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थोड़ी सी मदद से ही बिहार की गरीब महिलाएं बदल रही हैं अपनी जिंदगी

नमिता भंडारे,
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मुसहर (दलितों के बीच भी छोटी जाती की माने जाने वाली जाति) जाति का एक रिक्शा खींचने वाले शख्स की विधवा अमोला देवी पिछले साल 1 करोड़ रुपए का वित्तीय लेनदेन करने में सफल हो पाई हैं। उनके परिवर्तन की कुंजी भारत का सबसे बड़ा स्वयं सहायता समूह है, जिनकी 8.2 मिलियन महिलाओं ने 64 मिलियन डॉलर की बचत की है, औपचारिक क्रेडिट में 500 मिलियन डॉलर उधार लिया है और मधुमक्खी रखने से लेकर उच्च मूल्य वाले कृषि तक के 270,000 व्यवसाय शुरू किया है।

 

गया (बिहार): अमोला देवी कभी स्कूल में नहीं गई थी।  कभी भी बैंक को अंदर से नहीं देखा था। वह मुसहर यानी चूहे-पकड़ने वाली जाति से हैं। यानी चूहे-पकड़ने वाली जाति से हैं। मुसहर एक दलित जाति है और इनकी संख्या इतनी कम है और ये लोग इस कदर हाशिए पर हैं कि बिहार सरकार भी इसे एक विशेष श्रेणी में रखती है, जिसे महादलित कहा जाता है।

 

दस साल पहले बिहार के दक्षिणी जिले के जिंदापुर गांव में, उसके आठ साल के दो बच्चे बीमार हो गए थे। चिकित्सा का खर्च वहन न कर सकने के कारण उसके दोनों बच्चों की मौत हो गई। किसी समय में उनके पति रिक्शा चलाने का काम करते थे और 200 रुपए कमाते थे, जिसमें से 100 रुपए रिक्शा मालिक को चला जाता था। बाकी के बचे पैसों में उसे अपने बच्चों को खिलाना होता था और परिवार की देखभाल करनी होती थी। उसके बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। जब वह गांव के कुएं से पानी निकालने जाती थी तो उसे दूसरों के पानी भरने तक का इंतजार करना पड़ता था, ताकि उसके बाल्टी के संपर्क में आने से लोग भी अछूत या प्रदूषित न हो जाएं।

 

अब वर्ष 2016 में  अमोल देवी 1 करोड़ रुपए की वित्तीय लेन-देन करने में सफल रही हैं।

 

बिहार की लाखों गरीब महिलाओं की तरह अमोला देवी भी, जीविका नाम की एक राज्यव्यापी कार्यक्रम की लाभार्थी है। यह कार्यक्रम विश्व बैंक, राज्य सरकार और राष्ट्रीय सरकार द्वारा सह-वित्तपोषित है।

 

‘जीविका’ कार्यक्रम में स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में 8.2 मिलियन से अधिक ग्रामीण महिलाओं को शामिल किया गया है। प्रत्येक हफ्ते, हर दिन 10 रुपए निवारक करने के अलावा, इन महिलाओं ने सामूहिक रूप से 64 मिलियन डॉलर (418.5 करोड़ रुपए) की बचत की है और बैंकों से 500 मिलियन डॉलर (3,270 करोड़ रुपये) का ऋण लिया है। इस कार्यक्रम में अब तक, छोटे व्यवसायों में 600,000 महिला किसान, डेयरी और मुर्गी उत्पादकों और उद्यमियों की शुरूआत हुई है। ये महिलाएं राज्य भर में एक राजनीतिक और सामाजिक शक्ति के रूप में उभर रही हैं।

 

