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बच्चों से बलात्कार के दोषी को मौत की सजा पर बहस जारी

चैतन्य मल्लापुर,
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Supreme Court

 

मुंबई: 21 अप्रैल, 2018 को, भारत सरकार ने 12 साल से कम उम्र के बच्चों के बलात्कार के लिए मृत्युदंड की अनुमति देने के लिए एक अध्यादेश पारित किया है। लेकिन अहम सवाल ये है कि क्या मौत की सजा एक प्रभावी उपाय है?

 

मानवाधिकार के समर्थकों और संयुक्त राष्ट्र ने तर्क दिया है कि मृत्यु की सजा अमानवीय और क्रूर है और इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए। भारत में,  इस अध्यादेश ने इस बहस को पुनर्जीवित कर दिया है।

 

मानवीय तर्क के अलावा, नवीनतम आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि भारत में ट्रायल में देरी से मौत की सजा अप्रभावी होती है और परिणामस्वरूप अभियुक्त और उनके परिवारों के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।

 

जनवरी 2018 में प्रकाशित, ‘डेथ पेनल्टी इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, 27 साल पहले 1991 के सबसे पुराने मामले के साथ दिसम्बर 2017 के अंत तक भारत में मौत की पंक्ति में 371 कैदी थे।

 

मौत की सजा में भी गिरावट हुई है।  2017 में, राज्यों में सत्र अदालतों द्वारा 109 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई है, जो कि 2016 में 149 के आंकड़ो से 27 फीसदी नीचे है, जैसा कि ‘सेंटर ऑन द डेथ पेनल्टी’ द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है।

 

हालांकि, पिछले 13 वर्षों में, म1त की सजा का इंतजार कर रहे केवल चार कैदियों को सजा के तौर पर मृत्यु-दंड दिया गया है। इनमें से एक ने नाबालिग के साथ बलात्कार किया था और तीन आतंकवाद के दोषी पाए गए थे।

 

भारत के कानून आयोग ने मृत्युदंड पर 2015 की रिपोर्ट में कहा, “मौत की पंक्ति में खड़े कैदियों को ट्रायल, अपील और उसके बाद कार्यकारी राज-दया में लंबी देरी का सामना करना पड़ता है। इस इंतजार के दौरान ऐसे कैदियों को भयानक चिंता होती है। “

 

जुलाई 2013 और जनवरी 2015 के बीच किए गए और फरवरी 2016 में ‘सेंटर ऑन द डेथ पेनल्टी’ द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मौत की पंक्ति में खड़े 373 कैदियों के ट्रायल के लिए औसत समय पांच साल था। 127 कैदियों का ट्रायल पांच साल से अधिक समय तक चला और 54 कैदियों के लिए समय 10 वर्षों का था।

 

ऐसे कैदी, जिनकी दया याचिकाएं भारत के राष्ट्रपति ने खारिज कर दी थीं, उनका जांच के तहत जेल में बिताए गया औसत समय 16 साल नौ महीने का था, और मृत्यु की सजा के तहत औसत समय 10 साल पांच महीने का था।ऐसे मामलों  में जेल में कैदी द्वारा बिताए जाने का सबसे लंबा समय 25 साल था, और मृत्यु की कतार में बिताए जाने का सबसे लंबा समय 21 साल एक महीना था।

 

4 मई, 2018 को, सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले में दिए गए मौत की सजा को बरकरार रखने वाले 2017 के फैसले की समीक्षा के लिए चार अभियुक्तों में से दो की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रखा था, जैसा कि 4 मई, 2018 को ‘द बिजनेस स्टैंडर्ड’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

5 मई, 2018 को ‘डेक्कन क्रॉनिकल’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि पीड़िता की मां मौत की सजा के लिए शीघ्र फांसी के दंड के लिए दबाव डाल रही हैं। निर्भया की मां ने कहा, “ऐसा समय आता है जब कानून और न्याय में मेरा विश्वास निश्चित होता है, लेकिन अदालत की सुनवाई प्रक्रिया से  निराशा होती है।”

 

लेकिन अभियुक्तों के वकील ने कहा कि राज्य को दोषी ठहराने का अधिकार नहीं है। दो अभियुक्तों के वकील एपी सिंह ने कहा, “फांसी का दंड अपराधियों को मारता है, अपराध को नहीं … न्यायपालिका यह कैसे तय कर सकती है कि किसे जिंदा रहना चाहिए और किसे मरना चाहिए?”

