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महिला मतदाताओं में वृद्धि, फिर भी उनके मतदान में सुधार नहीं

रितिका कुमार,
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देश भर में महिला मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई है ।1980 के 51 फीसदी से 2014 में 66 फीसदी तक, लेकिन अब भी अगर अधिकांश राज्यों में वयस्क जनसंख्या लिंग अनुपात की तुलना की जाए, तो यह कम है।  2014 के चुनाव में, मध्य प्रदेश ने  राज्य की आबादी में महिलाओं की संख्या में की तुलना में कम महिलाओं को अपना वोट देते देखा है। जबकि अरुणाचल प्रदेश ने पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं (जनसंख्या लिंग अनुपात के संबंध में) ने वोट दिया है।

 

अब जैसे कि 2019 के आम चुनावों के लिए प्रचार जोर पकड़ रहा है, राजनीतिक दलों की चुनाव रणनीतियों के लिए महिला मतदाता रुझान महत्वपूर्ण है। साथ ही यह एक दशक पुराने कार्यक्रम ‘इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडियाज सिस्टमैटिक एजुकेशन एंड एलेक्ट्रल पार्टिसिपेशन’ ( एसवीईईपी ) प्रोग्राम के लिए भी जरुरी है।  वोटिंग में महिलाओं की भागीदारी में सुधार ज्यादा मतदान और सामाजिक-राजनीतिक लिंग समानता की कुंजी है।

 

मतदाताओं का लिंग अनुपात
 

 चुनावी मतदान में लिंग अंतर का आकलन करने के लिए मतदाताओं का लिंग अनुपात (एसआरवी) एक महत्वपूर्ण मीट्रिक है। जनसंख्या लिंग अनुपात (पीएसआर) की तरह एसआरवी, वास्तव में वोट देने वाले प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या है।  1,000 का एक एसआरवी का मतलब वोट देने वाले पुरुषों और महिलाओं की समान संख्या होगी। जबकि 1000 से नीचे या उससे ऊपर एक एसआरवी का मतलब यह होगा कि महिलाओं की तुलना में अधिक या कम पुरुषों ने वोट दिया है। देश के सभी 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में 2014 के राष्ट्रीय चुनाव में मतदान करने वाले मतदाताओं के लिंग अनुपात की गणना से पता चलता है कि मतदाताओं के सबसे बद्तर लिंग अनुपात वाले 10 निर्वाचन क्षेत्रों में से नौ मध्य प्रदेश में स्थित हैं। हालांकि इससे यह भी समझा जा सकता है कि यह मतदान केवल अंतर्निहित पीएसआर (18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में) को प्रतिबिंबित करता है।

 

वोटरों के न्यूनतम लिंग अनुपात के साथ निर्वाचन क्षेत्र


 

इस अनुमान को सत्यापित करने के लिए, हमें किसी दिए गए निर्वाचन क्षेत्र के लिए अंतर्निहित वयस्क पीएसआर की आवश्यकता है। चुनावी रोल सबसे अच्छा अनुमान हो सकता था, लेकिन हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि ये सटीक नहीं हो सकते हैं। हालांकि, जनगणना  देश के सभी जिलों के लिए यह जानकारी प्रदान करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के साथ भारत में 640 जिले हैं। मोटेतौर पर, संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में 100 अधिक जिले हैं।  इसका अर्थ है कि एक निर्वाचन क्षेत्र दो जिलों में फैला हो सकता है। भारत में प्रशासनिक और चुनावी डेटा के बीच तालमेल की अनुपस्थिति में, वयस्क पीएसआर पर जिला स्तर की जनगणना डेटा एक निर्वाचन क्षेत्र में वयस्क आबादी के अंतर्निहित लिंग अनुपात का निकटतम अनुमान है। देश के सभी संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में से, भिंड में सबसे कम एसआरवी है। यदि कम एसआरवी कम पीएसआर का कार्य है, तो जिलों में भिंड निर्वाचन क्षेत्र (भिंड और दतिया) बनाने वाले जिलों में भी कम पीएसआर होना चाहिए। ऐसा नहीं है, जैसा कि टेबल 2 दिखाता है। देबल में 15 जिलों को देश में सबसे खराब पीएसआर के साथ सूचीबद्ध किया गया है।

