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असम में अपनी नागरिकता साबित करने में जुटे हैं लाखों लोग, एक शख्स की कहानी में छुपा है उन लाखों लोगों का दर्द

समर हलर्नकर,
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असम के गुवाहाटी में अपने वकील के चैंबर में बैठे 32 वर्षीय मोइनल मोल्ला। वे लगभग 90,000 उन लोगों में से एक हैं, जिन्हें अगस्त, 2017 से 51 साल पहले अवैध अप्रवासी घोषित किया गया था। वर्तमान में राज्य में इस तरह के मामले में लगभग 2,000 से अधिक लोग, छह केंद्रों में बंद हैं।

 

गुवाहाटी (असम):  ऐसी कई बातें हैं जो मोइनाल मोल्ला को याद नहीं है। जैसे कि भारत के प्रधान मंत्री कौन हैं या राज्य में किस पार्टी का शासन है। लेकिन एक बात है जो वह कभी नहीं भूलते। वह नहीं भूलते 5 सितंबर 2013 की वह रात जब बारपेटा में उनके घर पुलिस आई थी और उन्हें थाने ले गई थी।

 

निरक्षर, बंगाली और अस्थमा के कारण कमजोर हुए शरीर के साथ मोल्ला अब 32 वर्ष के हो गए हैं। उन्हें याद है कि थाने ले जाते वक्त पुलिस ने उन्हें साथ ले जाने का कारण नहीं बताया था। उनसे केवल यह कहा गया था कि, गांव बुरा ( प्रमुख ) आ कर उन्हें ले जाएंगे। वह बताते हैं कि उन्हें एक मजिस्ट्रेट की अदालत में ले जाया गया और उन्हें एक अवैध अप्रवासी बताया गया, जबकि उनके माता-पिता भारतीय हैं। इसके बाद उन्हें एक पुलिस वाहन में ले जाया गया।

 

मोल्ला बताते हैं, ” मैं चिल्लाया…मुझे नहीं पता था कि मैं कहां जा रहा हूं।” उसे अपने घर से 100 किमी दूर एक नजरबंद केंद्र में ले जाया गया। वह याद करते हुए बताते हैं कि वहां उन्हें दो साल, 10 महीने और 29 दिनों के लिए रखा गया। पहले कुछ हफ्तों तक वह हर दिन रोते थे। उन्हें लगता था कि वह अपनी पत्नी, तीन बच्चों और माता-पिता से फिर कभी नहीं मिल पाएगा। वह दो महीने तक सदमें में रहे। फिर उन्होंने सोचा, जो हुआ,वह अल्लाह की मर्जी है, और फिर अपने को मजबूत किया।

 

मोल्ला 89,395 लोगों में से एक थे , जिन्हें पिछले 51 वर्षों से अगस्त 2015 तक राज्य में “विदेशी” घोषित किया गया है। यहां यह बता देना जरूरी है कि असम में पचास लाख अवैध प्रवासियों का अनुमान लगाया गया है। इंडियास्पेंड को असम सीमा पुलिस संगठन द्वारा मिले आंकड़ों से पता चलता है कि यह एकमात्र राज्य है, जहां अवैध प्रवास को रोकने के लिए समर्पित बल है। वर्तमान में राज्य के छह नजरबंदी केंद्रों में 2,000 से अधिक लोग बंद हैं।

 

इन केंद्रों में जेलर कैदियों को दो श्रेणियों में बांटते हैं। एक ‘बांग्लादेशी’ और  दूसरा ‘डी-मतदाता’  या संदिग्ध मतदाता । जेलरों का तर्क है कि बंदी के दौरान कोई भी ‘विदेशियों’ से मिलने नहीं आया, जबकि परिवार  के अन्य लोग असम के अन्य हिस्सों से ‘डी-मतदाताओं’ से मिलने आए थे, इसलिए वे भारतीय थे।

 

यह धुंधला, अनौपचारिक अंतर एक नए प्रयास के लिए चर्चा में है। राज्य की पहली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार के मई, 2016 में सत्ता में आने से अधिकारियों को ‘बांग्लादेशियों’ की पहचान करने, उनकी गिरफ्तारी और निष्कासन करने के लिए प्रोत्साहन मिला है। इसमें 100,000 या अधिक सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। इस अभियान पर कई सौ करोड़ रुपये खर्च होने हैं और यह किसी को बेदखल करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े प्रयासों में से एक है।

 

अब जब सर्वोच्च न्यायालय-निगरानी की पुनरावृत्ति के लिए दिसंबर 2017 की समय सीमा है, ऐसे में इसकी कानूनी परिभाषा सवालों के घेरे में है, धार्मिक और जातीय अशांति और  कार्यान्वयन पर असंतोष का खतरा है । इस परिश्थिति में एक सवाल उठाता है कि एक भारतीय नागरिक कौन है?

 

मोल्ला के लिए यह सबूत सरकार द्वारा जारी किए गए दस्तावेजों में था। मगर सरकार ने उन दस्तावेजों की जांच किए बिना उन्हें ‘डी-मतदाता’ घोषित किया।

 

कई महीनों तक,  मोल्ला का जीवन कारावास के नियम अनुसार बीता। सुबह 6 बजे उठना,  नाश्ते में चाय और एक चपाती, कुछ समय  खुली हवा में बिताना, थोड़ा समय  टीवी देखना ।  अस्थमा की वजह से जेल अधिकारियों के चिंतित होने से सामयिक अस्पताल की यात्रा और साप्ताहिक गैर-शाकाहारी भोजन (मछली और अंडा वैकल्पिक)। इस बीच उनके छोटे भाई ने तीन महीने में एक बार वहां तक की यात्रा की, जो मोल्ला की तरह ही किताबों में जिल्द लगा कर जीवन यापन करते हैं। छोटे भाई को केंद्र तक आने के लिए 160 कमी की यात्रा करनी पड़ती थी। एक दो बार मोल्ला की पत्नी और बच्चे भी उनसे मिलने आए।

 

मोल्ला कहते हैं, “जब वे आए तो हम सब मिलकर खूब रोए।”

 

माता-पिता भारतीय और उनका बेटा विदेशी कैसे?