 

नया अध्यादेश बच्चों के यौन शोषण को रोकने में मदद नहीं कर सकता है। ‘सेंटर ऑन द डेथ पेनल्टी’ में सहयोगी (सार्वजनिक मामलों) पूर्णिमा राजेश्वर कहती हैं,  “यह अंडर रिपोर्टिंग की समस्या को बदतर कर देगा। यह महत्वपूर्ण है कि सरकार बाल अधिकार समूहों से परामर्श करे और पीओसीएसओ के कार्यान्वयन का विस्तृत अध्ययन करे, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि बाल यौन शोषण का मुद्दा वास्तव में हल हो। “

 

कैद और मौत की कतार में बिताया गया समय

 

राजेश्वर ने इंडियास्पेंड से बातचीत करते हुए कहा,  “ट्रायल कोर्ट चरण में इसकी पुष्टि के बाद प्रत्येक मामले को उच्च न्यायालय में पुष्टि के लिए भेजा जाना चाहिए। उच्च न्यायालय चरण में पुष्टिकरण के बाद, सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। न्यायिक प्रक्रिया के अलावा, कैदी राज्यपाल और राष्ट्रपति के साथ दया याचिका भी दायर कर सकता है। “

 

उन्होंने इंगित किया कि इन दो समांतर प्रक्रियाओं को पूरा करने से पहले फांसी का दंड नहीं दिया जा सकता है, जिसमें विभिन्न स्तरों पर अपील भी शामिल हैं। राजेश्वर कहती हैं, ” यह, काफी लंबी प्रक्रिया है। इसके अतिरिक्त, भारतीय अदालतों पर बोझ से मामलों को तेजी से आगे बढ़ाना अक्सर मुश्किल हो जाता है। “

 

 

हाल के दिनों में भारत में फांसी का दंड
 

14 अगस्त, 2004 को, धनंजॉय चटर्जी को अपने 42 वें जन्मदिन पर पश्चिम बंगाल में अलीपुर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। चटर्जी को किशोर लड़की के बलात्कार और हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था।

 

21 नवंबर, 2012 को, मोहम्मद अजमल आमिर कसाब, जो 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों से बचने वाला एकमात्र आतंकवादी था, को पुणे की येरवडा जेल में फांसी दी गई थी।

 

9 फरवरी 2013 को, 2001 के संसद हमले के मामले में एक दोषी मोहम्मद अफजल गुरु को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी।

 

30 जुलाई, 2015 को, महाराष्ट्र के सीरियल विस्फोट मामले में एक दोषी, याकूब मेमन को नागपुर के जेल में फांसी दी गई थी।

 

 

भारत में मौत की कतार में कैदी

 

‘बाल बलात्कार के लिए मौत की सजा पेश करने वाला भारत 14 वां देश ‘

 

जम्मू-कश्मीर के कठुआ में जनवरी 2018 को आठ वर्षीय लड़की के साथ गैंगरेप और फिर हत्या और 2017 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव में 17 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार के मामले ने ऐसे अपराधों के लिए अधिक गंभीर सजा की मांग सामने आई। तीन महीने बाद, सरकार ने अध्यादेश पारित किया।

 

राजेश्वर ने कहा, “भारत अब 14 वां देश बन गया है, जिसने बच्चे के बलात्कार (हत्या के बिना) के लिए मौत की सजा पेश की है। प्राथमिक तर्क, यह है कि मृत्युदंड के संभावित अपराधियों पर भी प्रभाव पड़ेगा और इसलिए ऐसे गंभीर अपराधों के लिए  इस दंड को जारी रखना चाहिए। “

 

नेशनल अकादमी की राष्ट्रीय शोध परिषद द्वारा 2013 के अध्ययन, ‘डिटरेंस और डेथ पेनल्टी’ का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि अनुभवजन्य सबूतों से अब तक सुझाव देना बाकी है कि मौत की सजा एक निवारक के रूप में काम कर सकती है? वह कहती हैं, “यह निष्कर्ष निकाला गया कि कम से कम मृत्युदंड के संदर्भ में निवारण एक दोषपूर्ण अवधारणा है।”

