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नोटबंदी के एक साल बाद भी नकदी रहित अर्थव्यवस्था में क्यों नहीं शरीक हो पा रहे फूलों के किसान ?

श्रेया शाह,
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केशू पटेल और उनके बेटे कांतिलाल मध्य प्रदेश के मिर्जापुर में अपने खेत में गेंदे के फूल तोड़ रहे हैं। नोटबंदी के बाद, नकदी मिलने को लेकर अनिश्चितता है और इस वजह से वह परेशान हैं। उन्हें अपने सभी लेन-देन के लिए और रोजाना की जरूरत का सामान खरीदने, श्रमिकों, ट्रांसपोर्टरों को भुगतान करने के लिए नकदी की आवश्यकता होती है।

 

मिर्जापुर और इंदौर (मध्य प्रदेश): सरकार के 500 और 1,000 रुपये के नोटों को अमान्य करने के फैसले के 364 दिनों बाद, 7 नवंबर, 2017 को इंदौर की फूल मंडी में केशू सिंह पटेल (56) कहीं दिखाई नहीं दे रहे। इस संवाददाता की ओर से उनके सेल फोन पर लगातार कॉल करने पर यह संदेश मिलता रहाः “आपने जो नंबर डायल किया है वह स्विच ऑफ है।”

 

इंडियास्पेंड ने 8 नवंबर, 2017 की सुबह, मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर के निकट मिर्जापुर में पटेल को उनके खेत पर गेंदे के फूल तोड़ते पाया। पटेल ने बताया, “पिछले 20 दिनों से फोन काम नहीं कर रहा। इसकी मरम्मत नहीं हो सकती और हमारे पास अभी एक नया फोन खरीदने के लिए पैसा नहीं है।”

 

पटेल की यह स्थिति डिजिटल पेमेंट को अपनाने में छोटे किसानों को हो रही मुश्किल का संकेत देती है। यह मुश्किल पिछले एक वर्ष के दौरान बढ़ी है।

 

हालांकि, किसानों और व्यापारियों का कहना है कि नोटों को अमान्य करने के कदम का फूल मंडी में कीमतों पर लंबा असर नहीं पड़ा, लेकिन बड़ी ट्रांजैक्शंस के लिए चेक से भुगतान से किसानों के पास नकदी आने में देरी हुई है। इससे घर की खरीदारी के फैसलों पर असर पड़ा है क्योंकि छोटे किसानों और व्यापारियों को विशेषतौर पर बैंकिंग सिस्टम, और वित्तीय और डिजिटल साक्षरता कम होने के कारण संघर्ष करना पड़ रहा है।

 

बहुत से किसानों के पास स्मार्टफोन नहीं है। देश में 1 अरब लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है- इस वजह से वे मोबाइल बैंकिंग सर्विसेज या इंटरनेट-आधारित भुगतान व्यवस्थाओं का उपयोग नहीं कर सकते। इंडियास्पेंड ने पिछले वर्ष डीमॉनेटाइजेशन या स्थानीय भाषा में कहें तो नोटबंदी के असर को समझने के लिए पटेल के साथ एक दिन बिताया था। बाजार में नकदी की कमी के कारण, विवाह के सीजन में भी फूलों की कीमतें कम रही थी, इससे अक्टूबर और जनवरी के महीनों के बीच पटेल की सामान्य आमदनी 70फीसदी कम हो गई थी।

 

सर्कुलेशन में मौजूद भारतीय करेंसी के 14 लाख करोड़ रुपये- या वैल्यू के लिहाज से 86 फीसदी को एक रात में अमान्य करने के फैसले के एक वर्ष बाद- इंडियास्पेंड इस कदम के किन्हीं लंबी अवधि के प्रभावों को जानने के लिए पटेल और इंदौर की फूल मंडी पहुंचा।

 

नकदी अभी भी सबसे महत्वपूर्ण, कार्ड या चेक चलन में नहीं

 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 11.86 करोड़ किसान हैं और पटेल इनमें से एक हैं। किसानों की यह संख्या फिलीपींस की जनसंख्या के बराबर है। देश के सबसे निर्धन राज्यों में से एक मध्य प्रदेश में लगभग 98 लाख किसान रहते और कार्य करते हैं। पटेल एक “छोटे किसान” हैं, क्योंकि उनके पास करीब 2.5 एकड़ जमीन है,  2010-11 की कृषि जनगणना के अनुसार, एक भारतीय किसान के पास औसत जमीन (2.84 एकड़) से कम है। कृषि जनगणना के बारे में इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 में रिपोर्ट दी थी।

 

