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जयपुर की जर्जर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में ग्रेजुएट, फैक्ट्री मालिक और किसानों को श्रमिक नौकरियों की तलाश

माधव शर्मा,
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( जयपुर के मार्केट स्काव्यर में कॉन्ट्रैक्टर का इंतजार करते दिहाड़ी मजदूर। नोटबंदी और गुड्स एंड सर्विस टैक्स के बद्तर कार्यान्वयन और चीनी के द्वारा संचालित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा ने राष्ट्रव्यापी अर्थव्यवस्थाओं को अपंग बना दिया है। )

 

जयपुर: भारत के गुलाबी शहर के तीन बाजार क्षेत्रों में, खड़े एक पूर्व कृषक दंपति, एक कारखाने के पूर्व मालिक और एक ग्रैजुएट बताते हैं कि एक श्रमिक का काम मिलना कितना मुश्किल है, वह भी तब जब रिकॉर्ड बेरोजगारी की मार झेल रहे देश में आम चुनाव होने जा रहे हैं।

 

30 साल की शांति देवी और उसके पति 33 साल के बाबूलाल सैनी को काम मिले आठ दिन हो चुके हैं। एक चमकदार, लाल साड़ी पहनी देवी फुटपाथ पर बैठ गईं। पास में, एक चेक शर्ट और पैंट पहने हुए सैनी, वहां इकट्ठा 300 मजदूरों के साथ चर्चा में मशगूल थे।

 

यहां ठाडी बाजार चौकी या स्काव्यर में ( 3 राजस्थान की राजधानी में 5 में से एक मजदूर,जहां रोज़गार की तलाश में इकट्ठा होते हैं ) हर कोई रोज़गार की कमी से दुखी था।

 

आठ साल पहले शांति और उनके पति करौली जिले के राजोर के अपने गांव से 150 किलोमीटर पूर्व राजस्थान की राजधानी जयपुर आए थे। तब से वे दैनिक मजदूरी के लिए निर्माण स्थलों पर काम किया करते हैं। गांव में उनके पास एक ‘छोटा खेत’ था, जिसे उन्होंने बेच दिया, क्योंकि वे 5 लाख रुपये का ऋण चुका नहीं कर सकते थे।

 

शांति देवी और उनके पति बाबूलाल सैनी ( जिन्होंने कर्ज चुकाने के लिए अपना खेत बेच दिया ) अब मिलतर 8,000 रुपये कमाते हैं, जो कि 2017 के 18,000 से कम है। देवी कहती हैं, “दो साल पहले, हमें महीने में 25 दिन काम मिलता था, लेकिन अब हमें महीने में केवल आठ से 10 दिन ही काम मिलता है।” वे कहते हैं, उन्होंने इस तरह नौकरी की कमी का अनुभव पहले कभी नहीं किया था।

 

देवी ने बताया, “दो साल पहले, हमें महीने में 25 दिन काम मिलता था, लेकिन अब हमें महीने में केवल आठ से 10 दिन ही काम मिलता है।” इस अवधि में उनकी कमाई लगभग 55 फीसदी घट गई है। अब वे एक साथ 8,000 रुपये प्रति माह तक कमाते हैं। 2017 में यह प्रत्येक व्यक्ति 9,000 रुपये हुआ करता था।

 

इस आलेख में शामिल सभी लोग राजस्थान की आधिकारिक शहरी गरीबी रेखा से ऊपर होने के लिए पर्याप्त कमाई करते हैं, यानी 1,002 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह से ज्यादा। इसका मतलब है कि वे सरकारी सब्सिडी और सामाजिक-सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए पात्र नहीं हैं।

 

विशेषज्ञों ने कहा कि, वेतन और अवसरों में गिरावट नवंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी कार्यक्रम ( जिसने भारत की 86 फीसदी मुद्रा को रातों-रात अमान्य कर दिया गया ) और जून 2017 में लागू माल और सेवा कर (जीएसटी) से उपजी थी, जिसके बारे में कहा गया कि ये जल्दबाजी भरा कदम है और इसके अराजक कार्यान्वयन के लिए भी काफी आलोचना की गई है।

