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मुंबई के फुटपाथ पर कैंसर के मरीजों की यही कथा – खराब माली हालत, कम शिक्षित, और हताशा

स्वागता यदवार और ओजस्वी राव,
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मुंबई के परेल इलाके में टाटा मेमोरियल अस्पताल के पास मोनोरेल स्टेशन के भीतर डिवाइडर पर अपनी पत्नी के साथ बैठा कैंसर का एक मरीज। कई कैंसर रोगी होटल या धर्मशाला का खर्च जुटा पाने में समर्थ नहीं होते। जब तक उनका इलाज पूरा नहीं हो जाता तब तक वे अस्पताल के आस-पास, फुटपाथ पर रह लेते हैं।

 

मुंबई: भारत के मुख्य कैंसर अस्पताल के बाहर सड़क पर रहने वाले कैंसर के रोगियों ने औसतन, एक साल तक काम नहीं करते; आय के रुप में उनका नुकसान सलाना लगभग 55,000 रुपए का होता है। 92 फीसदी रोगियों की शिक्षा सातवीं कक्षा से कम है। चार में से एक रोगी पर कर्ज का बोझ है और अपने शहरह से मुंबई में अस्पताल से सटे फुटपाथ पर आने से पहले, औसतन 76,000 रुपए खर्च किए हैं, जैसा कि इन मरीजों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला है।

 

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हालांकि, भारत में कैंसर के मामले विश्व औसत का 50 फीसदी है और पश्चिमी दुनिया की तुलना में लगभग एक तिहाई। लेकिन यहां इस रोग के मामले में उच्च मृत्यु दर और बेहिसाब खर्चों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि यहां पर्याप्त ओनोकोलोजिस्ट और कैंसर  देखभाल की सुविधा नहीं है।

 

कैंसर के निदान से घर बिखर सकता है क्योंकि रोग का इलाज करना सबसे महंगा है। ‘आपातकालीन अस्पताल में भर्ती खर्च’ ( एक परिवार के स्वास्थ्य व्यय के लिए एक आर्थिक शब्द जब  परिवार की भुगतान करने की क्षमता 40 फीसदी से ज्यादा हो जाती है ) का कारण संचारी रोगों की तुलना में कैंसर में करीब 170 फीसदी ज्यादा है।

 

एक वैश्विक चिकित्सा पत्रिका ‘लैंसेट ओनोकोलोजी’ के वर्ष 2014 के अध्ययन के अनुसार, एक भारतीय सरकार की सुविधा में एक विशिष्ट कैंसर रोगी अकेले चिकित्सा उपचार के लिए 36,812 रुपये ( 593 डॉलर) खर्च करता है। यह खर्च प्रति व्यक्ति औसत भारतीय वार्षिक आय का 75,672 रुपए ( 1,219 डॉलर) का लगभग आधा है।

 

चूंकि भारत में एक संगठित और अच्छे तरह से नियंत्रित कैंसर-देखभाल प्रणाली नहीं है, स्वास्थ्य देखभाल की लागत, कैंसर की वजह से देखभाल और विकलांगता का प्रभाव गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों पर ज्यादा पड़ता है,यह स्थिति भारत की सामाजिक सुरक्षा की कमी से भी बदतर हुई है।

 

भारत में कैंसर-देखभाल संकट पर हमारी रिपोर्ट श्रृंखला के पहले भाग में, हमने बताया कि कैसे कॉलेज का छात्र और सेना में भर्ती होने की अकांक्षा रखने वाले अरविंद कुमार के परिवार ने पांच शहरो के छह डॉक्टरों तक पहुंचने के लिए 2,200 किलोमीटर की यात्रा की और  अरविंद कुमार के मुख कैंसर के चिकित्सा उपचार में 100,000 रुपए से अधिक खर्च किए और अंत में मध्य मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के बाहर के फुटपाथ पर उसकी यात्रा समाप्त हुई।

 

आज दूसरे भाग में, हम उस फुटपाथ पर रहने वाले सभी 51 मरीजों का सर्वेक्षण करेंगे और तीसरे भाग में, हम यह पता लगा सकते हैं कि टाटा मेमोरियल किस प्रकार कैंसर मरीजों की भारी संख्या का सामना करता है। और कैसे कैंसर के सबसे गरीब मरीजो के लिए सरकार के कार्यक्रम काम करते हैं।

