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भारतीय किशोर यौन क्रांति के लिए नहीं हैं तैयार

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नई दिल्ली: चार भारतीय महिलाओं में से एक (26.8 फीसदी) की शादी 18 साल से पहले हुई है और 15 से 19 वर्ष की आयु में 7.8 फीसदी महिलाएं गर्भवती या मां बनी हैं, जैसा कि वर्ष 2015-16 के नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -4 (एनएफएचएस-4) के डेटा में बताया गया है।

 

वैसे 18 साल से पहले विवाह होने वाली महिलाओं का प्रतिशत 2005-06 ( एनएफएचएस – 3) में 47.4 फीसदी से गिरा है और 15-49 वर्ष की आयु वर्ग में विवाहित महिलाओं में गर्भ निरोधकों का उपयोग 56.3 फीसदी से कम हो कर 53.5 फीसदी हुआ है।

 

हालांकि वर्ष 2005-06 में, 2.7 फीसदी लड़के और 8 फीसदी लड़कियों ने 15 वर्ष की उम्र से पहले अपनी यौन शुरुआत की है, लेकिन नवीनतम तुलनात्मक डेटा जारी नहीं किया गया है।

 

किशोर और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर काम कर रहे दिल्ली की एक गैर लाभकारी संस्था, ‘ममता’ के कार्यकारी निदेशक सुनील मेहरा कहते हैं, “ फिर भी, सामाजिक और नीतिगत बाधाओं में किशोरों (10 से 1 9 वर्ष) की यौन और प्रजनन आवश्यकताएं को संबोधित करने की इजाजत नहीं है, क्योंकि बहुत से लोग अविवाहित हैं और सहमति की उम्र से नीचे हैं।”

 

नतीजतन, भारत की 33.6 फीसदी जनसंख्या किशोर गर्भधारण से पैदा होती है। वर्ष 2013 में ‘यूनाइटेड नेशन पॉप्युलेशन फंड’ की समीक्षा के मुताबिक, प्रारंभ में गर्भावस्था में देरी से भारत की 2050 तक अनुमानित 1.7 बिलियन की आबादी में 25.1 फीसदी कटौती हो सकती है।

 

भारत में 253 मिलियन किशोर है, जो किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक है और जापान, जर्मनी और स्पेन की समान आबादी के बराबर हैं, लेकिन देश यह सुनिश्चित करने की और पर्याप्त कार्य नहीं कर रहा है कि वे उत्पादक वयस्क बन गए हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने नवंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

पहले की तुलना में कम राज्यों में किशोरों को सेक्स शिक्षा

 

एचआईवी-एड्स की चिंताओं से प्रेरित होकर भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के साथ मिलकर वर्ष 2005 में किशोरावस्था-शिक्षा कार्यक्रम (एईपी) शुरू किया है। किशोरावस्था में स्वास्थ्य राष्ट्रीय किशोरों के प्रजनन और यौन स्वास्थ्य रणनीति (एनएआरएसएचएस) के तहत वर्ष 2006 में राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में पहली बार सामने आया, जिसमें स्वास्थ्य क्लीनिक शामिल हैं, जो कि किशोरों (10-19 वर्ष) और युवाओं (19 -24 वर्ष) के लिए निवारक और रेफरल सेवाओं की पेशकश करते हैं।

 

स्थापना के दो साल के भीतर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और उत्तर प्रदेश सहित 12 राज्यों में एईपी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जैसा कि scroll.in ने 1 अगस्त 2014 को रिपोर्ट किया है उदाहरण के लिए, वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पाठ्य सामग्री में ग्राफिक्स का बहुत ज्यादा इस्तेमाल है। वह चाहते थे कि किशोर शिक्षा “योग और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों” पर केंद्रित हो।

 