 

अदालत द्वारा उन्हें विदेशी बताए जाने के बाद पुलिस उन्हें एक नजरबंद केंद्र ले गई थी। उन्हें खुद का बचाव करने का मौका नहीं मिला, क्योंकि वह अदालत में उपस्थित नहीं थे। वर्ष 1998 में मोल्ला को डी-मतदाता घोषित किया गया था।

 

16 फरवरी, 2010 को, ‘एकपक्षीय निर्णय’ द्वारा ( केवल एक पार्टी पर विचार करने के बाद) राज्य ने उन्हें एक विदेशी घोषित किया गया।  ‘एकपक्षीय निर्णय’ आम हैं, क्योंकि जो नोटिस पर हैं, या तो उन्हें नोटिस नहीं मिलता  (घर और काम के पते सैकड़ों किलोमीटर अलग हो सकते हैं) या फिर वो लापता हो जाते हैं, जैसा कि 26,000 से अधिक मामलों में हुए हैं, हालांकि सीमा पुलिस के अनुसार कई लोग गिरफ्तार भी हुए हैं।

 

मोल्ला को अपने मामले का विवरण नजरबंद केंद्र में मिला।  उन्हें संदिग्ध नागरिक के रूप में सूचीबद्ध किए जाने के 15वर्ष के बाद। उनके वकील, जो उनके गांव से थे, उन्होंने बताया कि उनका केस उनके पक्ष में मजबूत है। मोल्ला ने कहा कि “मैंने पहली बार सोचा कि मैं स्वतंत्र हो पाउंगा।”

 

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रोती हुई बेटी और मां के साथ मोइनल मोल्ला।  3 अगस्त, 2016 को असम के एक नजरबंद केंद्र से मोल्ला को दो साल बाद रिहा किया गया था। एक अशिक्षित जिल्दसाज  मोल्ला को एक विदेशी घोषित किया गया था। हालांकि उनके माता-पिता और बच्चे भारतीय हैं। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता प्रमाण स्वीकार कर उन्हें मुक्त कर दिया है। उसकी रिहाई पर पूरा गांव उन्हें लेने आया था। फोटो: विशेष व्यवस्था से

 

मोल्ला की रिहाई के रास्ते में गुवाहाटी उच्च न्यायालय में तीन खारिज अपील भी शामिल हैं। एक रिट याचिका, रिट अपील और एक समीक्षा याचिका। यह सर्वोच्च न्यायालय था, जिसने मोल्ला के नागरिकता प्रमाण पत्र को खारिज करने का कोई कारण नहीं पाया। उनके माता-पिता भारतीय थे, उनकी पत्नी, बच्चे, भाई और बाकी परिवार भारतीय थे। उनके पिता का भूमि रिकॉर्ड 1938 का था। गांव बुर्रा ने एक निवास प्रमाणपत्र जारी किया था। इस दस्तावेज को अक्सर राज्य द्वारा स्वीकार किया जाता है, जब अन्य रिकॉर्ड अधूरे, गलत या नष्ट होते हैं। मोल्ला की चार पुश्तें 1951 की नागरिकता सूची और 1966 के मतदाता सूची पर थे,  और उनके माता-पिता 1970 के मतदाता सूची में थे।

 

इन दस्तावेजों में से एक या सभी को पूरे भारत में नागरिकता का प्रमाण माना जाता है। लेकिन किसी भी राज्य में ‘विदेशी ट्रिब्यूनल’ नहीं है। असम में अब 100 है, जो 1964 की तुलना में चार ज्यादा है , जो नागरिकता प्रमाण की मांग करता है जैसा कि असम करता है। अवैध अप्रवासन का मामला मुख्य रूप से बांग्लादेशियों और मुसलमानों को लेकर बढ़ते वैमनस्य से भी जुड़ा है।

 

क्यों नागरिकों साबित करे कि वे 1971 से पहले असम में आए थे?

 

वर्ष1985 में, जिस साल मोल्ला का जन्म हुआ था, पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने असम समझौते पर हस्ताक्षर किया था, जिसमें कहा गया था कि 24 मार्च 1971 के बाद बाहर से राज्य में प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति को एक विदेशी माना जाएगा।

 

यह तारीख गैरकानूनी अप्रवासियों को हटाने के अनगिनत प्रयासों का केंद्र है। हालांकि, अवैध अप्रवास पर चिंता पहले भी स्पष्ट थी,जब 67 साल पहले 1950 में अप्रवासी अधिनियम  पारित हुआ था।

 

वर्ष1950 के अधिनियम में कहा गया है, “पिछले कुछ समय से पूर्वी बंगाल निवासियों की एक बहुत बड़ी संख्या में असम में आने से एक गंभीर स्थिति पैदा हुई थी। इस तरह के बड़े प्रवास प्रांत की अर्थव्यवस्था के लिए परेशानी का कारण हैं, इसके अलावा इससे कानून और व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा होती है।”

 

1985 का समझौता बांग्लादेश से अवैध आव्रजन के खिलाफ छह साल तक हिंसक विरोध प्रदर्शनों की परिणति थी, जिसे असम आंदोलन के रूप में जाना जाता है। बंग्लादेश एक ऐसा राष्ट्र है, जिसके साथ असम का 4,096 किलोमीटर की सीमा का हिस्सा लगता है। असम की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी वर्ष1961 में 23.3 फीसदी थी। यह बढ़कर वर्ष 2011 में 34 फीसदी हुई है, जैसा कि जनगणना के आंकड़ों में बताया गया है।

 

असम में मुसलमानों की आबादी, 1961-2011

Source: Census 1961, 1971, 1991, 2001, 2011Note: The 1981 census could not be conducted in Assam owing to disturbed conditions.