 

इलाज के लिए मुंबई की यात्रा

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हमने 51 मरीजों , जिनमें 37 पुरुष हैं, 14 महिलाएं हैं और साथ में उनके परिवारों की अनिश्चित, कठिन और आर्थिक रूप से खर्चीले यात्रा का जिक्र किया है,  जो टाटा मेमोरियल अस्पताल के होमी भाभा विंग के पीछे जरबाई वाडिया रोड के साथ लगे फुटपाथ पर रह रहे हैं। हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि किस प्रकार ( जैसे कैंसर फैलता है ) भारतीय सार्वजनिक-स्वास्थ्य प्रणाली देश के सबसे कमजोर रोगियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार नहीं है।

 

हमने दोनों समूहों के बीच जीवन की गुणवत्ता की तुलना करने के लिए हमने मुंबई में तीन धर्मशालाओं  में इलाज करा रहे 30 मरीजों से भी बात की है। धर्मशालाएं अधिक स्वच्छ थीं और 50 फीसदी कैंसर के मरीजों को धर्मशालाओं में भोजन मिलता है।  इन विश्राम घरों में रहने वाले लोगों के लिए साप्ताहिक भोजन व्यय फुटपाथ पर रहने वाले मरीजों की तुलना में औसतन आधे से भी कम (लगभग 630 रुपए) था।

 

नि:शुल्क या रियायती खर्च पर देखभाल सभी रोगियों के लिए असंभव!

 

केंद्र सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा चलाए जा रहे 76 वर्ष पुराना टाटा मेमोरियल अस्पताल अपने 60 फीसदी रोगियों को सब्सिडी वाले उपचार प्रदान करता है। ज्यादातर परामर्श, नैदानिक ​​और बिस्तर प्रभार गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए मुफ्त है और अन्य के लिए उच्च सब्सिडी पर उपलब्ध है।

 

फिर भी, यह अधिकांश रोगियों के लिए बहुत महंगा है। खासकर कीमोथेरपी और सर्जरी की सलाह की फीस। औसतन, यहां केमोथेरेपी पर चिकित्सक देखभाल 77,913 रुपए और केमोथेरेपी और सर्जरी के लिए 164,000 रुपए, सर्जरी करने वालों के लिए 55,135 रुपए और परीक्षण, निदान और अन्य के लिए 8,445 रुपए का भुगतान किया जाता है।

 

हमने पाया गया कि फुटपाथ पर रहने वाले ज्यादातर रोग महाराष्ट्र के बाहर के थे। ज्यादातर पिछले तीन महीनों से मुंबई में रह रहे थे । अधिकतर मजदूर अपनी बचत समाप्त कर चुके थे और औसतन उन्होंने इलाज के लिए किसी न किसी से 75,000 रुपए उधार लिया था।

 

कैंसर के कारण रोगियों को भी औसतन 55,000 रुपए का नुकसान भी हुआ है, क्योंकि उनका काम बंद हो गया। हालांकि वे फुटपाथ पर रह रहे थे, लेकिन उन्होंने भोजन और अन्य खर्चों पर हर हफ्ते 1,500 रुपए खर्च किए थे।

 

बुजुर्गों से ज्यादा युवा रोगी, ज्यादातर कम शिक्षित या लगभग निरक्षर

 

 

40 वर्षीय सविता चौधरी चल नहीं सकती हैं। हड्डी के कैंसर से उनका घुटना खराब हो गया है। इसलिए, वह जेराबाई वाडिया सड़क के फुटपाथ पर एक पतली चटाई पर बैठती हैं। वह राज्य द्वारा चलाए जा रहे सर जे जे अस्पताल से टाटा मेमोरियल अस्पताल भेजे जाने के बाद पिछले आठ महीने से फुटपाथ पर रह रही हैं। चौधरी ने उत्तरी महाराष्ट्र में जलगांव के अपने गांव रावेर से मुंबई तक की 280 किमी की यात्रा की है। चौधरी कक्षा सातवीं तक पढ़ी हैं और अपने पति के साथ दिहाड़ी मजदूरी करती हैं। चौधरी के साथ उनका पति और 13 साल का बेटा भी वहीं फुटपाथ पर रहता है। मुबंई आने के बाद से उनके बेटे की पढ़ाई रुक गई है, इससे दोनों परेशान हैं। चौधरी ने पहले ही इलाज के लिए 185,000 रुपए खर्च किए हैं, और डॉक्टरों ने उन्हें सर्जरी की सलाह दी है।

