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महिलाएं काम करे या स्तनपान कराए ?

अंतरा राय चौधरी और अदिति सूरी,
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नई दिल्ली: 24 वर्षीय कविता अपने जीवन यापन के लिए तोरन बनाती है। वह उत्तर दिल्ली की एक बस्ती में रहती है। रोजाना 30 से 50 रुपए कमाने के लिए दिन में आठ घंटे काम करती है।

 

लंबे कद की, सड़क के किनारे रहने वाली और घबराई सी दिखने वाली कविता को घर की देखभाल करने का काम छोड़ना पड़ा। काम करते हुए उसकी कमाई वर्तमान की तुलना को दोगुनी होती थी। काम छोड़ने का कारण अपने बच्चों की देखभाल करना था।

 

वह अपने चार साल के बच्चे और तीन महीने के शिशु के देखभाल के लिए अकेली हैं। साथ ही परिवार में कमाने वाली प्राथमिक सदस्य भी है। कविता का पति रिक्शा चलता है और कई महीनों से किसी स्थिर नौकरी पर नहीं है। पति ने कविता को घर की जिम्मेदारियां संभालने के लिए मजबूर किया।

 

अनिश्चित कार्य परिस्थितियों में छह महीने तक अपने शिशु को स्तनपान कराने की क्षमता कविता में नहीं है। देश में सबसे गरीब लोगों में स्वास्थ्य और पोषण सुनिश्चित करने में मां का दूध एक महत्वपूर्ण कारक है। ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2017 के मुताबिक विश्व में पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों में से एक तिहाई हिस्सेदारी भारत की है।

 

हमने कविता से पूछा कि क्या वह मानती है कि तीन महीने का विशेष स्तनपान उसके शिशु के लिए पर्याप्त था। उसका जवाब था, “मैंने इसे तीन महीने तक स्तनपान कराने में कामयाब रही, लेकिन मैं इसे छह महीने तक नहीं करा पाऊंगी, जो कि जरूरी है। मुझे नौकरी पाने के लिए घर से बाहर निकलना है, जिससे अच्छी आमदनी हो और तीन महीने के बच्चे को साथ में काम पर ले जाने के बारे में सोचना भी मेरे लिए असंभव है।”

 

कविता जैसी दुविधा भारत में कामकाजी महिलाओं के लिए आम है। वे अपने शिशुओं को विशेष रूप से स्तनपान करने में असमर्थ हैं, हालांकि वे इसके महत्व को समझती हैं, जैसा कि बेंगलुरू के  ‘इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स’ (आईआईएचएस), द्वारा आयोजित एक शोध अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया है।

 

अध्ययन में गहन साक्षात्कार और समूह चर्चाओं के माध्यम से तीन अनौपचारिक व्यवसायों ( घरेलू श्रमिकों, सड़क विक्रेताओं और घर-आधारित श्रमिकों ) में 120 कामकाजी माताओं का सर्वेक्षण किया गया। इस अध्ययन में शामिल माताओं की तरह। भारत में, 81 फीसदी से 86 फीसदी महिलाएं गैर-कृषि अनौपचारिक नौकरियों में शामिल हैं।

 

उन्हें मातृत्व संरक्षण योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है। उन्हें काम के दौरान दूध पिलाने के लिए ‘पेड अंतराल’  नहीं मिलता, जो माताओं और बच्चों के हितों और स्वास्थ्य की रक्षा कर सकता है।हमारे अध्ययन में भाग लेने वाली लगभग आधी काम करने वाली माताएं (47 फीसदी) जन्म देने के तीन महीने के भीतर काम पर लौट आईं, और अन्य 21 फीसदी अगले तीन महीनों में वापस आ जाएंगी। उत्तरदाताओं में से 27 फीसदी कामकाजी घंटों के दौरान विशेष रूप से स्तनपान कराना जारी रख सकते थे, जबकि 35 फीसदी ने पैकेज / पाउडर दूध का सहारा लिया, और 44 फीसदी ने अपने शिशुओं को अन्य तरल पदार्थ भी खिलाया।

 

माताओं के काम करने के दौरान शिशु आहार अभ्यास

 