 

जो अब तक स्पष्ट नहीं है, वह यह कि इनमें से कितने असमी, बंगाली या बंग्लादेशी हैं। जनगणना के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि 1971 में राज्य की आबादी वृद्धि दर में तेजी आई। अधिकारी कहते हैं कि प्रवास की लहर का यह प्रतिबिंब है। यही कारण है कि नागरिकता साबित करने के लिए यह कटऑफ वर्ष है। इसके अलावा 1991 में भी असम की जनसंख्या वृद्धि दर ( 0.3 प्रतिशत अंकों की दर से ) भारत से अधिक थी।

 

दशमांश जनसंख्या वृद्धि दर – 1971-2011

Source: Planning Commission

 

वह मोल्ला का गृह जिला था, जहां एक आंदोलन की शुरुआत हुई । कथित तौर पर पूर्व असम और पंजाब पुलिस के प्रमुख के पी एस गिल की अगुआई वाली इकाइयों द्वारा  20 वर्षीय छात्र, खरगेवार तालुकदार की हत्या के बाद, जो 855 ‘हुतात्माओं’ में से एक था। हम बता दें कि असम आंदोलन में मारे गए हुए लोगों को ‘हुतात्मा’ पुकारा जाता है। वर्ष 1990 का दशक शांति का था, क्योंकि सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाला ‘ऑल असम स्टूडेंट यूनियन’ (एएएसयू) की सरकार बन गई थी।

 

वर्ष 2004 में भारत के गृह राज्य मंत्री ने संसद को बताया कि असम में 5 बिलियन बांग्लादेशियों का (पश्चिम बंगाल में 5.7 मिलियन सहित 20 मिलियन देशव्यापी) निवास था। यह एक ऐसा बयान था, जिसे उनकी पार्टी कांग्रेस द्वारा ही वापस लेने के लिए कहा गया था।

 

वर्ष 2010 के दशक तक, अवैध अप्रवासियों को पहचानने और हटाने की प्रक्रिया की विफलता ही थी कि 1971 के बाद से 80,000 से कम की पहचान हो पाई या हर साल लगभग 1,740। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी वादों में से एक यह भी था कि बांग्लादेशियों को वापस भेजना है। बंगाल में एक चुनाव रैली में उन्होंने कहा था, “आप इसे लिख सकते हैं। 16 मई के बाद, इन बांग्लादेशियों को अपने बैग के साथ तैयार रहना चाहिए।”

 

जब असम में भाजपा सरकार आई, बांग्लादेशी विरोधी अभियान ने जोर पकड़ा और नागरिकता (संशोधन) विधेयक -, जो संसद में लंबित है, के माध्यम से अवैध बांग्लादेशी हिंदू अप्रवासियों को स्वचालित नागरिकता प्रदान करने की दिशा में माहौल बनने लगा।हालांकि यह उतना आसान नहीं है जितना कि प्रतीत होता है।

 

तालुकदार के भाई ने 11 दिसंबर 2016 को टाइम्स ऑफ असम को बताया, “अगर सरकार हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता देती है तो असम आंदोलन शहीदों का बलिदान बेकार हो जाएगा।”

 

बेदखली करने की धीमी, विवादास्पद प्रक्रिया ने बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप किया। वर्ष 2005 में, सुप्रीम कोर्ट ने असम में अवैध आबादी की तुलना “बाह्य आक्रमणकारियों” से की है। वर्ष 2014 में, सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के पुनर्निर्माण के अलावा 64 अतिरिक्त विदेशी ट्रिब्यूनल को मौजूदा 36 में शामिल करने का आदेश दिया था।

 

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गुवाहाटी, असम में ‘कामरूप फॉरनर्स ट्राइब्यूनल’ न्यायाधिकरण के बाहर इकट्ठा वे लोग, जिन्हें सरकार ने यह साबित करने के लिए कहा है कि वे भारतीय हैं या नहीं।  इनमें से ज्यादातर गरीब, कम शिक्षित या अशिक्षित और मुस्लिम हैं। ये लोग रिक्शा खींचने वाले हैं, श्रमिक, हैं, कल-पुर्जों का काम करते हैं और किराये पर जमीन लेकर किसानी करते हैं।

 

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गुवाहाटी, असम में ‘कामरूप फॉरनर्स ट्राइब्यूनल’.