 

राजेश्वर कहती हैं, कानून आयोग ने अपनी 2015 की मौत की सजा और न्यायमूर्ति वर्मा कमेटी की रिपोर्ट में निवारक प्रभाव पर सवाल उठाया है और यौन अपराधों के लिए इसके इस्तेमाल की सिफारिश नहीं की है।

 

यौन अपराध से जुड़ी हत्या / हत्या के लिए 2017 में 86 फीसदी मौत की सजा

 

2017 में मौत की सजा पाने वाले 109 कैदियों में से 43 लोगों (39 फीसदी) को यौन हिंसा से जुड़ी हत्या के लिए की मौत की सजा सुनाई गई थी। यहां हत्या के आरोप के साथ मुख्य अपराध बलात्कार था। 2016 में इसी तरह के अपराधों के लिए 24 लोगों को मौत की सजा पाने वालों की तुलना में 79 फीसदी ज्यादा है।

 

अधिकांश मौतों की सजा ( 51 व्यक्तियों (47 फीसदी) को  ) उन कैदियों को सुनाया गया था जिन पर हत्या का आरोप था।  मौत की सजा के लिए अन्य अपराध ‘दंगा और हत्या’ (5), ‘आतंक’ (5), ‘अपहरण और हत्या’ (3), और नशीली दवाओं के अपराध (2) हैं।

 

पूर्णरूपेण हत्या के तहत मौत की सजा और यौन हिंसा से जुड़ी हत्या 2017 में दी गई सभी मौत की सजाओं में से 86 फीसदी थी।

 

2017 में, महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मौत की सजा ( 23 लोगों (21 फीसदी) ) दी गई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश (19) और तमिलनाडु (13) के आंकड़े सबसे ज्यादा रहे हैं।

 

सबसे ज्यादा मौत की सजा, संख्या-186, वर्ष 2007 में सुनाए गए हैं। इसके बाद 164 के आंकड़े के साथ सबसे ज्यादा मौत की सजा सुनाने का साल 2005 रहा है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 2004 और 2013 के बीच सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर 2015 में विस्तार से बताया है। 2014 में 95 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी और और 2015 में 101 लोगों ने मौत की सजा सुनाई थी जिसमें से एक को फांसी का दंड दिया गया था।

 

‘सेंटर ऑन द डेथ पेनल्टी’ के डेटा के अनुसार, 1947 के बाद से भारत में 720 कैदियों को फांसी का दंड दिया गया है। 1947 के बाद से भारत में फांसी का दंड दिए जाने वाले में से करीब आधे मामले ( 354 ) उत्तर प्रदेश से हैं। इसके बाद  हरियाणा (90) और मध्य प्रदेश (73) का स्थान रहा है।

 

मौत की सजा बरकरार वाले 56 देशों में भारत

 

ग्लोबल मानवाधिकार संस्था, एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा मार्च 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, 142 देशों में मौत की सजा समाप्त हो गई है, जबकि 56 ने इसे बरकरार रखा है।

 

भारत के अलावा, अन्य प्रमुख देशों जिन्होंने मृत्युदंड को बरकरार रखा है, उनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जापान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सिंगापुर, थाईलैंड और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।

 

चयनित देशों में मौत की सजा और फांसी का दंड, 2017

Death Sentences And Executions In Selected Countries, 2017
Countries Death Sentences Executions
China 1000+ 1000+
Iran 507+
Saudi Arabia 1+ 146
Iraq 65+ 125+
Pakistan 200+ 60+
Egypt 402+ 35+
United States 41 23
Afghanistan 11+ 5
Malaysia 38+ 4+
Japan 3 4
Indonesia 47+
India 109

Source: Amnesty

 

एमनेस्टी के आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में चीन में 1,000 से अधिक मौत की सजा और फांसी के दंड की सूचना दी गई है। फांसी की सटीक संख्या ज्ञात नहीं है, क्योंकि चीन इसे राज बना कर रखता है।

 

अमेरिका ने 23 को फांसी दी और 41 को मौत की सजा सुनाई, जबकि भारत के पड़ोसी, पाकिस्तान ने 60 से अधिक लोगों को फांसी दिया और 2017 में 200 से अधिक लोगों को मौत की सजा सुनाई।

 

(मल्लापुर विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 28 मई, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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