कई अध्ययनों से पता चलता है कि बच्चों के जीवन के पहले छह महीनों में पोषण सुनिश्चित करने के लिए स्तनपान कराना सबसे प्रभावी तरीका है। इसके अभाव में बच्चों के स्टंट होने की संभावना बढ़ जाती है। 2015-16 में अंतिम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, प्रारंभिक जीवन में विकास और विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवधि के दौरान अल्पपोषण के कारण भारत में कम से कम 48.2 मिलियन बच्चे स्टंट थे।

 

भारत में स्टंटिग कम हो रही है। पिछले एक दशक से 2016 तक, राष्ट्रीय आंकड़ों ने भी 10 प्रतिशत अंकों की कमी दिखाई है। यह विशेष रूप से स्तनपान में 8.5 प्रतिशत अंक की वृद्धि के बाद है, जो यह दर्शाता है कि अभी भी केवल 55 फीसदी बच्चे छह महीने के लिए स्तनपान कर रहे हैं।

 

अनौपचारिक क्षेत्र में माताओं के लिए कोई प्रसूति संरक्षण नहीं

 

भारत में औपचारिक रोजगार में महिलाओं की जिंदगी में प्रसूति कल्याण कानून महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनके पास पहले दो बच्चों के लिए छह महीने की प्रसूति छुट्टी और घर से काम करने का विकल्प है, यदि काम की प्रकृति ऐसी व्यवस्था की अनुमति देती है। यह उन्हें आवश्यक छह महीने के लिए विशेष रूप से स्तनपान कराने का समय देता है।

 

लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को खुद के लिए प्रबंध करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, वे गर्भावस्था के बाद काम से लंबे समय तक ब्रेक लेने के लिए धन बचाते हैं, या क्रैच नहीं होने पर पड़ोसियों के भरोसे देखभाल नेटवर्क बनाते हैं। लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों से उनका काम या कमाई के अवसरों को कम नोटिस पर उनसे लिया जा सकता है, जिससे उनका काम अस्थिर और असुरक्षित हो जाता है।

 

यह संभव नहीं है कि 2025 तक विशेष स्तनपान दर को 69 फीसदी तक बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तनपान और बाल पोषण लक्ष्य को कामकाजी माताओं की इस आबादी के जनसांख्यिकीय भार को समान रूप से पूरा किया जा सके।

 

कविता के लिए परिस्थितियां कुछ ज्यादा ही अनिश्चित है, क्योंकि उसके पति की भरोसेमंद कमाई नहीं है। अपने नवजात शिशु के तीसरे महीने में, उन्हें दूसरी नौकरी की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि घर-आधारित काम में उसकी कमाई रोजाना 50 रुपए से भी कम थी और यह उसके घरेलू खर्चों के लिए पर्याप्त नहीं था। हालांकि गर्भवती महिलाओं के लिए प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना (पहले इंदिरा गांधी मित्रावायोग योजना (आईजीएमएसवाई) ) ऐसी महिलाओं की मदद करने का भरोसा देती हैं।

 

इस प्रकार, अनौपचारिक रोजगार कदम में काम करने वाली माताओं को अपने बच्चों को पर्याप्त रूप से स्तनपान कराने में मदद करने के लिए कोई महत्वपूर्ण कल्याण नवाचार नहीं हुआ है।

 

बच्चे के जन्म के बाद काम करने के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में महिलाएं कितनी जल्दी वापस आती हैं?

 

पुरुषों की अस्थिर नौकरियां बनाती हैं महिलाएं को प्राथमिक कमाऊ सदस्य

 

महिलाओं की आय उनके पतियों के लिए पूरक है ( या गैर-निश्चित व्यय के लिए उपयोग की जाती है ) शोध में शामिल की गई महिलाओं के लिए सच नहीं है। कविता की तरह, अध्ययन नमूने में ज्यादातर महिलाएं दोहरी कमाई या परिवार की प्राथमिक कमाऊ सदस्य हैं। उनकी आय घर का किराया, बिजली और खाद्य लागत के साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल की लागत का समर्थन करती है। कुछ महिला प्रतिभागियों ने बताया कि उन्होंने एक शिशु होने की अतिरिक्त लागत को पूरा करने के लिए काम करना शुरू कर दिया। इन महिलाओं को प्रसव के बाद जितनी जल्दी हो सके काम पर वापस जाना पड़ा, क्योंकि वे घर को समर्थन करने वाली आय से खुद को अलग नहीं कर पाईं।

