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कमजोर भावनात्मक रुख और कम अभिभावकीय आकांक्षाएं हो तो बच्चे छोड़ देते हैं पढ़ाई

विवेक विपुल,
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Photo credit: Heatheronhertravels.com

 

नई दिल्ली: माध्यमिक विद्यालय, विशेष रुप से वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण कमजोर भावनात्मक रुख और उनके माता-पिता की शिक्षा और व्यवसाय के लिए कम आकांक्षाएं हैं। यह निष्कर्ष आंध्र प्रदेश में 12 से 1 9 वर्ष के बीच 834 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन का है।

 

ब्रिटेन स्थिन, गैर लाभकारी संस्था ‘यंग लाइवस इंडिया’ के अध्ययन में पाया गया है कि कम आत्मबल वाले बच्चों की तुलना में अधिक आत्मबल वाले बच्चों में 19 वर्ष तक शिक्षा जारी रखने की संभावना 1.4 गुना ज्यादा है।

 

अध्ययन में पाया गया कि, ऐसे अभिभावक जो अपने बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा या इससे अधिक शिक्षा पूरी करने की अकांक्षा रखते थे, उनमें समकक्षों की तुलना में 19 साल की उम्र तक स्कूली शिक्षा जारी रखने की संभावना तीन गुना अधिक थी। ऐसे अभिभावक जो अपने बच्चों को 20 साल की उम्र में एक पूर्णकालिक माता-पिता या गृहिणी के रूप में देखना चाह रहे थे, उनके बच्चों की तुलना में ऐसे बच्चे, जिनके अभिभावक उन्हें 20 साल की आयु तक पेशेवर बनने की इच्छा रखते थे, उन बच्चों में शिक्षा जारी रखने की संभावना 1.8 गुना अधिक थी।

 

इसके अलावा, अध्ययन में पाया गया कि 10 फीसदी सबसे गरीब परिवारों के बच्चों की तुलना में सबसे समृद्ध 10 फीसदी परिवारों के बच्चों में 19 वर्ष की आयु तक शिक्षा जारी रखने की संभावना दोगुनी है।

 

अध्ययन विशेष रूप से लड़कियों के लिए और विशेष रूप से सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के लिए अभिभावकों की आकांक्षाएं बनाने के लिए हस्तक्षेप की सिफारिश करता है। यह अनुसूचित परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए शिक्षकों के कौशल को विकसित करने और उनकी मनोसामाजिक दक्षताओं के निर्माण करने की भी सिफारिश करता है।

 

बच्चों का व्यवहार

 

2002 के बाद से चल रहा लगभग 3,000 छात्रों पर शोध के बाद यह अध्ययन सामने आया है, जिसमें शामिल किये गए बच्चे पूर्व आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में विभाजित ) के गरीब इलाकों से थे। इनमें से इसमें 834 बच्चों के नमूने का इस्तेमाल किया गया, जिनके बारे में जानकारी ( मात्रात्मक और गुणात्मक ) वर्ष 2005 और 2014 के बीच एकत्र किए गए थे।

 

रेणु सिंह, रंजना केसरवानी और प्रताप मुखर्जी द्वारा फरवरी 2018 के पेपर में उल्लिखित परिणाम उजागर करते हैं कि किस प्रकार  बच्चों और माता-पिता के मनोसामाजिक कौशल और घरेलू आय तय करता है कि 19 साल की उम्र तक वे अपनी शिक्षा को कैसे जारी रख सकते हैं?

 

12 वर्ष की उम्र में मनोसामाजिक कौशल के बीच सहयोग और किशोरावस्था (19 वर्ष) के बीच शैक्षिक प्रगति और साथ ही 12 वर्ष की आयु और 20 साल की उम्र में बच्चों की माता-पिता की आकांक्षाओं को उजागर करने वाले मॉडल का इस्तेमाल करने वाले को समझाते हुए पेपर में कहा गया है कि, “शैक्षिक जीवन में प्रगति के लिए मनोसामाजिक कौशल आत्मविश्वास और प्रेरणा का एक महत्वपूर्ण तत्व है। ”

 

शोधकर्ताओं ने ‘आत्म-प्रभावकारिता’ और ‘व्यक्तिपरक कल्याण’ के माध्यम से छात्रों के भावनात्मक रुख का मूल्यांकन किया।

 

