Home » Cover Story » शौचालय सब्सिडी में कमी का असर स्वच्छ भारत मिशन पर

शौचालय सब्सिडी में कमी का असर स्वच्छ भारत मिशन पर

तिश संघेरा,
Views
1443

New Delhi: NAMMA public toilet - sensor-based solar toilets, suggested by former president late APJ Abdul Kalam during the inauguration of the modern 'Swachh Sauchalay' at Sikka Market, shopping complex, in Delhi on April 6, 2016. (Photo: IANS)
 

मुंबई: सब्सिडी में 65 फीसदी की कमी का असर महाराष्ट्र में चल रहे स्वच्छ भारत मिशन पर पड़ रहा है। यह जानकारी गुजरात के सीईपीटी विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में सामने आई है। स्वच्छ भारत मिशन राष्ट्रव्यापी स्वच्छता अभियान है। इस मिशन के तहत प्रत्येक शहरी परिवार में शौचालय सुनिश्चित करना है।

 

अध्ययन के मुताबिक महाराष्ट्र में पानी और एक सेप्टिक टैंक के साथ बुनियादी शौचालय बनाने की लागत करीब 35,000 रुपये होती है। शहरी क्षेत्रों के लिए स्वच्छ भारत कार्यक्रम (एसबीपीयूए) शहरों में साफ-सफाई और स्वच्छता प्रथाओं में सुधार करने पर केंद्रित है। इस कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार प्रति परिवार 4,000 रुपये की आंशिक सब्सिडी प्रदान करती है। यह महाराष्ट्र में 8,000 रुपये की राज्य सब्सिडी द्वारा पूरक है।  

 

इस तरह, परिवारों को मिलने वाला कुल सब्सिडी 12,000 रुपया है। जो निर्माण लागत का केवल 35 फीसदी है। शौचालय का निर्माण कराने वाले परिवार द्वारा शेष 65 फीसदी या 23,000 रुपये का आयोजन किया जाना चाहिए। अध्ययन में कहा गया है कि व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों की संख्या बढ़ाने के लिए, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि क्रेडिट विकल्प के माध्यम से अतिरिक्त वित्त उपलब्ध हो।

 

माइक्रोफाइनेंस संस्थान (एमएफआई) ने परंपरागत रूप से स्वच्छता क्रेडिट में रास्ता बनाया है, विशेष रुप से ग्रामीण इलाकों में, लेकिन वाणिज्यिक और सहकारी क्षेत्र के बैंकों, क्रेडिट सोसायटी और आवास वित्त संस्थानों (एचएफआई) को इसे व्यवहार्य उधार देने वाली धाराओं के रूप में भी पहचानने की जरूरत है, जैसा कि अध्ययन में कहा गया है।

 
 
क्यों हर घर को अपने शौचालय की जरूरत है? 
 

2015-16 में, भारत में 10.5 फीसदी शहरी परिवार खुले में शौच के लिए जाते रहे। 14.9 फीसदी ने ऐसे शौचालयों का इस्तेमाल किया, जहां के अपशिष्ट मनुष्यों के संपर्क में आते हैं। 6.1 फीसदी ने साझा सुविधाओं का उपयोग किया है, जैसा कि 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण आंकड़ों से पता चलता है।

 

एसएमबीयूए के उद्देश्य का हिस्सा अलग-अलग शौचालयों के साथ घरों के कवरेज में वृद्धि करना और यह सुनिश्चित करना है कि अपशिष्ट सुरक्षित रूप से और सही ढंग से प्रबंधित हो। साझा सुविधाएं वैश्विक स्तर पर 761 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है और खुले शौचालय में सुधार, व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों के लिए स्वीकार्य विकल्प नहीं है।

 

स्वच्छता के स्तर में सुधार और व्यक्तिगत घरेलू शौचालय सुनिश्चित करना… कोलेरा, दस्त, डाइसेंटरी और हेपेटाइटिस-ए जैसी संक्रामक बीमारियों के फैलाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए दस्त मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

वाई और सिन्नर में शौचालयों की ज्यादा मांग
 

सीईपीटी ने महाराष्ट्र के दो शहरों में एक सर्वेक्षण आयोजित किया। पहला शहर सिन्नर, जो  नासिक के उत्तरी जिले से लगभग 30 किमी दूर है और दूसरा शहर है वाई, जो पुणे से 85 किमी दूर है। सर्वेक्षण से पता चला है कि वाई में 30 फीसदी घर और सिन्नर में 35 फीसदी घरों में अपने शौचालय नहीं हैं। लेकिन यदि वित्तीय और जगह की बाधाएं दूर हो जाए तो 80 फीसदी से ज्यादा घर शौचालय बनाने को लेकर इच्छुक थे।

