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मुंबई की सड़कों पर कैंसर संकट का चेहरा

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मुंबई के परेल इलाके में, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के पास मोनोरेल स्टेशन से सटे एक डिवाइडर पर आराम करता एक कैंसर का मरीज। कई कैंसर रोगी होटल या धर्मशाला का खर्च उठाने में समर्थ नहीं होते और इलाज पूरा होने तक वे अस्पताल के आस-पास फुटपाथ पर रहते हैं।

 

मुंबई: पिछले चार महीनों से 24 साल के अरविंद कुमार को एक ही बात सता रही है कि उन्हें ओरल कैंसर कैसे हुआ? इन चार महीनों में अरविंद की जिंदगी बिहार के एक कॉलेज छात्र से मुंबई के फुटपाथ पर रहने वाले एक कैंसर रोगी में बदल गई है।

 

कुमार ने कभी भी धूम्रपान नहीं किया, गुटखा, पान या तंबाकू का सेवन नहीं किया जो 10 में चार भारतीयों में होने वाले कैंसर का स्रोत है। कुमार के दाएं आखों की कोशिकाएं बढ़ जाने के कारण बद्तर हो गई हैं। उन्हें बात करने में भी परेशानी होती है। इसलिए उनके जीजा ने हमसे बात की। उन्होंने हमें बताया कि कैसे पश्चिम बिहार के बेतिया जिले के रहने वाले बैचलर ऑफ आर्ट्स के छात्र पांच महीनों में पांच शहरों में डाक्टरों से जांच कराने के बाद यहां तक पहुंचे हैं। बेहतर इलाज के लिए कुमार घर से 1,866 किमी दूर रह रहे हैं।

 

एक पतली, प्लास्टिक की चटाई पर बैठे, कुमार का चेकअप एक सप्ताह में दो बार होता है और तीन हफ्ते में एक बार केमोथेरेपी और रेडियेशन दिया जाता है। कुमार उन 50 मरीजों में से हैं जो मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल के होमी भाभा विंग के सामने और पीछे जेराबाई वाडिया सड़क के फुटपाथ पर रह रहे हैं।

 

पलती से चटाई पर उनके साथ होते हैं उनके परिवार के सदस्य। उनकी चिकित्सा फाइलें और दवाएं एक दीवार पर लटके प्लास्टिक की थैलियों में रखी रहती हैं। आमतौर से कपड़ों से भरा बैग उनके पास होता है, एक तिरपाल की छत और एक स्टोव होती है।

 

मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की उम्र 76 वर्ष है। इसका अभिभावक परमाणु ऊर्जा विभाग है। इस अस्पताल का परिदृश्य भारत के कैंसर-संबंधी संकट से हमें रूबरू कराता है।

 

हालांकि, भारत में कैंसर की दर अभी भी पश्चिम की तुलना में कम है, लेकिन ये तेजी से फैल रहा है। कैंसर देखभाल गुणवत्ता की कमी के कारण कुमार जैसे लोग इतनी लंबी यात्रा करने पर विवश हैं, और अक्सर यह यात्रा जेराबाई वाडिया सड़क के फुटपाथ पर आकर थम जाती है।

 

कैंसर के संकट को हम किस तरह देखते हैं और इसके प्रति हम कितना गंभीर हैं और उपचार के क्या हाल-चाल हैं, इसपर इंडियास्पेंड की ओर से तीन रिपोर्ट की श्रृंखला टाटा मेमोरियल अस्पताल पर केंद्रित है।

 

पहले भाग में हम कुमार की मुबंई यात्रा और उनके परिवार द्वारा सामाना किए जाने वाली परेशानियों पर चर्चा करेंगे। दूसरे भाग में, हम जेरेबाई वाडिया सड़क के फुटपाथ पर रहने वाले कैंसर रोगियों के सर्वेक्षण के माध्यम से कैंसर की आर्थिक और सामाजिक लागत की गणना की कोशिश करेंगे। तीसरे भाग में, हम अपने सबसे गरीब मरीजों के लिए कैंसर की देखभाल के लिए सरकार के कार्यक्रमों की जांच करेंगे।

 

कैंसर अब किसी भी उम्र में हो सकता है क्योंकि कई कारणों से कोशिकाएं नियंत्रण से बाहर निकल जाती हैं। जीन में दोष, दूषित हवा और दूषित खान-पान, या तम्बाकू या अधिक शराब का उपभोग  भी कैंसर के प्रमुख कारण हैं। कैंसर के कारण बदल रहे हैं और लक्षण भी बदल रहे हैं। ऐसे में भारत में फैलते इस बीमारी शिकंजे को हम मापने में असमर्थ है।