 

23 वर्षीय घरेलू कार्यकर्ता जानवी ने कहा, “जब बच्चों को स्कूल, नए कपड़े, कुछ बिस्कुट और किताबों की ज़रूरत होती है, तो वो हमारे पास आते हैं। वे जानते हैं कि पैसा कहां है – उनकी मां के साथ। यहां तक ​​कि मेरा छोटा बच्चा, जो दो साल का भी नहीं है, जानता है कि पैसा मेरे पास है और जब उसे फ्रूटी चाहिए तो वह इशारे से बताता है कि उसे चाहिए। “

 

सर्वेक्षण में हर पांच महिलाओं में से तीन ने बताया कि उनके पति ने काम खोजने में अनियमितता दिखाई है। तीन नमूने वाले बस्तियों में, महिलाओं के पति काम से बाहर थे, काम की तलाश में थे या बेरोजगार थे। ऐसी परिस्थितियां अक्सर महिलाओं को घर का एकमात्र स्थिर कमाऊ सदस्य बनाता है। काम और आय में यह अनियमितता निर्माण में दिहाड़ी मजदूरी की नौकरियों की कमी या लाइसेंसिंग मुद्दों के कारण छोटे वेंडिंग व्यवसायों जैसे विवाह के लिए खानपान में व्यवधान या विद्युत प्रबंधन जैसे स्व-नियोजित कार्य की मौसमी प्रकृति के कारण थी।

 

इन बाधाओं के बावजूद, महिलाओं के साथ बातचीत में, हमने पाया कि उनके पति नए कौशल हासिल करने के इच्छुक नहीं थे, जिससे वे नियमित या अधिक स्थिर नौकरियां प्राप्त कर सकते थे। इसका मतलब था कि महिलाएं अक्सर अपने घरों में एकमात्र स्थिर कमाई करती थीं, जिन्हें प्रसव के बाद समय निकालना कठिन हो जाता था।

 

26 वर्षीय विक्रेता रेणु ने कहा, “ऐसा लगता है कि वे (पति) परवाह नहीं करते हैं कि उनके पास 5-10 दिन या दो महीने तक काम नहीं है। मुझे पता है कि मैं पांच दिनों तक काम नहीं करुंगी तो  अगली सुबह चाय के लिए कोई दूध नहीं होगा, और रात में खाने के लिए कोई रोटी नहीं होगी। यहां तक ​​कि अगर आपके शरीर में दर्द भी है, तो आपको उठना होगा और काम पर जाना होगा।”

 

हमने पाया, पुरुषों के लिए, मेगा सिटी श्रम बाजार में नए कौशल हासिल करने या बेहतर काम करने की आकांक्षा की मौद्रिक लागत बहुत अधिक थी।

 

ये कारक नई दिल्ली जैसी मेगासिटी के लिए विशिष्ट हैं जो अर्द्ध कुशल कामगारों के लिए अनौपचारिक बन गए हैं, जो उन्हें अनौपचारिक क्षेत्र में भी किसी भी तरह के नियमित काम से बाहर कर रहे हैं। यह बहिष्कार शहरी महिलाओं को लिंग-पृथक कार्य क्षेत्रों जैसे घरेलू काम और घर-आधारित काम में बने रहने को मजबूर करता है, जिससे वे अपने घरों के लिए वास्तविक कमाई कर सकें।

 

शुरुआत में दूध छुड़वाने से अक्सर पाचन समस्याएं

 

अध्ययन में महिलाओं को पता नहीं था कि कैसे अपने शिशुओं के लिए सबसे अच्छा पोषण तैयार करना है या गरीब कामकाजी माताओं की चुनौतियों का सामना करने के अन्य तरीकों को ढूंढना है, भले ही उनकी गर्भावस्था के दौरान और बाद में सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य देखभाल विकल्पों तक अच्छी पहुंच थी।

 