 

उस वर्ष, हालांकि हजारों की पहचान अवैध के रुप में की गई थी लेकिन 24 से ज्यादा को वापस नहीं भेजा गया है। वर्ष 2015 में यह संख्या गिर कर एक हुई और 2016 में 13 हुई है।

 

एनआरसी अब 31 दिसंबर, 2017 की दिशा में दौड़ रहा है। यह समय सीमा है यह बताने के लिए कि असम के 34 मिलियन लोगों में कितने भारतीय नागरिक हैं। एक जनवरी की समय सीमा चूक गई है। अब मोल्ला जैसे न जाने कितने लोगों का भाग्य इस तारीख पर अटका हुआ है।

 

‘भारत में आप जन्म से एक नागरिक हैं, असम में वंश से हैं’

 

फाइलों और पत्रों से घिरे एक वातानुकूलित कार्यालय के कमरे में, सरकार और एनआरसी समन्वयक के विशेष सचिव प्रतिका हजेला अपने काम के लिए आई-पैड और डेस्कटॉप का इस्तेमाल करती हैं।

 

करीब चार वर्षों के दौरान, एनआरसी ने अपने डेटाबेस में लगभग 66 मिलियन दस्तावेज दर्ज किए हैं। (लगभग 500 ट्रक भार, उनका अनुमान है) उन 32.5 मिलियन लोगों द्वारा मुहैया कराए गए जन्म, विद्यालय, कॉलेज प्रमाण पत्र से लेकर मतदाता प्रमाण पत्र,सूची और स्थानीय-सरकारी रिकॉर्ड, जो यह साबित करने के लिए बेचैन हैं कि वे यहाँ 24 मार्च, 1971 से पहले से रहते हैं। मोल्ला इसमें से एक थे।

 

50,000 से अधिक राज्य सरकार के कर्मचारियों-अधिकारियों ने घर-घर के सत्यापन की रिकॉर्डिंग की। नकली चीजों को पकड़ने के लिए  कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की जरूरत हुई। ऐसे दस्तावेज हो सकते हैं जो जाली नहीं हैं, लेकिन सही नहीं हैं, जैसे कि हजला ने ‘कन्टैमनैटड’ चुनावी अभिलेखों, फर्जी पैन कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र का जिक्र किया।

 

दिल्ली के ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर और भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य, हाजेला ने कहा, “कुछ (दस्तावेज) जाली हैं, लेकिन बड़ी संख्या में फर्जी नहीं हैं, इसलिए मुझे वंश रिकार्ड की ओर जाना पड़ता है, अन्यथा हर अवैध वैध हो जाएगा।”

 

एनआरसी के मुद्दे के लिए वंश मूल बिंदु है। वर्ष 1971 से पहले पैदा हुए लोगों की मूल संख्या करीब 4 मिलियन है। इन 4 मिलियन के वंशज अब साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे भारतीय हैं।हेजेला ने एनआरसी के काम के तीन घंटे की प्रस्तुति के दौरान इंडियास्पेंड को बताया, “असम में, आप वंश द्वारा नागरिक हैं, बाकी भारत में, आप जन्म से नागरिक हैं।”

 

जारी किए गए, उन हजारों संस्थानों के साथ पहचान और क्रॉस-जांच करोड़ों दस्तावेजों को सत्यापित करने के लिए घरों का दौरा  करने वाले सटीकता का प्रयास करने की कोशिश करने की मुख्य विधि वंशवृक्ष है, जो एनआरसी अपने डेटाबेस से बनाती है। बच्चों और पोते के साथ एक कंप्यूटर प्रोग्राम दादा-दादी से मेल करता है। अधिकारी वंशवृक्ष के सभी जीवित सदस्यों को बुलाते हैं ताकि यह पता कर सकें कि वे परिवार के सदस्यों का नाम जानते हैं या नहीं।

 

हजला कहते हैं,  “असल में, यह सहोदरों के बीच जांच है। कई जगह मेल न होता है तो भी वे सही होते हैं। दरअसलकई पत्नियों वाले लोगों का वंशवृक्ष बनाना आसान नहीं। कुछ लोगों के उपनाम हो सकते हैं, कई लोगों के नाम परिवर्तित हो सकते हैं। लेकिन उन सभी को एक अधिकारी के समक्ष बुलाया जाएगा और उनके बयानों का सत्यापन किया जाएगा। यह एकमात्र प्रक्रिया है, जिससे सटीक गणना हो सके।”कुछ झूठ पकड़े गए हैं। उदाहरण के लिए, कई लोगों ने दावा किया कि एक ही मां या पिता हैं, परिवार के लोगों से पूछताछ कुछ पता नहीं चलता।

 

असम में 6.8 मिलियन परिवारों द्वारा जमा किए गए 66 मिलियन दस्तावेजों में- एनआरसी ने अक्टूबर 2017 तक 49 मिलियन दस्तावेजों का सत्यापन किया था। हजला यह नहीं बताते कि कितने लोगों को अवैध पाया गया था। वह अवैध लोगों की अंतिम सूची को सर्वोच्च न्यायालय में पेश करेंगे, जो यह तय करेगा कि कब यह सार्वजनिक किया जाएगा।

 

पूर्व भारतीय सैनिक की कहानी

 

49 साल के मोहम्मद अजमल हक 3 अक्टूबर, 2017 को गुवाहाटी के फ्लैट में अपने घर में थे, जब असम के पुलिस महानिदेशक मुकेश सहाय टीवी पर दिखाई दिए।

 

हक को भेजे गए एक नोटिस का जिक्र करते हुए सहाय ने कहा कि, “असल में, यह गलत पहचान का मामला था।” हक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहा गया था। यह मामला राष्ट्रीय समाचार बन गया, जिससे सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा।

 

हक, जो 18 साल की उम्र में सेना में शामिल हो गए थे और 30 साल तक काम कर चुके हैं, सहाय के स्पष्टीकरण पर नाराज हैं।

 

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अपने घर पर टीवी देखते हुए सेवानिवृत्त सैनिक अजमल हक (बाएं) और उनका परिवार। असम पुलिस प्रमुख ने स्वीकार किया कि नागरिकता साबित करने पर हक को भेजा गया नोटिस एक गलती है।