जीविका एसएचजी महिला सदस्यों की एक बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वादा किया था कि यदि वे सत्ता में आते हैं तो शराब पर पाबंदी लगाएंगे और नीतीश कुमार ने वादा भी निभाया। करीब 20 एसएचजी की ग्राम परिषद, उजाला ग्राम संगठन की अध्यक्ष सरोज देवी कहती हैं, “पुरुष दिन में शराब पीएंगे और नशे में दुर्व्यवहार करेंगे। अब हम उन्हें बताते हैं, अगर आप शराब पीना चाहते हैं, तो कृपया जेल में खिचड़ी खाने के लिए तैयार रहें।”

 

वह बताती हैं, वर्ष 2012 में, जब पुलिस ने हत्या के मामले में घसीटा तो, सरोज देवी सहित, जीविका की महिला सद्स्यों ने पुलिस थाने का घेराव किया, फाटकों को तोड़ दिया और आग्रह किया कि गिरफ्तारियां कराई जाए। वर्ष 2016 में, उन्होंने स्थानीय पंचायत चुनावों में चुनाव लड़ा और 288 वोटों से जीता।

 

 

आगे की सोच के साथ है यह यात्रा

 

राज्य में बिहार की सबसे सीमांत महिलाओं का उत्थान, जो लगातार आंकड़ों में नीचे रहा है, महत्वपूर्ण है। ऐसे आंकड़ों के बावजूद, महिलाएं हर जगह दिखाई देती हैं- सड़कों पर, खेतों में, स्कूल तक साइकिल चलाने या बाजारों और हाटों पर छोटे स्टाल चलाती हुई दिख जाती हैं।

 

बिहार में भारत की सबसे बद्तर महिला श्रम शक्ति भागीदारी है, और देश के बाकी के हिस्सों में भी ऐसा ही है, जैसा कि हमारे चल रहे श्रृंखला में राष्ट्रव्यापी जांच पर चर्चा हुई है। हमने पहले में लेखों में भी बताया है कि बढ़ते शैक्षिक स्तर और आर्थिक सुधार के बावजूद महिलाएं रोजगार मानचित्र से गायब हो रही हैं।

 

Source: Ministry of Statistics and Programme Implementation

 

लेकिन अन्य मापदंडों पर पिछले दशक में एक स्पष्ट आंदोलन ऊपर की ओर बढ़ रहा है। बिहार देश के बाकी हिस्सों की तरह ऊपर नहीं बढ़ा है, लेकिन एक दशक के दौरान  साक्षरता में 10 प्रतिशत अंक से ज्यादा वृद्धि हुई है, 18 वर्ष से कम उम्र में शादी करने वाली महिलाओं के अनुपात में गिरावट हुई है और अधिक महिलाओं के पास बैंक खाते हैं, जिसका इस्तेमाल वे स्वयं करती हैं।

 

बिहार की महिलाएं पिछले एक दशक की तुलना में बेहतर है, लेकिन राष्ट्रीय औसत के पीछे
Indicator Bihar
(2005-06)
Bihar (2015-16) India
(2015-16)
Women who are literate 37% 49.6% (70.6% urban, 46.3% rural) 68.4%
Women aged 20-24 who married before 18 60% 39.1% (26.9% urban, 40.9% rural) 26.8%
Women who have experienced spousal violence 59% 43.2% (40.2% urban, 43.7% rural) 28.8%
Women with a bank account they themselves use 8% 26.4% (36.9% urban, 24.6% rural) 53.0%
Women with below normal BMI 45% 30.4% (22.2% urban, 31.8% rural) 22.9%
Married women who take part in household decisions 69% 75.2% (77.6% urban, 74.8% rural) 84.0%

Source: National Family Health Survey 4, 2015-16, and National Family Health Survey 3, 2005-06

 

इन लाभों के लिए ‘जीविका’ को श्रेय देना अवास्तविक होगा लेकिन ये 2007 के शुरु हुए परियोजना के साथ मेल खाती हैं।

 

पटना की संस्था, ‘एशियाई विकास अनुसंधान संस्थान’ (एडीआरआई) के सदस्य-सचिव, शैबाल गुप्ता कहते हैं, ” राजनीतिक दृष्टिकोण से भी नीतीश कुमार के लिए महिलाओं का एजेंडा महत्वपूर्ण है ।”