 

 सिन्नर में, 65,000 लोगों की कुल आबादी का 7 फीसदी झुग्गियों (4,500) में रहता है और उन लोगों की शौचालयों तक पहुंच नहीं है। वाई में, 339500 की कुल जनसंख्या के 97 फीसदी लोगों के पास अपने घर हैं, लेकिन उनमें से कई सरकार द्वारा निर्मित और स्थानीय गैर सरकारी संगठन द्वारा संचालित समुदाय शौचालय साझा करते हैं। इन निवासियों के लिए, व्यक्तिगत शौचालय स्वामित्व का मतलब संक्रमण और बीमारियों के जोखिम में कमी, बुजुर्गों और बच्चों के लिए अधिक सुविधा और कई अन्य सामाजिक लाभ का मिलना होगा।

 

वहां के एक आदमी ने बताया, “हमारे घर में हर कोई खुले में शौचालय जाता है।हमारे रिश्तेदार इस वजह से हमारे पास नहीं आते हैं। हमें लगता है कि शौचालय बनाना बहुत जरूरी है और इसे बनाने के लिए हम ऋण लेने को तैयार हैं। “

 

शौचालयों के मांग और इसके बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रयास के बावजूद, सिन्नर में संभावित आवेदकों में केवल 50 फीसदी और वाई में 12 फीसदी ने वास्तव में एसएमबीयूए योजना के लिए आवेदन किया है। इस अंतर का मुख्य कारण लागत है।

 
स्वच्छता क्रेडिट की जरूरत
 

जो लोग इस योजना के तहत शौचालयों का निर्माण करते हैं, वे परियोजना की शुरुआत में सब्सिडी का 50 फीसदी और पूरा होने पर शेष प्राप्त करते हैं। इसका मतलब है कि न केवल वित्त पोषण अंतर को भरने करने के लिए स्वच्छता क्रेडिट की आवश्यकता है, बल्कि निर्माण लागतों का समर्थन भी किया जाता है।

 

वाई और सिन्नर में स्थानीय नगर पालिकाएं अतिरिक्त 5,000 रुपये प्रदान करती हैं ( कुल सब्सिडी 17,000 रुपये तक लाती है ) लेकिन इस अतिरिक्त राशि के साथ, कुल लागत का केवल 48 फीसदी ही कवर होता है। शौचालय का निर्माण एक ‘आकांक्षा’ परियोजना के रूप में माना जाता है। एक बार घरों ने शौचालय बनाने का फैसला किया, तो आम तौर पर अभ्यास को सार्थक बनाने के लिए वे स्नान सुविधाएं और उन्नत फिक्स्चर जोड़ते थे। आमतौर पर इसका कुल लागत 45,000 रुपये तक लाया गया है, जिसके लिए ऋण जरुरी है।

 

एक उत्तरदाता ने कहा,  “हमें समुदाय के शौचालयों तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ी (और) रात में इनका उपयोग करना संभव नहीं है। हमने अपना घर छोड़ा है और शौचालय के साथ वाले एक घर किराये पर ले लिया है, क्योंकि हम एक बार में 40,000-45,000 रुपये खर्च नहीं कर सकते हैं। हम इसके बजाय 3,000 रुपये का किराया देते हैं।”

 

वाई और सिन्नर में वाणिज्यिक और सहकारी बैंकों और क्रेडिट सहकारी समितियों को स्वच्छता परियोजनाओं के लिए ऋण प्रदान करने का कोई अनुभव नहीं है। लेकिन सहकारी समितियों को वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में स्वच्छता वित्त विकल्पों का पता लगाने के लिए अधिक इच्छुक पाया गया था, चार से पांच साल के भुगतान मॉडल के साथ 50,000 रुपये तक  गैर जमानती राशि उधार दे रही थी, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है।

 

आवास वित्त कंपनियों ने प्रतिस्पर्धी दरों पर दोनों शहरों में गृह सुधार ऋण की पेशकश की, लेकिन विस्तृत दस्तावेज, बीमा और प्रसंस्करण शुल्क की उनकी मांग ने सामाजिक-आर्थिक समूह को डरा दिया। साथ ही, इस समूह के अधिकांश लोग बैंक को ऋण के लिए आवश्यक दस्तावेज प्रदान करने की स्थिति में नहीं हैं।

 

इसके अतिरिक्त, एमएफआई, जो इस क्षेत्र को उधार देने में सबसे अधिक अनुभव रखते हैं, के पास दोनों शहरों में सीमित उपस्थिति थी (एक के अपवाद के साथ, सिन्नार में ग्रामीण कुट्टा)। स्व-सहायता समूहों (एसएचजी – समुदाय आधारित बचत और उधार समूहों ने, जिसमें 10-20 स्थानीय महिलाएं शामिल थीं और विभिन्न सरकारी योजनाओं के संयोजन के साथ गठित)- वाई और सिन्नर दोनों में पुनर्भुगतान विलंब के कारण बैंकों की तरफ से उन्हें उधार देने में अनिच्छुक पाया ।