 

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वर्ष 2016 में भारत में कैंसर के 1.45 मिलियन नए मामले और 736,000 मौतों की संख्या दर्ज हुई है। वर्ष 2020 तक 880,000 मौतों की आशंका और वर्ष 2030 तक बढ़कर इस डरावने परिदृश्य का आंकड़ा 1.73 मिलियन हो जाने की आशंका है।

 

भारत में कैंसर-देखभाल संकट

 

हर साल भारत में कैंसर के लाखों नए मरीजों की पहचान की जाती है और करीब हर साल 680,000 लोगों की मृत्यु इस रोग के कारण होती है। कभी यह पश्चिमी दुनिया का रोग माना जाता था। भारत के कैंसर का बोझ अब अगले 18 वर्षों में 70 फीसदी बढ़ने की आशंका है, 2012 में लगभग 10 लाख नए मामलों से 2035 तक 1.7 मिलियन तक, जैसा कि कैंसर के डेटा पर एक अंतर्राष्ट्रीय पहल, ‘ग्लोबोकैन’ के आंकड़ों से पता चलता है।

 

‘नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम ऑफ द इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ के आंकड़ों के अनुसार, यह अनुमान से कम आंके गए हो सकते हैं, क्योंकि वर्ष 2016 में भारत में कैंसर के 1.45 लाख नए मामले और 736,000 मौतें हुई थीं और  वर्ष 2020 तक 880,000 मौतें और वर्ष 2030 तक इसमें 1.73 मिलियन बढ़ जाने की आशंका है।

 

भारतीय पुरुषों में सबसे आम कैंसर मौखिक और अन्नप्रणाली, पेट और फेफड़े के हैं, जबकि महिलाओं में मौखिक और गर्भाशय, ग्रीवा, स्तन और अन्नप्रणाली कैंसर आम हैं।

 

हालांकि, भारत में कैंसर के मामले दुनिया के औसत से आधे हैं। भारत में यह आंकड़ा प्रति 100,000 पर 92 का है, जबकि दुनिया का औसत प्रति 100,000 पर 182 का है। इस संबंध में भारत के लिए आंकड़े विकसित देशों में होने वाले मामलों का एक-तिहाई (प्रति 100,000 पर 268 ) है। लेकिन यहां कैंसर की देखभाल सुविधा बहुत कम है।

 

भारत में 250 से अधिक समर्पित कैंसर-देखभाल केंद्र नहीं हैं। ( भारत में प्रति मिलियन आबादी पर 0.2 जबकि अमरीका में प्रति मिलियन आबादी पर 4.4 का आंकड़ा है ) सभी समर्पित कैंसर-देखभाल केंद्रों में से 40 फीसदी आठ महानगरीय शहरों में मौजूद हैं और 15 फीसदी से कम सरकार द्वारा संचालित हैं, जैसा कि एक संस्था, ‘अर्न्स्ट एंड यंग’ द्वारा वर्ष 2015 के एक अध्ययन – ‘कॉल फॉर एक्शन: एक्सपैंडिंग कैंसर केयर इन इंडिया’ में बताया गया है।

 

यही कारण है कि भारत में कैंसर के 80 फीसदी मामले एक उन्नत स्तर पर चिकित्सा जांच के दायरे में आते हैं और भारत में 68 फीसदी कैंसर रोगी की मृत्यु होने के पीछे एक प्रमुख कारण है। जबकि अमरीका में कैंसर के कारण होने वाली मृत्यु के लिए आंकड़े 33 फीसदी हैं। भारत में प्रति मिलियन जनसंख्या पर 0.98 ऑकोलोजिस्ट हैं, जबकि चीन के लिए यह आंकड़े 15.39, फिलीपींस के लिए 25.63 और ईरान के लिए 1.14 हैं।  यही वजह है कि अपने देश में कैंसर के रोगियों को इलाज के लिए देश भर के केवल 27 सरकारी कैंसर रेफरल सेंटर और 250 कैंसर केंद्रों तक पहुंचना पड़ता है।इससे टाटा मेमोरियल अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर मरीजों की वैचेनी को और भारत की उच्च मृत्यु दर और कैंसर पर व्यय और मृत्यु के पीछे कारण को समझा जा सकता है।

 

टाटा मेमोरियल अस्पताल के निदेशक अनिल डी क्रूज़ कहते हैं, “ मरीजों के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल आने के पीछे दो कारण हैं – सबसे पहले (76 वर्षीय) ब्रांड वैल्यू और जनता के बीच बना इसका विश्वास और दूसरा कारण है भारत सरकार द्वारा मिलने वाली उदार वित्तीय सहायता। हमारे पास एक अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर संरचना है। ऐसी ही सेवा के लिए, निजी सेवा केंद्रों में रोगियों को 10 गुना अधिक भुगतान करना पड़ता है। ”