उन्होंने श्रमिकों, परिवारों या सामुदायिक सदस्यों से यह पूछने का अवसर खो दिया कि स्तनपान, भोजन और काम का प्रबंधन कैसे किया जाए, क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि उन्होंने कितना काम किया, और वे अपने शिशुओं को कितना समय दे सकते थे? काम करने वाली माताओं ने अपर्याप्त जानकारी के साथ भोजन पैटर्न तैयार किया, जिससे उनके शिशुओं के लिए कम पोषण संबंधी परिणाम सामने आए।

 

माताओं ने अपने शिशुओं का दूछ छुड़वाया, जिससे वे काम पर वापस जा सकें। ज्यादातर मामलों में, इससे बच्चों को अपर्याप्त भोजन और पोषण प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि माताओं ने बताया कि वे शिशु पोषण फार्मूला को नियमित रूप में वहन करने में असमर्थ थे।

 

22 वर्षीय सड़क विक्रेता देवी ने कहा, “एक बार बच्चे को मां के दूध की आदत हो जाये तो बाहर का दूध शुरु करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए 12-14 दिन में ही बाहर का दूध शुरु कर देना होता है।”

 

शिशुओं को उनके पाचन तंत्र पूरी तरह से विकसित नहीं होने पर भी दलिया और दालों के साथ भैंस और गाय का दूध दिया गया था। इससे दस्त होने का जोखिम बढ़ता है। स्टंटिंग और वेस्टिंग का भी खतरा होता है।

 

शिशुओं को दिया गया पानी, कई संक्रमणों का कारण

 

दस्त का मुकाबला करने के लिए, माताओं ने अक्सर भैंस या गाय के दूध को पतला किया या साफ किए बिना  और अनुपचारित पानी का उपयोग कर शिशु को चाय या जूस पिलाया, जो कि छह महीने से कम उम्र के बच्चों के लिए वैश्विक पोषण संबंधी दिशानिर्देशों के खिलाफ है। इन सभी वैकल्पिक भोजन विकल्पों में, पानी ने शिशुओं में संक्रमण के खतरे को बढ़ाया, क्योंकि इस उम्र में बच्चे की आंत बनने की प्रक्रिया में होते हैं।

 

पर्यावरण स्वच्छता और स्वच्छ पेयजल की कमी के साथ रहने वाले अनौपचारिक कामगारों के यहां  बच्चों में दस्त की संभावना ( पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के बीच मृत्यु दर का तीसरा प्रमुख कारण ) बहुत अधिक है, जैसा कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में रिपोर्ट में बताया गया है।

 

22 वर्षीय घरेलू कामगार लक्ष्मी कहती हैं, “ पानी उबाल कर नहीं देते हैं, इतना ध्यान नहीं रख पाते हैं बच्चों का। जब बहुत गंदा हो तब उबालते हैं। कुछ अलग से बना कर दें  बच्चों को, इतना समय नहीं होता है।”

 

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अध्ययन के दौरान खुली जल निकासी और पीने वाले पानी की आपूर्ति नल से। यह उत्तरी दिल्ली के एक अनौपचारिक बस्ती की तस्वीर है। गंदगी और स्वच्छ पेयजल की कमी के कारण दस्त की संभावना बढ़ जाती है, जो पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर का तीसरा प्रमुख कारण है।

 

कार्यस्थल पर स्तनपान के लिए बहुत कम समय या कोई समर्थन नहीं

 

कविता जैसी महिलाएं, जो घर से काम करती हैं, अपने शिशुओं को विशेष रूप से स्तनपान कराने में सक्षम हो पाई, क्योंकि उन्हें अपने बच्चों को कामकाज के स्थान तक ले जाने के मुद्दे का सामना नहीं करना पड़ा। लोकिन सड़क विक्रेताओं और घरेलू श्रमिकों को लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं।

 

खुले में बिक्री एक चुनौतीपूर्ण काम है। इस क्षेत्र में कामकाजी माताएं बिक्री के समय के दौरान अपने शिशुओं में शामिल नहीं कर सकती हैं, और आसानी से अपने शिशुओं को रखने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं ढूंढ सकती हैं।

 