 

स्वच्छता से वित्त तक पहुंच में लाया जा सकता है सुधार

 

इस अध्ययन में उधारकर्ताओं के बीच क्रेडिट विकल्पों और उधार देने वाले में उधारकर्ता प्रोफाइल और जरूरतों के संबंध में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। अध्ययन के अनुसार  यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक था कि बैंकों ने ऋण के उपयोग की निगरानी की है।   अध्ययन में कहा गया है कि शौचालय निर्माण क्रेडिट के लिए वित्तीय संस्थानों से संपर्क करने के लिए एसएचजी को सशक्त बनाना एक व्यावहारिक रणनीति हो सकता है। बैंकों के साथ अपने स्थापित लिंक पर निर्माण और शहरी परिषदों और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों से समर्थन का लाभ उठाना, इस दृष्टिकोण को अन्य शहरों और राज्यों में दोहराया जा सकता है।

 

वाई में, दो एसएचजी के तीन महिला सदस्यों ने शौचालय सब्सिडी योजना के लिए सफलतापूर्वक आवेदन किया और अपनी पहली किस्त (प्रत्येक 6,000 रुपये) प्राप्त की। फिर एसएचजी ने अपने शहरी सहकारी बैंक को अपने ऋण आवेदनों का समर्थन किया और प्रत्येक सदस्य ने एक दूसरे के गारंटर के रूप में कार्य करके एक वर्ष के लिए 11 फीसदी की दर से 20,000 रुपये उधार लिया।

 

अन्य प्रकार के वित्तीय संस्थान, अक्सर स्वच्छता ऋण में कम अनुभव के साथ, यह तैयार नहीं हो सकते है। वाणिज्यिक बैंक, एचएफआई और एमएफआई अक्सर शाखा स्तर पर एजेंसी की कमी से बाधित होते हैं। किसी भी नए ऋण उत्पाद को मंजूरी देकर या मौजूदा उत्पादों के साथ आवेदन करने के लिए वरिष्ठ स्तर पर अनुमोदन और जुड़ाव की आवश्यकता होगी।

 

अध्ययनकर्ताओं ने सुझाव दिया कि स्वच्छता क्रेडिट के लिए संसाधनों को एकत्रित करने वाले उधारकर्ता, हालांकि, बढ़ते ग्राहक आधार से लाभ उठा सकते हैं। बैंक प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (पीएसएल) श्रेणी के तहत स्वच्छता ऋण भी शामिल कर सकते हैं। इससे बैंकों को कृषि, माइक्रो क्रेडिट, शिक्षा, सामाजिक आवास आदि में विकास को बढ़ावा देने वाले क्षेत्रों में कुल ऋण राशि का 40 फीसदी उधार देने पर भारतीय रिजर्व बैंक की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलती है।

 

पीएसएल दिशा निर्देशों में हालिया परिवर्तन “घरेलू शौचालय के निर्माण / नवीकरण सहित” स्वच्छता सुविधाओं के लिए उधार देने की अनुमति देते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि स्वच्छता वार्षिक क्रेडिट योजनाओं (1 अप्रैल को सालाना शुरू होने वाले राज्य राजकोषीय नियोजन वक्तव्य) के हिस्से के रूप में शामिल किया गया हो। ये योजनाएं भाग लेने वाले बैंकों के लिए स्वच्छता से संबंधित लक्ष्यों को निर्दिष्ट कर सकती हैं। वित्त पोषण तक पहुंच एक मुद्दा है। जब भी उधारकर्ता स्वच्छता क्रेडिट बढ़ाने के लिए आगे आते हैं, खासतौर पर क्योंकि ऐसे ऋणों को ‘गैर-आय उत्पन्न करने वाली गतिविधि’ के रूप में देखा जाता है – मौजूदा आरबीआई नियमों के तहत एमएफआई के लिए एक विशेष समस्या है। वर्तमान में एमएफआई द्वारा वितरित कुल एकत्रित ऋण का 50 फीसदी आय उत्पन्न करने वाले उद्यम पर उपयोग किया जाना चाहिए।

 
( संघेरा लेखक और शोधकर्ता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 1 अक्टूबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
“क्या आपको यह लेख पसंद आया ?” Indiaspend.com एक गैर लाभकारी संस्था है, और हम अपने इस जनहित पत्रकारिता प्रयासों की सफलता के लिए आप जैसे पाठकों पर निर्भर करते हैं। कृपया अपना अनुदान दें :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*