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भारत को किशोरावस्था में निवेश और ध्यान देने की जरूरत

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भारत में किशोरावस्था (10 से 19 वर्ष) उम्र के बच्चों की संख्या 253 मिलियन हैं। यह संख्या किसी भी अन्य देश से अधिक और जापान, जर्मनी और स्पेन की संयुक्त जनसंख्या के बराबर है। लेकिन ये किशोर एक अच्छे वयस्क बनें, यह सुनिश्चित करने में भारत पर्याप्त काम नहीं कर रहा है, जैसा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुनील मेहरा ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा है। मेहरा की संस्था ‘ममता’ केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करती है।

 

तीन साल पहले, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम ( आरकेएसके ) में पहली बार राष्ट्रीय नीति में किशोरों के स्वास्थ्य को दर्शाया गया था। अक्टूबर, 2017 में, मेहरा के संगठन ने दिल्ली में अन्य गैर-लाभकारी संस्थाओं और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ किशोरावस्था स्वास्थ्य के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन द्वारा किशोर स्वास्थ्य पर विश्व कांग्रेस की मेजबानी की थी। कांग्रेस के विशेषज्ञों ने चर्चा की कि अगर भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश से लाभ उठाना है तो  किशोरावस्था में निवेश करना क्यों महत्वपूर्ण है और क्यों विभिन्न मंत्रालयों द्वारा चलाए जा रहे किशोरों के लिए विभिन्न कार्यक्रमों को एकीकृत करने की आवश्यकता है।

 

यदि भारत को सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) को पूरा करना है तो भारत के लिए विशेष रुप से किशोरावस्था स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है। इस लक्ष्य के लिए देश संयुक्त राष्ट्र के लिए प्रतिबद्ध है, जैसा कि मेहरा बताते हैं ( इंडियास्पेंड ने एसडीजी के बारे यहां, यहां और यहां लिखा है)।

 

62 वर्षीय मेहरा शिशुरोग विशेषज्ञ हैं और मां और बच्चे के लिए ममता स्वास्थ्य संस्थान के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं । ममता-एचआईएमसी को आमतौर पर ममता के रूप में जाना जाता है। यह संस्था सार्वजनिक क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को समुदायों के साथ संलग्न में मदद करती है और आधिकारिक नीति में किशोरों की चिंताओं को आवाज देती है।

 

 

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भारत अपने 253 मिलियन किशोरों को उत्पादक वयस्क बनने के लिए पर्याप्त काम नहीं कर रहा है, जैसा कि  स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुनील मेहरा ने इंडियास्पेंड को बताया है। मेहरा की संस्था, ममता केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करती है

 

एक चौथाई सदी के दौरान ‘ममता’ ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से लेकर किशोरों तक अपने काम का विस्तार किया है। यह 19 भारतीय राज्यों, नेपाल और बांग्लादेश में काम करता है।

 

मेहरा कहते हैं, “मुझे लगता है कि ममता ने सबसे अच्छा निवेश किशोरों को व्यस्त रखने, किशोर नेटवर्क बनाने और उनके लिए सुरक्षित वातावरण बनाने में किया, जहां वे जो चाहते हैं, वह कह सकते हैं ।”

 

वह दिल्ली में 36 वर्षों से सुबह और शाम बाल चिकित्सालय चलाते हैं और साथ ही ममता का प्रबंधन करते है, जिसे वह अपने तीसरा बच्चा मानते हैं।

 

भारत में किशोरों की सबसे बड़ी जनसंख्या (10-19 वर्ष) है, करीब 253 मिलियन और दुनिया में हर पांचवां किशोर एक भारतीय है। भारत अपने किशोरों की स्वास्थ्य और भलाई के लिए क्या कर सकता है?

 

हमने पहले भी कांग्रेस [किशोर स्वास्थ पर विश्व कांग्रेस] में कहा है कि  अगर सरकार जनसंख्या के इस उपकांत [किशोरों] में निवेश नहीं करती है, तो कई एसडीजी परिणामों पर नहीं पहुंचा जा सकता है।

 