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खुले में बिक्री चुनौतीपूर्ण काम है, जिसके लिए निरंतर ध्यान और उपस्थिति की आवश्यकता होती है, जिससे माताओं को अपने शिशुओं की देखभाल करने के लिए कम समय मिलता है। तस्वीर में दिख रही महिला अपने घर के 100 मीटर के भीतर बिक्री कर रही थीं, जिससे वह अक्सर अपने बच्चे से मिल पाती थीं।

 

महिला कामगारों को अपने शिशुओं को साथ लाने के लिए नियोक्ताओं से अनुमति मिलनी चाहिए। नियोक्ता अक्सर अनुमति नहीं देते, क्योंकि उन्हें डर है कि बच्चे घर गंदा करेंगे, नाजुक वस्तुओं को तोड़ देंगे और मां की काम में बाधा डालेंगे।

 

जब बच्चे को काम पर ले जाने का विकल्प नहीं होता तो माताओं को काम और देखभाल को संतुलित करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ती है। कविता घरेलू सहायक के रुप में अपनी नौकरी जारी नहीं रख पाई, क्योंकि न तो काम पर वो अपने बच्चे के लिए सुरक्षित जगह ढ़ूंढ पाई और न ही बच्चे की देखभाल के लिए घर पर कोई था। उसके पास पड़ोस में रहने वाली 8 वर्षीय लड़की थी, जो उसके बच्चे को देख सकती थी। हालांकि कविता एक बड़े संयुक्त परिवार में रहती थे, लेकिन उसके परिवार की सभी महिलाएं काम करती थीं। उसके घर के पास वाले क्रेच में 10 से 12 महीने से कम आयु के बच्चों को नहीं लिया जाता था।

 

काम करते समय स्तनपान कराने के लिए किसी प्रकार का समाधान दिल्ली में महिलाओं के पास नहीं था। दूध ‘पंपिंग करने’ और ‘एक्सप्रेस’ करने के खिलाफ महत्वपूर्ण सांस्कृतिक बाधाएं थीं। माताओं ने सोचा कि स्तन से निकलने के बाद दूध तुरंत खराब हो जाएगा। उन्होंने दूध ‘एक्सप्रेस’ करने के लिए अपने ससुराल वालों या पतियों से अनुमति लेने का भी उल्लेख किया। ‘एक्सप्रेस’ स्तनपान के भंडारण के लिए अपने घर या कार्यस्थल पर एक फ्रिज या किसी भी ठंडे भंडारण की सुविधा का न होना भी समस्या थी।

 

किसी तरह के समर्थन के बिना महिलाएं कई भूमिकाओं को संभालती हैं…

 

इस बात का सबूत है कि काम, घरेलू कामकाज, और बच्चों की देखभाल के तिहरे बोझ का प्रबंधन करने के लिए महिलाएं अनौपचारिक काम के लचीलेपन का उपयोग करती हैं। ऐसी स्थिति उन्हों जोखिम में पहुंचा देती है। घर की माली हालत में सुधार और काम के बीच वे तनाव में झूलती रहती हैं।

 

कविता जैसी महिलाओं के लिए तत्काल आर्थिक लाभ के मुकाबले, विशेष स्तनपान कराने की प्राथमिकता नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में इष्टतम स्तनपान पैटर्न को आगे बढ़ाने की उम्मीद करना शायद गलत हैं। हमें देखना होगा कि जो मां है, वह एक कामगार भी है।

 

सामाजिक सुरक्षा की कमी, सभ्य कार्य, रोजगार की कमी, और अपर्याप्त पर्यावरणीय स्वच्छता के संरचनात्मक मुद्दों के अंतराल को भरने के लिए एक व्यक्ति पर बोझ नहीं डाला जा सकता है। अध्ययन में शामिल महिलाओं के लिए काम से छुट्टी लेना असंभव है। वे स्तनपान को जरूरी मानती हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है उनका काम करते रहना और कुछ आमदनी घर लाना।

 

(चौधरी और सूरी ‘इंडियन इन्स्टिटूट ऑफ ह्यूमन सेटलमेंट’ में अकादमिक और शोध टीम की सदस्य हैं। वे सामाजिक सुरक्षा, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और शहरी स्वास्थ्य पर काम करती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 4 सितंबर, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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