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निजी कंपनियों और संगठनों के लिए आधार अनिवार्य नहीं

तिश संघेरा एवं चैतन्य मल्लापुर,
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मुंबई: निजी संस्थाएं पहचान प्रमाणित करने के लिए आधार डेटा की मांग नहीं कर सकती हैं। व्यक्तियों को अपने डेटा के उपयोग के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की अनुमति दी जानी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों के लिए सूचना का उपयोग केवल तब किया जा सकता है, जब एक न्यायिक अधिकारी जैसे कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने इसकी मंजूरी दी हो। ये भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐतिहासिक निर्णयों की एक श्रृंखला में एक बड़ा फैसला है। कोर्ट ने  बैंक खातों, मोबाइल कनेक्शन और स्कूल प्रवेश के लिए आधार की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। पहचान को प्रमाणित करने की इच्छा रखने वाली निजी कंपनियों द्वारा राष्ट्रीय पहचान डेटाबेस तक पहुंच को कोर्ट ने “असंवैधानिक” बताया है।  हालांकि अदालत ने सरकार की विशिष्ट पहचान (यूआईडी) कार्यक्रम आधार को स्थायी खाता संख्या (पैन) और कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की समग्र वैधता को बरकरार रखा है, लेकिन इसने कई संगठनों और सेवाओं, जैसे कि बैंक, बीमा फर्म और मोबाइल फोन कंपनियों के द्वारा आधार डेटा मांग पर प्रतिबंध लगाया है।

 

7 संगठनों और व्यक्तियों की याचिकाओं के बाद चर्चा में आया यह मामला, इतिहास में सबसे लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट (एससी) की सुनवाई चलने वाले मामलों में से एक है। (साढ़े चार महीने में 38 दिन सुनवाई चली है और 1973 केसावंद भारती मामले के बाद दूसरा सबसे ज्यादा समय लगने वाला मामला है ।) पांच न्यायाधीशों में से चार ने कार्यक्रम के पक्ष में फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में इस आधार पर इसकी वैधता का निर्णय लिया कि “न्यूनतम जनसांख्यिकीय और बॉयोमीट्रिक डेटा एकत्र किया गया है।”  न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़  ने कार्यक्रम की सामग्री और निष्पादन के साथ कई त्रुटियों को इंगित किया और पांच न्यायाधीशीय खंडपीठ पर असंतोष की आवाज बने। उन्होंने धन विधेयक के रूप में आधार एक्ट को पारित करने के सरकार के मार्च 2016 के फैसले पर विशेष रूप से तीखी आलोचना की, जिसे संसद के निचले सदन, लोकसभा द्वारा पेश और पारित किया जा सकता है। ऊपरी सदन या राज्य सभा संशोधन का सुझाव दे सकती है, लेकिन यह बिल में कोई बदलाव नहीं कर सकती है।

 

न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ ने कहा, “धन विधेयक के रूप में आधार अधिनियम को पारित करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है। अगर एक संविधान को राजनीतिक ताकतों से बचाना है, तो सत्ता और सत्ताधारियों को कानून के शासन का अनुपालन करना चाहिए। “

 

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए के सिकरी, ए एम खानविलकर, धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और अशोक भूषण के पांच न्यायाधीशीय खंडपीठ द्वारा आधार पर निर्णय सुनाया गया। न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ बहुमत से असंतुष्ट थे।

 

फैसले में क्या बदलाव शामिल हैं?
 

 पांच न्यायाधीशीय खंडपीठ ने,  पहचान के लिए अनिवार्य के रूप में आधार से संबंधित धारा 33 (2), 47 और 57 को अवैध बताया है। कोर्ट ने इसे नागरिकों के गोपनीयता के अधिकार से संबंधित प्रावधान बताया है।

 

धारा 47 व्यक्तियों को उनके डेटा के उपयोग के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की अनुमति देने से संबंधित है और पहचान पत्र प्रमाणित करने के लिए आधार डेटा मांगने वाली निजी संस्थाओं के लिए धारा 57 है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों के लिए सूचना प्रकटीकरण से संबंधित धारा 33 (2) को अपने वर्तमान रूप में बंद कर दिया गया है, लेकिन अपवाद हो सकते हैं और दुरुपयोग को रोकने के लिए, एक न्यायिक अधिकारी जैसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के मंजूरी की आवश्यकता होगी।

 

