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भारत का सबसे अमीर महानगर क्यों हार रहा है बाल पोषण की लड़ाई?

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सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चों की लिस्ट में मुंबई के कोलाबा वार्ड के नगरपालिका स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे तीसरे स्थान पर हैं।

 

मुंबई का कुलाबा अपने सुंदर इमारतों, गेटवे ऑफ इंडिया, स्विश पब, रेस्तरां और मरीन ड्राइव की सुखद सैर के लिए प्रसिद्ध है। इसी क्षेत्र में राज्य विधानसभा, विधानभवन, और राज्य सचिवालय और मंत्रालय के दफ्तर भी हैं।

 

हालांकि, इस हाई प्रोफाइल वार्ड में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बीच कुपोषित बच्चों की संख्या, सबसे ज्यादा की लिस्ट में तीसरे स्थान पर है।

 

एक गैर लाभकारी संस्था ‘प्राजा फाउंडेशन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015-16 में मुंबई के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 69 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 01 जून, 2017 को विस्तार से बताया है।

 

‘प्रजा फाउंडेशन’ की रिपोर्ट में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख है कि मुंबई के नगरपालिका स्कूलों में कुपोषित बच्चों की संख्या में चार गुना वृद्धि हुई है। यह आंकड़े वर्ष 2013-14 के 8 फीसदी से बढ़कर 2015-16 में 34 फीसदी हुए हैं। यहां यह जान लेना भी दिलचस्प है कि मिड डे मील प्रोग्राम के लिए आबंटित बजट में से एक बड़ी राशि का इस्तेमाल ही नहीं हुआ।

 

भारत के उस महानगर की इतनी भयावह स्थिति कैसे हो सकती है, जो देश के अन्य राज्य के मुकाबले ज्यादा अमीर तो है ही, जो दुनिया के 20 सबसे अमीर शहरों में से 17 वें स्थान पर है? दो लेखों की इस श्रृंखला में हम इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश करेंगे।

 

इस लेख में हमने आंकड़ों को खंगाला है और समस्या की गंभीरता का पता लगाने के लिए मुंबई के कुछ सबसे गरीब इलाकों का दौरा भी किया है।

 

इस लेख के दूसरे भाग में उन चुनौतियों पर हम बात करेंगे, जो बच्चों और विशेष रूप से पीड़ितों पर ध्यान केंद्रित करने और हस्तक्षेप में मदद कर सकती हैं।

 

ऊंची इमारतें और मलिन बस्तियां

 

कोलाबा में मलिन बस्तियां आसानी से नहीं दिखती हैं। यहां रियल एस्टेट की कीमतें प्रति वर्ग फुट 1,00,000 रुपए तक बढ़ी हैं। हालांकि, द्वीप नगर की तरफ, नौसेना नगर के रक्षा बलों के क्षेत्र की सीमा के साथ गीता नगर नाम की एक  बस्ती है। झुग्गी-बस्तियों के बीच से समुद्र की एक झलक देखी जा सकती है और जब उच्च लहरें आती हैं, लोगों के घरों में पानी भर जाता है।

 

गीतानगर बस्ती 1960 में बसा था, जब ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ का निर्माण करने वाले मजदूर यहां रहने आए थे। आज 6,000 की आबादी के साथ, यह मुंबई के अन्य अनौपचारिक झुग्गी बस्तियों की तरह अधिक आबादी वाला और संसाधनों की कमी वाला नहीं है।

 

बाएं से दाएं: गीता नगर के घर और गीतानगर को नेवी कॉलनी से अलग करने वाली दीवार

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Left to right: Houses at Geeta Nagar and boundary wall separating Navy colony from Geeta Nagar.

 

यह रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता और ‘फोर्थ जिसस एंड मदर्स कान्वेंट स्कूल’ में काम करने वाले वेलंकनी जोसफ ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, “यहां रहने वाले ज्यादातर लोग महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के प्रवासी हैं। यहां रहने वाली ज्यादातर माएं पास के ही घरों में घरेलू सहायक के रुप में काम करती हैं । पुरुष सुरक्षाकर्मी या ड्राइवर के रुप में काम करते हैं। ऐसे में माएं घर में एक समय का भोजन ही पका पाती हैं, बच्चे घर में पका खाने की बजाए बिस्कुट, चिप्स और तले-भुने हुए बाजारू खाते हैं।”

 

