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नौकरी पर महिलाएं : हरियाणा की एक फैक्टरी में उम्मीद के साथ परंपरा का टकराव

नमिता भंडारे,
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सर्दी आने के साथ जैसे-जैसे दिन छोटे हो जाते हैं, निराश करने वाली यह वास्तविकता सामने आती जाती है कि उसकी पिछले कुछ समय से चल रही नौकरी समाप्त होने जा रही है।

 

उनका गांव हरियाणा के झज्जर जिले में सांपला बस स्टॉप से कुछ किलोमीटर दूर है। गर्मी में जब दिन बड़े होते हैं, तो बस स्टॉप से अकेले चलकर घर जाना सुरक्षित लगता है। लेकिन नवंबर आने पर उनके बस से उतरने तक अंधेरा हो जाता है और पैदल चलकर घर जाना ठीक नहीं लगता।

 

उन्होंने जिंदल स्टील फैक्टरी में चार महीने का प्रशिक्षण लिया था, और जॉब ऑफर को स्वीकार किया था। वह फैक्टरी फ्लोर पर काम करने वाले महिलाओं के पहले बैच में शामिल थीं, लेकिन इसके बावजूद उषा (जो अपना केवल पहला नाम इस्तेमाल करती हैं) ने अपना इस्तीफा दे दिया है। उन्हें मौसम ने मात दी है या शायद उनके राज्य में हो रहे अपराध के आंकड़ों ने। यह केवल हरियाणा की बात नहीं है। पूरे भारत में रोजगार के नक्शे से महिलाओं की संख्या में एक चिंताजनक दर से कमी आ रही है, जैसा इस श्रृंखला के पहले भाग में बताया गया था। वर्ष1990 में महिला श्रम हिस्सेदारी 34.8 फीसदी थी, जो वर्ष 2013 में गिरकर 27 फीसदी रह गई। वर्ल्ड बैंक की अप्रैल, 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया में 2013 में पाकिस्तान के बाद रोजगार में महिलाओं की हिस्सेदारी के लिहाज से भारत की सबसे कम दर थी। वैश्विक स्तर पर केवल अरब देशों में इससे खराब दरें हैं। इस मामले में भारत की स्थिति कमजोर है और हरियाणा में इस मामले में सुधार की संभावनाएं कम दिख रही हैं।

 

श्रम बल हिस्सेदारी के लिहाज से बाकी के भारत के मुकाबले हरियाणा का स्थान

Source: National Sample Survey’s – 68th round

 

जब हम हरियाणा के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में बहुत खराब लिंग अनुपात की बात आती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16 के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में राज्य में पैदा हुए बच्चों में प्रत्येक 1,000 लड़कों पर लड़कियों का अनुपात 836 था, जो 919 के राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है। और इसे देश में बदतर स्थिति कहा जा सकता है।

 

इसके अलावा हरियाणा की छवि महिलाओं के खिलाफ अपराध की अधिक दर से भी जुड़ी है। आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। उदाहरण के लिए, वर्ष 2015 में हरियाणा ने देश में सबसे अधिक गैंग रेप की रिपोर्ट दी थी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के डेटा के अनुसार, हरियाणा में प्रत्येक एक लाख महिलाओं पर गैंग रेप का आंकड़ा 1.6 का था। इसके अलावा राज्य में प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 1.9 के साथ दहेज हत्या की दर दूसरी सबसे अधिक थी। यहां प्रति एक लाख की जनसंख्या पर महिलाओं का पीछा करने की दर 2.7 मामलों के साथ तीसरी सबसे अधिक थी।

 

इसके बावजूद, महिलाओं के लिए एक खतरनाक राज्य की हरियाणा की तस्वीर केवल आंशिक तौर पर सच है।

 

अन्य मानकों पर राज्य का प्रदर्शन अच्छा और राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। उदाहरण के लिए, 75.4 फीसदी की महिला साक्षरता दर, 68.4 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से अधिक है । राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16  के अनुसार, राज्य की 45.8फीसदी लड़कियों ने 10 वर्षों से अधिक की स्कूली शिक्षा पूरी की है और यह भी 35.7फीसदी  के राष्ट्रीय औसत से ऊपर है।