न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ ने असहमति में जो कहा, वह व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा पर केंद्रित था। उन्होंने कहा, “आधार संख्याओं का उपयोग करने के लिए निजी उद्यम की अनुमति से डेटा का शोषण होगा।” उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि, आधार “सूचनात्मक गोपनीयता और डेटा संरक्षण का उल्लंघन करता है”।

 

बैंक खातों को खोलने और मोबाइल फोन कनेक्शन के लिए सिम कार्ड खरीदने के लिए आधार की अनिवार्यता पर प्रतिबंध को नागरिक डेटा की सुरक्षा और प्रसार के बारे में चिंतित लोगों के लिए एक जीत के रूप में देखा जाता है।

 

इस फैसले में कहा गया है कि, 18 साल से कम उम्र के बच्चों के बॉयोमीट्रिक डेटा को नामांकित करने के लिए, माता-पिता की सहमति की आवश्यकता होगी। आधार के अभाव में बच्चों को किसी भी स्कूल या योजनाओं तक पहुंच से इनकार नहीं किया जा सकता है और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) और राष्ट्रीय योग्यता सह प्रवेश परीक्षा (एनईईटी) अब परीक्षा या प्रवेश के लिए यूआईडी की मांग नहीं कर सकती है।

 

हालांकि, आय रिटर्न दाखिल करने और पैन कार्ड आवेदन करने के लिए आधार प्रोफाइल से जुड़े 12 अंकों की पहचान संख्या को उद्धृत करना अनिवार्य होगा, जैसा कि आयकर अधिनियम के 139एए को बनाए रखते हुए बहुमत निर्णय ने कहा है।  भारत के समेकित निधि नामक सरकारी राजस्व के लिए मुख्य भंडार द्वारा वित्त पोषित, 530 कल्याणकारी योजनाओं जैसे कि पूरक पोषण कार्यक्रम, प्रसूति लाभ कार्यक्रम और कर्मचारियों की पेंशन योजना के तहत लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों को अभी भी अपना आधार संख्या, या नामांकन के लिए आवेदन का प्रमाण प्रदान करना होगा।

 

डेटा का संग्रह, इसका संग्रह और उपयोग गोपनीयता का उल्लंघन नहीं करता है
 

 सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि आधार द्वारा गोपनीयता का कोई उल्लंघन नहीं है और आधार अधिनियम ” गोपनीयता के अधिकार का त्रिस्तरीय परीक्षण पास करता है”।

 

निर्णय में कहा गया है, “आधार अधिनियम के तहत किसी की जनसांख्यिकीय और बॉयोमीट्रिक जानकारी देने की आवश्यकता गोपनीयता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है।”

 

याचिकाकर्ताओं ने यूआईडी की वैधता और प्रमुख सरकारी और निजी सेवाओं के साथ जोड़ने पर आपत्ति जताई थी। यह कहा गया था कि इससे संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा निहित गोपनीयता अधिकारों का उल्लंघन होता है।

 

अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि प्रत्येक नागरिक के लिए गोपनीयता का अधिकार “जीवन का आंतरिक हिस्सा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” है, एक उल्लेखनीय कानूनी उदाहरण था, जैसा कि अदालत ने आग्रह किया कि नागरिकों के डेटा तक निजी संगठनों की पहुंच को रोका जाए।

 

याचिकाकर्ताओं ने फोन ऑपरेटरों, वित्तीय सेवा संस्थानों और कई सरकारी विभागों और ठेकेदारों को पर्याप्त आश्वासन के बिना नागरिक डेटा तक पहुंचने पर सवाल उठाया था।

 

 1.2 बिलियन से अधिक लोग ( 92 फीसदी आबादी ) पहले से ही यूआईडीएआई के साथ अपने बॉयोमीट्रिक डेटा पंजीकृत कर चुके हैं। संगठन ने सरकारी सेवाओं के लिए आधार के रोल-आउट के प्रबंधन को अनिवार्य बनाया है। सितंबर 2011 में आधार कार्यक्रम शुरु किया गया था और इसके छह वर्षों में, जाली या नकली आधार संख्या और आधार से संबंधित बैंकिंग धोखाधड़ी की 164 मामलों की सूचना मिली थी। इनमें नकली फर्जी आधार संख्या या कार्ड के 123 मामले और संबंधित बैंकिंग धोखाधड़ी के 41 मामले शामिल थे।

 

स्वतंत्र शोधकर्ता अनमोल सोमाची और विपुल पैकर द्वारा बनाए गए डेटाबेस के अनुसार, 2018 में, यूआईडीएआई डेटा के दुरुपयोग के मामले में हर हफ्ते लगभग चार घटनाओं का औसत था।

