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‘अरावली के जंगल नहीं रहे, तो दिल्ली और गुड़गांव भी नहीं रहेंगे’

Malini Nair,
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दिल्ली से सटे फरीदाबाद में मांगर-बनी एक पवित्र जंगल है। गुड़गांव के बाहर के इस इलाके को अरावली के रूप में वर्गीकृत करने में हरियाणा सरकार की अनिच्छुकता पेड़-पौधों के इस दुर्लभ और समृद्ध निवास को खतरे में डाल सकता है।

 

लगभग 17,000 एकड़ का अरावली इलाका हरियाणा सरकार की ओर से संरक्षण खत्म करने के जारी प्रयास से जोखिम में है। इस इलाके में जो जंगल हैं, वे दिल्ली के लोधी गार्डन से 189 गुना बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। ये जंगल दुनिया के सबसे पुराने पर्वत श्रृंखलाओं में फैले हुए हैं। यहां के पेड़-पौधे भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के लिए फेफड़े के लिए बहुत जरूरी हैं, जो कि दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में से एक है और 46.7 मिलियन लोगों का घर है। ये आंकड़े स्पेन की आबादी से ज्यादा है।

 

3 बिलियन साल पुराने अरावली का उत्तरी किनारा एनसीआर से सटा हुआ है। इन पहाड़ियों का एक बड़ा हिस्सा, जो दुर्लभ जंगली पौधों का आश्रय है और जो जंगली जानवरों को पोषण देता है, अब एनसीआर में रियल एस्टेट की धूम से खतरे में है, जिस कारण हरियाणा सरकार ने गुड़गांव में अरावली के ‘परिसीमन’ का प्रयास शुरु किया है। इसका मतलब यह है कि राज्य में विशेषकर फरीदाबाद और आस-पास के जिलों में अरावली के इलाके में संरक्षित जंगल की स्थिति नहीं रह जाएगी।

 

6 दिसंबर, 2017 को एनसीआर नियोजन बोर्ड की नवीनतम सुनवाई में हरियाणा ने राज्य में अरावली द्वारा कवर किए गए क्षेत्रों में भू-सत्यापन करने की अपनी मंशा की घोषणा की है। हरियाणा का तर्क है कि गुड़गांव के बाहर हरियाणा में सीमा का विस्तार  ‘गैर मुमकिन पहर’ हैं और  सुरक्षा के अयोग्य हैं। यह तर्क एक निजी आवास परियोजना पर पांच महीने पुराने विवाद में निहित है, जिसमें 52 एकड़ में फैले मास्क्यूइट पेड़ों के भूखंड को साफ करने की कहानी है।

 

संरक्षणवादियों, कार्यकर्ताओं और वन विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली की पर्वत श्रृंखला अपनी अद्वितीय जैव-विविधता और भूविज्ञान के चलते अचल संपत्ति परियोजनाओं, खनन, अतिक्रमण और उपेक्षा से सुरक्षा की हकदार हैं। यहां यह जानना भी जरूरी है कि , इन पर्वत श्रृंखलाओं का विस्तार पूर्वी गुजरात में चंपानेर और पालनपुर से 800 किलोमीटर दूर पश्चिमी उत्तराखंड में हरिद्वार तक में है।

 

नई दिल्ली के भारत आवास केंद्र में हाल ही में संपन्न अरावली उत्सव (त्योहार) में वन रक्षकों ने अपनी पारिस्थितिक विविधता के दृश्य प्रमाण प्रस्तुत किये ।  इसमें लचीला धाउ पेड़ शामिल था, जो खड़ी, चट्टानी ढलानों पर पनपता है और जहां छोटे जीव जंतुओं के साथ-साथ वन्यजीव भी रहते हैं,जिसमें तेंदुए, हिसना, नीलगाय, गॉल्स और एवियन रैप्टर्स शामिल हैं।

 

उत्तरी अरावली के सबसे समृद्ध जीवित क्षेत्र में से एक है मांगर-बनी, हरियाणा के फरीदाबाद जिले के किनारे का एक गांव। एक पवित्र छोटा जंगल, जिसमें से तीन-चौथाई से अधिक आम भूमि है, अब इसे हरियाणा सरकार की तरफ से खतरा है।

 

हमने प्रकृतिवादी और लेखक प्रदीप कृष्णा से बात की है, जो कि अरावली के जंगलों को बचाने के लिए चल रहे अभियान के सक्रिय सदस्य हैं।

 

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प्रदीप कृष्णा, प्रकृतिवादी और पर्यावरणविद्

 

राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण पर चर्चा में अरावली पर शायद ही विचार किया जाता है। इसके महत्व और उपेक्षा से इसे बचाने की आवश्यकता के बारे में बात करना क्यों महत्वपूर्ण है?