 

इंडियास्पेंड से बात करते हुए उन्होंने बताया कि, “कोई गलत पहचान नहीं थी, वे मेरे लिए आए, और जब मेरे गुस्से में भरे परिवार ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया, तो मैं पुलिस थाने गया और नोटिस स्वीकार कर लिया।  “

 

जब नोटिस आया, तो मैं हिल गया और मुझे दुख भी हुआ। यदि मैं, एक पूर्व सैनिक के रूप में, मेरे मामले को प्रचारित नहीं किया होता, तो मैं नजरबंद केंद्र में ही समाप्त हो जाता। ऐसे हजारों लोग हैं,  जो भारत के नागरिक हैं, और उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं। ऐसे नोटिस भेजने से पहले वे किस तरह की जांच कर रहे हैं? “

 

हक के नागरिकता के सबूतों में, उनके पिता के 1942 का प्राथमिक स्कूल प्रमाण पत्र, 1966 के मतदाता सूची में पिता का नाम, 1 9 51 एनआरसी पर उनकी मां का नाम, और जमीन का एक कागज है । इसके अलावा, सेना भर्ती से पहले खुद भी जांच करती है। इसके वावजूद हक परेशान रहे। वकील सैयद बुरहानुर रहमान दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक हैं । इन दिनों गुवाहाटी उच्च न्यायालय में नागरिकता के मामलों का मुकदमा लड़ते हैं, कहते हैं, “कानून और इसके कार्यान्वयन के बीच एक बड़ा अंतर है। “

 

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भारतीय सैनिक के रूप में अजमल हक। फोटो सौजन्य: अजमल हक

 

मोल्ला या हक जैसे लोगों के दस्तावेजों पर या तो विचार नहीं किया जाता या नजरअंदाज किया जाता है, जो कई मुसलमानों और वकील द्वारा लगाए गए उस आरोप को मजबूत करता है जो कहते हैं कि मुस्लिम नागरिकों को जान-बूझ कर निशाना बनाया जाता है। इस बात को दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर स्वीकार किया है।

 

बांग्लादेश से अधिकांश अवैध प्रवासी गरीब हैं। एक बार जब वे फर्जी दस्तावेज बनाकर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) और पश्चिम बंगाल से आए मुस्लिम प्रवासियों के साथ मिल जाते हैं तो उन्हें फिर चिह्नित करना पुलिस अधिकारियों के लिए आसान काम नहीं। हालांकि बोली में अंतर स्पष्ट है। उन अधिकारियों में से एक ने कहा, “आप देखते हैं, अक्सर हमारे लोगों की परवाह नहीं है कि लोग बंगाली या बांग्लादेशी हैं। यदि साईकल-रिक्शा चालक को दाढ़ी है, तो यह पर्याप्त है। “

 

7 सितंबर, 2015 को जारी अधिसूचना के अनुसार, बांग्लादेशी हिंदू अवैध प्रवासी नहीं हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी है। लेकिन उन्हें एक हलफनामा जमा करना होगा, जिसमें बांग्लादेश बॉर्डर पार करने की सटीक तारीख, रास्ता, बांग्लादेश का पता दर्ज हो और इस बात का उल्लेख हो कि धार्मिक उत्पीड़न और डर की वजह से उन्होंने देश छोड़ा।

 

यह हलफनामा लंबे समय तक वीजा के लिए दिल्ली में गृह मामलों के मंत्रालय को ऑनलाइन जमा करना है। छह साल बाद, वे नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं वास्तव में, यह प्रक्रिया या तो लोगों के लिए अज्ञात है या हिंदुओं के प्रवासियों के लिए बहुत जटिल है। सीमा पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर, 2017 तक छह बंदी शिविरों में 1,094 लोगों के बीच 264 हिंदु थे।

 

हिरासत के दौरान मोल्ला ने एक दोस्त बनाया था, मिहिर बिस्वास। बिस्वास गुवाहाटी के मैकेनिक हैं और उन्होंने मोल्ला से उनके वकील से सहायता के लिए अनुरोध किया।  मोल्ला से अपनी वकील से बात भी की। बिस्वास के पिता बांग्लादेश से 1965 में आए थे। यहां उन्होंने एक स्थानीय महिला से शादी की और कई तरह के समर्थन दस्तावेजों के साथ खुद का जीवन बनाया। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने सितंबर 2016 में उनकी गिरफ्तारी अवैध बताई।

 

मुख्य रुप से गरीब ही निशाने पर होते हैं, खासकर साइकिल-रिक्शा चालक। इंडियास्पेंड द्वारा किए गए जांच में संदिग्ध नागरिकता के ऐसे लगभग 20 मामले सामने आए। अन्य मामलों में ज्यादातर किसान, कल-पुर्जे का काम करने वाले और दैनिक मजदूर शामिल होते हैं, जिनके पास या तो प्राथमिक शिक्षा होती है या वे अनपढ़ होते हैं । सभी पूछताछ और जांच में बार-बार अपमानित होते रहते हैं।

 

फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में, चिल्लाते न्यायाधीश और नंगे पैर विवादी

 

अक्टूबर के दिन थे। टिन के छतों और पारंपरिक लकड़ी के खूबसूरत घरों, और एक सिंचाई नहर के बीच कुछ लोग इकट्ठा थे। लेकिन परिवेश की सुंदरता पर उनका ध्यान नहीं था, क्योंकि उनकी सारी कोशिश यह साबित करने में लगी थी कि वे भारतीय हैं।