दूसरा, वयस्क स्वास्थ्य परिणामों में से कई उस पर आधारित है कि आप किशोरावस्था में क्या करते हैं। तकनीकी तौर पर हम इसे ट्रिपल डिविडेंड कहते हैं, जब आप किशोरावस्था में निवेश करते हैं, जो कि 253 मिलियन है, ( आंकड़ा 2011 की जनगणना से है, इसलिए इसे उस से अधिक होना चाहिए ) आपको यह देखना होगा कि ये सभी स्वस्थ हैं, आपको यह देखने की ज़रूरत है कि यह अगले पांच से दस वर्षों में उत्पादक कर्मचारियों की संख्या होगी। एक स्वस्थ कार्यबल प्राप्त करने के लिए, आपको शारीरिक और मानसिक दोनों स्वास्थ्य की जरूरत है, और फिर आप कौशल जोड़ते हैं, और जब आप तीनों को जोड़ते हैं, तो आप एक स्वस्थ वयस्क आबादी प्राप्त करते हैं। इसलिए जब आप किशोरावस्था में निवेश करते हैं, तो आप न केवल स्वस्थ युवा वयस्क होते हैं, बल्कि स्वस्थ वयस्क भी प्राप्त करते हैं।

 

उदाहरण के लिए, जब एक किशोरावस्था 16 से 19 वर्ष की उम्र में धूम्रपान शुरू करती है तो ऐसी संभावना बहुत अधिक होती है कि व्यस्क को कर वो चेन स्मोकर बन जाए। लेकिन अगर वह 25 साल बाद शुरू करते हैं तो इसकी संभावना कम होती है। शराब और व्यायाम और जीवन शैली की आदतों के लिए भी यही लागू होता है।

 

हमें यह समझने की जरूरत है कि आप इस युग में जो कुछ भी निवेश करते हैं, आप वयस्कों की गुणवत्ता का निर्धारण करेंगे। यह धीरे-धीरे सरकार द्वारा समझा जा रहा है।

 

मुझे कहना चाहिए कि हमारे पास पहले से ही एक अच्छा राष्ट्रीय कार्यक्रम है -राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम। समस्या यह है कि हम इसे कैसे लागू करते हैं। हमें अवसंरचना और प्रणालीगत हस्तक्षेप को देखने और यह देखने की जरूरत है कि जो वादा किया गया है वह लागू हो रहा है या नहीं।

 

हमें  जल्दी निवेश करना चाहिए और निवेश करते रहना चाहिए, जैसा कि शेयर बाजार में होता है। 11-12 वर्ष की शुरुआत में शुरू करें और 24 साल तक निवेश करें। यही मस्तिष्क के विकास में सबूत है, कल का 18, आज का 24 है। हमने (पहले) सोचा कि मस्तिष्क 18 साल में परिपक्व हो रही है, लेकिन यह 24 साल के बाद हो रहा है। इसलिए, शायद आपको किशोरावस्था की परिभाषा पर फिर से गौर करते की जरुरत है और इसे 24 वर्षों तक फैलाना होगा।

 

हालांकि, आरकेएसके (राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यकाल) किशोर स्वास्थ्य के लिए 2014 से है, उत्तर प्रदेश (यूपी) और बिहार के युवा वयस्कों के सर्वेक्षण में केवल 1 फीसदी लड़के और लड़कियों को आरकेएसके के बारे में पता था। आरकेएसके की गुंजाइश और गतिविधियों को बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

 

यह कथन सही और गलत, दोनों है। कुछ राज्यों में, कार्यक्रम बहुत अच्छा काम कर रहा है, और कुछ राज्यों में यह काम नहीं कर रहा है। उदाहरण के लिए, बिहार और यूपी उन राज्यों में से हैं जहां कार्यक्रमों को सफल होने में लंबा समय लगता है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु में, ज्यादातर लोग आरकेएसके से परिचित हैं। मैं मानता हूं कि यह चिंता का मामला है कि यूपी और बिहार राज्यों के ज्यादातर किशोर इस बारे में अनजान हैं।

 

ममता में, हम अब बिहार और यूपी के राज्यों के साथ साझेदारी कर रहे हैं; हमारे जैसे संस्थानों को सरकार का समर्थन करना चाहिए। प्रणाली पहले से ही तीनों आशाओं [मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं], आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (सरकारी क्रैचर श्रमिक) और एएनएम (सहायक नर्स, दाई) के साथ (सभी स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए) अत्यधिक बोझ तले दबी हुई है। मेरे पास चौथे कार्यकर्ता नहीं है आरकेएसके ने पीअर टीचर्स की अवधारणा के साथ आया, जो वयस्कों तक पहुंचने के लिए एएनएम का समर्थन करते हैं। पहली बार, पुरुष और महिला दोनों शिक्षक हैं, और मुझे लगता है कि पुरुष सहकर्मी शिक्षकों को लड़कों तक पहुंचने का यह एक बहुत अच्छा मौका है।

 

