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जमीन और घर से बेदखल किसानों की विधवाएं मांग रही हैं अपना हक और सरकार का सहयोग

कुणाल पुरोहित,
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( महिला किसान अधिकार मंच (मकाम) द्वारा आयोजित एक रैली में सरकार से अपने अधिकार मांगने के लिए 21 नवंबर को मुंबई के आजाद मैदान में महाराष्ट्र के महिला किसानों का प्रदर्शन। महाराष्ट्र में विधान परिषद के शिवसेना सदस्य नीलम गोरे ने भी इस अभियान में भाग लिया।) मुंबई: 21 नवंबर, 2018 को, महाराष्ट्र भर में किसानों की आत्महत्याओं के बाद विधवा हुई करीब 80 महिलाएं दक्षिण मुंबई के आजाद मैदान में एक मांग के साथ इकट्ठा हुईं। उनकी मांग है कि सरकार उन्हें महिला किसान के रूप में स्वीकार करे और उन्हें उन जमीनों का अधिकार मिले, जो उनके पति के नाम थी।

 
अनिता ताई के पति ने पांच साल पहले बढ़ते कर्ज से तंग आकर अपनी जान दे दी थी। अनिताताई केंद्रीय महाराष्ट्र के उस्मानाबाद से 400 किमी की यात्रा कर विरोध में शामिल होने आई । जब वह विधवा हुई तो उनके ससुरालवालों ने उन्हें जमीन में से हिस्सा देने के लिए इंकार कर दिया और घर से बाहर निकाल दिया।

 

जब अनिता ताई सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सब्सिडी वाले अनाज खरीदने गई, तो दुकानदार ने मना कर दिया। दुकानदार ने कहा, “नियम यह है कि आपके पास एक स्वतंत्र राशन कार्ड होना चाहिए।” लेकिन शादी के बाद उनके ससुराल वालों ने उनके लिए स्वतंत्र राशन कार्ड बनाने की अनुमति नहीं दी थी।

 

“क्या नियमों के अनुसार उनकी पहचान के लिए उनके नाम पर कोई खेत है?” दुकानदार ने पूछा था। अनिताताई ने कहा, “अगर मुझे मेरे नाम पर जमीन होती तो क्या मुझे आपकी राशन की ज़रूरत होगी?” अनिता ताई को बिना राशन के घर लौटना पड़ा।

 

मुंबई रैली में शामिल अनिता ताई जैसी महिला के हितों की रक्षा के लिए कोई सामाजिक या सरकारी सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। सबके पास कहने के लिए ऐसी ही कहानी है। महिलाएं कहती हैं कि, वे समाज द्वारा बहिष्कृत हैं और अक्सर  पतियों की मौत के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है।

 

पिछले दो दशकों में, महाराष्ट्र के सूखा प्रवण मराठवाड़ा और विदर्भ जिलों में 62,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। बार-बार फसल की विफलता, कम कीमत, बढ़ता कर्ज, लगातार सूखा और स्थायी फसलों पर कीट हमले किसानों के लिए संकट के कारण हैं।

 

महिला किसानों के लिए काम कर रहे संगठनों का एक निकाय, महिला किसान अधिकार मंच (मकाम) द्वारा आयोजित एक अध्ययन के अनुसार 2012 और 2018 के बीच इन आत्महत्याओं से विधवा हुई महिलाओं को अभी तक उन खेतों के अधिकार प्राप्त नहीं हुए हैं, जिन पर उन्होंने अपने पतियों के साथ खेती की थी।  उनमें से केवल 35 फीसदी को परिवार के घरों पर अधिकार मिले हैं।

 

21 नवंबर, 2018 को जारी अध्ययन की रिपोर्ट के साथ ही रैली के दौरान 505 महिला किसानों के जीवन का सर्वेक्षण किया, जिनके पतियों ने कृषि संकट के कारण आत्महत्या की थी। इसमें मराठवाड़ा और विदर्भ के 11 जिलों को शामिल किया गया, जो महाराष्ट्र में कृषि संकट से सबसे प्रभावित क्षेत्रों में से हैं।

 

 अमरावती जिले में एक एनजीओ और मकाम के सदस्य स्वराज मित्रा की आरती बाईस ने कहा, ” अक्सर भूमि पति या परिवार के नाम पर होती है, इसलिए घर और राशन कार्ड भी उनके नाम पर ही होते हैं। नतीजतन, महिलाएं न तो संस्थागत क्रेडिट और न ही अन्य कृषि से संबंधित सरकारी योजनाओं तक पहुंच सकती  हैं।”

 

कार्यकर्ताओं ने कहा कि किसी भी सुरक्षा व्यवस्था के बिना और सरकारी लाभों तक सीमित पहुंच के साथ, महिलाओं को कर्ज के चक्र में फंस जाने की आशंका होती है।

 