 

वर्ष 2015 के राज्य चुनावों में बिहार की 60.5 फीसदी महिला मतदाताओं ने मतदान किया, जबकि  54.9 फीसदी पुरुषों ने मतदान किया है।

 

महिलाओं के वोट बैंक को लुभाने के लिए, नीतीश के पास योजनाओं की एक टोकरी है। स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल देना।पंचायत और नगरपालिका चुनावों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 33 फीसदी से 50 फीसदी करना। पुलिस में महिलाओं के लिए 35 फीसदी आरक्षण के अलावा राज्य की सभी नौकरियों में 35 फीसदी आरक्षण का वादा।

 

बिहार के गरीब जिलों में से छह में ग्रामीण घरों से महिलाओं को लक्ष्य बनाते हुए तीन उद्देश्यों के साथ 2007 में ‘जीविका’ शुरू हुई थी। इनमें से सबसे प्रमुख ग्रामीण परिवारों का सामाजिक सशक्तिकरण था,उसके बाद आर्थिक सशक्तिकरण और गरीबी कम करना था।

 

यह कार्यक्रम अब बिहार के 38 जिलों और 534 ब्लॉकों में चलाया जा रहा है।

 

‘जीविका’ की संरचना में जिंदगी की रेखा में नीचे से उपर की ओर जाने की सोच है। 10-15 महिलाएं एसएचजी के रूप में ब्याज पर ऋण लेने और बैंकों से क्रेडिट प्राप्त करने के लिए व्यवस्थित करती हैं। आर्थिक गतिविधि के आसपास केंद्रित वे निर्माता संगठन भी बनाते हैं, जैसे कि शहद उत्पादन या छात्रों के लिए कम लागत वाले सौर उर्जा वाले लैंप बनाना।

 

इन एसएचजी में से बीस से 30 ग्राम संगठन बनाते हैं, जबकि 25 से 35 गांव संगठन एसएचजी क्लस्टरों के एक संघ के रूप में एक साथ मिलते हैं।अमोला देवी एक ऐसे संघ की अध्यक्ष है जिसे ‘एकता संकुल संघ’ कहा जाता है, जिसमें चार ग्राम पंचायतों के 7,000 सदस्य हैं। इस फेडरेशन के लिए अकेले ब्याज से आय करीब 100,000 रुपए प्रति माह है।

 

जब महिलाएं ऋण वापस करती हैं, ब्याज सभी स्तरों पर वितरित किया जाता है, ताकि गांव और क्लस्टर ग्रुपिंग को एक शेयर मिले। साप्ताहिक बैठक अनिवार्य हैं, और रिकॉर्ड बनाए रखा जाना चाहिए। यह महिलाएं स्वच्छता से सामाजिक मुद्दों तक पर चर्चा के लिए यहां मिलती हैं। 2 अक्तूबर, 2017 को, उन्होंने दहेज को खत्म करने का वचन दिया। यह प्रथा बिहार में वर्षों से चली आ रही है।

 

लेकिन इसे शुरु करना आसान नहीं था।

 

परिवारों के प्रतिरोध के बाद भी महिलाओं ने बाहर रखे कदम

 

‘जीविका’- सामाजिक विकास की राज्य प्रोजेक्ट मैनेजर, अर्चना तिवारी कहती हैं, “बिहार में महिलाओं की उर्जा को सीमित करने की संस्कृति है। यहां तक ​​कि गांवों में, महिलाएं अपने घरों और इसकी परिधि तक ही सीमित थीं।  पुरुष शकी थे, वे जानना चाहते थे कि हम महिलाओं को क्या सिखा रहे थे।”

 