अगर आप एनीमिया को देखते हैं, अगर 16 से 17 वर्ष की आयु में लड़कियों की संख्या 56 फीसदी है, तो लड़कों में यह लगभग 30 फीसदी है। तो, यह नहीं है कि लड़के प्रभावित नहीं है। एक एनीमिक व्यक्ति उत्पादक व्यक्ति नहीं हो सकता है। और इसलिए आरकेएसके ने हमें लड़कों तक पहुंचने के लिए एक दृष्टिकोण दिया। हां, प्रबंध करना मुश्किल है, लेकिन भारतीय संदर्भ को देखते हुए और मानव संसाधनों की कमी को देखते हुए, स्वास्थ्य पर व्यय की कमी के कारण, हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, बल्कि पीयर शिक्षकों पर भरोसा करना है।

 

किशोर स्वास्थ्य की देखभाल करने में हम पीअर शिक्षकों की पहचान और प्रशिक्षित कैसे कर सकते हैं?

 

ममता ने पूरे राज्यों के विभिन्न जिलों में यह किया है। हमने एनएचएम (नेशनल हेल्थ मिशन) के अंतर्गत प्रशिक्षकों की एक टीम की पहचान की है जो अलग-अलग उपवर्ग जैसे कि पीअर टीचर्स, आशा और एएनएम को प्रशिक्षित करती है। आशाओं को पीअर शिक्षकों के कामकाज की पहचान करने और रखने की सुविधा है। आशा एक गांव की महिला होती है ( बहू ) ताकि वह उस गांव के साथियों को जानती है, और उसे गांव के साथियों की सिफारिश करनी चाहिए।  उन्हे [सहकर्मी शिक्षकों] तब प्रशिक्षकों के समूह द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है और एएनएम को सहकर्मी शिक्षकों को सहायता और सलाह देना होता है।

 

भारत में सेक्स शिक्षा निषेध है। फिर भी भारत में 26.8 फीसदी लड़कियां 18 वर्ष की आयु से पहले शादी कर लेती हैं, और इन लड़कियों की, 20-24 वर्षों के बीच विवाहित होने वालों वाली लड़कियों की तुलना में बच्चे के जन्म के समय मरने की संभावना ज्यादा होती हैं। लिंग और स्वास्थ्य के मुद्दे के बारे में आपके क्या विचार है?

 

8 फीसदी की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के साथ वाले देश के लिए यह शर्मनाक है कि इसकी एक-चौथाई महिलाओं की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले होती है। हम जानते हैं कि यह गरीबी और अंतरजन्य और अल्प पोषण की शुरुआत करता है ( इस विषय पर इंडियास्पेंड द्वारा की गई रिपोर्ट आप यहां, और यहां पढ़ सकते हैं )

 

बाल दुल्हनें आबादी का एक अदृश्य उपवर्ग हैं, जिनकी देखभाल और सेवाओं तक पहुंच और स्कूल तक पहुंच बहुत खराब है। इसलिए, पहली बात यह है कि हमें इसे मिशन मोड में संबोधित करना होगा।  हमें एक पीढ़ी में बाल विवाह को रोकने की आवश्यकता है,  इसके लिए हमें 10 वर्षों तक इंतजार करने की जरुरत नहीं करनी चाहिए। इसके लिए कई सालों के लिए, आपने बहुत नुकसान किया है, और आपने इतने सारे बच्चों को जन्म दिया हैं जो कम वजन के पैदा हो रहे हैं, और इन बच्चों को मधुमेह होने की संभावना – हम जानते हैं कि अन्य बच्चों की तुलना में कम वजन वाले बच्चों के टाइप 2 मधुमेह और हृदय रोग की संभावना ज्यादा होती है।

 

तो, अगर आप बाल विवाह को नहीं रोकते हैं, तो आप अपनी सभी समस्याओं को बड़ा कर रहे हैं।

 

दूसरा मुद्दा जब तक हो सके स्कूल में लड़कियों को बनाए रखना है।

 

तीसरा, हमें उन तक अच्छे यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवा की पहुंच बनानी चाहिए, जिसका अर्थ है कि उन तक सेनेटरी नैपकिन, गर्भनिरोधक, आयरन और फोलिक-एसिड गोलियों तक पहुंच प्राप्त होगी। हमें यह देखना होगा कि ऐसा होता है। यह बड़ा लिंग मुद्दा है।

 