 

हमारे सर्वेक्षण में पाया गया कि अधिकांश मरीज 40 साल की औसत उम्र के साथ, अपेक्षाकृत युवा थे। तीन 18 साल से कम उम्र के थे और एक 60 साल से ज्यादा थे। इनमें से 34 फीसदी कभी स्कूल नहीं गए थे, जबकि 22 फीसदी की शिक्षा सातवीं या उससे कम थी, और 8 फीसदी से ज्यादा लोगों ने दसवीं की शिक्षा पूरी नहीं की थी।

 

‘जर्नल लैंसट’ द्वारा वर्ष 2012 में प्रकाशित, भारत में एक बड़े पैमाने पर कैंसर मृत्यु दर के अध्ययन से पता चलता है कि कैंसर से होने वाली मौतों में से 70 फीसदी 30 से 69 की आयु के बीच के हैं। अध्ययन के मुताबिक, प्रति 100,000 पर आयु-मानकीकृत कैंसर मृत्यु दर सबसे शिक्षित वयस्कों के मुकाबले कम शिक्षित वयस्कों में दो गुना अधिक थी।

 

सड़क पर रहने वाले दस मरीजों में से चार बिहार से थे। 92 फीसदी ने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में आने से पहले उपचार लिया था।

 

Bankrupt, Poorly Educated, Desperate: Cancer Patients On Mumbai Footpath

 

36 वर्षीय मोहम्मद इकराम का गर्दन बचपन में जल गया था। बड़े होने पर उनका घाव संक्रमित हो गया। और, अपने घर बिहार के बेगूसराय और पटना में सर्जरी के बावजूद, घाव कैंसरग्रस्त हो गया। बिहार के पूर्वी जिले खगड़िया के अपने गृह नगर मोरार के पास 10 निजी अस्पतालों में 200,000 रुपए खर्च करने के बावजूद उनका दर्द कम नहीं हुआ था। इकराम दिहाड़ी मजदूरी करते थे और पिछले दो वर्षों से उनका काम छूट गया है। जब हम मई 2017 में उनसे पहली बार मिले, तब वे अपनी पत्नी और अपने छह बच्चों के साथ- पिछले 10 दिनों से टाटा मेमोरियल अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर रह रहे थे। उन्हें अस्पताल में हुए टेस्ट का इंतजार था। उन्होंने कहा कि वह लगातार दर्द में हैं।

 

जेराबाई वाडिया सड़क के फुटपाथ पर कोई भी रोगी मुंबई से नहीं थे। कैंसर के इलाज के लिए 96 फीसदी अपने घर से मुंबई आए थे। सबसे ज्यादा रोगी बिहार (41 फीसदी) से थे, इसके बाद उत्तर प्रदेश (18 फीसदी), महाराष्ट्र (16 फीसदी) और बंगाल (12 फीसदी) से थे।

 

सर्वेक्षण में शामिल लगभग आधे उत्तरदाताओं (48 फीसदी) का कहना है कि उनका अपने शहरों में इलाज न कराने का कारण “कोई उचित कैंसर उपचार उपलब्ध न होना है।” जबकि 65 फीसदी का कहना था कि कि वे मुंबई डॉक्टर या रिश्तेदारों की सलाह पर आए हैं। हमने 51 रोगियों से बात की। इनमें से  92 फीसदी ने टाटा मेमोरियल अस्पताल में आने से पहले चिकित्सा देखभाल लेने की बात की : निजी सुविधा से 60 फीसदी और सरकारी अस्पताल से 50 फीसदी (कई ने दोनों को चुना) ने चिकित्सा देखभाल की बात बताई।