‘नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन’ (एनएसीओ) ने विवादास्पद चित्रण और शब्दों को स्पष्ट रूप से हटा दिया, जैसे कि ‘संभोग’, ‘कंडोम’ और ‘हस्तमैथुन’, जैसा कि Scroll.in ने बताया है। Scroll.in ने आगे यह भी बताया है कि अप्रैल 2009 में, एम. वेंकैया नायडू ( भारत के उपराष्ट्रपति और तत्कालीन राज्य सभा  के सदस्य ) की अध्यक्षता वाली एक राज्यसभा समिति ने कहा कि किशोर-शिक्षा कार्यक्रम से ” बुरी तरह की संलिप्तता को बढ़ावा मिलेगा, सांस्कृतिक कपड़ों की बुनियाद पर प्रहार होगा, भारतीय युवा भ्रष्ट होंगे और शिक्षा प्रणाली पतन की ओर बढ़ेगा और कौमार्य उम्र को घटाएगा। ”

 

लैंगिकता पर काम करने वाली नई दिल्ली स्थित एनजीओ तर्शी में कार्यक्रम समन्वयक दीपिका श्रीवास्तव कहती हैं, “यह कहना मुश्किल है कि कितने राज्य किशोरावस्था शिक्षा कार्यक्रम को लागू कर रहे हैं। कई राज्यों ने इसे पहले प्रतिबंधित कर दिया था, जो फिर शुरू कर दिया है, जैसे कि केरल में।”

 

वह कहती हैं, “ हालांकि, जहां कार्यक्रम लागू किया जा रहा है, वहां कार्यान्वयन की गुणवत्ता का प्रश्न खुला है। यह देखते हुए कि लैंगिकता की शिक्षा लंबे समय तक आयोजित दृष्टिकोण और सांस्कृतिक या नैतिक मानदंडों को संबोधित करती है, यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कार्यान्वयन महत्वपूर्ण है कि युवा लोग यौनकिता से संबंधित सटीक, गैर-निष्पक्ष जानकारी प्राप्त करते हैं।”

 

यौन संबंध बनाने वाले किशोरों की संख्या ज्यादा, कुछ ही इस्तेमाल कहते हैं जन्म नियंत्रण तकनीक

 

बिहार में,  सर्वेक्षण में शामिल किए गए 10,400 से अधिक किशोरों (15-19 वर्ष) में से 14.1 फीसदी अविवाहित किशोर लड़के और 6.3 फीसदी अविवाहित किशोर लड़कियां शादी से पहले यौन संबंध बना चुकी थीं। जनसंख्या परिषद की एक 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, उनमें से 22 फीसदी लड़के और 28.5 फीसदी लड़कियां 15 वर्ष की आय़ु से पहले यौन संबंध बना चुकी थीं।

 

अध्ययन में पाया गया कि, 20.3 फीसदी से अधिक अविवाहित लड़के और 8.2 फीसदी अविवाहित लड़कियों से ज्यादा ने कंडोम का इस्तेमाल नहीं किया है। 15-19 वर्ष की आयु वाली विवाहित लड़कियां जो अपने साथी के साथ यौन संबंध में हैं, उनमें से केवल 11.2 फीसदी ने शादी के भीतर गर्भनिरोधक का इस्तेमाल किया और 45.2 फीसदी के पास बच्चों के बीच अंतर की एक पूरी नहीं हुई जरूरत थी।

 

संस्था के सर्वेक्षण में, इसी तरह के परिणाम उत्तर प्रदेश (यूपी) में भी उभरे हैं, जहां 17.2 फीसदी किशोर (15-19 वर्ष) लड़के और 6.2 फीसदी किशोर लड़कियां यौन रुप से सक्रिय पाए गए हैं। भारत की 253 मिलियन किशोर आबादी में से यूपी और बिहार की संयुक्त रुप से 30 फीसदी की हिस्सेदारी है।

 