 

एक वर्ष से फरवरी 2019 तक, नियोजित भारतीयों की संख्या 60 लाख से 4 करोड़ तक गिर गई है, जैसा कि ‘संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ (सीएमाईई) द्वारा बताया गया है।  सीएमआईई के प्रबंध निदेशक और सीईओ  महेश व्यास ने 5 मार्च, 2019 को लिखा था, “बेरोजगारी की स्थिति ने नोटबंदी के बाद के वर्ष को प्रतिबिंबित किया है, लेकिन अब यह एक गहरी और बड़ी समस्या का संकेत देता है।”

 

व्यास लिखते हैं, “कामकाजी आबादी की तुलना में कम रोजगार अवसर की वजह से निजी और असंगठित क्षेत्रों में मजदूरी घट गई है, जहां केवल हताश लोग ही ऐसी नौकरियां लेने के लिए तैयार हैं।”

 

हमारी रिपोर्टिंग के अनुसार, चीनी सामानों की प्रतिस्पर्धा ने देश भर की अर्थव्यवस्थाओं को पंगु बना दिया है। राजस्थान में एक अन्य कारक पर्यावरण की दृष्टि से गंभीर बजरी और नदी-रेत खनन पर 2017 का सर्वोच्च न्यायालय का प्रतिबंध है, जिसने हजारों लोगों काम से निकाल दिया गया, ग्रामीण श्रमिकों को शहरों में भेज दिया और प्रति व्यक्ति आय द्वारा भारत के ग्यारहवें सबसे गरीब राज्य में नौकरियों पर दबाव बढ़ा दिया है।

 

यह 11-आलेखों की श्रृंखला का दूसरा हिस्सा है (आप पहला भाग यहां पढ़ सकते हैं), जो भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार को ट्रैक करने के लिए देश भर के श्रम केंद्रों से सूचित किया गया है ( ऐसे स्थान जहां अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिक अनुबंध की नौकरियों की तलाश में जुटते हैं )। यह क्षेत्र, जो देश के अनपढ़, अर्ध-शिक्षित और योग्य-लेकिन-बेरोजगार लोगों के द्रव्यमान को अवशोषित करता है, भारत के 92 फीसदी कर्मचारियों को रोजगार देता है, जैसा कि सरकारी डेटा का उपयोग करके 2016 के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अध्ययन से पता चलता है।

 

अनौपचारिक श्रमिकों के जीवन और आशाओं को ध्यान में रखते हुए, यह श्रृंखला नोटबंदी और जीएसटी के बाद नौकरी के नुकसान के बारे में चल रहे राष्ट्रीय विवादों को एक कथित परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। ऑल इंडिया मैन्यफैक्चरर ऑर्गनाइजेशन के एक सर्वेक्षण के अनुसार, चार साल से 2018 तक  नौकरियों की संख्या में एक-तिहाई गिरावट आई है। सर्वेक्षण में 300,000 सदस्य इकाइयों में से 34,700 को शामिल किया गया था। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार केवल 2018 में, 1.1 करोड़ नौकरियां खो गईं और इनमें से  ज्यादातर असंगठित ग्रामीण क्षेत्र में थे।

 

देवी और सैनी भारत के अनौपचारिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं,  जैसा कि हमने कहा, यह भारत के 52.7 करोड़ कार्यबल में से 92 फीसदी को रोजगार देता है। और उन लोगों को रोजगार देता है, जो अन्य व्यवसायों में असफल रहे हैं और जो केवल श्रम के लिए योग्य हैं।

 

