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आठ चुनावी वर्षों में, भारत का ग्रामीण ऋण, आपदा और मौत का संकट

संयुक्ता नायर,
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मुंबई: 2015 में आत्महत्या करने वाले 8,007 भारतीय किसानों में से 10 में से चार कार्ज के बोझ में दबे हुए थे। 2014 में यह आंकड़ा 10 में से दो किसानों का था। 11 वर्षों में अधिक परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है और औसत ग्रामीण परिवार ने 1.03 लाख रुपए उधार लिया था, जैसा कि सरकारी आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चला है।

 

एक असफल कृषि अर्थव्यवस्था में अशांति बढ़ने से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ग्रामीण गुजरात में 16 सीटें गंवाईं हैं ( 40 फीसदी से कम निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल हुई )। जैसा कि भाजपा द्वारा शासित छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में इस वर्ष चुनाव होने हैं, हमने दो-भाग की श्रृंखला में यह जानने की कोशिश की है कि किस प्रकार देशभर में ग्रामीण ऋण, संकट और मृत्यु में वृद्धि हो रही है।

 

ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चता, किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि हो रही है और इसकी और बद्तर होने की संभावना है,  2019 के आम चुनावों में ग्रामीण आर्थिक मंदी का एक महत्वपूर्ण मुद्दा होने की उम्मीद है। और यह संभव नहीं है कि 2022 तक किसानों को अपनी आय दोगुना करने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वादा पूरा हो पाएगा, जैसा कि इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

2011 में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान की संयुक्त रुप से ग्रामीण जनसंख्या 123.6 मिलियन थी, जो मेक्सिको की वर्तमान जनसंख्या के बराबर है। यह दुनिया का 11वां सबसे आबादी वाला देश है। हिंदुस्तान टाइम्स की दिसंबर 2017 की इस रिपोर्ट के मुताबिक तीनों राज्यों में कृषि विकास दर में गिरावट आई है जबकि किसान अशांति से मध्यप्रदेश और राजस्थान में रुकावटें पैदा हुई है, जैसा कि फसलों की कीमतें गिरने से जूझते किसान उच्च मूल्यों की ऋण छूट और सरकारी गारंटी की मांग कर रहे थे।

 

आत्महत्या करने वाले चार में से एक किसान कर्ज के बोझ में

 

2015 में, कम से कम 8,007 भारतीय किसानों ने आत्महत्या की है, जो कि 2014 में 5,650 की संख्या से 41.7 फीसदी ज्यादा है और इस तरीके से मरने वाले किसानों में से 39 फीसदी कर्ज में थे, जैसा कि  2015 की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के  नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है। 2014 में, 20.6 फीसदी आत्महत्या करने वाले किसानों ने पैसे उधार लिए थे।

 

2013 में 3 भारतीय ग्रामीण परिवारों में से एक कर्ज के बोझ में थे। यह आंकड़े 2002 की तुलना में 26.5 फीसदी ज्यादा है। 2013 में प्रति ऋणग्रस्त ग्रामीण परिवार का औसत ऋण 1.03 लाख था, जो कि लगभग रॉयल एनफील्ड बुलेट 350 (1.09 लाख रुपए) की कीमत के बराबर है, आईफोन एक्स के एक उच्च अंत संस्करण (1.02 लाख रुपए) और पैनासोनिक 55 इंच के फ्लैट स्क्रीन टीवी (0.99 लाख) से ज्यादा है। यह शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में खाड़ी का संकेत है, जहां 833 मिलियन या 68.8 फीसदी भारतीय रहते हैं, उनमें से ज्यादातर गरीब हैं।

 

2013 में, वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और बीमा कंपनियां जैसे संस्थागत एजेंसियों ने 56 फीसदी ग्रामीण ऋण का आयोजन किया था। जबकि गैर-संस्थागत एजेंसियां ( जिसमें धन उधारदाताओं, परिवार या दोस्त शामिल हैं ) शेष 44 फीसदी के लिए जिम्मेदार रहा है। व्यावसायिक धन-उधारदाता ग्रामीण ऋण (28.2 फीसदी) के अधिकतम हिस्से के लिए जिम्मेदार रहे हैं जो यह दर्शाता है कि ग्रामीण परिवार अभी भी आसान ऋण के लिए अपने स्थानीय धन-उधारदाताओं पर निर्भर हैं। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित वाणिज्यिक बैंक, 25.1 फीसदी ग्रामीण ऋण और सहकारी समितियों और सहकारी बैंकों में 24.8 फीसदी का आयोजन किया है।