 

न्यूनतम व्यस्क आबादी लिंग अनुपात के साथ जिले


 

पीएसआर और एसआरवी के बीच यह विसंगति कुल राज्य स्तर पर भी होती है। नीचे दिया गया आंकड़ा एसआरवी और पीएसआर में भारत के सभी राज्यों के लिए अवरोही क्रम में अंतराल प्रस्तुत करता है।

 

वयस्क आबादी और मतदाताओं में महिला-पुरूष का अंतर

Source: Census of India, 2011, Election Commission of India, and author’s calculations

 

फिर मध्यप्रदेश में, एसआरवी और पीएसआर के बीच बड़ा अंतर ( प्रति 1000 पुरुषों पर 169 महिलाएं) है। इसके बाद गुजरात और उत्तर प्रदेश का स्थान रहा है। स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर अरुणाचल प्रदेश है, जहां अंतर नकारात्मक है – पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं (पीएसआर की तुलना में) वोट के लिए निकलीं हैं। दोनों मामलों से पता चलता है कि वयस्क जनसंख्या लिंग संरचना अकेले वोटिंग आबादी के लिंग अनुपात में बदलाव की व्याख्या नहीं कर सकती है। मानचित्र का उपयोग करके अंतर-राज्य विविधता में गहराई से घूमने से स्थानिक रुझानों की पहचान हो सकती है। मध्यप्रदेश के मामले पर फिर से विचार करें। राज्य स्तरीय एसआरवी 771 (देश में सबसे कम) है, लेकिन पीसी द्वारा तोड़ने पर, राज्य के भीतर भी बहुत भिन्नता है (चित्र 2 और 3)।

 

वयस्क जनसंख्या का लिंग अनुपात

Source: Election Commission of India

 

मतदाताओं को लिंग अनुपात

Source: Election Commission of India

 

नीमच और मंदसौर जिलों में 973 का औसत पीएसआर है। दोनों जिले मंदसौर संसदीय क्षेत्र के भीतर हैं, जिनमें केवल 813 का एसआरवी है। हालांकि यहां प्रति 1000 पुरुषों पर 140 महिलाओं का अंतर है, कुछ मामलों में दोनों के बीच का अंतर और अधिक बड़ा है।

 

भिंड (भिंड और दतिया जिलों को मिला कर) में, पीएसआर और एसआरवी के बीच का अंतर प्रति 1000 पुरुषों पर 280 से अधिक महिलाओं का है। यह पीएसआर के मुकाबले एसआरवी के संबंध में मध्यप्रदेश के भीतर व्यापक भिन्नता को इंगित करता है। यह बदलाव समझना कठिन है कि क्यों पीएसआर से स्वतंत्र, राज्य के कुछ क्षेत्रों में महिलाएं बड़ी संख्या में मतदान करने बाहर आ रही हैं। दरअसल, मध्यप्रदेश में, महिला मतदाताओं का आंकड़ा, 1980 में 42 फीसदी से बढ़कर 2014 में 57 फीसदी हो गया है। फिर भी, महिलाएं जनसंख्या में उनके अनुपात की तुलना में छोटी संख्या में मतदान कर रही हैं। उम्मीद है कि कुछ लोगों  ( पुरुष और महिलाएं ) का नाम मतदाता पंजीकरण के दौरान दर्ज नहीं हो पाता और कुछ चुनाव के दिन वोट देने नहीं आते।   सांस्कृतिक- सामाजिक कारणों से लेकर प्रशासनिक उलझनें तक इसके लिए जिम्मेदार हो सकती हैं। भारत का निर्वाचन आयोग, अपने क्रेडिट के लिए, अपने एसवीईईपी कार्यक्रम के माध्यम से महिलाओं के बीच राजनीतिक भागीदारी में सुधार के लिए जबरदस्त प्रयास कर रहा है। एसवीईईपी के तहत अधिक सटीक चुनावी तालिका और बड़े पैमाने पर मतदाता पंजीकरण और जागरूकता ड्राइव के साथ आने वाले चुनावों में मतदाताओं की यौन संरचना का विश्लेषण संभव होगा।

 

(कुमार पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान में पीएचडी छात्र हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 15 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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