 

मुस्लिम महिलाएं साड़ी ( राज्य में कुछ मुसलमान, चाहे बंगाली या असमिया, हिजाब पहनते हैं ) में थे और पुरुष लुंगी या पैंट और ढीले-ढाले शर्ट पहने हुए । बुजुर्ग पुरुषों के सर पर टोपी और दाढ़ी थी, युवाओं की नहीं थी।  लोगों के पास नहीं थे। उल्लाबुरी फॉरनर्स ट्रिब्यूनल के अदालत के बाहर संकीर्ण गलियारे में कोई पंखा नहीं था, इसलिए हर कोई पसीने से तर-बतर था। वे 90 मिनट से इंतजार कर रहे थे लेकिन जज के आने का कोई संकेत नहीं था, जो हर दिन देर से आने के लिए जाने जाते थे।

 

11.45 बजे, ट्रिब्यूनल सदस्य आए जो दो साल के अनुबंध पर हैं। मुकदमे के लिए अंदर जाने वाले हरेक को जूते बाहर निकालना पड़ा। ट्रिब्यूनल सदस्य चाहते थे, वे उनके सामने नंगे पांव आए। उनके वकील और अदालत के अधिकारियों को छूट मिली थी।

 

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मुकदमें के लिए आए लगभग सभी गरीब मुसलमानों को  असम के गुवाहाटी में उल्लाबुरी फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में अदालत के कमरे के बाहर अपने जूते छोड़ कर जाना पड़ता है। वकील और अधिकारी ही जूते पहन कर जाते हैं।

 

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न्यायालय के बाहर मुकदमा चलाने वालों के लिए नंगे पैर रहने की जरुरत है। भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए जिन लोगों को कहा गया है, उनमें से ज्यादातर मुस्लिम और वृद्ध हैं

 

59 वर्षीय समद अली के रबड़ के चप्पलों को छोड़ने के बाद अंदर गए और ट्रब्यूनल के सदस्यों ने चिल्लाना शुरू कर दिया। अली के पास प्राथमिक शिक्षा है। वह ऊंचा सुनते हैं और छोटे किसान हैं और इस बार वह एक स्थानीय असामी चैनल के साथ थे, क्योंकि उनकी नागरिकता के संबंध में दूसरी बार पूछताछ की जा रही थी, हालांकि उन्हें पहली बार नागरिक घोषित किया गया था। अली और उनके वकील माफी भी मांगी।  ट्रिब्यूनल के सदस्य ने कहा कि वह अगली बार मामले को देखेंगे। दो हफ्ते बाद, सदस्य ने फैसला सुनाया कि वह वास्तव में एक भारतीय है।

 

अली का मामला अलग है। वर्ष 2010 में उन्हें विदेशियों के एक न्यायाधिकरण द्वारा भारतीय घोषित किया गया था, लेकिन 2017 में उन्हें फिर से एक नोटिस जारी किया गया था, इस बार इस तथ्य का उपयोग करते हुए कि मतदाता सूची में ‘अब्दुल समद’ नाम का इस्तेमाल है। नाम, वर्तनी और जन्म की तारीख में अंतरपूरे भारत में दस्तावेजों में आम गलतियां हैं, लेकिन असम में ऐसे बदलावों में आप एक विदेशी घोषित कर सकते हैं।

 

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असम में गुवाहाटी के ‘उल्लुबाड़ी फॉरनर ट्रिब्यूनल’ के बाहर 59 वर्षीय किसान समद अली। अली के पास प्राथमिक स्तर की शिक्षा है।अली को वर्ष 2010 में एक ‘फॉरनर ट्रिब्यूनल’ द्वारा भारतीय घोषित किया गया था, लेकिन 2017 में उन्हें फिर से एक नोटिस जारी किया गया था क्योंकि उसका नाम मतदाता सूची में ‘अब्दुल समद’ था। बाद में संदेह दूर हुआ।

 

ये अंतर छोटा हो सकता है। जैसे किसी ने समाद अली को समत अली लिख दिया। कुछ नाम अलग होते हैं क्योंकि लोग अपने पेशे को अपने नामों में शामिल करते हैं, जैसे कि चपरासी, मास्टर, मुंशी। आमतौर पर, कई लोग एकल नामों का उपयोग करते हैं, लेकिन उदाहरण के लिए, जनगणना अधिकारी ने बाद में अलि या पहले अब्दुल जोड़ा दिया। जैसे कि समद अली उर्फ ​​अब्दुल समद के साथ हुआ था।कुछ मामलों में, कानूनी दस्तावेजों में उपनाम ​​का उल्लेख किया गया था, लेकिन कई अदालतों ने अंतर को अनदेखा कर दिया।

 

एक पुलिस स्टेशन के निकट इंडियास्पेंड ने तुफाजल इस्लाम से मुलाकात की। इस्लाम साईकल पर बच्चों के कपड़े बेचते हैं। उनकी उम्र कितनी थी? एक दुबला – पतला सा आदमी जो कहता है कि गिरफ्तार होने से पहले वो मोटा था, उम्र के सवाल पर वह कुछ सेकेंड के लिए सोचता है। फिर कहता है 34 से 36 साल। तीन साल पहले, इस्लाम के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने उन्हें पुलिस थाने में बुलाया और 200 रुपये की रिश्वत के लिए कहा: “मैंने मना कर दिया, इसलिए उन्होंने मेरे फिंगरप्रिंट ले लिए और कहा, तुम एक विदेशी हो।”

 