शुरुआती दिनों में शामिल हुई कई महिलाओं ने अपने पतियों को इस संबंध में नहीं बताया था या फिर उनके प्रतिरोध का सामना किया था। 2009 में जब फुलवा देवी शामिल हुई थी , तब उनकी सास ने उन्हें ताना मारते हुए पूछा था कि क्या वह ‘ पूरा दिन गांव की गलियों में घूमते हुए बिताएंगी।’ लेकिन जब फुलवा देवी ने अपने पति के लिए हार्डवेयर की दुकान स्थापित करने के लिए 100,000 रुपए का ऋण लिया, तो उन्हें पता चला कि उसने क्या किया था। फुलवा के पति ने उससे कहा, ‘आपने मेरे लिए जो किया है, मेरे माता-पिता भी नहीं कर सकते।’

 

वर्तमान में ‘जीविका’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में प्रतिनियुक्त और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी बालारुर्गन डी कहते हैं, “ये ऐसी महिलाएं हैं, जो अपने घरों से बाहर कभी कदम नहीं रखती थी जब तक कि उन्हें खेतों में न जाना हो या रिश्तेदारों या सामाजिक कार्यों में न जाना हो। अब ये महिला दूसरे राज्यों में जाती हैं और तीन महीने तक वहां रहती हैं।”

 

ये महिलाएं अपने गांवों से परे एक दुनिया की खोज कर रही हैं।

 

चार बार झारखंड और एक बार उत्तर प्रदेश का दौरा करने वाली फुलवा देवी कहती हैं, “झारखंड में पहले 15 दिनों तक मैं समझ नहीं पाती थी कि वहां कि महिलाएं मुझसे क्या कह रही थीं,…वे मुझे बैठने कह रही हैं या चलने के लिए कह रहे हैं…समझ नहीं पाती थी।”

 

 

कई महिलाओं की यह यात्रा भारत की खोज से कहीं ज्यादा

 

सरोज देवी कहती हैं, “जब हम एक साथ राज्य से बाहर जाते हैं, तो हम एक दूसरे से नहीं पूछ सकते हैं कि आपकी जाति क्या है।”  

 

बालामुर्गन इस बात से सहमत हैं। वह कहते हैं, “आप जाति और लिंग के अवरोधों पर एक बड़ा और बड़े पैमाने पर प्रभाव देख सकते हैं। आज जब आप 12 महिलाओं के समूह को देखते हैं, तो आप यह नहीं बता सकते कि ऊंची जाति कौन है और कौन कम जाति है। हर कोई साथ बैठती हैं और एक साथ काम करती हैं। “

 

मूनमा देवी ने बताया कि बिहार की लिट्टी-चोका की स्वादिष्ट व्यंजन के साथ वह एसएचजी मेला में भाग लेने के लिए केरल भी गई थी। 10 दिनों में उन्होंने 232,000 रुपए की बिक्री की थी। बीते दिनों को याद करती हुई वह कहती हैं, “ एक समय ऐसा था, जब मैं चूड़ियां खरीदने का सपना भी नहीं देख सकती थी।”

 

 

‘ऋण’ जैसे शब्द जीविका की महिलाओं को डराते नहीं

 

जीविका एसएचजी की भारत का सबसे बड़ा आंदोलन होने का दावा करता है। आंध्र प्रदेश एसएचजी आंदोलन पर आधारित मॉडल, यह अब झारखंड, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में समुदाय के मोबिलिज़रों को प्रशिक्षित करता है।

 

बालामुर्गन बताते हैं, जीविका “इस पैमाने पर बिहार के लिए सामाजिक पूंजी में निवेश करने के लिए एकमात्र परियोजना है। आप बिहार जैसे राज्य में बिना पैमाने के प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकते हैं और अभी हम दृढ़ विश्वास से कह सकते हैं कि हमने एक प्रभाव पैदा किया है। ”  

 