 

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मुंबई में आने से पहले उन्होंने औसतन 76,000 रुपए खर्च किए थे, जिनमें से 25 फीसदी ने 100,000 रुपए या इससे ज्यादा खर्च किया है। टाटा मेमोरियल अस्पताल में आने से पहले कई डॉक्टरों के पास जाने का कारण ग्रामीण इलाकों में एलोपैथिक चिकित्सकों की अनुपस्थिति थी।  2008 के एक अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण भारतीयों के 92 फीसदी रोगियों ने कहा कि वे पहले निजी डॉक्टरों के पास गए थे जिनमें से 79 फीसदी एलोपैथिक चिकित्सक नहीं थे।

 

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अधिकांश मरीज निजी स्वास्थ्य सेवा चाहते हैं, भले ही सरकारी अस्पतालों में उपचार मुफ्त या सस्ता हो। वर्ष 2014 के लैनसेट अध्ययन के अनुसार 80 फीसदी आउट-पेशेंट और 40 फीसदी कैंसर के इन-पेंशेंट रोगी देखभाल निजी क्षेत्र द्वारा किया गया था।

 

मुंबई में तीन महीने, 80 फीसदी लोगों की शहर यात्रा पहली बार

 

डेढ़ महीने पहले कैंसर की पहचान होने के बाद से 46 वर्षीय बलिराम शिंदे  बेहद मानसिक दबाव में आ गए हैं। उनकी पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया, और उसने शिंदे के छोटे भाई के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कर ली है, जो अब फुटपाथ पर उनके साथ रहते हैं। उनके भाई ही उन्हें इलाज के लिए मुंबई ले कर आए थे। शिंदे  एक कृषि मजदूर हैं।

 

उन्होंने हमें बताया कि वह अपने भाई के साथ लड़ रहे हैं क्योंकि जिस कैंसर का इलाज “बहुत महंगा” है। शिंदे के दो बच्चे हैं और दोनों ही उनसे संबंध तोड़ना चाहता थे। जब इंडियास्पेंड ने शिंदे से मुलाकात की, तो उन्होंने अपना उपचार परीक्षण पूरा कर लिया था और एक डॉक्टर से सलाह लेने के लिए इंतजार कर रहा थे।

 

जेराबाई वाडिया सड़क के फुटपाथ पर रहने वाले 51 कैंसर रोगियों में से 80 फीसदी ने कहा कि उनकी  शहर की यह पहली यात्रा थी और यहां कैंसर की देखभाल के लिए औसतन तीन महीने से रह रहे हैं। लगभग सभी रोगियों के साथ कम से कम एक रिश्तेदार था।

 

लगभग एक तिहाई (29 फीसदी) में पेट संबंधी कैंसर था, 23 फीसदी मुंह के कैंसर से ग्रसित थे और 6 फीसदी मरीजों को  हड्डी का कैंसर था।

 

कैंसर के प्रकार

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ऋण,  सेविंग फाइनेंस कैंसर केयर और उपचार से जुड़ी सरकारी योजनाओं के बारे में कुछ रोगी जानते हैं!

 

19 वर्षीय छात्र अजय यादव को गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर है। उनका परिवार पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में गृहनगर के पास एक निजी अस्पताल में गया था। उन्होंने वहां के अस्पताल में 200,000 रुपए खर्च किए। परिवार ने स्थानीय सावकारियों से 40,000 रुपए का उधार लिया है। उनके पिता, नेत्रपाल यादव ने कहा कि वह अपने बेटे के इलाज के लिए अधिक पैसा जुटाने के लिए अपनी आठ बीघा ( करीब दो एकड़) जमीन बेच देंगे।

 

सर्वेक्षण किए गए चार में से एक ( यानी 39 फीसदी) रोगी ने कैंसर की देखभाल के लिए उधार लिया था। 55 फीसदी ने रिश्तेदारों, 30 फीसदी ने उधारदाताओं और 15 फीसदी ने दोनों से पैसे लिए थे। उनमें से किसी ने बैंक से ऋण नहीं लिया था। दूसरों ने कहा कि वे इलाज के लिए बचत का उपयोग कर रहे थे, लेकिन ज्यादातर लोगों के बचाए पैसे खत्म हो रहे थे। औसतन, ऋण 75,000 रुपए था, और यह 10,000 रुपए से लेकर 300,000 रुपए तक रहा था।