आत्म-प्रभावकारिताया आत्म-विश्वास के लिए, छात्रों को 0 से 7 के पैमाने पर संज्ञानात्मक, सामाजिक, व्यवहारिक और भावनात्मक रुख को मापने वाले खुद के अंकन के लिए कहा गया था ।अधिकतम आत्मविश्वास के लिए 7 का अंक है।

 

छात्रों के व्यक्तिपरक भलाई का आकलन में 1 से (सबसे बुरे संभव जीवन का प्रतिनिधित्व करने) से 9 (सर्वोत्तम संभव जीवन) तक खुद के अंकन के लिए कहा गया था। 4 या उससे ऊपर का स्कोर उच्च व्यक्तिपरक कल्याण को दर्शाता है। जबकि 60 फीसदी उत्तरदाताओं में उच्च आत्मविश्वास दिखा, जबकि  51 फीसदी में उच्च व्यक्तिपरक कल्याण की झलक मिली।

 

मनो-सामाजिक कौशल

उच्च आत्म-प्रभावकारिता सूचकांक मूल्य की रिपोर्ट करने वाले छात्रों में से 57.3 फीसदी ने 19 साल की उम्र में शिक्षा जारी रखी, जबकि 42.7 फीसदी ने 12 और 19 की उम्र के बीच स्कूल छोड़ा है। इसके विपरीत, जिन्होंने कम आत्म-प्रभावकारिता सूचकांक स्कोर किया है, उनमें से 8.5 फीसदी अब भी 19 साल की उम्र में स्कूल में थे, और 51.5 फीसदी ने 19 वर्ष की उम्र तक स्कूल छोड़ा था।इसी तरह, उच्च व्यक्तिपरक कल्याण की रिपोर्ट करने वाले छात्रों का स्कूल में रहने की संभावना अधिक थी। उच्च व्यक्तिपरक कल्याण की सूचना देने वाले 64 फीसदी ने 19 वर्ष की आयु तक शिक्षा जारी रखी, जबकि 36 फीसदी ने 19 वर्ष की आयु तक पढ़ाई छोड़ दी । लेकिन कम व्यक्तिपरक कल्याणकारी की सूचना देने वालों में 44.2 फीसदी ने शिक्षा जारी रखी थी और 55.8 फीसदी ने 19 वर्ष की आयु तक पढ़ाई छोड़ दिया।

 

मनो-सामाजिक अभिलक्षण

Psychosocial Characteristics
Continued In Education Between Ages 12-19 (In %) Dropped Out Between Ages 12-19 (In %) Total Respondents
Self-Efficacy Index
Low 48.5 51.5 274
High 57.3 42.7 560
Subjective Well-Being
Low 44.2 55.8 394
High 64 36 431
Total 54.4 45.6 834

Source: Young Lives India
Note: Self-efficacy measures emotional attitudes of a person on a scale of 0 to 7, such that a score of 7 is high; subjective well-being was assessed by asking respondents to score themselves from 1 (the worst possible life) to 9 (the best possible life), such that a score of 4 or above is high

 

अध्ययन के मुताबिक, कम स्तर की तुलना में आत्म-प्रभावकारिता के उच्च स्तर वाले बच्चों की आयु 19 वर्ष तक की शिक्षा को जारी रखने की संभावना 1.4 गुना अधिक है। अध्ययन में कहा गया है कि उच्च स्तर के व्यक्तिपरक कल्याण के साथ बच्चों की शिक्षा जारी रखने की संभावना दो गुना ज्यादा है।

 

यह निष्कर्ष स्थायी विकास लक्ष्यों ( संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रोत्साहित एक वैश्विक विकास एजेंडा ) के लक्ष्य 4 के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिसका लक्ष्य हर बच्चे को शिक्षित करना है। 2014 में, स्कूल छोड़ने वाले 24 मिलियन (124 मिलियन का 14 फीसदी) भारतीय थे, जैसा कि दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ के सीनियर फेलो किरण भट्टी ने 7 जुलाई, 2015 को ‘द वायर’ में लिखा था।

 

ग्रामीण स्कूलों में, उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं के स्कूल छोड़ने के साथ 14 वर्ष की आयु तक नामांकन दर 95 फीसदी से गिर कर 18 वर्ष की आयु तक 70 फीसदी हुआ है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 16 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

4.7 फीसदी पुरुषों की तुलना में 5.7 फीसदी महिलाओं के नामांकित नहीं होने के साथ 14 साल की उम्र में, पुरुष और महिला गैर-नामांकन के बीच का अंतर एक प्रतिशत का है। 32 फीसदी महिलाओं और 28 फीसदी पुरुषों के नामांकन न होने के साथ 18 साल की उम्र में यह चार प्रतिशत अंक बढ़ा है।