अमोला देवी 2007 में जीविका आंदोलन के शुरुआत को याद करते हुए अब हंसती हैं। उन्हें थोड़ी शंका थी, जब उन्हें निजी बचत के रूप में एक सप्ताह में 10 रुपए निर्धारित करने के लिए कहा गया था। वह कहती हैं, “मैंने इतने सारे ठगों को देखा है जो आते हैं और कहते हैं कि ‘हमें पैसे दें, हम आपकी बेटी की शादी के लिए निवेश करेंगे’ और फिर वे आपके पैसे लेकर गायब हो जाएंगे।”

 

अंत में जब वह थोड़ी नरम पड़ी और अपने जीवन में पहली बार बैंक खाता खोला, तो बैंक से उसे ऋण लेने के लिए कहा।

 

वह कहती हैं, “शब्द ‘ऋण’ भयावह है।” बिहार के अनौपचारिक गांव अर्थव्यवस्था में जहां ब्याज दर प्रति वर्ष 120 फीसदी के बराबर हो सकती है, यह देखना आसान है कि क्यों?

 

सबसे पहले  हाथ पंप की मरम्मत के लिए उसे 1,500 रुपए की जरुरत थी। इसके लिए ऋण लेना आसान नहीं था। लेकिन उसने यह माना कि वह छोटी किस्तों में 24 फीसदी ब्याज का भुगतान कर सकती थी। इसके बाद दूसरी बार, उसे 6,000 रुपए के ऋण की जरुरत थी ताकि मां के अंतिम संस्कार के लिए गिरवी रखे गए जमीन को छुड़ा सके। 7,000 रुपए के तीसरे ऋण से उन्होंने भैंसों की एक जोड़ी खरीदी। इस समय तक उसने अपने बेटे के लिए ‘डीजे बाजा’ (साउंडबॉक्स) खरीदने के लिए 30,000 रुपए के लिए आवेदन दिया, तो वह सहज थी।

 

 

सभी तरह के जीविका ऋण का करीब 11 फीसदी, गांव के वाणिज्यिक उधारदाताओं से उधार लेने वाले ऋणों का भुगतान करने में जाता है। बरहा गांव की दिहाड़ी मजदूर की पत्नी कांती देवी ने तुरंत उस ऋण का भुगतान किया, जो उसने 120 फीसदी पर लिया था। वह कहती हैं, “यह ब्याज हमें आगे गरीबी में डाल रहा था और हम स्कूल में अपने सात बच्चों को भेजने के लिए भी सक्षम नहीं थे।” अनौपचारिक धन-ऋणदाता ने अपनी ब्याज दर को प्रतिवर्ष 60 फीसदी तक घटा दिया है।

 

पश्चिम बंगाल में काम करने वाले प्रवासी की पत्नी, शलहा खातून ने अपने बच्चे के लिए दवा खरीदने के लिए पहली बार 1,500 रुपए का उधार लिया था। उसके बाद से, उसने अपनी जमीन पर बंधक का भुगतान किया और जब उसका पति गंभीर रूप से बीमार हो गया, तो उसने चिकित्सा देखभाल के लिए 40,000 रुपए का ऋण लिया। उसके सभी बच्चे स्कूल में हैं।सबसे बड़ी बेटी बीए में पढ़ रही है।

 

ऐसे राज्य में जहां 30.4 फीसदी महिलाएं कुपोषित हैं, कुछ महिलाओं ने अपनी चिकित्सा उपचार के लिए ऋण लेने की बात कही है। सरोज देवी बताती हैं, “एक बार जब सायकिल से गिरने के बाद उसके सिर पर चोट लगी तब गया में इलाज की व्यवस्था ठीक नहीं लगी और पड़ोसी राज्य झारखंड की राजधानी, रांची में खुद के चिकित्सा उपचार लेने के लिए 20,000 रुपए का कर्ज लिया।”

 

एक मजदूर की पत्नी शीला देवी का मामला शायद सबसे उल्लेखनीय है। उनका 22 वर्ष का बेटा सुरेद्र बोधगया में गाइड का काम करता था। 2009 में जब उन्होंने शाली देवी से कहा कि वे मैंडरिन सीखने के लिए दिल्ली जाना चाहता था, उन्होंने साफ मना कर दिया। वह कहते हैं, “यह मेरे बस के बाहर की बात थी। इतने पैसे मैं कहां से लाती?”