 

निश्चित रुप से अरावली ने लोगों का बहुत कम ध्यान आकर्षित किया है। कई मामलों में वह दिल्ली और गुड़गांव के लिए स्थानीय मुद्दा है और इसी कारण हमने कहा कि प्रदर्शनी ‘उत्तरी अरावली’ के बारे में है। लेकिन शहरी महानगरीय क्षेत्रों का पड़ोसी ग्रामीण इलाकों के प्रति असंवेदनशील होना भारत में सार्वभौमिक मुद्दा है। अरवाली के प्रति उपेक्षा की ये बड़ी वजह है।

 

मैं भारत के महानगरों में से एक भी उदाहरण नहीं देख पाता, जो पड़ोस में स्थित प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा या सुरक्षा कर रहे हैं। यदि आप न्यूयार्क जैसे मेगा-शहरों को देखते हैं, तो पाते हैं कि वे लोग ऐसे क्षेत्रों को सख्ती से बचाते हैं और शहर के आस-पास के बड़े जंगली इलाकों पर ध्यान देते हैं क्योंकि वे क्षेत्र उनके लिए पानी के स्त्रोत होते हैं। यूरोपीय संघ ने भी अपने शहरों के लिए इसी प्रकार की योजना बनाई है।

 

हम इस तरह का कुछ भी नहीं करते हैं। भारत में कहीं भी शहरी क्षेत्रों के पड़ोस में स्थित वन्य या अर्द्ध-जंगली या कृषि क्षेत्रों को शहर का विस्तार होने के लिए खाली माना जाता है।

 

यहां अधिकांश लोग, यहां तक कि प्रकृति प्रेमी भी, अरावली के बारे में रुची नहीं रखते हैं। क्या आप इसकी पारिस्थितिक विशिष्टता को विस्तार में बता सकते हैं?

 

हम सभी उत्तरी आरावली को दिल्ली के कई पर्वत पृष्ठ जैसा ही सोच कर बड़े हुए हैं । यह सच है कि शहर में हर जगह पर्वत पृष्ठ जो आप देखते हैं, वे छोटे हो रहे हैं और उनपर तेजी से फैलने वाले दक्षिण अमेरिकी पेड़  ‘विलायती कीकर’ लगाए जा रहे हैं। इससे पहाड़ियों की विविधता और उनकी सुंदरता भी कम हुई है। यह 1920 के दशक के बाद से वन रक्षा की दुखद मिसाल है।

 

यह सब तब सामने आया, जब हमने कुछ ‘ गुप्त बीहड़ों'( प्राकृतिक जंगल के छोटे क्षेत्र )  को खोज निकाला, जो चमत्कारिक ढंग से फरीदाबाद और गुड़गांव में बचे हुए थे। तब हममें से कई पहाड़ों की प्राकृतिक पारिस्थितिकी के बारे में अपने विचारों को पूरी तरह से संशोधित करने लगे। यह एक रहस्योद्घाटन था। मैं पहली बार 2002 में मांगर-बनी गया था और मैं बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कह रहा। लेकिन जब मैं लोगों को इस छोटे जंगल को दिखाने ले गया तो वे अविश्वास और खुशी से झूम उठे थे। यह खूबसूरत है। हमारे कई पेशेवर वन रक्षकों ने जब इस जंगल की तस्वीरें देखीं तो उन्होंने हम पर ‘फेक फोटो’  का आरोप लगाया था।

 

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धाउ एक लचीला पेड़ है जो खड़ी, चट्टानी ढलानों पर उगता है, जहां और कुछ नहीं उग पाता। यदि इसे नष्ट कर दिया जाता है तो वहां कई सालों तक कुछ और नहीं उगता है।

 

मैंने सबसे पहले मांगर-बनी का नाम पुरातत्वविद् नयनजोत लाहीरी से सुना था। उन्होंने बताया था कि दिल्ली के दक्षिणी दक्षिण में अरावली में ऐतिहासिक बस्तियों की तलाश में उन्होंने एक मंच पर मांगर-बनी को ढूंढा था। इसकी खोज ने उन्हें भी चकित कर दिया था। उन्होंने मुझे एक नक्शा भेजा और मैंने मार्ग का अनुसरण किया । मांगर-बनी प्राकृतिक जंगलों की घाटी और फरीदाबाद के जल निकासी का हिस्सा था। वहां तक पहुंचकर मुझे बेहद खुशी हुई। एक आदरणीय बाबा की याद में इस जंगल  की रक्षा के लिए तीन गांवों के लोग एक साथ आए थे। नतीजा यह हुआ कि मंगर बानी का प्राकृतिक रूप सभी तरह के विनाश के बीच में बरकरार रहा, जो कि तेजी से फैलने वाले ‘प्रॉसिपिस जुलीफ्लोरा’ द्वारा चारों ओर घिरा हुआ था।

 

अरावली के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?