छह महीने बाद, एक पुलिसकर्मी ने नोटिस दिया, जिसमें नागरिकता के प्रमाण के साथ अदालत में उपस्थित होने को कहा गया था। मामला दो साल तक चला गया। पहले वकील ने इस्लाम से 1.3 लाख रुपए की फीस ली और उसकी सारी जमा-पूंजी चली गई।

 

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तुफाजुल इस्लाम को याद नहीं कि उनकी उम्र 34 है या 36 वर्ष । स्थानीय पुलिस द्वारा नागरिकता साबित करने की मांग के बाद उनकी 1.3 लाख रुपए की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई है। दो साल बाद और वकीलों के बदलने का बाद, एक ‘फॉरनर ट्रिब्यूनल’ ने स्वीकार किया कि वह भारतीय हैं। इस्लाम गुवाहाटी शहर में सायकल पर बच्चों के कपड़े बेचते हैं।

 

अंत में, उन्हें 31 साल के वकील अमन वादुद के बारे में पता चला, जो इस तरह के मामलों से लड़ने के लिए निपुण हैं या केवल उतना ही लेते हैं जो ग्राहक देते हैं। न्यायाधिकरण न्यायाधीश वाडूद से सहमत था। इस्लाम भारतीय था और उनकी मां का नाम 1966 के मतदाता सूची में था। वदुद ने कहा, “ये कॉपी पेस्ट का मामला हैं। पुलिस बार-बार उसी प्रकार का कार्यप्रणाली का उपयोग करती है, और गरीबों को कई मामलों में बार-बार परेशान किया जाता है।”

 

हजेला कहते हैं, “अगर मैं बांग्लादेश से अवैध प्रवासी हूं, तो मुझे पहली बार क्या करना चाहिए? मैं दस्तावेज बनाना शुरू कर दूंगा। मैं कहूंगा कि मैं उस का बेटा हूं, जिसका नाम रोल पर है। मैं एक पिता को गोद लूंगा। मुझे गांव के मुखिया से एक प्रमाण पत्र मिलेगा। मैं नागरिक आपूर्ति विभाग जाऊंगा और एक राशन कार्ड प्राप्त करूंगा-वे केवल यह जानना चाहते हैं कि मेरे परिवार में कितने लोग हैं। मैं एक ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त कर सकता हूँ इनमें से किसी भी दस्तावेज के साथ, मुझे मतदाता सूची में शामिल किया जा सकता है। यह नागरिकता का वास्तविक प्रमाण है, लेकिन मैं मतदाता सूची पर भरोसा नहीं कर सकता हूं। “

 

यह प्रक्रिया समझ के बाहर

 

किसकी गिरफ्तारी करें, यह निर्णय लेने में सरकार के अलग-अलग हथियारों के विरोधाभासी दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए गुवाहाटी विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर मनिरूल हुसैन ने कहा, “यह बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा है। यह भूत का पीछा करने जैसा है।  “

 

असमिया मुस्लिम हुसैन ऊपरी असम में लखीमपुर से है, जिसे ‘मूल’ असमिया के गढ़ के रूप में माना जाता है। प्रवासियों, चाहे बंगाल से हों या बांग्लादेश से,  निचले असम में एकत्रित होते हैं। उन्होंने स्मरण किया कि 1960 के दशक में पुलिस ने कितनी मनमानी की थी, जब लगभग 200,000 बंगाली बोलने वालों को बिना मुकदमे के निर्वासित किया गया था।

 

हुसैन ने 1965 में पुलिस द्वारा अपने घर के निकट एक गरीब मुस्लिम परिवार के प्रताड़ना का उदाहरण दिया। “वह आदमी इतना अधिक घबरा गया था कि  जब पुलिस ने उनसे पूछा कि कब वे यहां आए थे, उन्होंने कहा कि 10 साल पहले। मेरी मां ने बताया कि वे करीब आधे सदी से यहां रह रहे थे। अगली सुबह, वे सभी चले गए थे पुलिस को लक्ष्य दिए गए थे। “

 

पिछले 51 वर्षों से अगस्त 2017 तक 29,738 “बांग्लादेशियों” को “वापस भेज दिया गया है”, ( बांग्लादेश की सीमा के पास ले जाकर छोड़ दिया गया ), जैसा कि इंडियास्पेंड के साथ साझा किए गए सीमावर्ती पुलिस के आंकड़ों से पता चलता है।

 

एक विचार मंच ‘कार्नेगी इंडिया’ की ओर से 01 जून, 2016 की टिप्पणी के अनुसार, “… भारत-बांग्लादेश सीमा पर कभी-कभी अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वापस करने का अभ्यास प्रभावी नहीं रहा है। उनकी या तो स्वेच्छा से प्रवेश करने या बांग्लादेशी सीमा रक्षक द्वारा भारत में वापस धकेलने की संभावना होती है। इसके अलावा, निर्वासन की ऐसी व्यवस्था किसी भी कानूनी ताकत से रहित है। “

 

आज, कोई भी व्यक्ति “वापस भेजने” की बात नहीं करता। हालांकि कानूनी प्रक्रिया दोषपूर्ण है, और बांग्लादेश के साथ दोस्ताना संबंध हैं। उनसे निरंतर बात हो रही है, हालांकि वर्तमान सरकार ने नोटिस जारी करने के लिए पुलिस को टारगेट दिए हैं।

 

उनके कार्यालय में, घोषित विदेशियों की, गिरफ्तारी, दोषी और जारी किए गए की अद्यतित सूचियों को हाथों से सफेद बोर्ड पर लिखा जाता है। असम की सीमा पुलिस के मुख्य पुलिस प्रमुख आर एम सिंह ने टारगेट की बात को खारिज कर दिया, लेकिन गलत कानूनी कार्यवाही की संभावना को स्वीकार कर लिया।