देश भर के लाखों अनौपचारिक श्रमिकों की तरह, उनकी पहले से ही अनिश्चित आर्थिक स्थिति, पिछले दो वर्षों में और खराब हो गई है। उनका 8,000 रुपये मासिक वेतन रसोई और शौचालय के साथ एक कमरे के घर पर किराए के रूप में खर्च होता है, और पांच और सात साल की उम्र के उनके दो बेटों की शिक्षा पर 2,000 रुपये खर्च किया जाता है। देवी आठवीं कक्षा तक पढ़ी हैं, उनके पति अनपढ़ हैं। उनकी एक बेटी है, जिसकी शादी 13 साल की उम्र में हुई थी।

 

उनका घर चौकड़ी से 4 किमी दूर है और वे इलेक्ट्रिक रिक्शा में आने और जाने के लिए प्रति व्यक्ति प्रति यात्रा 10 रुपये का भुगतान करते हैं। ठाडी बाजार पर चौकी कुशल, अर्ध-कुशल और अकुशल श्रमिक नियमित रुप से आते हैं। कुशल श्रमिक, जिसे श्रमिक वर्ग की क्रीम माना जाता है, प्रति दिन लगभग 500 रुपये कमाते हैं, अर्धकुशल श्रमिक उनसे लगभग आधा कमाते हैं।

 

लेकिन उनकी कहानियां एक जैसी हैं।
 

सैनी ने हमें बताया, “हर दिन, हम सुबह 8 से 12 बजे तक काम का इंतजार करते हैं,जब हमें काम नहीं मिलता है, तो हम घर लौट आते हैं। इसके बाद हमारा पूरा दिन नष्ट हो जाता है, क्योंकि हमारे पास कोई काम नहीं है। ”

 

बढ़ती बेरोजगारी की समस्या
 

राजस्थान के छोटे पैमाने पर निर्माण, खनन, रत्न और आभूषण उद्योग को नोटबंदी और जीएसटी ने “गंभीर रूप से प्रभावित” किया है, जिसे चीनी आयात और उपकरणों के ज्वार से बदतर बना दिया है, जो नौकरियों और खनन प्रतिबंधों की जगह लेता है, जैसा कि विशेषज्ञों और दिहाड़ी मजदूरों ने हमें बताया है।

 

एक वैचारिक संस्था, बजट एनालिसिस राजस्थान सेंटर के एक आर्थिक विश्लेषक नेसर अहमद ने कहा, “नकदी संकट के कारण, लोगों की क्रय शक्ति कम हो गई और बाजार मंदी में गिर गया। नवंबर 2017 से नौकरियों में लगातार कमी आई है। सरकार के फैसलों का असर एक साल बाद दिखने लगा।”

 

सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान की बेरोजगारी दर 2016 में दोगुनी से अधिक हुई है। यह आंकड़े  2016 में 6.6 फीसदी से दिसंबर 2018 में 14.9 फीसदी हुए हैं।

 

नौकरियों के संकट ने शिक्षितों को भी अपने पाले में खींच लिया है।
 
गणेश मेर्था की कहानी से संकट की भयावहता का पता चलता है।
 

पूर्वी राजस्थान के सवाई माधोपुर में शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह गवर्नमेंट कॉलेज से आर्ट्स ग्रैजुएट 22 वर्षीय मेर्था फरवरी की एक ठंड सुबह कांट्रैक्टर द्वारा उठाए जाने का इंतजार कर रहे थे। नौकरी की तलाश में जयपुर आए उन्हें एक साल हो चुका है। जिस दिन हमने उनसे बात की, मजदूर के रूप में उन्हें एक दिन में 300 रुपये कमाने की उम्मीद थी।

 

खाकी पैंट और काले टीशर्ट पहने मेर्था ने हमें बताया, “मैं सोच कर जयपुर आया था कि मेरे लिए कोई नौकरी होगी और शहर में मुझे एक अच्छी जिंदगी मिलेगी।” जनवरी 2019 में, उन्होंने केवल 12 दिनों के लिए काम किया, 4,800 रुपये कमाए, जिनमें से 3,500 रुपये चौकडी के पास अपने एकल कमरे के किराए पर खर्च किए गए।

 