 

 व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2018 का मसौदा जुलाई में सरकार को सौंप दिया गया था।  संगठनों को किस प्रकार मूल व्यक्तिगत डेटा एकत्र करना है, संसाधित करना और स्टोर करना है। इसके एक ढ़ांचा बनाने के लिए भारत संघर्ष कर रहा है।

 

डेटा के बारे में वर्तमान में कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं कि कितने समय तक संगठन व्यक्तिगत विवरण रख सकते हैं – डेटा हटाने के लिए कंपनी को बोल सकते हैं, जैसा कि यूरोपीय संघ में होता है।

 
हाशिए वाले समूहों की रक्षा अधिक महत्वपूर्ण है
 

 

न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा: “सर्वश्रेष्ठ होने के मुकाबले अद्वितीय होना बेहतर है।” उन्होंने तर्क दिया कि समाज के हाशिए वाले वर्गों के लिए पहचान का एक रूप विस्तार करना अन्य मुद्दों से भारी होगा।

 

वर्ष 2016 के आधार अधिनियम ने 1230 कल्याणकारी योजनाओं के तहत नागरिकों को लाभ प्राप्त करने, आयकर फॉर्म भरने, कॉलेज की डिग्री प्राप्त करने और ड्राइविंग लाइसेंस और पैन कार्ड प्राप्त करने के लिए नागरिकों के लिए 12 अंकों की अद्वितीय पहचान संख्या अनिवार्य कर दी थी, जैसा कि  इंडियास्पेंड ने मार्च 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

यह सब 2015 के सर्वोच्च न्यायालय अंतरिम आदेश के बावजूद था, जिसमें आधार नामांकन स्वैच्छिक था।

 

तब से, जनजातीय समूहों और अशिक्षित गरीबों को राशन कार्ड और पेंशन भुगतान से इनकार कर दिया गया था क्योंकि वे या तो नामांकित नहीं थे या यदि वे थे, तो इन सामाजिक सुरक्षा खातों को आधार जोड़ने में विफल रहे थे।

 

यह तब हुआ जब सरकार ने शुरुआत में गरीब और हाशिए वाले सामाजिक कल्याण योजनाओं और कार्यक्रमों के “न्यायसंगत, कुशल और बेहतर वितरण” को सुनिश्चित करने के लिए आधार को “एनाबेलर” और “सॉफ्ट पहचान आधारभूत संरचना” के रूप में वर्णित किया, जिसमें अन्य पहचान दस्तावेजों की कमी हो सकती है।

 

न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ ने कहा, “धारा 7 के तहत लाभ और सेवाओं के लिए आधार को अनिवार्य करना एक ऐसी स्थिति का कारण बन जाएगा जिसमें नागरिक आधार के बिना नहीं रह सकेंगे।”

 

आधार अधिनियम, 2016 (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं की लक्षित डिलीवरी) की धारा 7, किसी भी सरकारी सेवा के लिए आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य है, जिसके लिए लाभ हस्तांतरण की आवश्यकता होती है या जहां कोई व्यय किया जाता है। इसमें सरकारी पेंशन योजनाओं और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एमजीएनआरईजीएस) के तहत वितरित भुगतान शामिल हैं।

 

भारतीय रिजर्व बैंक की एक शाखा द्वारा प्रकाशित एक पेपर ने अक्टूबर 2017 के संस्करण में निष्कर्ष निकाला है कि गरीबों को दिए गए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण पर आधार के लाभों का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 9 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

आधार से संबंधित अन्य मुद्दे भी सामने आए, जैसे कि अंतिम-विंदु तक पहुंच की समस्या, प्रमाणीकरण की गुणवत्ता, अस्पष्ट वित्तीय लाभ और सुरक्षा चिंताएं। इसने कई तरह की चिंताओं को जन्म दिया क्योंकि सरकार ने आधार के साथ अधिक आर्थिक कार्यक्रमों और गतिविधियों को जोड़ा। केंद्र ने आधार की जरूरत और सरकारी हस्तांतरण को अधिक कुशलता से वितरित करने के मामले का बचाव किया है। 2018 के कर्नाटक राज्य चुनावों के दौरान, कार्यक्रम की आलोचना पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा “समझ नहीं आ रहा है या जानबूझकर झूठ फैल रहे हैं “।

 
(संघेरा लेखक और शोधकर्ता हैं। मल्लापुर नीति विश्लेषक हैं। दोनों इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 26 सितंबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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