‘प्रजा फाउंडेशन’ की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015-16 में कोलाबा वार्ड के इस गीता नगर में कम से कम 49 फीसदी लड़के और 59 फीसदी लड़कियां कुपोषित हैं। रिपोर्ट कहती है कि कुल कुपोषित बच्चों की संख्या वर्ष 2014-15 में 244 थी, जो बढ़ कर वर्ष 2015-16 में 2,768 हुआ है।

 

सरकार द्वारा संचालित नगरपालिका स्कूलों में कुपोषण में चार गुना वृद्धि

 

मुंबई नगर निगम यानी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन (बीएमसी) अपने स्कूलों में पढ़ रहे सभी बच्चों का वार्षिक स्वास्थ्य आकलन करता है। ‘प्रजा फाउंडेशन’ को सूचना के अधिकार के माध्यम से इन आंकड़ो तक पहुंच मिली है और इन आंकड़ों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकला है कि छोटे बच्चों की कुपोषित होने की संभावना अधिक है। वर्ष 2015-16 में, कक्षा 1 से 5 के बीच किए गए अध्ययन में 73 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए।

 

भारतीय शहरों में कुपोषण

 

Source: National Family Health Survey-4

 

शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली (डीआईएसई) के मुताबिक, मुंबई शहर में 83 फीसदी सरकारी और अनुदानित स्कूलों और उपनगरों में 95.1 फीसदी स्कूलों में मीड-डे मील प्रोग्राम चलने के बावजूद शहर में कुपोषण के मामलों की संख्या ज्यादा है।

 

हालांकि, देश का सबसे समृद्ध नगरपालिका, बीएमसी ‘प्रजा फाउंडेशन’ के इस दावे से इंकार करता है कि कुपोषण के मामलों में चार गुना वृद्धि हुई है। बीएमसी के कार्यकारी स्वास्थ्य अधिकारी पद्मजा केसकर ने कहा कि  “प्रजा फाउंडेशन को गलत जानकारी मिली है। वर्ष 2014 से पहले हम केवल उम्र के साथ वजन मापते थे। वर्ष 2014 के बाद से हम कद, उम्र के लिए वजन और कमर की परिधि भी मापते हैं। इसके अलावा, कम वजन का मतलब कुपोषण नहीं है। ”

 

‘प्रजा फाउंडेशन’ ने इसे ‘प्रशासनिक बहाना’ बताते हुए जोर दिया कि बीएमसी को दलीलों की बजाय समाधान खोजने की कोशिश करनी चाहिए। ‘प्रजा फाउंडेशन’ के परियोजना समन्वयक मिलिंद म्हस्के कहते हैं कि, “यदि बीएमसी वर्ष 2014 के पहले बच्चे का कद के साथ वजन नहीं माप रही थी तो यह उनकी एक बड़ी लापरवाही है। मूल बॉडी मास इंडेक्स में भी कद की आवश्यकता होती है। ”

 

यहां तक कि वर्ष 2014 के बाद आकलन में परिवर्तन के संबंध में बीएमसी के तर्क को देखा जाए तो भी आंकड़े बताते हैं कि बीएमसी स्कूलों में पढ़ रहे 36 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं।

 

म्हास्क कहते हैं कि यह एकीकृत बाल विकास योजना की विफलता को इंगित करता है। इस योजना का उदेश्य छह वर्ष की आयु से कम बच्चों को पोषण और शिक्षा प्रदान करना है। केंद्र सरकार के सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य गरीबों को भोजन और गैर-खाद्य वस्तुओं को उपलब्ध कराना है। संबंधित राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे मीड-डे मील कार्यक्रम का उदेश्य प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को मुफ्त भोजन प्रदान करना है।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन स्टंटिंग ( उम्र के अनुसार कम कद ), वेस्टिंग ( कद के अनुसार कम वजन ), कम वजन ( आयु की तुलना में ) और एक तरफ सूक्ष्म पोषक तत्व की कमियों और दूसरी ओर मोटापे और संबंधित समस्याएं को लेकर कुपोषण पर विचार करता है।

 

मुंबई के लोकमान्य तिलक जनरल म्यूनिसिपल अस्पताल में बाल चिकित्सा के प्रमुख डॉ. अलका जाधव ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, “कम वजन कुपोषण के लक्षण हैं। इसका मतलब है कि बच्चा कुपोषित है और उन्हें वह पोषण नहीं मिल रहा है, जिसकी बच्चे को जरुरत है। ”सरकार के आंकड़ों ने भी बाल कुपोषण से संबंधित चिंताजनक आंकड़े दिखाए हैं।

