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नए पशु कानून से भयभीत हैं मराठवाड़ा के किसान

पूर्वी कुलकर्णी,
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औरंगाबाद और लातूर (महाराष्ट्र): “उनके लिए ( सरकार) क्या पशु और किसान एक ही श्रेणी में नहीं हैं? जब तक ये दोनों नष्ट नहीं हो जाते, उनकी स्मार्ट सिटी परियोजना कैसे पूरी होगी? ”यह पोस्ट सोशल मीडिया साइट फेसबुक पर पिछले महीने दक्षिण-मध्य महाराष्ट्र के लातूर जिले के शिरूर-ताजबंद गांव के किसान, लेखक और पत्रकार महारुद्र मंगनाले से लिखी थी। यह पोस्ट मवेशी बाजारों पर प्रतिबंधों को कड़ा करने और इसके किसानों पर प्रभाव के संदर्भ में लिखा गया था।

 

मार्च 2014 को महाराष्ट्र में वध के लिए पशुओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया है। 23 मई, 2017 को, केंद्र ने जानवरों पर क्रूरता को रोकने के लिए पशु अधिनियम के तहत वध के लिए मवेशियों की बिक्री और खरीद पर प्रतिबंध लगाने वाले नए नियमों को अधिसूचित किया है।

 

पशुओं पर क्रूरता रोकने और पशुओं के वध को रोकने के नए कानून से पशु बाजार पर क्यों बढ़ गया है दवाब, मराठवाड़ा के किसान क्यों हैं परेशान? दो लेखों की इस श्रृंखला में, इस सवाल का जवाब जानने के लिए इंडियास्पेंड ने ग्रामीण इलाकों का दौरा किया है। ऐसा लगता है कि राज्य के पशुधन के एक बड़े हिस्से के मालिक, छोटे खेतों के मालिक और भूमिहीन किसान हैं। ये लोग पशुपालन को व्यवहार्य बनाने के लिए अनुत्पादक जानवरों को बेचेने की आजादी की जरूरत महसूस कर रहे हैं।

 

श्रृंखला के दूसरे लेख में हम मवेशियों की मौजूदगी के महत्व को महसूस करने के लिएहम मराठवाड़ा के दो किसानों की जिंदगी में झांकने की कोशिश करेंगे।

 

मराठवाड़ा भारत की वर्तमान कृषि संकट का प्रतीक है।  77 फीसदी किसानों के पास पांच एकड़ जमीन से ज्यादा नहीं है। पिछले एक दशक में क्षेत्र में तीन साल सूखा पड़ा है। क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति आय 90,460 रुपए है। यह 12,547 रुपए के राष्ट्रीय औसत से कम है। मवेशी पालन और व्यापार इस क्षेत्र में खेती आजीविका का अभिन्न स्रोत हैं। कृषि कार्यों के लिए मवेशी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मराठवाड़ा में 1,614 गांव-स्तरीय डेयरी सहकारी समितियां भी हैं, जो राज्य के छह डिवीजनों में तीसरा सबसे ज्यादा है। 2016 में इन समुदायों से 20 मिलियन लीटर वार्षिक दूध की खरीद हुई थी।

 

हालांकि, मवेशियों के आर्थिक जीवन चक्र के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि क्या वे दूध के लिए हैं या कृषि कार्यों के लिए? यह 25 से 30 वर्ष के जीवनकाल में लगभग 15 वर्षों तक साथ रहते है।

 

पशुओं का आर्थिक चक्र

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Source: Food and Agriculture Organisation; Sheep and goat breeds of India & Guidelines for slaughtering, meat cutting and further processing, United Nations, India Council of Agricultural Research & Tamil Nadu Agricultural University Agritech Portal

 

इस प्रकार, किसानों को अनुत्पादक मवेशियों को बेचने में सक्षम होना चाहिए। यह विशेष रूप से गरीब किसानों का मामला है, जिन्हें उत्पादक मवेशियों को खरीदने और दूध की खरीद या खेती को बनाए रखने के लिए धन जुटाने की जरुरत होती है। सूखे जैसे संकट के समय छोटे किसान  जीविका के लिए धन जुटाने के लिए मेवेशी बेच कर निर्वाह करते हैं।

 

सूखा ग्रस्त मराठवाड़ा के छोटे और सीमांत किसानों के लिए पुराने और अनुत्पादक पशुवत और उनके लिए चारे और पानी की व्यवस्था करना बेहद कठिन है। पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन के संघ विभाग की 2015-16 की रिपोर्ट के मुताबिक, छोटे भूमिधारकों और भूमिहीन किसानों ने पशुधन के स्वामित्व में बड़ा हिस्सा हासिल किया है।