 

रोजगार के लिए कहां जाती हैं हरियाणा की महिलाएं

Source: National Sample Survey’s – 68th round

 

लेकिन, जब रोजगार की बात आती है, आंकड़े निराश करते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16  के अनुसार, हरियाणा की केवल 17.6 फीसदी महिलाओं को पिछले 12 महीनों में कार्य के लिए नकदी का भुगतान किया गया, जो 24.6 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से कम है।

 

बढ़ती शिक्षा के बावजूद कार्यस्थल पर महिलाओं की संख्या क्यों नहीं बढ़ रही? भारत की महिलाएं रोजगार के नक्शे पर इतनी तेजी और चिंताजनक गति से नीचे क्यों जा रही हैं? अगले कुछ महीनों में इंडियास्पेंड जमीनी रिपोर्टों के जरिए महिला श्रम बल हिस्सेदारी में गिरावट की पड़ताल करेगा। इन रिपोर्टों में महिलाओं के रोजगार और कार्यस्थल पर हिस्सेदारी में विभिन्न रुकावटों को समझने की कोशिश की जाएगी।

 

हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कौशल कार्यक्रमों की निगरानी कर रही यूएनडीपी के स्टेट प्रोजेक्ट की प्रमुख कांता सिंह कहती हैं, “हरियाणा विरोधाभासों की भूमि है। एक ओर, महिलाओं को कुश्ती, मुक्केबाजी और जूडो जैसे दमखम वाले खेलों के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन दूसरी ओर, उन्हें विशेषतौर पर औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के लिए जाने से रोका जाता है। बहुत सी लड़कियों और उनके अभिभावकों के लिए खेलों में हिस्सा लेना सरकारी नौकरियां, धन और शोहरत पाने का एक टिकट है।”

 

लड़कियों के लिए शिक्षा एक प्राथमिकता है और यह राज्य की शिक्षा तालिकाओं में प्रदर्शित होता है। कांता सिंह का कहना है कि यह आंकड़ा नौकरियों में तब्दील नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति सरकारी नौकरी चाहता है और इतनी नौकरियां मौजूद नहीं हैं। वह कहती हैं, “एमए या बीए करने के बाद भी उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही या बहुत कम वेतन की पेशकश की जा रही है।”

 

निजी क्षेत्र में नौकरियों को आमतौर पर नीची नजर से देखा जाता है या उन्हें अस्थायी नौकरियां माना जाता है।

इसके अलावा, इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, टेक्सटाइल और ऑटो स्पेयर पार्ट्स जैसे सेक्टर्स में नौकरियां अक्सर गुरूग्राम या पानीपत के औद्योगिक क्षेत्र में मिलती हैं। सिंह कहती हैं, “एक महिला कैसे एक दूरदराज के गांव से यात्रा कर सकती है? अगर उसे गुरूग्राम में नौकरी मिलती है, तो वह कहां रहेगी? नौकरी मिलने के बाद किफायती ट्रांसपोर्टेशन और रिहाइश जैसी मदद की कमी भी एक समस्या है।”

 

महिला का घूंघट गौरव की बात

 

झज्जर जिले के रोहाद गांव में जिंदल स्टील फैक्टरी में चिनगारियां दिख रही हैं। यहां महिलाओं ने मई, 2016 में चार महीने के प्रशिक्षण के पहले बैच के बाद से फैक्टरी फ्लोर पर अपनी जिम्मेदारियां संभाली हैं। सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी हासिल करने, मशीनें चलाना और फैक्टरी फ्लोर पर काम करने के नियमों को सीखने के बाद, 27 युवा महिलाएं कार्य के लिए पूरी तरह तैयार थीं।

 