 

कर्ज से संबंधित किसान आत्महत्याओं (कुल: 3,097) का सबसे बड़ा अनुपात अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों से आया है। इसमें सबसे पहला स्थान महाराष्ट्र का है जहां 2015 में 1,293 किसानों (41.7 फीसदी) ने आत्महत्या किया है। इसके बाद कर्नाटक में 946 (30.5 फीसदी) और तेलंगाना में 632 (20.4 फीसदी) किसान आत्महत्या के मामले सामने आए हैं।

 

कर्नाटक चार प्रमुख राज्यों में से एक है (अन्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान) जो 2018 में हुए चुनावों में शामिल होंगे। 2015 में कर्नाटक में 70 फीसदी किसान आत्महत्याओं का कारण ऋण था।

 

किसानों में, सीमान्त भूमि धारणों के साथ ऋणग्रस्ता ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे गरीब राज्यों में, 75 फीसदी से अधिक किसानों की सीमान्त भूमि वाले हिस्से (1 हेक्टेयर / 2.5 एकड़ तक) कर्ज में हैं।

 

ग्रामीण भारत की बढ़ती कर्जबाजारी की दो विशेषताएं हैं: बैंकों और अन्य औपचारिक स्रोतों के अवैतनिक ऋण बढ़ने के साथ धन-उधारदाताओं की पकड़ बढ़ रही है।

 

अनौपचारिक क्रेडिट प्राप्त करना आसान है, औपचारिक ऋण नहीं चुकाये जा रहे

 

पहले से कहीं ज्यादा अधिक ग्रामीण परिवार अनौपचारिक क्रेडिट ( प्रेषियों और परिवारों से ) पर भरोसा करते हैं, यहां तक ​​कि बैंकों और अन्य औपचारिक एजेंसियों ने अवैतनिक ऋण के साथ संघर्ष करते हैं।

 

2013 में, 28.6 फीसदी किसानों ने पेशेवरों के कर्जदारों ( ग्रामीण ऋणों के लिए प्रमुख स्रोत ) पर भरोसा किया  जो 2002 के आंकड़ों की तुलना में 19.6 फीसदी ज्यादा है किसानों को उधार देने वाले बैंकों और अन्य औपचारिक संस्थाओं की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) में पिछले एक वर्ष से 2017 तक 20 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

ग्रामीण परिवारों को धन-उधारदाताओं पर निर्भर रहना जारी रहता है क्योंकि बढ़ते हुए औपचारिक ऋण वितरण सेवाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचा है, और गैर-संस्थागत स्रोत शिघ्र धन प्रदान करते हैं, जैसा कि 2013 भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का यह पेपर कहता है।

 

औपचारिक स्रोतों से उधार लेने का मतलब कागजी कार्रवाई, अनम्य स्थितियों और संपार्श्विक है, जबकि अनौपचारिक स्रोत अधिक लचीले होते हैं और अक्सर संपार्श्विक के लिए नहीं पूछते हैं,  भले ही ब्याज की दरें ऊंची दरों पर उधार दे दी हों: अनौपचारिक स्रोतों से उधार लिया गया ऋण का 38 फीसदी का ब्याज दर 30 फीसदी से ज्यादा था। अनौपचारिक स्रोत समय पर भुगतान पर जोर नहीं देते हैं, जबकि बैंक ऐसा करते हैं।

 

2017 में, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ने 36,359 करोड़ रुपए और 30,000 करोड़ रुपए के कृषि ऋण छूट की घोषणा की, जिससे बढ़ती किसान आत्महत्याओं को हतोत्साहित किया जा सके। हालांकि,  केवल एक तिहाई छोटे और सीमांत किसानों को संस्थागत ऋण का उपयोग किया जाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जून 2017 में रिपोर्ट में बताया है, ऐसे ऋण माफी का कम असर पड़ता है। इसके बजाय, वे एनपीए में योगदान करते हैं, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में।