 

इसलिए नए प्रतिबंध, पशु पालन को तेजी से अव्यावहारिक बना रहे हैं। इंडियास्पेंड ने पाया कि मराठवाड़ा में वध व्यापारियों को अपना कारोबार और किसानों को डेयरी फार्मिंग बंद करना पड़ रहा है।

 

नए नियमों ने मवेशियों की बिक्री प्रक्रिया को बनाया जटिल

 

महाराष्ट्र सरकार की कृषि उत्पाद विपणन समितियां (एपीएमसी) राज्य में संचालित 300-ऑड मार्केट के भीतर 196 पशु सब-यार्ड चलाती हैं। कुछ पशु बाजार परिसर के भीतर निर्दिष्ट दिनों पर कार्य करते हैं, जहां अन्य कृषि उपज का कारोबार होता है। जबकि अन्य ग्राम पंचायत निकायों द्वारा विनियमित हैं, जो अंदर के इलाकों में स्थित होते हैं।

 

एपीएमपी पशु व्यापारियों को बाजार में लाए जाने वाले पशु-गाय, भैंस, बैल, बैल, बछड़ा, बकरी, भेड़ आदि की खरीद और परिवहन के लिए लाइसेंस देता है।  वर्तमान में, कोई भी व्यक्ति प्रदर्शन और बिक्री के लिए बाजार में पशु ला सकता है। अगर लेन-देन होता है तो खरीददार से 10 रुपए का न्यूनतम लाइसेंस शुल्क लिया जाता है।

 

बिक्री के लिए आवश्यक एकमात्र दस्तावेज बिक्री के बाद, एपीएमसी या ग्राम पंचायत द्वारा रजिस्टर में आधिकारिक प्रविष्टि है। खरीदार और विक्रेता के नाम और पता बताते हुए एक मूल रसीद, बिक्री मूल्य और जानवर के विवरण जारी किए जाते हैं।

 

नवीनतम नियमों के तहत, मवेशी बिक्री एक अधिक जटिल प्रक्रिया बन जाएगी। बाजार की गतिविधियों का और अधिक सख्त नियमन करने के लिए इसमें दो समितियों का गठन होगा- एक जिला स्तर पर और दूसरा स्थानीय स्तर पर।

 

एपीएमसी के निर्वाचित सदस्यों के विपरीत इन समितियों के सदस्य राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे। वे बाजार में प्रवेश करने वाले हर जानवर का निरीक्षण करने के लिए जिम्मेदार होंगे।

 

जानवरों के लिए क्रूरता पर हालिया रोकथाम (पशुधन बाजार नियमन) नियम, 2017 की धारा 11, 12 और 13 के अनुसार, वे “अयोग्य” जानवरों के प्रवेश और बिक्री को रोकने के साथ-साथ ‘क्रूर तरीके से उपचार’ के मामलों में जानवरों को उनके मालिकों से लेकर जब्त कर सकते हैं।

 

किसान संगठन ‘शेटकारी’ के पश्चिमी महाराष्ट्र सीमा के महिला खंड की अध्यक्ष सीमा नरोद कहती हैं, “हम हर उस कानून का विरोध करते हैं, जो मौजूदा मुफ्त पहुंच, सीमित नियमन और व्यापार की स्वतंत्रता को सीमित करता है। ”

 

नरोद कहती हैं कि, ये नियम एक किस्म की मनमानी है और किसानों के लिए हानिकारक हैं। इसमें  वर्तमान व्यापार प्रथाओं की जमीनी हकीकतों को हटा दिए गए हैं।

 

वह आगे कहती हैं कि, “पश्चिमी महाराष्ट्र में दूध उत्पादन किसानों के लिए एक बढ़िया व्यवसाय है। यहां कई तरह के क्रॉस-नस्ल गायें हैं पाली जाती हैं, जो अधिक मात्रा में दूध का उत्पादन करते हैं। लेकिन, इन गायों के नर बछड़े का इस्तेमाल कृषि उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सकता है। उन्हें बेचने के अलावा हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है। ”

 

चमड़ा उद्योग और कसाईखाने में क्रॉस-न्रेड डेयरी गायों के नर बछड़ों के खरीदारों की एक बड़ी संख्या शामिल है।

 

दुकानें बंद करने वाले एक मवेशी बाजार की कहानी

 

लातूर जिले के उदगीर शहर में एपीएमसी के साप्ताहिक पशु बाजार में साल 2016-17 और 2017-18 की पहली तिमाही में बिक्री में मामूली कमी दर्ज की गई है। 2010-11 और 2015-16 के बीच की अवधि में लगातार सूखे के कारण बिक्री में तेजी आई थी। संकट के समय, मुसीबत से निपटने के लिए किसान अक्सर मवेशी बेचते हैं।