 

भारत में कैंसर पर सरकार का खर्च

 

भारत में कैंसर पर सार्वजनिक व्यय प्रति व्यक्ति अमरीकी 100 डॉलर से कम है, जबकि उच्च आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति अमरीकी 100 डॉलर से उच्च है।

 

इसके अलावा, भारत में कई कैंसर केंद्रों में प्रदान की जाने वाली देखभाल अक्सर उपलब्ध सुविधाओं से तय होती है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो कई केंद्रों में रेडियोथेरेपी तक पहुंच नहीं होती है। औसतन, प्रति रेडियोथेरेपी मशीन पर 2-5 मिलियन लोग होते हैं। यह उच्च आय वाले देशों में प्रति मशीन पर 250,000 लोगों की तुलना में दस गुना अधिक है।

 

कैंसर और मृत्यु के नए मामले – भारत और विश्व, 2012

Source: Cancer Atlas, 2012

 

भारत में कैंसर पश्चिमी देशों से भिन्न है, क्योंकि भारत में कैंसर के मामले तम्बाकू उपयोग (40 फीसदी), संक्रमण (20 फीसदी),और अन्य कारणों से जुड़े हैं। ग्लोबल मेडिकल जर्नल ‘लैन्सेट ऑन्कोलॉजी’ के वर्ष 2014 के एक पत्र में कहा गया है, “सामाजिक कारक, विशेष रूप से असमानताएं, भारत के कैंसर-बोझ के प्रमुख कारण हैं।”

 

कुमार की कहानी भारत के कैंसर-देखभाल संकट के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है ।

 

दांतों के दर्द ने पांच शहरों के छह डॉक्टरों से जांच और 5,500 किलोमीटर की यात्रा कराईy

 

जब हम पहली बार मई, 2017 में कुमार से मिले थे तो वह भारत के छोटे शहरों से बड़े शहरों तक आने वाले हजार लोगों की तरह कुमार एक ढीली, सफेद शर्ट और ढीले काले पैंट में तैयार थे। रुमाल से उन्होंने अपनी एक आंख को ढका हुआ था। आंख कैंसर के कारण खराब हो गया था। उन्होंने हमें रुमाल हटा कर आंखों को दिखाया कि कैसे ट्यूमर से उनका सर से लेकर आंख सूजा हुआ है।

 

यह पांच महीने पहले मार्च 2017 में कुमार के दांतों में दर्द के साथ शुरु हुआ था। दर्द बढ़ने के साथ सूजन बढ़ने लगा और 45 दिनों के भीतर यह दाएं आंखों तक फैल गया।

 

कुमार के साथ यह तब हुआ जब कुमार अपने आहार के प्रति सचेत  थे, हर सुबह जॉगिंग कर रहे थे और भारतीय सेना में नौकरी पाने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए लगातार कसरत भी कर रहे थे।

 

उनका परिवार उन्हें 200 किलोमीटर की दूरी पर पटना सरकारी अस्पताल ले गया। वहां डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि सर्जरी की जरूरत है। इसकी लागत 250,000 रुपये होगी। फिर परिवार 260 किमी उत्तर की ओर यात्रा कर गोरखपुर पहुंचा, जहां बायोप्सी के बाद कैंसर होने का पता चला। उन्होंने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, वाराणसी, बिहार के मोतिहारी में जांच के दौरान 1000 किलोमीटर की यात्रा की जिसमें 100,000 रुपए खर्च हुए।

 

कुमार की स्थिति में नहीं हुआ सुधार।

 

फिर, कुमार के गांव में किसी ने उन्हें इलाज के लिए मुंबई जाने के लिए कहा। तीन लोगों का परिवार- अरविंद कुमार, उनके जीजा चंद सिंह महतो (30) और उनकी मां निर्मला देवी, अप्रैल 2017 में मुंबई आए।

 

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टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के पास मोनोरेल स्टेशन के भीतर एक डिवाइडर पर आराम करता एक कैंसर का मरीज। कई कैंसर रोगी होटल या धर्मशाला का खर्च उठाने में समर्थ नहीं होते। इलाज होने तक वे अस्पताल के आस-पास फुटपाथ पर रहते हैं।

 

कैंसर के इलाज में  बचत समाप्त, रिश्तेदारों से लिए 50,000 रुपए का कर्ज

 