 

शहरीकरण का प्रसार। खराब स्थानिक योजना और दिल्ली और गुड़गांव को रहने के लिए बेहतर शहर बनाने में अरावली कैसे मदद कर सकती है, इस संबंध में लोगों की अज्ञानता।

 

हम भारत में अब भी शहरों की योजना बनाने में पुराने तरीकों का उपयोग करते हैं। हमने 1950 के दशक में ब्रिटिश शहर और देश की योजना से एक विशेष कार्यप्रणाली सीखा । लेकिन लंबे समय से बाकी दुनिया ने योजना के उन तरीकों को छोड़ दिया था, हमने प्रवृत्ति आधारित योजना का उपयोग करना जारी रखा है। जल संरक्षण, वायु गुणवत्ता, जीवन की गुणवत्ता, और अन्य परिणामों की एक पूरी श्रृंखला जैसे संसाधनों को देखने की बजाय केवल भूमि उपयोग योजना के माध्यम से जिंदगी नहीं जी जा सकती।

 

जब हम एक आधुनिक तरीके से योजना बनाते हैं, तो हमें अपने शहरों की रक्षा करने के लिए हमें ग्रामीण इलाकों में एक प्रीमियम लगाने की आवश्यकता होगी। यह विचार हमारी नियोजन प्रक्रिया में भी उत्पन्न नहीं हुआ है।

 

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गुड़गांव और फरीदाबाद दोनों में स्पष्ट रूप से अरावली के उल्लेख के साथ राष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र को हरे रंग में दिखाता हुआ एक नक्शा

 

पिछले कुछ दशकों में निर्माण या उपेक्षा के चलते जो नुकसान हुआ है, उस बारे में क्या आप हमें कुछ बता सकते हैं?

 

 मैं नहीं जानता कि नुकसान को कैसे मापते हैं। यह सच है कि दिल्ली और हरियाणा के वन विभागों को उनके अर्ध जंगली वनों के लिए कोई ख्याल नहीं है। हरियाणा यह कह रहा है कि मंगल बानी ‘तकनीकी रूप से’ एक जंगल नहीं है। यह बेतुका है। कुछ वन अधिकारी हैं, जिन्होंने बहादुर भूमिका निभाई है लेकिन उन्हें सरकार और सिविल सेवकों का सामना करना पड़ता है, जो विकास की प्रतीक्षा में जंगलों को खाली भूमि के रुप में देखते हैं।

 

इसी समय, यह बात कि दिल्ली में सेंट्रल रिज अभी भी बरकरार है (यह सभी 900 हेक्टेयर) एक अद्भुत चीज है। लंबे समय से यह संरक्षित हैऔर अगर यह एक संरक्षित क्षेत्र के रूप में बना रहता है, तो संभवत: एक दिन दुनिया के किसी भी राजधानी शहर के सबसे अद्भुत जंगलों में से एक बन सकता है।

 

क्या अरावली के जल स्रोत खतरे में हैं? क्या आप हमें उनकी प्रकृति और मूल के बारे में कुछ बता सकते हैं?

 

 इस क्षेत्र के जलविज्ञान के बारे में अध्ययन से पता चलता है कि पानी का रिसाव अरावली में अधिक है। प्राचीन पहाड़ियों की आकृतियां और दरारें जल के लिए एक शानदार परिवेश बनाते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि पहाड़ियों के करीब भूजल पानी कम खारा है, और बहुत कम प्रदूषित है। अकेले इस तथ्य के कारण ही पहाड़ियों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानने के लिए पर्याप्त कारण हैं। लेकिन इस बारे में सोचें, पिछले 30 वर्षों में, पुरातत्वविदों को इस तथ्य से हैरानी हुई है कि दिल्ली के नजदीक, इन पहाड़ियों में पाषाण युग की बस्तियों के निशान मिले। ऐसी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। जाहिर है, इन जगहों पर तब भी पानी का अच्छा-खासा स्रोत रहा होगा। अरावली नदियों और झीलों की जगह थी। हम कभी-कभी इस दिशा में सोच नहीं पाते।

 

हरियाणा सरकार अरावली के जंगलों को बेकार क्यों घोषित कर रही है?

 

 सिर्फ इसलिए कि यदि हरियाणा सरकार जंगलों के महत्व को स्वीकार करती है तो वे उन्हें ‘तथाकथित’ विकास के लिए नहीं उपयोग कर पाएगी।  यह मूर्खतापूर्ण है, क्योंकि सीधी सी बात यह यह है कि इन पहाड़ियों में प्राकृतिक जंगल के किसी भी प्रकार के समाशोधन से विनाश हो जाएगा।खड़ी पहाड़ियां (जैसे मंगार) पर एक अद्भुत पेड़ का प्रभुत्व है, जिसे धाउ कहते हैं। यह एकमात्र पेड़ है जो खड़ी, चट्टानी पहाड़ियों में उगने में सक्षम है। धाऊ को हटा दें, और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र असफल हो जाएगा। यहां और कुछ नहीं उगेगा।

 

शहरी निवास के करीब अरावली के कई भाग मौजूद हैं। हमें इसके साथ कैसा वर्ताव करना चाहिए?

 

 उन्हें महत्व देकर और उन्हें जलग्रहण के रूप में संरक्षित करके, उन्हें नाजुक इलाके के रूप में चिह्नित करके हमें उन्हें बचाना चाहिए। उन्हें अतिरिक्त शहरी भूमि उपयोग के संरचना का हिस्सा बना कर हम ऐसा कर सकते हैं। लेकिन हमारी सरकारों और योजना बनाने वालों को यह नहीं पता कि यह कैसे करना है।

 

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( नायर इंडियास्पेंड के सलाहकार संपादक हैं। )

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 10 दिसंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

 

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