 

Source: Data collected from APMC, Udgir

NOTE: *Figures available up to December 2013; **Up to June 15, 2017

 

अधिकारियों के अनुसार पशुपालन में दो कारणों से गिरावट हुई है: खेती के लिए मशीनों के उपयोग में वृद्धि और वर्ष 2015 में प्रतिबंध के बाद पशु खदीरने वाले व्यापारियों की संख्या में कमी।

 

उदगीर बाजार के एपीएमसी सचिव बी.एम पाटिल कहते हैं, “ बाजार के बाहर से संचालित करने वाले लगभग 10-12 पशु व्यापारी यहां अब काम नहीं करते हैं। इसका कारण मवेशियों के परिवहन में होने वाली परेशानियां हैं। ”

 

विदर्भ में किसानों की स्थिति चिंताजनक है।

 

मध्य प्रदेश में बैतुल जिले के भैंसदेही तालुक के सावल मधे गांव के पशु बाजार ने नौ महीने पहले ही काम करना बंद कर दिया है। सावल माधे गांव महाराष्ट्र में अमरावती जिले की सीमाओं से जुड़ा है और राज्य के अकोला, अमरावती और बुलढाना जिलों में 30 किमी के दायरे में पशु-पालकों के लिए एकमात्र बाजार है।

 

अकोला जिले के अकोट तालुक के पनाज गांव के एक किसान सतीश देशमुख कहते हैं, अपने पशुओं के व्यापार के लिए जो सावल माधे गांव जाते थे, वे अब अमरावती जिले में पराटवाड़ा गांव के  पशुधन बाजार तक पहुंचने के लिए 50-90 किलोमीटर की यात्रा के लिए मजबूर हैं।

 

‘शेटकारी संगठन’ के देशमुख कहते हैं, “लगभग चार महीने पहले, मवेशी लाने पर कुछ मुस्लिम व्यापारियों को धमकी दी गई थी और मारा-पीटा भी गया। उनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। स्थिति तेजी से तनावपूर्ण और कठिन हो रही है।”

 

26 मई, 2017 को वाशिम जिले के मालेगांव तालुका में दो पुरुषो को गौमांस रखने के आरोप में सात गौ रक्षकों ने बुरी तरह पीटा था। भारत में पिछले सात सालों में 28 मौतों सहित गाय के मामले में 63 अपराध हुए हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 28 जून, 2017 को विस्तार से बताया है। और इनमें से 97 फीसदी घटनाएं 14 मई 2014 को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुई हैं।

 

मंगलनाले कहते हैं, “लोगों को डर है कि उनके खिलाफ झूठे मामले दर्ज किए जा सकते हैं। मैंने तय किया है कि जब तक कानून ठीक न हो जाए, मवेशियों का पोषण नहीं करेंगे।  जब किसान खुद कर्ज में हैं और आत्महत्या कर रहे हैं, तो उनके पास बूढ़े मवेशियों को लंबे समय तक रखने और मरने के बाद दफनाने के पैसे नहीं है। जेसीबी को किराए पर लेना और गड्ढे खोदना महंगा है। ”

 

किसानों तक पर्याप्त सरकारी सहायता की पहुंच नहीं

 

वर्ष 2016-17 में, मराठवाड़ा में तीन जिलों में से एक सबसे अधिक गोजातीय आबादी वाली औरंगाबाद जिले में 15,891 पशुओं का बीमा किया गया है। 2012 पशुधन जनगणना के अनुसार, जिले की पशु जनसंख्या 676,180 है।

 

औरंगाबाद डिवीजन के पशुपालन विभाग के सहायक आयुक्त, बी.डी चौधरी कहते हैं, “बीमा पॉलिसी में हमें 5,000 पशुओं का लक्ष्य दिया गया था। हम इसे पार कर चुके हैं। ”

 

यदि गाय, भैंस या बैल पॉलिसी के लिए पंजीकरण के एक से तीन साल के भीतर मर जाते हैं तो बीमा रकम पशु मालिक को दिया जाता है। पंजीकरण के समय पशुओं के प्रचलित बाजार दर और स्वास्थ्य के आधार पर पशु चिकित्सक द्वारा राशि का अनुमान किया जाता है।  चौधरी स्वीकार करते हैं कि चारा की उपलब्धता इस क्षेत्र में बड़ी चुनौती है।

 