 

भट्टी लिखते हैं, ” अगर  अनियमित उपस्थिति को परिभाषा में शामिल किया जाता तो स्कूल छोड़ने वाले बच्चों का कुल प्रतिशत बहुत अधिक होगा।”

 

अभिभावकों की आकांक्षाएं

 

नमूना में 70 फीसदी अभिभावकों ने अपने बच्चों के बारे में माध्यमिक शिक्षा और उससे आगे बढ़ने के लिए आकांक्षा जताई, जबकि 30 फीसदी ने अपने बच्चों से माध्यमिक विद्यालय से ज्यादा पढ़ने की अपेक्षा नहीं की ।

 

20 वर्ष की उम्र के बच्चों की व्यावसायिक आकांक्षाओं के संदर्भ में 54 फीसदी ने अपने बच्चों को ‘पेशेवर’ (लेखाकार, कलाकार, सिविल सेवक, जिला कलेक्टर, वकील, शिक्षक, आदि) के रूप में देखा, जबकि 32 फीसदी ने अपने बच्चों को कुशल या अर्द्ध कुशल श्रमिक / उद्यमियों (कुशल: -कंप्यूटर ऑपरेटर, प्रशासनिक सहायक, दर्जी, आदि और अर्द्ध कुशल / उद्यमी: -घरेलू कार्यकर्ता, मजदूर, बाजार व्यापारी, व्यापारी, आदि)के रुप में देखा है।

 

लगभग 14 फीसदी देखभाल करने वालों ने अपने बच्चों को 20 वर्ष की आयु में काम करते देखने का नहीं सोचा है, जिसमें पूर्णकालिक माता-पिता या एक गृहिणी (लड़कियों के लिए), या पूर्ण समय का अध्ययन शामिल है। 834 नमूने में केवल दो देखभालकर्ताओं ने अपने बच्चों को 20 साल की उम्र में पढ़ते हुए देखा है।

 

जिन बच्चों की देखभाल करने वालों ने माध्यमिक शिक्षा या अधिक को पूरा करने की आकांक्षा की थी, उनकी, अपने समकक्षों की तुलना में 19 साल की उम्र में स्कूली शिक्षा जारी करने की संभावना तीन गुना अधिक थी।

 

उन बच्चों की तुलना में जिनकी देखभाल करने वालों ने उन्हें 20 साल की आयु तक पेशेवर बनने की आकांक्षा जताई थी, ऐसे बच्चे की तुलना में अभिभावकों द्वारा 20 साल की आयु में पूर्णकालिक माता-पिता या गृहिणी बनने की अकांक्षा देखने वाले बच्चों में उनकी शिक्षा जारी रखने की संभावना 1.8 गुना कम थी।

 

अपने बच्चों के भविष्य के बारे में अभिभावकों की आकांक्षाएं

इसके अलावा, नमूना में 10 फीसदी सबसे गरीब परिवारों के बच्चों की तुलना में सबसे समृद्ध 10 फीसदी परिवारों के बच्चों की 19 वर्ष की आयु तक शिक्षा जारी रखने की संभावना दोगुनी है।

 

करीब 61 फीसदी पहले जन्म लिए बच्चों ने 19 की उम्र तक स्कूल जारी रखा, जबकि चौथे या बाद के जन्म लिए बच्चों के लिए यह आंकड़े 40.3 फीसदी हैं।

 

अनुसूचित जाति की तुलना में अनुसूचित जनजाति के बच्चों की 19 वर्ष की आयु में स्कूल में होने की संभावना दोगुनी थी।

 

12 वर्ष की आयु से वैतनिक काम में लगे हुए करीब 85 फीसदी बच्चों ने 19 वर्ष की आयु तक आते-आते स्कूल छोड़ा है । ऐसे बच्चे जो वैतनिक काम नहीं करते हैं, उनकी तुलना में काम में लगे हुए बच्चों की 19 वर्ष की आयु में स्कूल जाने की संभावना 89 फीसदी कम है।

 

बाल श्रम (निषेध और नियमन) संशोधन अधिनियम 2016 में कहा गया है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नियोजित नहीं किया जाना चाहिए जबकि 2009 के बच्चों के नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत 6-14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को स्कूल में होना चाहिए। हालांकि, जैसा कि इस अध्ययन से पता चलता है, इन कानूनों का अक्सर उल्लंघन किया जाता है।

 

(विवेक विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।.)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 1 मार्च 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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