इसको संबोधित करने के लिए हमें लड़कों के व्यवहार के बारे में बात करने की ज़रूरत है। हम देखते हैं कि हर कोई लड़कियों के बारे में बात कर रहा है, लेकिन लैंगिक असमानता को कौन कायम कर रहा है? यह लड़के हैं जो इसे कायम कर रहे हैं और काफी हद तक कई सेवा प्रदाता या बड़े सेवा प्रदाता पुरुष हैं और लड़कियों और महिलाओं के बारे में उनके दृष्टिकोण में सुधार की जरूरत है। यह एक बड़ी समस्या है और हम इसे किसी भी समय जल्द ही हल करने नहीं जा रहे हैं। लेकिन हमें इसे देखने की जरूरत है।

 

हमें दाइयों की अवधारणा को मजबूत करने की जरूरत है। हमारे पास पहले से चिकित्सा अधिकारी हैं, और हमें ग्रामीण परिवेश में चुनौती का एहसास है। मैं अक्सर स्वीडन जाता रहता हूं, और मुझे लगता है कि दाई भी चिकित्सा अधिकारियों की तुलना में अधिक सक्षम हैं। दाइयों के लिए उनके पास बहुत अच्छे पाठ्यक्रम हैं आयुष (आयुर्वेद, नेचुरोपैथी, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी) डॉक्टरों से नियमित सेवा करने के लिए कहने के बजाय, मुझे लगता है कि दाइयों के पाठ्यक्रमों में विकल्प है।

 

आत्म-नुकसान मौत के प्रमुख कारणों में से एक रहा है, भले ही अवसाद और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्या किशोरों को प्रभावित करते हैं। हम जमीनी स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कैसे प्रदान कर सकते हैं?

 

एक ओर, हम कहते हैं कि वे (किशोरावस्था) स्कूल में हों, लेकिन दूसरे पर, हमें स्कूल आधारित चुनौतियों जैसे कि बदमाशी, प्रदर्शन दबाव, रिश्ते चुनौतियों, आत्मसम्मान के मुद्दों से निपटना होगा। ये ऐसे मुद्दे हैं जो किशोरावस्था के माध्यम से हो कर जाते हैं: क्या मैं उसके जैसी सुंदर हूं? क्या मैं उसके जैसा लंबा हूं? क्या मैं उसके जैसे बुद्धिमान हूं? ये मुद्दे तुच्छ दिखते हैं, लेकिन जीवन के उस स्तर पर वे इतना महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे मानसिक स्वास्थ्य के रूप में दिखना शुरू करते हैं। स्कूलों में खराब प्रदर्शन के लिए अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होती है, इसे परामर्शदाता के माध्यम से निरंतर सहायता की आवश्यकता होती है, और यही कुछ ऐसा करने की आवश्यकता है।

 

इसलिए, आपको किशोरों को अच्छी जानकारी प्रणाली और ज्ञान प्रदान किए जाने की जरुरत है; जिसमें सेक्स की शिक्षा शामिल होती है जो उन्हें अपने शरीर, उनके संबंधों और यौन अभिविन्यास के बारे में बताती है।  यह कई किशोर मानसिक स्वास्थ्य जरूरतों का ख्याल रखता है। यह एक मुकाबला तंत्र है; चिंता बनने से पहले मैं मेरी ज़रूरतों से सामना करुं?

 

इन मुद्दों की देखभाल के लिए स्कूलों का मंच होना चाहिए, लेकिन माता-पिता एक बड़ा मुद्दा बन रहे हैं। अभिभावकों को शिक्षकों को तरह ही सहायता की आवश्यकता है। सामाजिक संरचनाएं कक्षा में कुछ चीजें तब्दील करती हैं; हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि कक्षा में शिक्षक इसे बढ़ा पाएंगे। यदि उनके पूर्व-प्रशिक्षण कक्षाएं इन मुद्दों के बारे में बात नहीं करते हैं और उन्हें बताती हैं कि उन्हें कक्षाओं में कैसे पहुंचे, तो वे कैसे कर सकते हैं?

 

मुझे अपने क्लिनिक में ऐसे माता-पिता मिलते हैं जो कहते हैं, ‘मेरी बेटी अपने कमरे में जाती है और कई घंटों तक बाहर नहीं आती; अगर कोई उसका मोबाइल फोन ले लेता है तो वह हम पर चिल्लाती है।’ ये ऐसी समस्याएं हैं जो माता पिता नहीं जानते हैं कि कैसे सामना करना है। संरचित संस्थानों के माध्यम से जानकारी प्रदान करने का कोई व्यवस्थित तरीका नहीं है, इसलिए उन्हें जानकारी के साथ बमबारी कर दिया जाता है जो कि उनकी उम्र के लिए गलत और अनुचित नहीं है।

 