आर्ट्स में ग्रैजुएट गणेश मेर्था नौकरी की तलाश में एक साल पहले जयपुर आए थे। जिस दिन हमने उनसे बात की, मजदूर के रूप में उन्हें एक दिन में 300 रुपये कमाने की उम्मीद थी।

 

2016 में, एक चौकडी में 300 में से 200 लोगों को काम मिला, जैसा कि मजदूरों के एक संघ, निर्माण मजदूर संघ के सचिव हरिकेश बुगालिया ने अनुमान लगाते हुए बताया है। आज केवल 50-80 लोगों को काम मिलता है। ठेकेदार उनकी हताशा का फायदा उठाते हैं। बुगालिया कहते हैं, “मजदूर अपने गांवों में वापस जा रहे हैं, जैसा कि उनकी हताशा बढ़ती है, ठेकेदार कम मजदूरी देते हैं। “वे भूख के कगार पर हैं।”

 

मेर्था उस भूख जानते हैं। उन्होंने कहा, “कई दिनों के बाद मैंने सादा चावल खाया, क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे।” फरवरी में मुझे 28 दिनों में से तीन दिन काम मिला। वह कहते हैं “मैं एक ग्रैजुएट हूं, और मैं मजदूरी कर रहा हूं।”

 

मेर्था का जीवन कठिन है, क्योंकि उन्हें खनन प्रतिबंधों के बाद कस्बों और शहरों में स्ट्रीमिंग करने वाले ग्रामीण श्रमिकों के स्कोर का मुकाबला करना है, जो पहले से कम नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।

 

अवैध रूप से खनन जारी है, लेकिन प्रतिबंध ने भी निर्माण धीमा कर दिया है, जिसे रेत की जरूरत है, आगे चलकर काम कम होगा।

 

बालू-खनन बंद होने पर मजदूरों पर ज्यादा असर  
 

सौराती देवी (45) और उनके पति रामेश्वर (49) ने बताया कि कैसे उन्होंने रेत-खनन प्रतिबंध के बाद अपनी नौकरी खो दी और कैसे टोंक शहर छोड़ कर जयपुर आए।

 

देवी ने कहा कि वह और रामेश्वर दोनों, अनपढ़,  हैं और उन्हें महीने में आठ दिन से अधिक काम नहीं मिलता है, जबकि टोंक में लगभग 20 दिन काम मिलता था।

 

देवी ने बताया, “मैंने अपने बेटे (जो अब एक कॉलेज में पढ़ता है) को टोंक वापस भेज दिया, क्योंकि उसके यहां होने से खर्च बढ़ जाएगा , जिसे वहन करना मुश्किल था।”

 

बालू-खनन पर प्रतिबंध हटने के बाद सौराती देवी (केंद्र) और उनके पति ने टोंक शहर छोड़ दिया। जयपुर में दंपति को महीने में आठ दिन से ज्यादा काम नहीं मिला है, जबकि टोंक में उन्हें करीब 20 दिन काम मिलते थे।

 
2017 के बाद से उनकी आमदनी आधी हो कर, करीब 8,000 रुपये प्रति माह हो गई है।
 

राजस्थान हाई कोर्ट और मानव अधिकार कानून नेटवर्क के एक वकील, ताराचंद वर्मा ने कहा, “लोग कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि स्थानीय जगह पर कोई काम नहीं है”। अधिक काम होने पर भी, दिहाड़ी मजदूरों के लिए विकल्प सीमित हैं।

 

कोई आधिकारिक डेटा नहीं हैं, लेकिन लगभग राज्य के 69 मिलियन लोग में से आधे श्रमिक हैं ( दैनिक मजदूरी पर 3 करोड़ ), जैसा कि निर्माण मजदूर संघ का अनुमान है।

 

समूह के अनुमान के अनुसार, 35 लाख मिलियन से अधिक निर्माण श्रमिक हैं, खनन में 2 मिलियन काम करते हैं, ईंट भट्टों में 10 लाख रंगाई और छपाई में 500,000, जवाहरात और आभूषण उद्योग में 200,000 और खेतों पर 30 लाख लोग काम करते हैं।