इस वर्ष, पटेल ने पहले प्याज बेचे और उन्होंने बताया कि प्याज उनकी उम्मीद से कम दाम पर बिके। लेकिन उनकी मुख्य समस्या व्यापारियों के चेक के जरिए भुगतान करने पर जोर देने से जुड़ी थी, कुछ व्यापारियों ने तो बाद की तिथि के चेक देने की बात कही थी। पटेल ने कहा, “बैंक खाते में पैसा आने में 4-5 दिन लगते हैं, और इसके बाद हमें बैंक जाकर रकम निकालनी होगी।” फसल को ले जाने सहित प्रतिदिन के लेन-देन बमुश्किल 500-1,000 रुपये के होते हैं और इनके लिए बैंकिंग सिस्टम का उपयोग करना बड़ी समस्या है।

 

पटेल के अनुसार, “पहले आप चेक जमा करने बैंक जाते हैं। जब आप रकम निकालने के लिए वापस जाते हैं तो कई बार वे आपसे कहते हैं क हस्ताक्षर मेल नहीं खाते, कई बार आपसे आधार कार्ड लाने के लिए कहा जाता है।” उन्होंने बताया कि उसी गांव में रहने वाले उनके बड़े भाई ने करीब पांच दिन पहले 25 क्विंटल सोयाबीन बेची थी, लेकिन अभी तक उनके खाते में पैसा नहीं आया है।

 

मध्य प्रदेश सरकार ने कहा था कि किसानों को 50,000 रुपये तक का भुगतान नकद किया जा सकता है, लेकिन रिपोर्टों में बताया गया है कि किसानों को अभी भी चेक से भुगतान किया जा रहा है।

 

 पटेल कहते हैं, “अगर हमारी फसलों पर कीड़े लगते हैं तो हमें तुरंत पैसे की जरूरत होती है। अगर हम तुरंत दवाई (कीटनाशक या फफूंदनाशक) का छिड़काव नहीं करते, तो हमें नुकसान होता है।” पटेल ने बताया कि इस वर्ष उनकी गेंदे की फसल का एक हिस्सा “कपाडिया” नाम की बीमारी, के कारण सूख गया, यह बीमारी पत्तियों को काला करती है और फूलों को सुखा देती है।

 

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केशू सिंह पटेल के खेत में बीमारी से सूख गए गेंदे के पौधे। इस वर्ष, उनकी फसल का एक हिस्सा बीमारी के कारण खराब हो गया।

 

यह पूछने पर कि क्या वह स्थानीय किराना दुकान पर भुगतान के लिए एक कार्ड का उपयोग करते हैं, पटेल असमंजस में पड़ गए। उन्होंने कहा कि किराना दुकानों के पास कार्ड नहीं है, उनके बैंक ने उन्हें एक कार्ड नहीं दिया- केवल नकदी- और फिर उन्होंने कहा कि उनके पास केवल एक बैंक खाता है। उनके बेटे, कांतिलाल ने समझाया कि उनके पास एक कार्ड है और वह उसका उपयोग केवल एटीएम से रकम निकालने के लिए करते हैं, लेकिन अभी उनके पास बैंक में कोई पैसा नहीं है।

 

बाजार में अभी कीमतें कम हैं, लेकिन नोटबंदी के कारण नहीं

 

इंदौर मंडी में भारत फ्लावर्स के कर्मचारी शब्बीर अब्बासी (52) ने बताया कि यह मंडी (बाजार) में कम कीमतों का समय है, लेकिन यह नोटबंदी के लंबी अवधि के प्रभावों के कारण नहीं, बल्कि बाजार के सामान्य उतार-चढ़ाव की वजह से है। उनका कहना था, “विवाह का सीजन शुरू होने के साथ कीमतें कुछ दिनों में बढ़नी चाहिए।”

 

पटेल ने गेंदे और गुलदाउदी की अपनी फसल को मंडी में नियमित बेचने की शुरुआत नहीं की है- उन्होंने कहा कि वह फसल के तैयार होने और कीमतों के बढ़ने पर कुछ दिनों में बिक्री शुरू करेंगे।

 

इंदौर मंडी में फूल, सोयाबीन, आलू, अन्य सब्जियों के अपने उत्पादन को बेचने वाले किसान चंपालाल कहलवाड (47) ने बताया, “मंडी में कोई पैसा नहीं है। मुझे नहीं पता कि इसका क्या कारण है। ऐसा लगता है कि प्रकृति भी वर्तमान सरकार के पक्ष में नहीं है।” उन्होंने यह बात इस वर्ष खराब मॉनसून का उदाहरण देते हुए कही।

 

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इंदौर, मध्य प्रदेश में फूल मंडी। पिछले वर्ष, नोटबंदी के एक महीने बाद, फूलों के दाम विवाह के सीजन में भी कम रहे थे। लेकिन व्यापारियों और किसानों का कहना है कि कीमतों पर नोटबंदी का लंबा असर असर नहीं रहा है।

 

छोटा लेनदेन नकद में, केवल बड़े व्यापारी कर रहे चेक का उपयोग

 