एक राज्य नीति किसानों के बीच चारा बीज का वितरण करने की अनुमति देता है। इस नीति के तहत वर्ष 2015-16 में औरंगाबाद जिले में लाभार्थियों की संख्या बढ़ी है। लेकिन यह अपर्याप्त है ।जिले में 52 9, 861 भूमिधारी किसानों में से 83 फीसदी के पास 2.5 एकड़ से कम जमीन है । यह मवेशियों के चारा के लिए पर्याप्त नहीं है।

 

औरंगाबाद जिला परिषद के एक पशुधन विकास अधिकारी कहते हैं, “क्योंकि बीज 100 फीसदी सब्सिडी पर उपलब्ध कराए जाते हैं, हर साल लाभार्थियों की सीमित संख्या में बजट की उपलब्धता के आधार पर चयन किया जाता है। ”

 

‘मवेशी बाजार एक परंपरा है जिसे जारी रखने की जरूरत’

 

पशुधन की प्रदर्शनी और बाजार महाराष्ट्र की कृषि परंपरा का एक हिस्सा हैं। यहां स्वदेशी किस्मों के सैकड़ों मवेशी हर महीने बाजार में आते हैं और कारोबार होता है।

 

एक मामला लातूर जिले के उदगीर शहर से 22 किलोमीटर दूर हाली-हांदरगौली गांव के 50 साल पुराने बैल बाजार का है। यह मराठवाड़ा के बड़े बाजारों में से एक है। यह बाजार प्रत्येक वर्ष दशहरा त्योहार (अक्टूबर) और खरीफ की बुवाई के मौसम (जून) के बीच आठ महीनों के लिए लगता है। बाजार अपने देवानी और लाल कंधारी के बैल के नस्लों के लिए जाना जाता है। ये दोनों प्रजाति के बैल अधिक गर्मियों में काम करने की अपनी क्षमता और ताकत के लिए जाने जाते हैं। इनकी अच्छी कीमत मिलती है।

 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से ‘धर्म’ के लिए ‘गौवंश’ की रक्षा के तर्क के विरोध में नांदेड़ से पूर्व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) विधायक शंकर अन्ना डोंगरे पूछते हैं, ” क्या ये प्रदर्शनी और बाजार भी हमारी परंपरा के हिस्से नहीं हैं?”

 

उधर हली-हंदरगौली बाजार में मवेशी व्यापार, जो शनिवार को सोमवार को संचालित होता है, अब काफी कम हो गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, 29 मई, 2017 को, बुवाई के मौसम के लिए बाजार बंद होने से पहले, केवल तीन भैंसे ही बिक्री के लिए मौजूद थीं। पहले यह संख्या 100 तक होती थी।

 

किसान और पत्रकार महारुद्र मंगनाले कहते हैं, “कानूनी परिप्रेक्ष्य (पशु वध पर) स्वयं में दोषपूर्ण है। किसान वैसे भी कत्ल के लिए उत्पादक मवेशी का व्यापार नहीं करते हैं। ”

 

व्यापारियों का कहना है कि केंद्र की नई अधिसूचना लागू होने पर लातूर जिले के उदगीर तालुक में कर्नाटक की नरगांव, देवोनी और उदगीर में पशु बाजार पूरी तरह से बंद हो सकता है।

 

प्रस्तावित कानून की धारा 8 बताती है कि राज्य की सीमा से 25 किलोमीटर के भीतर पशु बाजार का कोई आयोजन नहीं किया जा सकता है।

 

डोंगरे आगे कहते हैं कि, “यह कानून शहरों में रहने वाले उन लोगों द्वारा बनाया गया है, जो मवेशियों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। जो लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल नहीं कर सकते हैं और उन्हें अल्ड एज होम में छोड़ सकते हैं, वे हमारे पुराने मवेशियों की देखभाल करने के बारे में कैसे बता पाएंगे?”

 

इसके अलावा, नए नियमों की धारा 14 में पशुओं के सींग रंगने और गहने पहनाने जैसी परंपरागत प्रथाओं को भी प्रतिबंधित किया गया है।

 

मंगलनाले आगे कहते हैं, “कानून इस नजरिये से बना है कि किसी कारखाने में जानवरों को कैसे रखा जाता है। सरकार क्या जानती है कि हम अपने जानवरों की कितनी देखभाल करते हैं?”

 

(कुलकर्णी एक स्वतंत्र लेखक हैं और मुंबई में रहती हैं। वह सामाजिक उद्यम और मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़ी रही हैं।)

 

पशुओं पर क्रूरता और पशुओं के वध को रोकने के लिए नए पशु कानून से कानून से पशु बाजार पर क्यों बढ़ गया है दवाब, क्यों मुश्किल में हैं किसान, इसपर दो लेखों की श्रृंखला का यह पहला भाग है।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 जुलाई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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