 माकाम की नेशनल फसिलिटेशन टीम के सदस्य सीमा कुलकर्णी ने कहा कि सर्वेक्षण और इसके परिणामों से पता चला है कि इन विधवा किसानों के संघर्षों के लिए सरकारी नीतियों में बहुत कम संदर्भ हैं। चूंकि पुरुष किसानों की आत्महत्या के बाद इन महिलाओं के साथ सरकार की बातचीत शुरू होती है और समाप्त होती है, इसलिए मकाम अधिक लिंग-संवेदनशील नीति बनाने के लिए दबाव डालना चाहता है।

 

उन्होंने कहा, “महिलाओं को कभी किसान नहीं माना जाता है। सच्चाई यह है कि वे अपने पतियों के साथ खेती करती हैं और अगर उनके पति न रहे तो भी वह खेती करना जारी रखती हैं।” मौजूदा नीतियों में इन महिलाओं को सिर्फ कृषि श्रमिक के रूप में पहचाना जाता है। इसका मतलब यह है कि महिलाओं के लिए उनके पतियों की मौत के बाद कृषि योजनाओं में प्रवेश करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

 
33 फीसदी महिलाओं को पता नहीं कि वे पेंशन की हकदार हैं

 

महाराष्ट्र की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर है और इसके लिए आलोचना की जाती है। हाल के वर्षों में, राज्य महत्वपूर्ण सामाजिक कल्याण योजनाओं पर अपना खर्च घटा रहा है। लाभार्थियों के बीच जागरूकता की कमी से स्थिति और खराब हुई है। उदाहरण के लिए, सर्वेक्षण के लिए साक्षात्कार में शामिल महिलाओं में से 41 फीसदी महिलाओं के पास या तो राशन कार्ड नहीं था या केवल परिवार के राशन कार्ड में उनका नाम सूचीबद्ध था। इसका कारण यह है कि उनमें से 63 फीसदी नहीं जानती हैं कि वे एक स्वतंत्र राशन कार्ड की हकदार हैं।

 

विधवाओं और परित्यक्ताओं, अनाथों और विकलांग महिलाओं के लिए राज्य योजना, संजय गांधी निर्धन योजना के माध्यम से एक 600 रुपये की पेंशन दी जाती है। सर्वेंक्षण किए गए महिलाओं में से केवल 34 फीसदी महिलाओं को यह प्राप्त होता था और यहां तक कि कुछ ही महिलाओं को यह नियमित रुप से प्राप्त हुआ है। लगभग 33 फीसदी को ऐसी पेंशन के बारे में भी पता नहीं था और उन्होंने इसके लिए आवेदन नहीं किया था।

 

वर्धा के करणजी भोग गांव से 45 वर्षीय माधुरी भोगे एक किसान थी। 2007 में उनके पति ने खुदकुशी कर ली। इसके बाद अपने पारिवारिक खेत में काम करने की जगह वह वर्धा में गांधी सेवाग्राम आश्रम में एक टूरिस्ट गाइड के रूप में काम करने लगी। सरकार ऐसी परिस्थितियों में विधवा महिलाओं को 1 लाख रुपये का अनुग्रह राशि देती है, लेकिन भोगे को इस योजना के बारे में पता नहीं ।

 

वर्धा के करणजी भोग गांव की 45 वर्षीय माधुरी भोगे की पति की मृत्यु 2007 में हुई थी। उनके पति ने अपने ही खेत में फांसी लगा ली थी। फसलों बार-बार विफल होने के बाद परिवार पर 1.5 लाख रुपये से ज्यादा का कर्ज था। भोगे के पति, ओमप्रकाश इस ऋण को लेकर मानसिक रूप से व्यथित थे। जब ओमप्रकाश ने आत्महत्या की, तो सरकार ने नहीं माना कि यह आत्महत्या कृषि के कारणों से था। नतीजतन, भोगे को सरकार की ओर से 1 लाख रुपये की राशि कभी नहीं मिली,  जो आत्महत्या करने वाले दूसरे किसानों के परिवारों को मिला था।

 

उनके ससुराल वालों ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था। भोगे ने बताया, “पति की मृत्यु के लिए घर वालों ने मुझे जिम्मेदार ठहराया। हमारे गांव में जब कोई किसान आत्महत्या करता है, तो उसकी मौत का जिम्मेदार उसकी पत्नी को ही ठहराया जाता है।” 11 साल बाद, भोगे को एहसास हुआ कि अगर उनके पास पैसा होता तो वह संकट से लड़ सकती थी। एक और समस्या थी। पति की मृत्यु के बाद काफी समय तक वह मानसिक रूप से परेशान रही। भोगे ने बताया कि मात्र 20,000 रुपये का ऋण था जो तीन खराब उपज के बाद 1.5 लाख रुपये से अधिक तक चला गया था।

 