राष्ट्रीय स्तर पर, जबकि तीन राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (1992-93, 1998-99, 2005-06) ने लगभग बराबर अनुपात (59.1 फीसदी, 59.8 फीससदी और 58.2 फीसदी) की गर्भवती और किशोर माताओं की सूचना दी है, किशोरावस्था में पहली गर्भावस्था में लगातार वृद्धि(11.7 फीसदी, 12.4 फीसदी और 14.4 फीसदी)  हुई थी। जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड डायग्नॉस्टिक रिसर्च में 2015 की एक समीक्षा में कहा गया, ” इस प्रवृति के पीछे का कारण प्रारंभिक विवाह और निम्न गर्भनिरोधक उपयोग है।”विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्पष्ट है कि भारतीय किशोरों में यौन सक्रियता बढ़ी है।

 

भारतीय किशोर में यौन सक्रियता

 

कई तरह के अध्ययनों (यहां, यहां और यहां) में पाया गया है कि अन्य देशों के किशोरों की तरह भारत के किशोर यौन रुप से सक्रिय हैं।

 

प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं में मासिक धर्म संबंधी विकारों, मासिक धर्म की स्वच्छता, सैनिटरी नैपकिन का उपयोग, गर्भ निरोधकों का उपयोग, यौन संबंध, यौन शोषण और लिंग हिंसा पर परामर्श शामिल हैं।

 

मेहरा कहते हैं, हालांकि, मासिक धर्म की स्वच्छता की गतिविधियों और और स्कूलों के माध्यम से आयरन फोलिक परिपूरक और आंगनवाड़ी (दिन देखभाल केंद्र) के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रतिरक्षण में हाल ही में तेज गति आई है लेकिन यौन और प्रजनन स्वास्थ्य “पूरी तरह से उपेक्षित” है।

 

‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकोट्री’ में वर्ष 2015 की समीक्षा में कहा गया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली किशोरों की यौन और प्रजनन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार नहीं है। स्वास्थ्य देखभाल  पेशेवरों को अक्सर यौन और प्रजनन की जरूरतों के बारे में जानकारी की कमी होती है, और चूंकि सेक्स स्वयं एक निषिद्ध विषय है, इसलिए किशोरों के यौन इतिहास आमतौर पर दर्ज नहीं किए जाते हैं।

 

जर्नल में छपी समीक्षा में कहा गया है, “गलत सूचना में युवाओं में गलतफहमी पैदा करने की क्षमता है, जिससे उन्हें सेक्स के प्रति स्वस्थ व्यवहार अपनाने की संभावना कम हो जाती है।”

 

उसमें जल्द ही किसी भी समय में सुधार की संभावना नहीं है क्योंकि यौन सक्रिय किशोरों में सरकारी कार्यक्रम विशेष रूप से लोकप्रिय नहीं हैं।

 

सरकारी कार्यक्रमों के बारे में किशोरों को बहुत कम जानकारी

 

अक्तूबर 2014 में, सरकार ने ‘राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम’ (आरकेएसके) शुरू किया गया था जो ‘एनएआरएसएचएस’ के तहत स्थापित किशोरों के अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिक (एएफएचसी) की तरह ही किशोरों की जरूरतों के प्रति गांवों में स्वास्थ्य क्लीनिक बनाया है।

 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इन कार्यक्रमों का कोई मूल्यांकन सार्वजनिक नहीं किया है। स्वतंत्र अध्ययनों में व्यापक अज्ञानता दिखाई देती है।

 

अध्ययन में पाया गया कि गांवों में 5 फीसदी से अधिक युवा पुरुषों और 8 फीसदी युवा महिलाओं को एएफएचसी के संबंध में जानकारी नहीं थी, हालांकि उनके गांव 5-10 किमी दूर के बीच स्थित थे, जैसा कि महाराष्ट्र, राजस्थान और झारखंड में जनसंख्या परिषद द्वारा आयोजित एक 2014 के अध्ययन में बताया गया है। सिर्फ  0.8 फीसदी युवा महिलाओं ने एएफएचसी से सेवाएं लीं, जबकि एक भी युवा पुरुषों ने ऐसा नहीं किया।

 