 

सिंह ने कहा, “पुलिस सचमुच दबाव में है, इसलिए इनमें से कुछ चीजें (उत्पीड़न) होती हैं।” उन्होंने कहा कि रुखे तरीके से वापस भेजने के दिन अब समाप्त हो गए हैं और निर्वासन अब राजनयिक प्रक्रिया है।

 

यह राजनयिक प्रक्रिया लाखों बांग्लादेशियों को निर्वासित होने की संभावना को रोकती है, भले ही उनकी पहचान उस रुप में की गई हो। केंद्रीय गुवाहाटी में एक शांत लेन में अपने घर-सह-कार्यालय में, एक काले और नीले रंग की सूट में कपड़े पहने एक युवा राजनयिक काजी मोंताशिर मुरशेद ने वियना कन्वेंशन द्वारा निर्वासन के लिए निर्धारित प्रक्रिया को बताया-“एक बार जब किसी की निर्वासन के लिए पहचान की जाती है, तो भारतीयों को निकटतम बांग्लादेशी उच्चायोग को सूचित करना चाहिए।

 

एक टीम तब साक्षात्कार करेगी और स्वयं को संतुष्ट करेगी कि वह वास्तव में एक बांग्लादेशी है और एक अस्थायी पासपोर्ट की व्यवस्था करता है। एनआरसी क्या करता है यह चिंता का विषय नहीं है।”

 

बांग्लादेश के सहायक उच्चायुक्त और गुवाहाटी में मिशन के प्रमुख, मुरशीद ने इंडियास्पेंड से कहा, “हमारी स्थिति यह है कि एनआरसी भारत की सरकार का आंतरिक मामला है।” “सैद्धांतिक रूप से” उन्होंने जो निहित किया वह तथ्य है कि बंग्लादेश यह अनुसरण करता है और उसे पता है कि असम में अशांति है।

 

मुरशेद कहते हैं, “1971 के बांग्लादेश और आज का बांग्लादेश समान नहीं है। दरअसल, कई मानव-विकास सूचकों पर बांग्लादेश भारत से आगे निकल गया है। उन्होंने तर्क दिया कि असम में बांग्लादेशियों के आने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं था। हमारा न्यूनतम मजदूरी अधिक है और अगर वे 1971 से पहले आए तो हमें इसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए। तब कोई बांग्लादेश नहीं था। “

 

अधिकांश लोग दूसरे वर्ग के नागरिकों के रूप में रह सकते हैं!

 

लेकिन भारत की दूसरी सबसे बड़ी शिशु मृत्यु दर के साथ एक राज्य, असम में वर्तमान राजनीति अवैध आप्रवासन और मुस्लिम प्रश्न के आसपास घूम रही है।

 

“हिंदू जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है। लेकिन मुस्लिम दर बढ़ रहे हैं, ” जैसा कि वाशिंगटन पोस्ट ने 27 नवंबर, 2016 को हिमांता बिस्वा सरमा, असम सरकार में वित्त मंत्री (और एक बार असम समझौते को लागू करने के प्रभारी मंत्री) का हवाला देते हुए कहा था।

 

“यहां अधिकांश मुस्लिम बांग्लादेश से हैं। अगर यह जारी है, तो असमिया हिंदू जल्द ही अल्पसंख्यक बन जाएंगे; हम अपनी भाषा, हमारी संस्कृति, हमारी पहचान खो देंगे। “

 

अंतर्राष्ट्रीय वास्तविकताओं और संबंधों की जटिलताओं ने बड़े पैमाने पर असम की सरकार की ओर से निर्वासन की संभावना को मंद किया है।जो भी वर्तमान तात्कालिकता और गति, पहचान प्रक्रिया की संभावना हजारों में होगी, जैसा कि नाम न छापने की शर्त पर इस प्रक्रिया में शामिल एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा। सरकार के एक अधिकारी ने कहा, “यह एक बेवकूफी भरा काम है। यह देखते हुए कि सामूहिक निर्वासन कभी नहीं होगा, भारत की सरकार के साथ हमारी पृष्ठभूमि की चर्चाएं दो संभावनाओं के आसपास चल रही हैं: एक, जो कि पहचाने गए हैं वो चुनावी सूची से हटा दिए जाएंगे और उनके भूमि अधिकार, जहां लागू हो, रद्द कर दिए जाएंगे। संक्षेप में, अधिकांश लोग दूसरे वर्ग के नागरिकों के रूप में रह सकते हैं। “

 

गुवाहाटी में पहले से ही मोल्ला की यही हकीकत है, भले ही वह एक भारतीय है। वह सुबह से शाम तक किताबों को जिल्द लगाने का काम करते हैं, उसके तीन बच्चे स्कूल में हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनका क्या होगा।

 

मैंने पूछा, वह अपने राज्य की सरकार से क्या चाहते थे ?

 

मोल्ला भ्रमित दिखे। उसने कहा, “आपका क्या मतलब है? हमारे जैसे लोगों के लिए कोई सरकार क्या करेगी?”

 

मैंने पूछा, सत्ता में कौन सी पार्टी थी।

 

उन्होंने सोचते हुए कहा, “कांग्रेस?”

 

और भारत के प्रधान मंत्री?

 

कुछ पल के लिए उन्होंने सोचा।

 

फिर कहा, “मोती, हां मोती और कुछ…।”

 

(हलर्नकर संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 28 अक्टूबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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