यह भी समझें कि यह उम्र है जब जोखिम लेना जैविक है; यह रोगविज्ञान नहीं है। इसलिए, आपको एक रचनात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता है: जब वे जोखिम लेते हैं, तो उन्हें महसूस करना चाहिए कि वे एक संरक्षित वातावरण में हैं। जोखिम-उठाने के व्यवहार को उतारने के लिए वैकल्पिक चैनल दें, जो कि स्वयं प्रकट होता है, उदाहरण के लिए, सड़क दुर्घटनाओं में वे सोचते हैं, ‘मैं 150 किलोमीटर प्रति घंटे की दूरी पर एक कार चला सकता हूं, और इससे मेरी प्रेमिका प्रभावित होगी’, इसका  परिणाम ने नहीं समझते। घटना के उच्च परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण है

 

देश में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी है तो ऐसे में हमें मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से कैसे निपटना चाहिए?

 

मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों को रोकने के लिए है मुझे एकमात्र उपाय दिखता है। यह कहने की तरह है कि आपके पास पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं, तो आपका ध्यान बीमारी को रोकने के लिए होना चाहिए, ताकि संस्थान का भार नीचे आ जाए।

 

हमें स्वास्थ्य सेवा में मानव संसाधन के अंतर को हल करने की जरूरत है, लेकिन हमें (मानसिक-स्वास्थ्य) सुविधाओं पर भार को कम करने के लिए निवारक हस्तक्षेपों में निवेश करना होगा।

 

वर्तमान में, भारत में मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों की संख्या इतनी सीमित है और शहरी-केंद्रित है कि ग्रामीण (क्षेत्रों) के लिए बहुत कम उपलब्धता है। हमें प्रतिरक्षात्मक और प्रोत्साहन मानसिक स्वास्थ्य में बहुत निवेश करना है। साथ ही, हमें ऐसे संस्थानों में निवेश करने की जरूरत है जो अच्छे, प्रशिक्षित परामर्शदाताओं का उत्पादन करते हैं। तब तक, हमें उन स्नातकों को प्रशिक्षित करने की ज़रूरत है जो परामर्शदाताओं के लिए बेरोजगार हैं और उनके लिए [रोजगार] स्थान बनाते हैं।

 

किशोरों के लिए एक संचार रणनीति तैयार करना कितना मुश्किल है, क्योंकि प्रत्येक आयु समूह अलग है और वे हमेशा टॉप-डाउन संचार के लिए ग्रहणशील नहीं होते हैं?

 

किसी भी देश के लिए दस वर्ष, 11 वर्ष, 12 साल और अनय उम्र के किशोरों के लिए संदेश बनाना बहुत कठिन होगा। मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। स्कूल-आधारित हस्तक्षेपों को कक्षा पाठ्यक्रम की तरह देखा जा सकता है – तुम कक्षा 6 में कुछ बुनियादी जानकारी देते हैं, फिर बच्चे के बड़े होने तक जानकारी प्रदान करना जारी रखते हैं। तो, आपको उम्र के अनुसार उपयुक्त स्कूल-आधारित प्रशिक्षण मिलता है।

 

लेकिन जन मीडिया द्वारा क्या जाना चाहिए (समूह में) और समूह (आयु) क्लस्टर में हस्तक्षेप से क्या किया जाना चाहिए – 10-13, 14-19, 20-24-आपकी महामारी विज्ञान क्या कह रहा है, सामान्य आवश्यकताएं क्या हैं: आप उस संदेश के माध्यम से जाते हैं और इसे (हस्तक्षेप) बनाते हैं।

 

तो अब इसे प्रदान कौन करेगा? यदि आप सहकर्मी-शिक्षक कार्यक्रम को देखते हैं, इसका उद्देश्य लगभग एक ही आयु के साथियों या या लगभग एक या दो साल बड़े साथियों को प्रदान करना था, ताकि वे इसे उपदेश देने के बजाए इसे वयस्कों के साथ वितरित करना चाहिए।

 

उन्हें एक माहौल दें जहां वे सवाल पूछ सकें और सहकर्मी को प्रतिक्रिया देने का विश्वास उत्पन्न कर सकें।हमारे हस्तक्षेप में से एक में, हम सहकर्मी शिक्षकों की आत्म-प्रभावकारीता में सुधार करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अगर उनकी आत्म-प्रभावकारिता में सुधार होता है, तो उनके संवादात्मक मूल्य में बहुत सुधार होता है।

 

हमें प्रणाली बनाने की जरूरत है जो प्रणाली में वयस्कों की तुलना में किशोरों को प्रतिक्रिया देती है।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 26 नवंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। हमसे respond@indiaspend.org पर संपर्क किया जा सकता है। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार रखते हैं।

 
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