82-90 फीसदी (इन आंकड़ों की एक सीमा होती है क्योंकि प्रश्न पूछे गए तीन स्वास्थ्य समस्याओं को कवर किया गया) किशोरों को इससे मदद नहीं मिलने का मुख्य कारण उनकी समस्याओं को गंभीर नहीं माना जाना था; दूसरा सबसे आम कारण था शर्मिंदगी थी,  जैसा कि वर्ष 2014 के अध्ययन में पाया गया है।

 

वर्ष 2017 के इस अध्ययन के अनुसार,  साक्षत्कार लिए गए 10-14 साल की आयु वर्ग के लड़कों और लड़कियों में से 1 फीसदी से अधिक को आरकेएसके के बारे जानकारी नहीं थी और केवल 4-7 फीसदी ने स्वास्थ्य सेवाओं और एक मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से जानकारी प्राप्त की थी।

 

हालांकि, आरकेएसके के साथ, प्रयास अब किशोरों को अपने स्वयं के गांवों से पीअर शिक्षकों के माध्यम से शामिल करने के लिए है जो, किशोर यौन और प्रजनन की जरूरतों के लिए “गैर-न्यायिक सेवाएं” प्रदान करने के लिए सहायक नर्स दाइयों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, परामर्शदाताओं और चिकित्सा अधिकारियों को संवेदित करते हुए, विभिन्न जीवन कौशल के बारे में बात करेंगे। इनमें पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, गैर-संचारी रोग, लिंग और यौन और प्रजनन स्वास्थ्य शामिल हैं, जैसा कि एक गैर लाभकारी संस्था ‘चाइल्ड इन नीड’ की सहायक निदेशक, इंद्राणी बनर्जी भट्टाचार्य बताती हैं।

 

अनचाहे गर्भधारण के पीछे गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल की कमी

 

जागरूकता की कमी या शर्मिंदगी के कारण सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच न होने के कारण दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।

 

वर्ष 2012 में, किशोरों की प्रजनन दर ने भारत के कुल प्रजनन दर में 17 फीसदी का योगदान दिया है और 20 से कम उम्र के महिलाओं में 14 फीसदी जन्म अनियोजित थे, जैसा कि ‘जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड डाइअग्नास्टिक रिसर्च’ के वर्ष 2015 के अध्ययन में बताया गया है।

 

भारत की 48.5 मिलियन गर्भधारण में से आधे अनियंत्रित थे, जैसा कि FactChecker की दिसंबर, 2017 की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

 फैमली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफपीए) की निदेशक अमिता धनू ने 19 वर्षीय साना (बदला हुआ नाम) का उदाहरण दिया है, जो एक रिश्ते में थी और केवल आपातकालीन गर्भनिरोधक के बारे में पता था। इसलिए, जब भी उन्हें असुरक्षित यौन संबंध बनाए थे, उन्होंने केवल आपातकालीन गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल किया था।

 

इसका परिणाम यह था कि जब साना के पिरीअड एक बार नहीं आया तो उसने गर्भपात करने के लिए एक आपातकालीन गर्भनिरोधक लिया। लेकिन फिर उनका पिरीअड नहीं आया और देश भर के 39 एफपीए इंडिया क्लीनिकों में से एक में वह आईं और वहां उन्हें पता लगा कि वो गर्भवती हैं – अपातकालीन गर्भनिरोधक गर्भावस्था के बाद गर्भपात नहीं कर सकते हैं। उन्होंने फिर से असुरक्षित यौन संबंध बनाया। उसे ओरल गर्भ निरोधकों के बारे में सलाह दी गई और एक सुरक्षित गर्भपात किया गया।

 

धनु कहती हैं, “इन [एफपीए इंडिया] क्लिनिकों में सेवा प्रदाताओं और कर्मचारियों को किशोरों के स्वास्थ्य के मुद्दों से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। क्लीनिक में पर्यावरण अनुकूल है और सेवाएं युवा लोगों के लिए उपयुक्त समय पर उपलब्ध हैं।”

 