कुमार का सेना में भर्ती होने का सपना कुछ चिंताओं के कारण टूट रहा है है ? क्या वह ठीक हो जाएगा? क्या वह फिर से सामान्य दिखेंगे? डॉक्टर कब उसे घर जाने देंगे? क्या वह अपने परिवार को उस ऋण से उबरने में मदद कर पाएंगे, जो उन्होंने इलाज के लिए लिया है।

 

सारी बचन समाप्त होने के बाद कुमार के परिवार ने अपने रिश्तेदारों से 50,000 रुपए का उधार लिया है।

 

मुंबई में, कुमार और उनके परिवार ने देखा कि होटल और गेस्ट हाउस में प्रतिदिन रहने का खर्चा 600 से लेकर 2,000 रुपए होगा। फिर उन्होंने आसपास के फुटपाथ पर कई मरीजों को रहते देखा। कुमार के परिवार ने भी वहीं रहने का फैसला किया।

 

जब इंडियास्पेंड ने उनसे मुलाकात की, तो परिवार ने मुंबई में दो महीने से इलाज के लिए 60,000 रुपए खर्च किए थे। हालांकि, परामर्श अत्यधिक रियायती है, लेकिन गरीबी रेखा से ऊपर वाले मरीज़ों को टाटा मेमोरियल अस्पताल में परीक्षण और दवा के लिए भुगतान करना पड़ता है। मुंबई में परिवार का दैनिक खर्च 200 रुपये से लेकर 300 रुपये तक है। कुमार के कैंसर से उनकी वित्तीय स्थिति प्रभावित हुई है। बचत खत्म हो गई, कर्ज लेना पड़ा और इलाज की इस अवधि में परिवार ने कमाई से होने वाले आय को भी गंवा दिया।

 

एक मजदूर के रुप में काम करने वाले महतो को कुमार के साथ रहने के लिए अपना काम छोड़ना पड़ा है। उनकी पत्नी और कुमार की बहन, उनकी दो बेटियों, भाई और पिता की देखभाल करते हुए, घर पर हैं। कुमार के पिता खेतों में काम करते हैं और कमाई करने वाले अकेले सदस्य है। कुमार का छोटा भाई कक्षा दस का छात्र है।

 

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अरविंद कुमार का मुफ्त केमोथेरैपी चल रहा है और फिलहाल वह एक महीने के लिए नाना पालकर धर्मशाला चले गए हैं, जहां उन्हें मुफ्त भोजन और आवास मिलेगा।

 

दोपहर 2 बजे डॉक्टरों से मिलने के लिए सुबह 4 बजे से कतार में

 

चूंकि कुमार का परिवार उन्हें लेकर मुंबई आ गया इसलिए कुमार का इलाज तेजी से चल रहा है। मंगलवार और बुधवार सिर और गर्दन के कैंसर मरीजों के लिए होते हैं। हालांकि, परामर्श सुबह 8 बजे शुरू होता है, अस्पताल में प्रवेश करने  की रेखा चार घंटे पहले 4 बजे शुरू होती है। द्वार 7 बजे खोले जाते हैं।

 

कुमार के जीजा कहते हैं, “यदि आप सुबह सुबह उठते हैं, तो डॉक्टर आपको दोपहर को देखता है। ” अस्पताल के अंदर, मरीज को आउट-मरीज डिपार्टमेंट (ओपीडी) के घंटों के दौरान नि: शुल्क नाश्ता और भोजन मिल जाता है। मरीज के साथ आए प्रत्येक लोगों को हर आहार के लिए 50 से 100 रुपए तक का भुगतान करना पड़ता है।

 

कुमार केमोथेरेपी और रेडिएशन के दुष्प्रभाव से ग्रस्त हैं, जो उन्हें हर तीन सप्ताह में एक बार दिया जाता है। वह कहते हैं, “मैं जब भी कुछ खाता हूं उल्टी से महसूस होता है और सब बाहर निकल जाता है। ” रेडियाथेरेपी के कारण उनकी त्वचा का रंग काला पड़ गया है ।

 

सड़क पर जीवन: रातें होती हैं बद्तर

 

फुटपाथ पर जीवन आसान नहीं है। शौचालय का इस्तेमाल करने और सार्वजनिक विश्रामगृह में स्नान करने के लिए रोगियों को 5 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। पीने का पानी अस्पताल के कैंटीन से भरा जाता है।

 

पुलिसवालों का जिक्र करते हुए अरविंद की मां निर्मला देवी कहती हैं, “हर रात एक कठिन परीक्षा है। पुलिस वाले मरीजों और उनके परिवारों को हटा देते हैं। फिर सब अपनी रिपोर्ट, दवाएं, कपड़े और अन्य सामान इकट्ठा करते हैं और बंद दुकानों के पास आश्रय खोजते हैं।”

