पादन करती हैं, क्योंकि ऐसी इकाइयों को साड़ी बनाने के हर चरण में शामिल हर गतिविधि के लिए कर का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। (सूची देखें)

 

 

दांव पर अनौपचारिक नौकरियां

 

सूरत के वस्त्र उद्योग – इसकी पावरलूम की इकाइयां, रंगाई और छपाई मिलों और व्यापारियों – ने औपचारिक और अनौपचारिक नौकरियों में 10 लाख श्रमिकों को सीधे या परोक्ष रूप से रोजगार दिया है। इनमें से कई श्रमिकों को 18-दिवसीय हड़ताल के दौरान शहर छोड़ना पड़ा।

 

एक व्यापारी रंगे कपड़े खरीदता है, और इसे शहर भर में फैले हुए सैकड़ों कढ़ाई इकाइयों को भेजता है। साड़ी इकट्ठा करने वाले बिचौलियों उन सैकड़ों महिला कामगारों के बीच वितरित करते हैं, जो अपने घरों से अंशकालिक काम करते हैं।

 

वस्त्र बाजार में एक नए व्यापारी, अनिल जैन ने बताया, “प्रत्येक चरण के पूरा होने पर साड़ी हमारे पास वापस आती है। इन सबके आगे-पीछे सरकार न केवल हमें सेवा के लिए भुगतान करना चाहती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करती है कि हर कोई अपनी रिटर्न फाइल करे। क्या सरकार को ये उम्मीद है कि ये सभी श्रमिक ऑनलाइन रिटर्न दाखिल करेंगे?”

 

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एक कपड़ा मिल में साड़ियों के बंडल से साड़ी काटते हुए कामगार। इसके बाद साड़ियों पर कई चरणों में काम होगा और फिर पैकिंग होगी।

 

सरकार ने वास्तव में, जीएसटी नंबर या फाइल रिटर्न प्राप्त करने के लिए 20 लाख रुपये से कम के वार्षिक कारोबार के साथ व्यवसायों को छूट दी है। टेक्सटाइल वेबसाइट के मंत्रालय के एक दस्तावेज ने वस्त्र उद्योग की चिंताओं को स्पष्ट किया, विशेष रूप से इनपुट क्रेडिट और 180 दिनों के भीतर भुगतान का आश्वासन के लिए। लेकिन व्यापारियों का दावा है कि इसमें भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

 

मुंबई के ‘नासिकवाला लॉ ऑफिस’ के संस्थापक हुसीफा नासिकवाला कहते हैं, “अगर मेरे पास जीएसटी पंजीकरण है, तो मैं उस व्यक्ति से नहीं खरीदूंगा जिसके पास जीएसटी नहीं है। इन इनपुट क्रेडिट्स को मुझे लेना है, इसलिए मैं जीएसटी नंबर (श्रृंखला के नीचे) के लिए आग्रह करता हूं। “नासिकवाले के मुताबिक, सूरत और आसपास के वस्त्र उद्योग में केवल नकदी चलती थी। काम की पूरी श्रृंखला के दौरान टैक्स नहीं दिया जा रहा था, “अब, यदि आप कर व्यवस्था लागू करते हैं तो पूरी श्रृंखला परेशान हो जाती है। यह वह मुख्य मुद्दा है, जिसका सामना वे कर रहे हैं। कुछ छोटे व्यापारी मिट जाएंगे। “

 

5 अगस्त 2017 को, जीएसटी परिषद की बैठक में ( जहां नौकरी के काम पर कर समान रूप से 5 फीसदी रखा गया था ) इन मुद्दों पर बात नहीं हुई, जैसा कि कपड़ा संघ ‘एफओएसटीटीए’ ने बताया। व्यापारी जीएसटी को अनमस्वाकार करते दिख रहे हैं।

 

रामोलिया कहते हैं, “बोलेंगे तो करना होगा, 50 फीसदी कारोबार ख़त्म हो जाएगा। (अगर सरकार हमें मजबूर करती है, तो हम इसे करेंगे।लेकिन यह 50 फीसदी व्यवसाय को मार डालेगा)। “

 

(‘इंडियास्पेंड- आईसीएफजे’ फेलो सिद्दीकी को पत्रकारिता का छह वर्षों से ज्यादा का अनुभव है। वह मीडिया, विस्थापन, पर्यावरण, राजनीति और संस्कृति के मुद्दों पर लिखते रहे हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 21 अगस्त 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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