 

बेटा ने भावनात्मक कार्ड खेला। उसने मुझसे कहा, “, यदि आप मुझे शिक्षित नहीं करना चाहते थे तो तुमने मुझे जन्म क्यों दिया?”

 

शीला देवी ने कहा कि वह उस रात सो नहीं सकी। अगले दिन, उसने अपने एसएचजी से 80,000 रुपए के ऋण के लिए पूछा। अपनी बचत के साथ, उसने अपने बेटे को हवाई टिकट खरीदा- न कि दिल्ली तक बल्कि चीन तक। अगर वह मैंडरिन सीखना चाहता था, तो वह उसे वहां से ठीक तरह से सीख पाएगा। इससे पहले परिवार में किसी ने भी हवाई जहाज से यात्रा नहीं की थी।

 

 

अनजाने में, ऐसा प्रतीत होता है कि जब जीविका महिलाएं ऋण लेती हैं तो इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि घर की मरम्मत, पुराने ऋण का भुगतान, पूंजी निवेश और छोटे व्यवसायों की स्थापना।

 

इनमें से कुछ उनके पति या बेटों द्वारा चलाए जा रहे हैं। 2008 में एसएचजी में शामिल होने से पहले रेणु देवी के पति कुरमावा गांव के क्षेत्रों में एक औनौपचारिक मजदूर के रूप में काम करते थे। 5000 रुपए के पहले ऋण के साथ उन्होंने अपने पति के लिए बाल सैलून खोला। 25,000 रुपए के दूसरे ऋण उस सैलून को विस्तारित करने में चला गया, जिससे उन्होंने इसे “फैंसी” बनाया। जब उसके बेटे ने अपना ब्यूटी पार्लर शुरू किया, उसने 50,000 रुपए का दूसरा ऋण लिया। वर्षों से, उसने अब तक  उसने 200,000 रुपए से अधिक का ऋण लिया है। सभी का भुगतान किया गया है, लेकिन वह स्वयं व्यवसाय नहीं चलाती है जो अपने बेटे और पति के लिए वित्तपोषित किया है।

 

खिजरसराय की सुनीता कुमारी का पति चिंटू कुमार आइसक्रीम का व्यवसाय करता है, जो सीजन में 16 विक्रेताओं को रोजगार देता है। इस मौसम में  बिक्री प्रति दिन 10,000 रुपए तक पहुंच जाती है। व्यापार के लिए पूंजी सुनीता के एसएचजी ऋण से आई थी। क्या वह भी काम करती है? इसके जवाब में चिंटू कहते हैं “जब वह मेरे आइसक्रीम व्यवसाय के साथ मेरी मदद कर सकती है, तो उसे बाहर जाने और कहीं और काम करने की आवश्यकता कहां है?”

 

विश्व बैंक के  वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ, विनय कुमार वीतुकुर कहते हैं, “महिलाओं को मुर्गी पालन और उच्च मूल्य वाली कृषि जैसे उद्यमों को स्थापित करने और चलाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। महिलाएं इन उद्यमों का स्वामित्व और संचालन कर रही हैं और वर्तमान में करीब 270,000 महिला उत्पादक समूहों को प्रशिक्षित किया गया है।”

 

सफलता ने नई चुनौतियां पैदा की हैं

 

जबकि पैमाना एक महत्वपूर्ण कारक रहा है, जीविका की सफलता ने इसे चलाने वाले लोगों की नवीन सोच के लिए बहुत कुछ किया है।

 