 

कृषि और संबद्ध गतिविधियों की एनपीए में 20 फीसदी की वृद्धि हुई है – मार्च 2016 में 51,964 करोड़ रुपए से मार्च 2017 में 62,307 करोड़ रुपए तक। 2017 के आरबीआई के एक पेपर में कहा गया है कि, हालांकि ऋण माफी और बैंकों के एनपीए का स्पष्ट संबंध नहीं बनाया जा सकता है। हालांकि, 2009 में, 2008 कृषि माफी योजना लागू होने के एक साल बाद, कृषि से एनपीए में वृद्धि हुई है, 2011-15 के बीच वे 4-5 फीसदी के बीच स्थिर रहे हैं।

 

बढ़ते एनपीए के पीछे बढ़ती फसल विफलताएं और कम होती ग्रामीण आय की कहानी है।

 

जलवायु परिवर्तन के बढ़ने से ग्रामीण आय में कमी, फसल की पैदावर कम

 

बढ़ती किसान कर्ज का एक कारण यह है कि खेती की आय जो अच्छी फसल के साथ अग्रानुक्रम में नहीं बढ़ी है। 2013 राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय की इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत में औसत कृषि घर ने प्रति माह 6,500 रुपए से कम कमाया है। यह एक शहरी पांच सितारा होटल में दो लोगों के लिए रात के खाने के बराबर है।

 

2016 में एक अच्छी फसल के बावजूद, भारत के 70 फीसदी (62.6 मिलियन) कृषि परिवार प्रत्येक माह औसत रुप से कमाने से ज्यादा खर्च करते हैं, मुख्य रूप से निजी स्वास्थ्य सेवा पर, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जून 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

ऋण के उच्च स्तर और और फसल विफलताएं अन्य कारण हैं जो किसान आत्महत्याओं में योगदान करती हैं, जैसा कि मिंट ने मई 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

ग्लोबल वार्मिंग के कारण बढ़ते तापमान के साथ फसल विफलताएं जुड़ी हुई हैं। फसलें जलवायु के उतार-चढ़ाव जैसे कि अप्रत्याशित बारिश, सूखा और गर्मी तरंगों के प्रति संवेदनशील हैं। कम फसल भोजन की कीमतें बढ़ाती है, कृषि नौकरियों को कम करती है और घरेलू बचत को कम करती है।

 

जबकि बढ़ते मौसम के दौरान उच्च तापमान और कम बारिश ने आत्महत्याओं में योगदान दिया था, वहीं, ऑफ-सीज़न के दौरान आत्मसमर्थन पर इसी स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, जैसा कि अगस्त 2017 में इंडियास्पेंड ने यह संकेत हुए बताया था कि कृषि उत्पादन प्रत्यक्ष कारण था।

 

1980 के बाद से भारत में आत्महत्या की दर दोगुनी हो गई है और आत्महत्याओं में समग्र वृद्धि में 6.8 फीसदी हिस्सेदारी जलवायु वार्मिंग के कारण है, जैसा कि टैम्मा कार्लेटन, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय – बर्कले से एक अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता ने हमें बताया है।

 

1980 के बाद से भारत में आत्महत्या की दर दोगुनी हो गई है और आत्महत्याओं में समग्र वृद्धि में 6.8 फीसदी हिस्सेदारी जलवायु वार्मिंग के कारण है, जैसा कि टैम्मा कार्लेटन, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय – बर्कले से एक अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता ने हमें बताया है।

 

बाद में अध्ययन को चुनौती दी गई, और कार्लेटन ने आलोचना का जवाब दिया।
 

कार्लेटन ने कहा, “जलवायु परिवर्तन अभी शुरू हो गया है, और 19 80 के बाद से आने वाले तापमान का अनुमान आने वाले दशकों में बहुत कम है। इसलिए, भविष्य में गर्मी के कारण होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि होने की संभावना है।”

 

यह दो लेखों की श्रृंखला का पहला भाग है।

 

(नायर इंटर्न हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 4 जनवरी 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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