इसके एक वर्ष बाद, 72 महिलाओं ने जेएसएल लाइफस्टाइल और दिशा प्रोजेक्ट- यूएनडीपी, इंडिया डिवेलपमेंट फाउंडेशन और जेंटो के बीच भागीदारी, के बीच सार्वजनिक-निजी भागीदारी के हिस्से के तौर पर प्रशिक्षण पूरा किया। इनमें से, अभी 62 प्लांट में काम कर रही हैं और उन्हें कानून के अनुसार 8,340 रुपये प्रतिमाह का न्यूनतम वेतन मिल रहा है। प्रशिक्षण पूरा करने वाली कुछ महिलाओं ने नौकरी की पेशकश पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। जेएसएल लाइफस्टाइल के डिप्टी मैनेजर (एचआर) राकेश कौशिक ने बताया, “कुछ का विवाह हो गया और अन्य उच्च शिक्षा के लिए चली गई।” सिंह ने इसके साथ जोड़ा कि दो महिलाओं को अधिक वेतन पर बेहतरी नौकरी मिली है।

 

वर्ष 2003 में शुरू हुई इस फैक्टरी के फ्लोर पर कभी महिलाओं को नहीं देखा गया था। किसी महिला को कभी फैक्टरी के अंदर नहीं देखा गया था। कौशिक ने कहा, “उन्हें बाहरी दुनिया की कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन अब वे यहां हैं तो कार्य का वातावरण बेहतर ढंग से बदला है।” उन्होंने बताया, “अन्य पुरुष उनके सामने गलत भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकते। वे हमारी मांएं और बहनें हैं। तो हमें नियोक्ता के तौर पर निश्चित रूप से फायदा हुआ है।”

 

फैक्टरी में वेलफेयर ऑफिसर, पूजा शर्मा ने बताया, “सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं के स्वभाव और आत्मविश्वास के स्तर में है।” राजस्थान से संबंध रखने वाली चार बहनों में से एक पूजा राज्य के लिए कुछ अलग हैं। वह बहादुरगढ़ में पेइंग गेस्ट के तौर पर रह रही हैं। वह कहती है, “मैं अपने कार्य के जरिए पहचान बनाना चाहती हूं।”

 

हरियाणा एक पितृ प्रधान समाज वाला राज्य है। इसकी खाप पंचायतें अक्सर लड़कियों को क्या पहनना चाहिए या क्या नहीं और किससे विवाह करना चाहिए और किससे नहीं, जैसे आदेश देने के लिए सुर्खियों में रहती हैं। राज्य की एक सरकारी पत्रिका ‘कृषि संवाद’ में हाल ही में घूंघट ओड़े एक महिला के सिर पर चारा उठाकर ले जाने की फोटो छपी थी। इसके कैप्शन में लिखा था: घूंघट की आन-बान, म्हारा हरियाणा की पहचान।

 

चुनौती महिलाओं को पढ़ने के लिए आश्वस्त करने की नहीं है। चुनौती उन्हें पितृ प्रधान राज्य में कार्य करने और अपनी आकांक्षा को व्यक्त करने की अनुमति देने की है। सिंह कहती हैं, “लड़कियों और महिलाओं और उनके परिवारों को यह आश्वस्त करने में बड़ा सामाजिक निवेश करने की जरूरत है कि उन्हें क्यों कार्य करने, वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनने और पितृसत्ता से बाहर निकलने की जरूरत है।”

 

स्टील फैक्टरी में महिलाओं ने एक बड़े बंधन को तोड़ा है। विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच अंतर स्पष्ट है। लगभग सभी अविवाहित महिलाओं का कहना है कि वे यह नौकरी ‘अभी के लिए’ कर रही हैं और भविष्य में उनके करियर की संभावनाएं विवाह के बाद उनके पति पर निर्भर करेंगी।

 

प्रीति शर्मा बताती हैं, “यह मेरे जेब खर्च के लिए है। मैं विवाह के बाद कार्य करना जारी रखूंगी या नहीं इसका निर्णय मेरे पति लेंगे।”

 