 

मुंबई उपनगर के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -4 (2015-16) के मुताबिक, पांच वर्ष से कम आयु के 21.3 फीसदी स्टंड, 20.3 फीसदी वेस्टेड और 28.9 फीसदी कम वजन के हैं। हम बता दें कि मुंबई उपनगर की आबादी मुंबई से तीन गुना है और उत्तर में दहिसर तक और पूर्व में मुलुंड तक फैली हुई है।

 

एनएफएचएस-4 के आंकड़े मुंबई शहर के लिए बद्तर हैं, जहां पांच साल से कम उम्र के चार बच्चों में से एक स्टंड ( 25.5 फीसदी ), वेस्टेड (25.8 फीसदी ) और कम वजन (22.7 फीसदी) के हैं।इसके अलावा, सर्वेक्षण से पता चलता है कि, छह महीने और दो साल की उम्र के बीच पर्याप्त पोषण का प्रतिशत मुंबई उपनगरीय इलाके में 14.2 फीसदी और मुम्बई शहर में 6.4 फीसदी है।

 

पहुंच और परिणामों की असमानता

 

मुम्बई की ऊंची इमारतें उन असमानताओं को छुपाता है, जो स्वास्थ्य देखभाल, स्वच्छता और सरकारी सेवाओं तक लोगों की पहुंच को दर्शाते हैं। यह मुंबई की झुग्गी बस्तियों में दिखाई नहीं देते हैं, जहां इसकी 41.3 फीसदी आबादी रहती है।

 

मुबंई में झुग्गी आबादी का करीब 60 फीसदी, शहर के 8 फीसदी जमीन पर रहता है, जिनका संघर्ष न केवल रहने के लिए जमीन के लिए है बल्कि बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच के लिए भी है। 2015 सेव द चिल्ड्रन रिपोर्ट, ‘फॉरगॉट्टन वायसेज: द वर्ल्ड ऑफ अर्बन चिल्ड्रेन इन इंडिया’ के अनुसार अन्य क्षेत्रों की तुलना में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों की सुविधाओं तक पहुंच कम है। अन्य क्षेत्रों के लिए आंकड़े 71.2 फीसदी हैं, जबकि झुग्गी बस्तियों के लिए आंकड़े 56.7 फीसदी हैं। बाथरूम के लिए आंकड़े 77.5 फीसदी हैं, जबकि झुग्गी के लिए 66.6 फीसदी हैं।जल निकासी के लिए आंकड़े 44.5 फीसदी के मुकाबले 36.9 फीसदी, एलपीजी के लिए 65 फीसदी के मुकाबले 51.3 फीसदी या शौचालय के लिए 65 फीसदी की तुलना में 81 फीसदी हैं।

 

मुंबई की समस्या, आने वाले वर्षों में देश द्वारा सामना करने वाले सबसे गंभीर चुनौती का प्रतीक है। अगले पांच वर्षों में भारत की आबादी दोगुनी होकर 800 मिलियन तक पहुंचने की संभावना है, जिसमें से 200 मिलियन लोगों के गरीबी में रहने की अनुमान है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने जून 2015 में विस्तार से बताया है।

 

फिर भी, भारतीय सरकार अपने ग्रामीण नगरिकों के लिए आवंटित प्रति व्यक्ति खर्च एक छठा हिस्सा और  ग्रामीण गरीबों के लिए आवंटित की गई राशि का दसवां हिस्सा शहरी नगरिकों को आवंटित करता है।

 

दिल्ली की पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एडिशनल प्रोफेसर सुपर्णा घोष जराथ ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया, “शहरी स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी विकसित हो रही है। स्वास्थ्य सेवाओं के विकेंद्रीकरण की एक जरूरी आवश्यकता है और वर्तमान स्थिति में शहरी स्वास्थ्य व्यवस्था शहरी गरीबों के बीच स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती मांग के अनुरूप नहीं है। इसलिए शहरी गरीबों की समस्याओं का परिमाण अच्छी तरह से ज्ञात नहीं है।”

 

(इस श्रृंखला के अगले भाग में, हम मुंबई के गोवंडी क्षेत्र का दौरा करेंगे। गोवंडी क्षेत्र से कुपोषण के बद्तर आंकड़े सामने आए हैं।)

 

(यादवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 05 जुलाई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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