भोगे ने कहा, “सरकारी अधिकारियों ने इसे खेत से संबंधित आत्महत्या के रूप में वर्गीकृत करने से इंकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि ओमप्रकाश मानसिक रूप से बीमार थे। नियमों ने हमें उस मदद से से रोका, जो हमें मिलनी चाहिए था। लेकिन उसने लड़ाई लड़ी और परिवारिक घर छोड़ने से इंकार कर दिया, जब तक कि उसके और बच्चों को खेतों में उनका हिस्सा नहीं दिया गया।

 
राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य बजट में कटौती
 

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि महाराष्ट्र की राजकोषीय प्राथमिकताएं ( इसने सामाजिक खर्च में कटौती की है ) किसानों की विधवाओं के संकट को बढ़ा सकती हैं। उदाहरण के लिए,  स्वास्थ्य देखभाल में बजट की कमी का मतलब है कि परिवारों को अपने मौजूदा ऋण बोझ को बढ़ाने, चिकित्सा खर्चों को वहन करने के लिए उधार लेना पड़ता है।

 

यहां अध्ययन से पता चला है कि जिन 69 परिवारों में सर्वेक्षण किया गया है, जिन्हें बीमारियों के इलाज के लिए पैसे की जरूरत थी। 47 परिवारों को इसके लिए ऋण लेना पड़ा था। यह महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रमुख स्वास्थ्य बीमा योजना, ‘महात्मा फुले जन आरोग्य योजना’ के माध्यम से स्वास्थ्य कवर के रूप में 1.5 लाख रुपये के बावजूद है। सर्वेक्षण में शामिल परिवारों में से केवल 19 फीसदी परिवार इस योजना के बारे में जानते थे।

 

योजना के बारे में जागरूकता की कमी से भी परेशानी बढ़ती है। महाराष्ट्र सरकार ने 2018 में इस योजना के लिए वित्त पोषण में 56 फीसदी कटौती की घोषणा की है।

 

2016 में, उस्मानाबाद के बौला गांव के 33 वर्षीय सविता शेल्के को उनके पति की मौत के बाद घर और संपत्ति से बेदखल कर दिया गया था। बार-बार फसल खराब होने के कारण उनके पति निराश थे और बाद में उन्होंने पेट्रोल पी कर आत्महत्या कर ली थी।

 

 उन्होंने याद करते हुए बताया, ” पति ने मुझे कभी नहीं बताया कि कितना कर्ज था, लेकिन मुझे पता था कि उधार देने वाले उसे परेशान कर रहे थे।” बाद में अपने परिवार से परेशान हो कर वह पुणे शहर चली गई, जहां अब वह घरेलू सहायक के रूप में काम करती हैं।

 

33 वर्षीय सविता शेल्के उस्मानाबाद के बौला गांव में रहती थीं । 2016 तक उन्होंने अपने पति के साथ खेती की थी। बार-बार खराब फसल से परेशान होकर उनके पति ने आत्महत्या कर ली थी। वह कहती हैं कि पति की मौत के बाद उनके ससुराल वालों ने उनसे दुर्व्यवहार किया। उसे जमीन और परिवार के घर पर अधिकार छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। वह अब पुणे में रहती हैं, जहां वह घरेलू नौकरानी के रूप में काम करती हैं। उनके दो बच्चों की शिक्षा लागत पर उनकी आय का 40 फीसदी खर्च होता है और वह अपने सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करती हैं।

 

शेल्के सालाना 72,000 रुपये कमाती हैं, लेकिन दो बच्चों को पढ़ाने का वार्षिक खर्च करीब 30,000 रुपये है, और घर का किराया और अन्य खर्चों के लिए कम ही पैसे बचते हैं।

 

वह कहती हैं, “परिवार ने मेरी मदद नहीं की, लेकिन क्या सरकार कम से कम मेरे बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती?” प्रदर्शन के लिए आने वाली कई महिलाएं मुंबई पहली बार आई थीं। उनके लिए,  वह दिन उनकी पहचान को फिर से वापस दिलाने के बारे में था। वर्धा जिले के अमलगांव गांव के 37 वर्षीय नीलिमा भालेराव को पता है कि राज्य कैसे सुनिश्चित कर सकता है कि उनकी तरह की महिलाएं उन कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंचें, जिन योजनाओं पर उनका हक है। वह कहती हैं, “ सरकार स्मार्ट कार्ड की बात करती है, लेकिन क्या सरकार हमें एक स्मार्ट कार्ड नहीं दे सकती, जो कहती है कि हम किसानों की विधवाएं हैं।? “

 

(पुरोहित एक स्वतंत्र पत्रकार है, राजनीति, लिंग, विकास और प्रवासन के मुद्दों पर लिखते हैं। वह एसओएएस के छात्र रहे हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 नवंबर 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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