झज्जर में पॉलीटेक्नीक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लेने वाली ज्योति कादियान को पता है कि उनके लिए समय निकल रहा है। उनकी सगाई नौसेना के एक व्यक्ति से हो चुकी है और विवाह नवंबर में होना है। वह जानती हैं कि फैक्टरी में अब उनके कुछ ही दिन बचे हैं। उनके भावी पति को उनके कार्य करने से समस्या नहीं है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि केवल एक सरकारी नौकरी ही सम्मानजनक होगी। ज्योति ने कहा, “गांव में बहुत से लोग सोचते हैं कि निजी क्षेत्र में कार्य करना अच्छा नहीं है। मैं सरकारी नौकरी के लिए काफी कोशिश कर रही हूं, लेकिन यह मिलना आसान नहीं है।”

 

दूसरी ओर, विवाहित महिलाएं कहती हैं कि वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए कार्य कर रही हैं।

 

 

कार्य और परिवार के कामों में संतुलन बनाना मुश्किल है।

 

मोनिका रोहिल ने प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, क्योंकि वह अपनी 18 महीने की बेटी का भविष्य सुरक्षित करना चाहती थी। उनकी और बच्चों की कोई योजना नहीं है। मोनिका का दिन सुबह 5 बजे शुरू होता है। जब वह जागती हैं, अपनी बेटी के लिए दूध गर्म करती हैं, अपने पति का लंच पैक करती हैं, जो एक अन्य फैक्टरी में काम करते हैं। बर्तन मांजती हैं, कपड़े धोती हैं, स्नान करती हैं और फिर 8.45 पर अपने पति की ओर से उपहार में दिए गए टू-व्हीलर होंडा एक्टिवा पर कार्य के लिए निकल जाती हैं। पास ही में रहने वाली उनकी मां उनके बाहर रहने के दौरान उनकी बेटी की देखभाल करती हैं।

 

कार्य से वापस घर आने पर, उन्हें अपनी बेटी के साथ खेलने के लिए कुछ समय मिलता है और इसके बाद डिनर तैयार करने का समय हो जाता है। वह अक्सर 11 बजे से पहले नहीं सो पाती, कई बार सोते-सोते आधी रात का वक्त हो जाता है।.

 

क्या उनके पति घर के कार्यों में सहायता करते हैं? “निश्चित तौर पर”, वह कहती हैं, “जब मैं डिनर तैयार करती हूं तो वह हमारी बेटी के साथ खेलते हैं।” । इसके बाद कुछ देर सोचकर वह बताती हैं, “प्रत्येक सुबह जल्दी आने वाले टैंकर से पानी लाना भी उनका काम है, क्योंकि उनके इलाके में नल का पानी गंदा है।”

 

राजेश कश्यप, 14 और 10 वर्ष के दो बच्चों की मां हैं। उनके जैसी  अन्य महिला अपने परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए कार्य करती हैं। राजेश बताती हैं, “मेरे दोनों बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। हम एक आमदनी से अपने खर्च पूरे नहीं कर सकते।” उनके पति ड्राइवर हैं और अपने काम के अधिक घंटों के कारण घर के काम में हाथ नहीं बंटा पाते। राजेश कहती हैं, “लेकिन मेरे दोनों बच्चे काफी मदद करते हैं।”

 

जिन्होंने प्रशिक्षण लिया है और नौकरी नहीं कर रही हैं, उनसे अगर पूछा जाता है तो अक्सर उत्तर यह होता है कि वे पढ़ रही हैं। सोनिया रोहिल्ला ने स्टील फैक्टरी में प्रशिक्षण लिया था, लेकिन उन्होंने नौकरी की पेशकश ठुकरा दी। उनका कहना है कि वह बीटेक की प्रवेश परीक्षा के लिए पढ़ रही हैं।

 

मोनिका से यह पूछने पर कि वह अपनी नौकरी को किस तरह से देखती हैं तो उनका बिना किसी हिचक के जवाब था, “यह पक्का है कि इससे मुझे एक आमदनी मिली है। लेकिन इससे अधिक इसने मुझे एक पहचान दी है।”

 

(नमिता भंडारे दिल्ली स्थित एक पत्रकार हैं और भारत के लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 12 अगस्त 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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