 

रत्नों और आभूषणों के क्षेत्र में हमें सबसे नोटबंदी और जीएसटी के खिलाफ लोगों में सबसे ज्यादा गुस्सा देखने को मिला।

 

एक ठेकेदार से मैं मजदूर बन गया, बीजेपी की बदौलत
 
40 साल के लालाराम चौधरी नोटबंदी और जीएसटी का जिक्र आते ही गुस्से में आ गए।
 

चौधरी ने 2008 में काम शुरु किया था और वे रत्न-कटिंग और पॉलिशिंग फैक्ट्री के मालिक थे, खर्च के बाद एक महीने में 40,000 रुपये तक कमाते थे और 25 श्रमिकों को रोजगार देते थे। हमने चौधरी को सीतापुर चौकडी पर नौकरी की तलाश में पाया। अब वह 14 किमी की यात्रा करते हैं और सीतापुर तक बस से आते है, 10,000 रुपये तक कमाते है और हर महीने 14 दिन काम करते है।

 

काले और सफेद चेक शर्ट, जैकेट और एक ग्रे मफलर पहले हुए चौधरी को देखकर लगता नहीं कि वे इस दुनिया से हैं। करीब से देखने पर पता चला कि उनकी जैकेट फीकी पड़ गई थी। उन्होंने कहा कि दो साल से कोई कपड़े नहीं खरीदे हैं। वह बताते हैं, उनका परिवार ( माता-पिता, पत्नी और दो बच्चे ) घर पर सब्जियां उगाते हैं, जिससे कुछ बचत हो।

 

लालाराम चौधरी, कभी रत्न-कटिंग और पॉलिशिंग कारखाने के मालिक थे। कारखाने की मशीनों को बेचकर उन्होंने  अपने 25 श्रमिकों को भुगतान किया और अपने सपने को छोड़ दिया। आज, वह मजदूरी पर जीवित हैं।10,000 रुपये तक कमाते हैं। हर महीने उन्हें 14 दिनों के लिए काम मिल पाता है।

 

चौधरी ने कहा, ‘मैंने डिमोनेटाइजेशन के बाद एक साल में 200,000 रुपये गंवाए और फिर जीएसटी आया, इसलिए मुझे फैक्ट्री बंद करनी पड़ी।’ उन्होंने कारखाने की मशीनों को बेच दिया, अपने श्रमिकों को भुगतान किया और अपने सपने को छोड़ दिया, हालांकि अभी भी वह 2013 में बनाए तीन-बेडरूम के घर में रहना जारी रखते हैं।

 

चौधरी ने कहा, “मैं 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को वोट नहीं दूंगा।उनकी नीतियों के कारण, मैं एक ठेकेदार से मजदूर बन गया।”

 

नोटबंदी और जीएसटी ऐसे समय में आए जब चीनी मशीनें रत्न और आभूषण उद्योग में मैनुअल श्रम को कम कर रही थीं। इससे कोई मदद नहीं मिली।

 

जींस और नीली, चेक की हुई शर्ट पहने, 36 वर्षीय रामफूल हरितवाल सांगानेर के जयपुर मोहल्ले में एक रत्न काटने वाली फैक्ट्री के मालिक हैं और 10 वर्षों से इस क्षेत्र में हैं। उन्होंने बताया कि कैसे चीनी मशीन टूल्स ने मैनुअल काम को 60 फीसदी तक कम कर दिया था।

 

एक साल में, हरितवाल ने अपने कर्मचारियों की संख्या सात से तीन कर दी। हरितवाल ने बताया  इससे पहले, जौहरियों को बेचे जाने से पहले कच्चे रत्न को काटने, आकार देने और पॉलिश करने की आवश्यकता होती थी। “अब, चीनी मशीनों के आगमन के साथ, यह सब काम एक ही जगह पर किया जाता है।”

 