 मंडी में फूलों की दुकान के मालिक जगन्नाथ महादेव भुयर, जिन्हें भाउसाहब के नाम से जाना जाता है, बताते हैं, “मेरे पास अभी भी एक बैंक खाता नहीं है।” उन्होंने इंडियास्पेंड से कहा कि पिछले वर्ष एक बैंक खाता खोलना और उसे चलाना बहुत मुश्किल था। उनका कहना था, “लेकिन मैं कल, बुधवार को, जो एक शुभ दिन है, खाता खोलने जा रहा हूं।” उन्होंने बताया कि वह अपना घर बेच रहे हैं और वह बिक्री से मिलने वाली रकम को उस खाते में रखेंगे।

 

समग्र रूप से, भारत में बैंक खाता रखने वालों का अनुपात अधिक है, 63फीसदी भारतीयों के पास किसी न किसी प्रकार का एक वित्तीय खाता है। लेकिन इंडियास्पेंड की अक्टूबर 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में केवल 12फीसदी ने बिल के भुगतान, बीमा और कर्ज के भुगतान जैसी आधुनिक बैंक एकाउंट सर्विस का उपयोग किया था।

 

मंडी में बिक्री करने वाले किसान, मुकेश मुकाती के पास एक बैंक खाता है, लेकिन वह उसका नियमित उपयोग नहीं करते। उन्होंने बताया, “उपयोग के लिए बैंक में पर्याप्त पैसा होना चाहिए।” मुकाती ने कहा कि उन्होंने बैंक से एक कर्ज भी लिया है और वह फूल मंडी से रोजाना मिलने वाली नकदी से अपने घर का खर्च चलाते हैं।

 

भुयर ने बताया कि मंडी में रोजाना के लेन-देन के लिए बैंक खातों का कोई उपयोग नहीं है। उनका कहना था, “200, 500, 1,000 रुपये का भुगतान करने वाला व्यक्ति इसके लिए एक खाते का उपयोग क्यों करेगा? हम किसान को इतनी छोटी रकम चेक से क्यों दें?”

 

मंडी में बड़े व्यापारियों को चेक से भुगतान मिलते हैं।

 

पंकज पारोड (37) एक व्यापारी हैं और वह मंडी में 15-20 वर्षों से काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नोटबंदी से पहले चेक या सीधे बैंक ट्रांसफर के जरिए कुछ भुगतान होते थे, लेकिन अधिकतर लेन-देन नकद में ही थे। उन्होंने बताया, “अब बड़ी मात्रा में खरीदारी करने वाले लोग चेक से भुगतान करते हैं या बैंक में रकम ट्रांसफर करते हैं, लेकिन किसान अभी भी हमसे नकद में भुगतान चाहते हैं क्योंकि रकम बहुत छोटी है, और इससे भुगतान में देरी होती है।”

 

 मंडी में 30 वर्षों से बिक्री कर रहे किसान गजानंद ने बताया, “अब हमें भुगतान मिलने का समय पक्का नहीं है। लेकिन हम समझते हैं कि यह व्यापारियों की गलती नहीं है।”

 

मंडी में किसी के पास भुगतान के लिए क्रेडिट या डेबिट कार्ड मशीन नहीं है।

 

 ‘सरकार किसानों को नकद भुगतान के लिए व्यापारियों को कहे’

 

पिछले वर्ष, पटेल परिवार के पास बैंक खाते में 30,000-40,000 रुपये थे, लेकिन उन्होंने इस रकम का उपयोग अगले वर्ष बीजों और घर के खर्चों के लिए कर लिया। इस बार गर्मी में, उन्होंने एक नया बोरवेल खोदने के लिए 50,000-60,000 रुपये खर्च किए क्योंकि पुराना खराब मॉनसून में सूख गया था। पटेल ने बताया, “हमने गांव में अपने किसी जानकार से उधार लिया था, और अब हम वह रकम वापस चुका रहे हैं।”

 

पटेल ने इंडियास्पेंड से कहा, “पहले हम किराना- तेल, चीनी- थोक में खरीदते थे लेकिन अब हम एक बार में केवल 1 लीटर तेल या ½ आधा किलोग्राम चीनी खरीदते हैं। हमें यह नहीं पता कि अगला नकद भुगतान हमें कब मिलेगा। मैं अपने जीवन में कभी भी इतना व्याकुल नहीं हुआ। लेकिन अब मैं हूं।”

 

“सरकार को कहना चाहिए कि किसानों को नकद में भुगतान किया जा सकता है। हम छोटे किसान हैं, हमारे पास छिपाने के लिए काला धन नहीं है।”

 

“अच्छी बात यह है कि वे अभी भी फूल मंडी में छोटे लेन-देन के लिए हमें नकद में भुगतान करते हैं।”

 

(शाह लेखक/संपादक हैं,इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 11 नवंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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