यौन शिक्षा और परामर्श के बिना, किशोर भी यौन संचारित संक्रमण (एसटीआई) और एचआईवी प्राप्त करने के उच्च जोखिम स्तर पर हैं।

 

15-19 वर्ष की आयु समूह में, जिन्होंने संभोग किया, उनमें से 10.5 फीसदी लड़कियां और 10.8 फीसदी लड़कों ने एसटीआई या एसटीआई के लक्षणों की सूचना दी है और 0.07 फीसदी लड़कियां और 0.01 फीसदी लड़के एचआईवी पॉजिटिव पाए गए हैं, जैसा कि 2005-06 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में बताया गया है। 15-24 वर्षों के बीच के युवाओं का, आबादी का 25 फीसदी हिस्सा होने के साथ भारत के एड्स बोझ में 31 फीसदी का योगदान है।

 

 विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्पष्ट है कि गर्भनिरोधक पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं।

 

आपातकालीन गर्भ निरोधकों की आवश्यकता

 

किशोरों के लिए उपलब्ध गर्भ निरोधकों में से इंट्रा गर्भाशय के उपकरण और सुबह की गोलियां की सिफारिश नहीं की जा सकती, क्योंकि वे नियमित रूप से यौन गतिविधि वाले लोगों के लिए हैं।

 

एकमात्र विकल्प कंडोम है, “फिर भी, इसका मतलब है कि लड़कियों को अपने पुरुष भागीदारों पर सुरक्षा के लिए भरोसा करना होता है जो आदर्श नहीं है”, जैसा कि एक गैर लाभकारी संस्था, पॉप्युलेशन हेल्थ सर्विसेज (इंडिया) के निदेशक विवेक मल्होत्रा कहते हैं। यह संस्था गर्भनिरोधक उत्पादों को सस्ता उपलब्ध कराने की कोशिश करता है। मल्होत्रा कहते हैं, “एक विकल्प के रूप में आपातकालीन गर्भ निरोधकों को सस्ते और व्यापक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए।”

 

आज, काउंटर पर, आपातकालीन गर्भनिरोधक व्यावसायिक उत्पाद के रूप में उपलब्ध हैं, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक किशोरों के लिए कीमत बहुत अधिक है। यदि स्कूलों में नहीं, तो आपातकालीन गर्भ निरोधकों को कॉलेजों में उपलब्ध होना चाहिए और सरकार द्वारा किफायती दरों पर बेचा जाना चाहिए।

 

किशोर, जो गर्भ निरोधकों के बारे में नहीं जानते हैं या जिनके पास पर्याप्त पहुंच नहीं है, उन्हें प्रारंभिक और अनियोजित गर्भधारण होने की संभावना है।

 

प्रारंभिक और अनियोजित गर्भधारण के प्रतिकूल परिणामों हैं, जैसे एक्लम्पसिया-गर्भधारण के दौरान दौरे, जन्म के समय कम वजन, प्रारंभिक नवजात मृत्यु और जन्मजात विकृति। गर्भवती किशोरों के स्कूल छोड़ने की अधिक संभावना है, जिससे उनका और उनका परिवार भविष्य में प्रभावित हो सकता है।

 

यह लेख इंटरनेश्नल पेरेंटहुड फेडरेशन (आईपीपीएफ) की ओर से वित्तीय सहायता से तैयार किया गया है। इस लेख की सामग्री फैमली प्लानिंग एसोसिएशन, इंडिया (एफपीए) की एकमात्र जिम्मेदारी है, और किसी भी परिस्थिति में इंडियास्पेंड को आईपीपीएफ की स्थिति को प्रतिबिंबित करने के रूप में नहीं माना जा सकता है। एफपीए इंडिया 18 राज्यों में 44 शाखाओं और परियोजनाओं के माध्यम से संचालित करती है ताकि सभी के लिए यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं और जानकारी तक पहुंच सुनिश्चित हो सके।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख अंग्रेजी में 12 जनवरी, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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