जयपुर के सांगानेर में मणि काटने के कारखाने के मालिक और उद्योग में 10 साल से लगे रामफूल हरितवाल ने बताया कि कैसे चीनी मशीन टूल्स ने मैनुअल काम 60 फीसदी तक कम कर दिया था। एक साल में, हरितवाल ने अपने कर्मचारियों की संख्या सात से तीन कर दी।

 

उन्होंने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी ने उनको आर्थिक रूप से तोड़ दिया। कटे हुए और पॉलिश किए गए हीरे और कीमती पत्थरों पर 0.25 फीसदी जीएसटी की दर मामूली सी आय में दशकों तक जीवित रहने वाली छोटी इकाइयों के कारोबार को समाप्त कर रही है। हरितवाल की कमाई हर महीने 25,000 रुपये – 30,000 रुपये से घट कर वर्तमान में 10,000 रुपये से 15,000 रुपये के बीच हो गई है।

 

आभूषण उद्योग नकदी पर चलता है और नोटबंदी और आभूषणों की नकदी खरीद को 200,000 रुपये तक सीमित करने के एक सरकारी निर्णय के साथ ( बेहिसाब नकद लेनदेन पर अंकुश लगाने और कर के दायरे को चौड़ा करने के योग्य उद्देश्य के साथ ) उद्योग इसका सामना करने में असमर्थ रहा, जैसा कि बेंगलुरु के अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा।

 

जयपुर सर्राफा (आभूषण) व्यापारी समिति के अध्यक्ष 53 वर्षीय कैलाश मित्तल ने कहा, “रत्न और आभूषणों की मांग में कमी के कारण, हमें श्रमिकों को निकालना पड़ा।”

 

मित्तल एक आभूषण की दुकान के मालिक भी हैं, जहां उन्होंने अपने कर्मचारियों की संख्या 10 से छह कर दी है। उनके अनुमान से, जयपुर में इलेक्ट्रिक रिक्शा चलाने वालों में से अधिकांश कभी आभूषण डिजाइनर और जवाहरात कटर थे।

 

चूंकि जयपुर की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी, परिणामस्वरूप रोजगार की समस्या को दूर करने में सरकार कई कदम पीछे रह गई है।

 

सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम देर से और अपर्याप्त भी
 

1996 में, बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (BOCW) एक्ट पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य सभी असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को पंजीकृत करना था, जिससे वे सरकारी कल्याण और सामाजिक-सुरक्षा कार्यक्रमों से लाभान्वित हो सकें। राजस्थान ने कानून पारित करने के 13 साल बाद इसे लागू किया और श्रम कल्याण बोर्ड बनाया।

 

सिद्धांत रूप में, इससे अनौपचारिक श्रमिकों के राज्य के लोगों के लिए पर्याप्त लाभ होने चाहिए: शिक्षा और कौशल विकास; जीवन बीमा; आकस्मिक मृत्यु या चोट के लिए मुआवजा; मातृत्व लाभ; साइकिल और बहुत कुछ।

 

राजस्थान के श्रम विभाग के अतिरिक्त आयुक्त सीबीएस राठौड़ के अनुसार, “राज्य में अब तक 23 लाख मजदूर पंजीकृत किए गए हैं और 2,200 करोड़ रुपये श्रम उपकर के रूप में एकत्र किए गए।”

 

राठौड़ ने कहा कि 73 फीसदी या 1,600 करोड़ रुपये से अधिक खर्च नहीं किया गया है, और 23.9 फीसदी या 550,000 से अधिक श्रमिकों को लाभ नहीं हुआ है।

 

उदयपुर जिले के सलूम्बर ब्लॉक में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2018 के सामाजिक ऑडिट के दौरान सरकारी लापरवाही का खुलासा हुआ था। रिपोर्ट से पता चला कि 22 फीसकी अनौपचारिक श्रमिकों को आवेदन जमा करने के चार से छह महीने बाद लाभ मिला, लगभग 6.43 फीसदी को सात से नौ महीने के बाद और 4.56 फीसदी लगभग एक साल के बाद लाभ मिला। रिपोर्ट में यह भी पता चला कि सर्वेक्षण में शामिल 1,400 श्रमिकों में से 39 फीसदी मजदूर नहीं थे, जो सरकार के डेटाबेस पर सवाल उठाते हैं।