उदाहरण के लिए, इस कार्यक्रम में एक सामाजिक-वनरोपण परियोजना है, जहां महिलाओं को पांच साल स्वामित्व मिलने वाले पेड़ों के लगाने और रख-रखाव करने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) के माध्यम से मजदूरी मिलती है। जीविका, एक गैर-लाभकारी संस्था निदान और जीएआईएन (ग्लोबल अलायंस फॉर इम्प्रूवड पोषण) के बीच एक और साझेदारी चावल और दालों के साथ गेहूं प्रदान करता है और आंगनवाड़ी के लिए खनिजों और विटामिन आरक्षित करता है।

 

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बिहार में गया जिले के सहदेवखाप गांव में संयंत्र में काम करती महिलाएं। जीविका, एक गैर-लाभकारी संस्था निदान और जीएआईएन(ग्लोबल अलायंस फॉर इम्प्रूवड पोषण) के बीच एक और साझेदारी के तहत चावल और दालों के साथ गेहूं भी प्रदान किया जाता है और आंगनवाड़ी के लिए खनिजों और विटामिन आरक्षित करता है।

 

ग्राम संगठनों को एक स्वास्थ्य-जोखिम निधि और एक खाद्य-सुरक्षा निधि प्राप्त होती है, जिससे महिलाओं को सामूहिक रूप से सीजन के दौरान अनाज खरीदने और जरुरत के समय के लिए स्टोर करने में सक्षम बनाता है।

 

शुरुआती सालों में, इससे कुछ भ्रम हो गया,  जैसा कि तिवारी याद करते हुए बताते हैं। जब तीन महिलाओं के एक समूह ने 200 क्विंटल अनाज खरीदने के लिए एक चावल के थोक व्यापारी से संपर्क किया, तो व्यापारी ने सोचा कि वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं: इससे पहले किसी महिला ने कब थोक में अनाज खरीदा था? लेकिन महिलाओं को धोखा देना आसान नहीं था और अनाजों की अच्छी कीमत पर गिरने से पहले अपनी  चेक बुक दिखाई।

 

कमजोर प्रशासन और व्यापक भ्रष्टाचार के साथ एक राज्य में जीविका सफल रहा है। एडीआरआई के शैबल गुप्ता कहते हैं,  “इसने जमीनी स्तर से एक मजबूत संरचना बनाई है।” जिलों के चयन से लेकर बाजार के वेतन पर काम पर रखे जाने वाले युवा पेशेवरों के लिए, जीविका “पूरे देश में नहीं तो बिहार में अपनी तरह का केवल एक परियोजना रहा है।

 

ग्रामीण विकास विभाग के सचिव और पिछले 10 वर्षों में जीविका के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरविंद कुमार चौधरी कहते हैं, ” दुनिया का बेहतरीन आइडिया विफल हो जाएगा अगरे इसे ठीक से लागू नहीं किया गया।हमने इस परियोजना को लागू करने के लिए सबसे अच्छे लोगों को लिया है, क्योंकि शुरुआत से यह स्पष्ट था कि गरीबों को खराब सेवा नहीं दी जानी चाहिए। “

 

वर्ष 2012 में ‘इन्स्टिटूट ऑफ रुरल मैनेजमेंट’ से ग्रैजुएट, आनंद, ने मई 2012 में शामिल होने के बाद से जीविका की प्रगति देखी है। वह कहते हैं, ” हमारे सफल होने का कारण सामुदायिक स्तर पर संसाधनों का विकास करना है।”

 

समय के साथ, इस परियोजना ने महिलाओं को संस्थानों और बैंकों, पंचायती राज और मनरेगा जैसे अधिकारियों के सामने उजागर किया है। सिंह कहते हैं, “यह सशक्तिकरण को एक नए स्तर पर लेकर आया है, जहां महिलाएं अपने घर से बाहर नहीं निकलती थी, वहीं अब वे बैंक प्रबंधकों या जिला मजिस्ट्रेट्स के साथ उनकी समस्याओं पर चर्चा करने की मांग करती हैं।”

 