 

इन रोगियों ने जो औसत ऋण लिया था वह 2015-16 में 82,269 रुपए प्रति व्यक्ति आय का 91 फीसदी था।

 

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गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य सहायता प्रदान करने वाली सरकारी योजनाएं हैं – ग्रामीण क्षेत्रों में 27 रुपए और शहरों में 32 रुपए। इन कार्यक्रमों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य निधि शामिल है, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री कैंसर फंड, राज्य बीमारी सहायता फंड और स्वास्थ्य मंत्री के विवेकाधीन अनुदान शामिल हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को प्रति वर्ष 30,000 रुपये का बीमा प्रदान करती है।अधिकांश राज्यों के भी अपने स्वयं के स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम हैं।

 

हमने जिने रोगियों से बात की, उनमें से अधिकांश को इन कार्यक्रमों के संबंध में जानकारी नहीं थी। 92 फीसदी मरीज चिकित्सा उपचार या रहने की लागत के लिए किसी भी सरकारी योजना का उपयोग नहीं कर रहे थे।

 

वर्ष 2014 में लैंसेट अध्ययन के अनुसार, “ कुछ क्षेत्रों में ​​सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा कवरेज कम है। उन क्षेत्रों में जहां लगभग 71.7 फीसदी हेल्थकेयर मामले में खर्च अपनी जेब से जाता है, कई क्षेत्रों में तो ये आंकड़ा 90 फीसदी तक है।भारत में ये लागत एशिया में सबसे ज्यादा है। ”

 

जेराबाई वाडिया फुटपाथ पर रहने वाले रोगियों और उनके परिजनों ने औसतन भोजन और रोजमर्रा के कामों पर प्रति सप्ताह 1,500 रुपये खर्च किए हैं। 92 फीसदी को सड़क के किनारे भोजन मिला या फिर रेस्तरां से। 39 फीसदी को एनजीओ से भोजन प्राप्त हुआ। कम से कम 82 फीसदी मरीजों और उनके परिजनों को टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल से पानी मिला है।

 

10 में से एक दिहाड़ी मजदूर हैं, कैंसर की पहचान के बाद 44 फीसदी हुए बेरोजगार

 

सर्वेक्षण किए गए कैंसर के मरीजों में से आधे से ज्यादा कैंसर का इलाज होने से पहले काम करते थे। 82 फीसदी दिहाड़ी मजदूर थे, जो  प्रति माह 5,000 रुपए तक कमाते थे। ज्यादातर मरीजों ने कैंसर की वजह से एक वर्ष से काम नहीं किया था।  मरीजों से साथ आने वाले सहयगियों की बात की जाए तो उनमें से 41 फीसदी मुंबई में आने से पहले काम करते थे।

 

जैसा कि हमने बताया था, प्रत्येक रोगी कैंसर के कारण अपनी जगह छोड़ कर दूसरी जगह आ जाने के कारण 55,000 रुपए का नुकसान झेल रहे हैं।

 

अन्य अध्ययनों से पता चला है कि कैंसर से प्रभावित परिवारों के रोगी पर 36-44 फीसदी वार्षिक व्यय होता है। इन अध्ययनों से यह भी पता चला है कि कैंसर से पीड़ित परिवारों ने सामान्य घरों की तुलना में लगभग 50 फीसदी अधिक उधार लिया और 16 फीसदी ज्यादा अपनी संपत्ति बेच दी है।

 

आमदनी का नुकसान

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इंडियास्पेंड कैंसर सर्वेक्षण को स्वतंत्र शोधकर्ता पुतुल गुप्ता और संतोष हरिश के सहयोग से आकार दिया गया और विश्लेषण किया गया है।

 

(तीन रिपोर्टों की श्रृंखला का यह दूसरा भाग है। पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।)

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। राव इंडियास्पेंड के साथ इंटर्न रह चुकी हैं)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 05 सितंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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