 

राठौड़ ने स्वीकार किया कि पिछले दो से तीन वर्षों में श्रमिक प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा, “लेकिन उन्हें काम दिलाने की जिम्मेदारी औद्योगिक विभाग की है, हमारी नहीं।” वह आगे कहते हैं कि उनका विभाग केवल कल्याणकारी योजनाओं को लागू करता है।

 

मजदूरों की आजीविका को सुरक्षित रखने में मदद करने वाली संस्था आजीविका ब्यूरो में कार्यक्रम प्रबंधक, संतोष पूनिया ने उन लोगों को पंजीकृत करने में श्रम विभाग की “लापरवाही और निरीक्षण प्रक्रिया ” को दोषी ठहराया, जो बीओसीडब्ल्यू कानून के तहत मजदूर नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि, कई अधिकारियों को रिश्वत देकर पंजीकृत हुए थे।

 

श्रम विभाग के अतिरिक्त आयुक्त राठौड़ ने लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि सभी योजनाओं का लाभ पंजीकृत मजदूरों को समय पर दिया गया था।

 

केंद्र और राज्य ने ग्रामीण बेरोजगारी का कोई दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत नहीं किया है। दिसंबर 2018 में नई कांग्रेस सरकार ने, एक ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा),के तहत काम मांगो अभियान शुरु किया , जब अभियान चला तो इसकी मांग बढ़ गई – शुरू में, 5 जनवरी से 20 जनवरी, 2019 तक,  जो बाद में 28 फरवरी तक और विस्तार किया गया।

 

सरकार के अनुसार, 25 लाख से अधिक लोगों ने काम की मांग की है।

 

अनौपचारिक रोजगार के मुद्दे को हल करने के लिए, कांग्रेस ने दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनावों से पहले अपने घोषणा पत्र में श्रमिक कल्याण बोर्डों का वादा किया था, लेकिन आगे कुछ नहीं आया है। पूनिया ने कहा, “नई गठित राजस्थान सरकार ने शिक्षित युवाओं के रोजगार के लिए कोई योजना नहीं बनाई है, हालांकि उनका बेरोजगारी भत्ता 3,000 रुपये से बढ़कर 3,500 रुपये हो गया है।”

 

उधर गुर्जर के थाडी और  मेर्था में, बेरोजगार और ग्रैजुएट , अन्य दैनिक वेतन भोगी मजदूरों की भावनाओं को दर्शाते हैं।

 

वे कहते हैं, “सरकार छोटी नौकरियां भी नहीं दे पा रही है। चुनाव हर बार होते हैं, वादे सब कुछ बदलने के लिए किए जाते हैं, लेकिन कुछ भी नहीं बदलता है। 2014 में, नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वह हर साल 2 करोड़ (20 मिलियन) नौकरियां देंगे, लेकिन मैंने कुछ दिनों पहले अखबार में पढ़ा था कि उनके शासन में 45 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर्ज की गई है। ”

 

ठाडी बाजार चौकी में, पूर्व किसान सैनी और देवी ने 2019 के आम चुनावों को थोड़ा प्रासंगिक बताया। देवी ने कहा, “राजनीति के बारे में मेरी समझ बहुत खराब है। मुझे इतना पता है कि श्रमिकों के लिए सुबह और शाम के भोजन की व्यवस्था करना बहुत मुश्किल है। सरकार को हममें से किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता है। ”

 

उनके आसपास के अधिकांश श्रमिकों की यही राय थी।

 
यह 11 आलेखों की श्रृंखला में ये दूसरी रिपोर्ट है। पिछली रिपोर्ट, जो इंदौर से है, आप यहां पढ़ सकते हैं।
 
(शर्मा जयपुर के एक फ्रीलांस लेखक हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का अखिल भारतीय नेटवर्क है।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 11 मार्च 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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