क्या कोई नकारात्मकता भी है? बालामुर्गन कहते हैं, कि “जब आप बड़े पैमाने पर काम करना शुरू करते हैं, तो यह एक समान स्तर और गुणवत्ता बनाए रखना एक चुनौती तो है ही।”

 

जीविका परियोजना के निषेध से स्वच्छता तक कई मुद्दों पर काम करने की उम्मीद भी चुनौतीपूर्ण है।

 

लेकिन ‘जीविका’ की सफलता की वास्तविक कुंजी महिलाओं के साथ निहित है। परियोजना ने कभी भी अंश जारी नहीं किया है, और ऋण को ब्याज के साथ वापस चुकाया गया है (हाल ही में 24 फीसदी से 12 फीसदी तक नीचे लाया गया)।

 

‘जीविका दीदी’  ही ऋण पर निर्णय लेती हैं, पुनर्भुगतान का प्रबंध करती हैं, पुस्तक और रिकॉर्ड रखने के तरीकों के साथ साप्ताहिक बैठकों का आयोजन करती हैं। वे समुदाय के मोबिलिज़रों को काम पर लगाते हैं और अपने वेतन का भुगतान करते हैं।

 

सिंह कहते हैं कि, “यह विचार उन अधिकारियों की एक समुदाय का निर्माण करना है जो पूरी तरह से आत्मनिर्भर और परियोजना के समाप्त हो जाने के बाद भी इसे बनाए रखने में सक्षम हैं।” एकाधिकार और पक्षपात को रोकने के लिए नेतृत्व घुमाया जाता है। चौधरी कहते हैं: “महिलाओं को पता है कि यह सब्सिडी नहीं है। वे जानते हैं कि उन्हें बैठकर अपनी समस्याओं का समाधान करना होगा। “

 

…और वे समाधान करते हैं

 

जब शारवाड़ा गांव के रामचंद्र ठाकुर ने शराब पर लगी पाबंदी के दिनों में शराब खरीदने के लिए उनकी पत्नी द्वारा एसएचजी ऋण से खरीदी साईकल बेच दी तो एसएचजी ने उन्हें एक अपराधी घोषित कर दिया और उनकी पत्नी की ऋणों तक पहुंच रोक दी।

 

जब एक मुखिया ने पंचायत चुनाव लड़ने के लिए एसएचजी फंडों में 50,000 रुपए का इस्तेमाल किया, जो अंततः हार गया, तब महिलाएं उसके दरवाजे तक उतर गईं, थाली और स्टील प्लेटों से मार कर उन्हें शर्मिंदा किया। मुखिया ने 27,000 रुपए लौटाए हैं और बाकी को 5,000 रुपए की किश्तों में वापस भुगतान करने का वादा किया है।

 

गांव में कोई भी, यहां तक कि गांव के प्रमुख भी ‘जीविका दीदी’ के साथ नहीं उलझते हैं।

 

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भारतीय महिलाओं का श्रमबल से बाहर होने के कारणों पर देश भर में चल रही हमारी पड़ताल का यह सातवां लेख है। 

 

पहले के लेख आप यहां पढ़ सकते हैं:-

 

क्यों भारतीय कार्यस्थलों में कम हो रही है महिलाओं की संख्या – 

 

नौकरी पर महिलाएं : हरियाणा की एक फैक्टरी में उम्मीद के साथ परंपरा का टकराव

 

घरेलू कामों के दवाब से महिलाओं के लिए बाहर काम करना मुश्किल, मगर अब बदल रही है स्थिति

 

भारत की शिक्षित महिलाएं ज्यादा छोड़ रही हैं नौकरियां 

 

हिमाचल प्रदेश की महिलाएं क्यों करती हैं काम: एक जैम फैक्टरी के पास है इसका जवाब

 

भारत में जज से लेकर श्रमिकों तक यौन उत्पीड़न का दंश

 

(भंडारे पत्रकार हैं, दिल्ली में रहती हैं और अक्सर भारत के लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 25 नवंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

 

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