 

वे एक धर्मशाला (गैर-धार्मिक विश्रामगृह) में क्यों नहीं जाते? “मैं नाना पालकर (एक निजी ट्रस्ट द्वारा संचालित एक धर्मशाला) चार बार गया हूं,” महतो ने कहा, “वे कहते हैं कि सोशल वर्कर से एक पत्र लाओ। सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि हम मानदंडों में फिट नहीं हैं। हम फुटपाथ पर नहीं रहना चाहते, लेकिन हमें कहीं भी ठिकाना नहीं मिल पाया। “

 

हालांकि कुमार का पिता एक खेतिहर मजदूर है, लेकिन  वे आधिकारिक रूप से गरीबी रेखा से ऊपर हैं। उनकी गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) राशन कार्ड है, इसलिए, एनसी या नॉन-चार्ज की मंजूरी नहीं मिल सकती है, जो कुछ अस्पताल सेवाओं के लिए न्यूनतम शुल्क की अनुमति देता है और जांच या परामर्श के लिए कोई शुल्क नहीं लेता है।

 

जब इंडियास्पेंड ने  फिर उनसे जून 2017 में मुलाकात की, तो परिवार मॉनसून के बारे में चिंतित था। “हमने इस बारिश के दौरान मोनोरेल स्टेशन के पास आश्रय लिया है,,” महतो ने कहा।

 

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ताज होटल समूह का एक हिस्सा ताज हॉस्पिटेलिटी हर दिन टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, परेल में करीब 300 मरीजों को मुफ्त भोजन प्रदान करता है।

 

फुटपाथ पर क्यों लौट जाते हैं मरीज?

 

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की सामाजिक सेवा बच्चों के लिए मुफ़्त कैंसर के उपचार और आवास प्रदान करती है।लेकिन वयस्क कैंसर रोगियों के पास कम विकल्प हैं।

 

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के जनसंपर्क अधिकारी एस एच जाफरी कहते हैं, ” हमने फुटपाथ पर रहने वाले सभी रोगियों  को स्थानांतरित कर दिया था और उन्हें बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट क्वार्टर में 165 कमरों में मुफ्त आवास दिया था, लेकिन वे सभी वापस आ गए।”

 

“सभी कैंसर रोगियों को सस्ती दरों पर समायोजित करने के लिए पर्याप्त एनजीओ हैं, लेकिन जो लोग यहां फुटपाथ पर रहते हैं, वे यहां पर मुफ्त भोजन के कारण नहीं जाना चाहते हैं।”

 

ताज होटल्स समूह का एक हिस्सा ताज हॉस्पिटैलिटी हर दिन, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में करीब 300 मरीजों को मुफ्त भोजन प्रदान करता है; उन्हें सुबह 6 बजे नाश्ता भी मिलता हैं। अन्य स्वयंसेवी संस्थाएं समय-समय पर भोजन और अन्य अनिवार्य जरूरतों के लिए सहायता भी प्रदान करते हैं।

 

जनसंपर्क अधिकारी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया करते हुए, महतो ने कहा, “अस्पताल के दूसरी तरफ रहने वाले रोगियों के लिए यह सच हो सकता है। वे एक साल पहले से इलाज करा रहे हैं, लेकिन अभी भी वहां रहते हैं। “

 

फुटपाथ पर अन्य कैंसर के रोगियों के साथ बातचीत में पता चला कि कुछ मरीज स्वेच्छा से रहने के अन्य सस्ते विकल्पों पर ध्यान नहीं देते हैं। अस्पताल के बाहर रहना उनके लिए सुविधाजनक है और उन्हें 4 बजे की लाइन जल्दी मिलती है। कुछ लोगों ने बताया कि उन्हें अन्य आवास सुविधाओं के बारे में पता नहीं था, जबकि कुछ ने कहा कि उन्होंने कोशिश की और फुटपाथ पर लौट आए।

 

जैसा कि आप इस कहानी में महसूस कर पा रहे होंगे, अरविंद कुमार केमोथेरेपी के कारण काफी कमजोर हो चुके हैं। दो महीने तक एक मोनोरेल स्टेशन पर रहने के बाद, पास के नाना पालकर धर्मशाला में जा पहुंचे है, जहां उन्हें एक महीने तक मुफ्त भोजन और आवास मिलेगा।

 

यह तीन रिपोर्टों की श्रृंखला का पहला भाग है।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 04 सितंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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